#चुल्लू_भर_पानी_में डूब मरो
सात ब्रह्मा जी (रजोगुण) की मृत्यु के उपरान्त भगवान विष्णु (सतोगुण) की मृत्यु होगी। सात विष्णु जी की मृत्यु के पश्चात् शिवजी की मृत्यु होगी। तब माता पार्वती जी भी मृत्यु को प्राप्त होगी, पूर्ण मोक्ष नहीं हुआ।
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सतगुण विष्णु की आयुः-
श्री ब्रह्मा जी की आयु से सात गुणा अधिक श्री विष्णु जी की आयु है अर्थात् पचास करोड़ चालीस लाख चतुर्युग की श्री विष्णु जी की आयु है।
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अक्षर पुरूष अर्थात् परब्रह्म की आयु:-
परब्रह्म का एक युग ब्रह्मलोकीय शिव अर्थात् महाशिव (काल ब्रह्म) की आयु के समान होता है। परब्रह्��� का एक दिन एक हजार युग का तथा इतनी ही रात्रि होती है
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काल ब्रह्म की आयुः-
सात त्रिलोकिय ब्रह्मा (काल के रजगुण पुत्र) की मृत्यु के बाद एक त्रिलोकिय विष्णु जी की मृत्यु होती है तथा सात त्रिलोकिय विष्णु (काल के ��तगुण पुत्र) की मृत्यु के बाद
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तीर्थों व धामों पर जाना तो उस यादगार स्थान रूपी भट्ठी को देखना मात्र ही है। यह पवित्र गीता जी में वर्णित न होने से शास्त्र विरूद्ध हुई। जिससे कोई लाभ नहीं (प्रमाण पवित्र गीता अध्याय 16 मंत्र 23-24)।
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पत्थर की पूजा करें, भूले सिरजनहारा।।
कबीर परमेश्वर ने कहा है कि यदि
एक छोटे पत्थर (देव की प्रतिमा) के पूजने से परमात्मा प्राप्ति होती हो तो मैं तो पहाड़ की पूजा कर लूँ ताकि शीघ्र मोक्ष मिले।
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परब्रह्म की रात्रि (जो एक हजार युग की होती है) के समाप्त होने पर दिन के प्रारम्भ में काल व दुर्गा का पुनर्जन्म होता है फिर ये एक ब्रह्मण्ड में पहले की भांति सृष्टि प्रारम्भ करते हैं
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गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 तथा अध्याय 8 श्लोक 20 से 22 में किसी अन्य पूर्ण परमात्मा के विषय में कहा है जो वास्तव में अविनाशी है।
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भगवान शंकर जी ने पार्वती जी को एकांत स्थान पर उपेदश दिया था जिस कारण से माता पार्वती जी इतनी मुक्त हो गई कि जब तक प्रभु शिव जी (तमोगुण) की मृत्यु नहीं होगी, तब तक उमा जी की भी मृत्यु नहीं होगी
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शिव, सदाशिव (काल ब्रह्म) के सबसे छोटे पुत्र हैं
शिवपुराण (पृष्ठ 86) में लिखा है, "हमने सुना है कि भगवान सदाशिव (ज्योति निरंजन/काल ब्रह्म) शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।
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जो भक्ति की साधना शास्त्रों में वर्णित नहीं है, उसे करता है तो उसे न तो सुख प्राप्त होता है, न उसे भक्ति ��क्ति यानि सिद्धि प्राप्त होती है तथा न उसकी गति यानि मुक्ति होती है
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सूक्ष्मवेद में कबीर साहेब ने कहा है:-
कबीर, पत्थर पूजें हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार।
तातें तो चक्की भली, पीस खाए संसार।।
बेद पढ़ैं पर भेद ना जानें, बांचें पुराण अठारा।
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वह कल्याणकारी हैं। भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान महेश इन तीनों देवताओं की उत्पत्ति सदाशिव के अंश से हुई है।" ब्रह्मा, सदाशिव जिसे काल भी कहते हैं के ज्येष्ठ पुत्र हैं ,मझोले विष्णु जी और सबसे छोटे पुत्र शिव जी हैं
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श्री शिव महापुराण में विद्यवेश्वर संहिता भाग-1 पृष्ठ 17.18 अध्याय 9-10 में स्पष्ट है कि सदाशिव यानि काल ब्रह्म श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा शिव जी के पिता जी हैं।
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इसी विध्वेश्वर संहिता के 25 पेज पर खुद सदाशिव कहते है कि शिव लिंग वास्तविकता में लिंग और लिंगी का अभेद रूप है।
इसी के बारे में संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि शिवल��ंग वास्तविकता में male private part और
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First India News Exposedश्री देवी महापुराण के तीसरे स्कंद के अध्याय 4-5 पृष्ठ 138 में श्री विष्णु जी स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि मेरा (विष्णु का) श्री ब्रह्मा का तथा श्री शिव का आविर्भाव यानि जन्म तथा तिरोभाव यानि मरण होता है। तीनों को जन्म देने वाल
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🔶गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में स्पष्ट किया है कि जो साधक शास्त्राविधि त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है यानि जो भक्ति की साधना शास्त्रों में वर्णित नहीं है,
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जिससे कि आम जनता को हमारे धर्म शास्त्रों में लिखी सही भक्तिविधि का पता ��ल सके और वो अज्ञानी संतो-महंतो, मुल्ला-काजियों के चंगुल से बाहर निकल सके और
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संत रामपाल जी महाराज जी और उनके अनुयायियों ने कई बार भारत सरकार से प्रार्थना की है कि एक बार आध्यात्मिक ज्ञान चर्चा भारत देश के सभी धर्म गुरुओं के बीच करवाई जाए
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ब्रह्मा और विष्णु की लड़ाई को रोकने के लिए ब्रह्म यानी सदाशिव ने तेजोमय लिंग की स्थापना की थी जैसा कि विद्वेश्वर संहित�� में बताया गया है। इसी विध्वेश्वर संहिता के 25 पेज पर खुद सदाशिव कहते है
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पूर्ण परमात्मा (अल्लाह) की भक्ति करके पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर सके और उस सनातन परम धाम में पहुंच सके जिसके बारे में गीता अध्याय 18 के श्लोक 62 में बताया गया है जहां जाने के बाद फिर इस संसार में लौटकर नही आना पड़ता।
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