Exposing Whispers from Palaces-Secretariat-Assembly-Media.
🙏 to all who dare to stand with us; Without You, this handle is just word. #HappyToHelp | VŌX POPULĪ
Some users dragged the jewellery brand through the mud for allegedly mocking Hindu traditions and demanded a boycott of the brand as well
Link in Comment Section to read full story.
#kritisanon#rakshabandhan#giva
आदरणीय महोदया,
JNVU जोधपुर बीएड फाइनल ईयर की Regular छात्रा है। कॉलेज द्वारा 25,000 की डोनेशन मांगी जा रही थी। ना देने के कारण कॉलेज ने द्वेषतावश Sessional Marks में जानबूझकर Absent (A*) चढ़ाकर फेल कर दिया है
नामPUSHPA
रोल नंबर 25BED15936
Enrollment No 20R/28946
@KumariDiya
तीन दिन के अथक प्रयास के बाद मुझे रीटा जी मिली। मैने जब उन्हें सुना तो मैं खुद को इस कहानी को डाक्यूमेंट करने से रोक नहीं पाई। रीटा सिंगल मदर है, दो दो जॉब करती है। रात को 2 बजे तक मैं खुद इनके साथ रही और अब लिंक से आप स्टोरी पढ़ सकते है, आपको अच्छी लगे तो शेयर करिएगा!
जयपुर की बजाज नगर थाना पुलिस ने नकली नोट की गैंग को पकड़ा,,4 आरोपी गिरफ्तार हुए,,पुलिस ने आरोपियों से पूछताछ की तो एक आरोपी कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता का बेटा निकला,,पुलिस और प्रवक्ता जी ने मामले को दबाने की कोशिश भी की मगर खुलासा हो ही गया।
@INCIndia@INCRajasthan@BJP4Rajasthan
क्या हमारे धनकुबेर मंत्री, सांसद और एमएलए एक किसान जगदीश सैनी से कुछ सीखेंगे?
बच्चों को छत नहीं मिली तो इस किसान ने पहले साढ़े तीन करोड़ की जमीन दे दी और भ्रष्टाचारियों का बनाया स्कूल भवन गिर गया तो उन्होंने अब अपने घर का आधा हिस्सा उसी स्कूल को दे दिया। हमारी विधानसभा और संसद में जगदीश सैनी को होना चाहिए या उन्हें जो आज वहाँ बैठे हैं और जिनके कारण तीन दशक यानी छह सरकारों के समय से इस स्कूल के हालात इतने बदतर हैं।
+++
आप राहुल चौधरी के बनाए इस विडियो को देखिए।
राहुल चौधरी कोई पत्रकार नहीं है। लेकिन यह मुझ जैसे कितने ही पत्रकारों को शर्मसार कर रहा है। हम पत्रकारों के चेहरे से तो इस लड़के ने सारे नकाब हटा ही दिए हैं, हमारे जनप्रतिनिधियों की असलियत भी इसने खोल कर रख दी है।
राहुल चौधरी की अभिव्यक्ति अनगढ़ हो सकती है, उसकी दृष्टि नहीं। उसके पास शायद प्रेस-कार्ड नहीं, जो कि मेरे पास भी नहीं; लेकिन इस लड़के के पास वह नागरिक चेतना है, ज��� कई बार बड़े-बड़े न्यूज़रूमों और हम जैसे पेशेवर पत्रकारों की आँखों से भी ओझल हो जाती है।
और मैं यह बात गहरी आत्मग्लानि के साथ लिख रहा हूँ।
मैं जिस जयसिंहपुरा में रहता हूँ, उससे पांच सौ मीटर दूर डेहर की ढाणी का यह सच शर्मसार करता है।
जिस सत्य को एक सजग युवा नागरिक ने देख लिय��, उसे मैं नहीं देख पाया, जबकि अपने को पत्रकार समझता हूँ। पत्रकारिता की पहली कसौटी शायद यही है कि हम अपने आसपास के अदृश्य दुःख को देख सकें; इस कसौटी पर यह मेरी निजी विफलता और शर्मिंदगी है।
+++
यह कहानी एक किसान जगदीश सैनी की है। उन्होंने 1997-98 में, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जी के आह्वान पर हर बस्ती के निकट विद्यालय खोलने की सरकारी मुहिम चली, तब विद्यालय के पास अपनी जमीन नहीं थी। जगदीश सैनी ने सात सौ व���्गगज का अपना कॉर्नर प्लॉट विद्यालय को दे दिया। आज उस जमीन का बाजार-मूल्य करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये है। यों किसी दान का मूल्य बाजार तय नहीं करता, लेकिन सरकारी अफसरों, शिक्षा विभाग, इलाके के विधायकों और सांसदों और 1997 से अब तक रहे शिक्षा मंत्रियों की कृतघ्नता का परिमाण समझने के लिए यह आँकड़ा जरूरी है।
जगदीश सैनी के उसी कॉर्नर प्लाॅट पर राजधानी के ही एक हिस्से में यह विद्यालय भवन बना। यह इतना ज���्दी ढह गया तो ��प समझ सकते हैं कि कितने भ्रष्ट और बेईमान लोगों ने इसे बनाया होगा। एक सामान्य शिक्षित, लेकिन नैतिक आभा से दिपदिपाते किसान और सरकारों में बैठे लोगों की नीयत की तुलना इससे की जा सकती है।
भवन बना, लेकिन समय, उपेक्षा और प्रशासनिक आपाराधिक उदासीनता के बीच वह जर्जर होता गया। लगभग डेढ़ वर्ष पहले एक शिक्षिका बच्चों को पढ़ा रही थीं। संयोग से वे और बच्चे कमरे से बाहर निकले ही थे कि छत धड़ाम से गिर पड़ी��� कुर्सियाँ-मेजें मलबे में दब गईं। मृत्यु उनसे केवल कुछ लम्हों के अंतर से लौट गई। यदि बच्चे वहीं बैठे रह जाते तो आज हम इसे किसी भयानक “हादसे” का नाम देकर संवेदना प्रकट कर रहे होते, जबकि वह हादसा नहीं, वर्षों की संस्थागत लापरवाही से तैयार की गई संभावित हत्या होती।
विद्यालय की छत गिर गई, पर व्यवस्था क�� नींद आज तक नहीं टूटी। बच्चों को कोई सुरक्षित भवन नहीं मिला। तब उसी जगदीश सैनी ने, जो पहले ही करोड़ों की जमीन दे चुके थे, अपने घर के दो कमरे विद्यालय के लिए खोल दिए। उन्होंने पहले अपनी जमीन दी; अब अपना घर भी दे दिया।
+++
यह केवल उनकी विशालहृदयता की कहानी नहीं है। यह हमारे शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधित्व के माथे पर लगा हुआ कलंक है।
सरपंच कहाँ था?
उस क्षेत्र के विधायक ने क्या किया?
शिक्षा विभाग कहा��� था?
पूर्व और वर्तमान सरकारों की निगरानी व्यवस्था किस काम की थी?
+++
वर्तमान जनप्रतिनिधियों की तत्काल जिम्मेदारी है, लेकिन उनसे पहले पदों पर बैठे लोग भी अपने गिरेबान में झाँकें। किसी विद्यालय का भवन एक दिन में खंडहर नहीं बनता; उसकी हर दरार वर्षों तक सत्ता की आँखों के सामने चौड़ी होती है।
मैं राजस्थान के सभी विधायकों से आग्रह करता हूँ कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में यदि किसी विद्यालय के बच्चों को सुरक्षित जगह उपलब्ध नहीं है तो मंत्री, विधायक, सांसद और अन्य जनप्रतिनिधि अपने विशाल सरकारी आवासों अथवा निजी घरों का एक हिस्सा उनके लिए खोल दें। और वहाँ जगदीश सैनी का बड़ा सारा चित्र लगाएँ और अपने जिन आकाओं के फोटो लगा रखे हैं, उन्हें कूड़ेदान में फेंक दें, ताकि प्रतिदिन याद रहे कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी एक साधारण नागरिक अपने कंधों पर ढो रहा है।
+++
राजस्थान विधानसभा के सामने विधायकों के लिए पाँच सितारा होटलों को मात देने वाले आलीशान आवास खड़े हैं। राजस्थान इंटरनेशन�� सेंटर है, कॉन्स्टीट्यूशन क्लब है और सत्ता की प्रत्येक आवश्यकता के लिए भव्य इमारतें हैं। इस प्रदेश के वक्ष परा बोझ बने नेताओं के लिए विशालकाय सरकारी भवन और लवाजमे हैं। लेकिन हमारी शिक्षा और चेतना के केंद्र आज अपने हालात पर आंसू बहा रहे हैं।
विडंबना देखिए, सत्ता को छत चाहिए तो राज्य महल खड़े कर देता है; बच्चों को छत चाहिए तो जगदीश सैनी को अपना घर खाली करना पड़ता है। यही एक सच हमारी विकास-प्रा���मिकताओं का पूरा रिपो��्ट-कार्ड है।
मैं जगदीश सैनी को प्रणाम करता हूँ। लेकिन हमारा प्रणाम सरकार को उसके दायित्व से मुक्त नहीं कर सकता। इस विद्यालय के लिए तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक भवन, नए निर्माण की समयबद्ध स्वीकृति और इस दीर्घ उपेक्षा की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
जगदीश सैनी की उदारता पर गर्व कीजिए; और उस व्यवस्था पर लज्जित भी होइए, जिसने एक नागरिक को विद्यालय के लिए पहले अपनी जमीन और फिर अपना घर देना पड़ा। लेकिन जनता के पैसे से जनता के परिश्रम से कमाए पैसे को भ्रष्टाचार और अपने वैभव के लिए खर्च करते हैं, यह जाने कब शर्मसार करेगा।
+++
इन हालात के लिए निश्चित ही शिक्षा मंत्री मदन दिलावर दोषी हैं। उन्हें जो जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, वह ग़लत नहीं है। एकदम सही है। उनकी भाषा भी ख़राब है। लेकिन क्या वे अहंकारी भी कभी थोड़ा शर्मसार होंगे, जिनके कार्यकाल में यही सब इसी तरह हो रहा था और उन्होंने मदन दिलावर से भ�� गहरी आँखें मूंद रखी थीं?
मदन दिलावर एक दलित हैं और इसीलिए उन पर हमले ��सान हैं, लेकिन मदन दिलावर जैसे ही अपराधों और उनसे भी खराब भाषा वाले उच्च और प्रभावशाली जातियों के नेताओं के कामकाज के तौरतरीकों पर कोई नहीं बोलता, जो नौनिहालों के शिक्षा केंद्रों, कॉलेजों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की बदहाली को अनदेखा करके लग्जरी होटलों को शर्मसार करते नभस्पर्शी भवन अपने नेताओं, अफसरों और कोटरी के लोगों को खुश करने के लिए खड़े करते हैं या मंदिरों पर सब कुछ लुटा रह�� हैं। ईश्वर तो कण कण में है अगर है तो उसका कोई क्या मंदिर बनाएगा। लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा और आदि शंकराचार्य से लेकर पुनर्जागरण काल तके सच्चे संन्यासियों की भाषा में कहें तो अगर कोई सच्चा मंदिर है और जो ब्रह्म के समस्त द्वार खोलता है, तर्क और विवेक तथा वैज्ञानिक सोच देता है तो वे स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज या पुस्तकालय हैं।
तो जगदीश सैनी को प्रणाम कीजिए और अपने सरकारी घरों के हिस्से उन ब���्चों के लिए खोल दीजिए, जो विद्यार्जन के लिए ��पने घर से निकले हुए हैं।
कात्यायन स्मृति में आज के हालात के लिए कितना उपुयक्त कहा गया है :
नृपाधमः स विज्ञेयस्त्याज्यं तस्य च शासनम्।
यत्र बालाश्च बालिकाः सुखेन नाधीयन्ते वै॥
अपना कोई भी संसाधन व्यर्थ न करें। हमारी ज़रूरत दुनिया की कोई भी आर्थिक ताक़त पूरी नहीं कर सकती। यह हैंडल पूरी तरह जनता की संपत्ति है। इससे जुड़े किसी भी व्यक्ति का कोई व्यक्तिगत संपर्क या संबंध महज़ काल्पनिक है। केवल इनबॉक्स ही अधिकृत है।