सिस्टम बोले तो?
व्यवस्था में सुधार संबंधी कल की मेरी पोस्ट पर आप द्वारा दी गई प्रतिक्रिया और समर्थन के लिए बहुत धन्यवाद।
मेरा मानना है कि ‘विकसित भारत’ का मतलब होगा मजबूत सिस्टम्स का काम करना। जब हम विकसित देशों से अपनी तुलना करते हैं तो हमें क्या अंतर दिखता है? उनके सिस्टम काम कर रहे होते हैं: सड़क पर चलते ही उनके यातायात का सिस्टम हमें प्रभावित करता है, सिटी बसें साफ और समय पर होती हैं क्योंकि उनका अलग सिस्टम काम कर रहा होता है, डिवाइडर पर फूल खिले होते हैं- उसका भी एक सिस्टम होता है। ऐसे कितने ही सिस्टम हम गिन सकते हैं।
हमें भी सिस्टम मज़बूत करने होंगे, समस्या निवारक (problem solving) समाज बनना होगा। इसके वैचारिक बीज बोने की जिम्मेदारी राजनीतिज्ञों की होगी और खाद-पानी देने की हम सबकी।
ऐसा नहीं है कि हम इसमें बिल्कुल फेल हैं, भारत में ही कई समस्याओं का सिस्टमैटिक हल निकाला गया है।
▪️पासपोर्ट: कुछ साल पहले पासपोर्ट बनवाना टेढ़ी खीर था, पुलिस रिपोर्ट लगवाने के लिए मेरे पास भी सिफारिशें आती थीं। लगभग एक दशक से कोई नहीं आती, सिस्टम काम करता है, जिसको चाहिए पासपोर्ट मिल रहा है और समय से मिल रहा है।
▪️भीम एप: हमारे साॅफ्टवेयर इंजीनियर्स, बैंक विशेषज्ञ और, प्राइवेट सेक्टर ने मिलकर ऐसा पेमेंट सिस्टम बना लिया जो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है।
▪️112: पहले धटना होने पर पुलिस को बुलाना एक समस्या थी। अलीगढ़ से एक छोटा प्रयोग शुरू करने का अवसर मिला ‘सेवा 100’, जिसे आगे माॅडर्न कंट्रोल रूम और फिर 112 के रुप में आगे बढ़ाया गया। आज यूपी पुलिस 8 मिनट में पहली गाड़ी पहुंचाने में कामयाब है। एक और सिस्टम!
ऐसे अनेक सिस्टम हैं, लेकिन अनेकों का अभाव भी है जो हमें एक नागरिक के रुप में खलता है। ज्यादातर तहसील, थाना और, ब्लाक से संबंधित हैं।
मोदी जी हमेशा याद दिलाते हैं कि, मंत्री के रुप में, देखो कौन सी समस्या बार-बार आ रही है। उसकी गहराई में जाओ और पूरा हल निकालो। उनके शब्दों में- “ऑटो पायलट पर डालो”। अब देखो, अगली समस्या क्या बची।
यही तो है सिस्टम।
आपको कौनसा सिस्टम कमजोर दिखता है?
कौन से सिस्टम बन गए, अच्छा काम कर रहे हैं? आपनी बात जरुर बताएं
मेरे युवा साथियों,
अकादमिक शिक्षा का महत्व है, किंतु इसके साथ आप किसी न किसी कौशल में निपुणता अवश्य प्राप्त करें। यह कौशल आपको रोजगार पाने वाला ही नहीं, अपितु रोजगार देने वाला भी बनाएगा।
उत्तर प्रदेश में अकेले एमएसएमई सेक्टर से लगभग 4 करोड़ युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं। यह कौशल उन्नयन में प्रदेश के नवसामर्थ्य का प्रमाण है।
—मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी
(योगी की पाती के प्रमुख अंश)
उत्तर प्रदेश की माननीय राज्यपाल सुश्री आनंदीबेन पटेल का बयान चर्चा में है। उन्होंने राज्य सरकार की स्कूटी योजना की अव्यावहारिक शर्तों का उदाहरण देते हुए नौकरशाही (IAS) के काम करने के तौर-तरीकों पर एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने साफ संदेश दिया- "नीति निर्धारण व्यावहारिक होना चाहिए।"
प्रशासनिक व्यवस्था और IAS अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर उनका यह आक्रोश, चिंता और खरी-खरी बातें बिल्कुल जायज हैं। मैं उनके इस विचार से सौ प्रतिशत सहमत हूँ। जब तक सरकारी नीतियां सिर्फ फाइलों और कागजों में खूबसूरत दिखेंगी और जमीन पर लागू होने लायक नहीं होंगी, तब तक लोक कल्याण का वास्तविक उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा।
नीति निर्माण में व्यावहारिकता का यह अभाव ही हमारी पूरी प्रशासनिक मशीनरी की सबसे बड़ी कमजोरी है। और इसका हल केवल आलोचना करने में नहीं है, बल्कि समस्या की जड़ तक जाकर पूरे 'सिस्टम' को बदलने में है। इसका ठोस और व्यावहारिक समाधान क्या है?
संविधान के लागू होने के 76 वर्ष बाद अब समय आ गया है कि हम भारतीय नौकरशाही के उस प्रसिद्ध ‘स्टील फ्रेम’ पर गंभीरता से पुनर्विचार करें, जिसे कभी प्रशासन की रीढ़ माना गया था। क्या यह व्यवस्था आज भी अपने मूल उद्देश्य पर खरी उतर रही है? क्या इसकी निष्पक्षता और ईमानदारी को सुरक्षित रखने वाले तंत्र प्रभावी हैं? क्या इसमें योग्य प्रतिभाओं को हम ला पा रहे हैं? और सबसे बड़ा प्रश्न: क्या यह ‘स्टील फ्रेम’ विकसित भारत के लिए उपयुक्त है, या अब समय आ गया है कि इसे अधिक लचीले, तेज और उत्तरदायी ढांचे, जैसे कार्बन फाइबर, से बदल दिया जाए?
व्यक्ति नहीं, सिस्टम!
एक आदर्श नौकरशाही की पहचान कुछ स्टार अधिकारियों से नहीं, बल्कि मजबूत सिस्टम से होती है। चुनाव प्रबंधन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। चुनाव आयोग ने ऐसी प्रक्रियाएं और व्यवस्थाएं विकसित की हैं, जहां सफलता का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि लाखों कर्मियों के सामूहिक प्रयास को मिलता है। यही कारण है कि दुनिया के कई नवोदित लोकतंत्रों ने भारत के इस मॉडल को अपनाया है। दूसरा सिस्टम, आपदा प्रबंधन का है, जहां भारत ने बहुस्तरीय संस्थागत ढांचा विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। आह भारत न केवल अपने संकटों से प्रभावी ढंग से निपटता है, बल्कि अन्य देशों की सहायता भी करता है। इन सफलताओं के समानांतर एक कठोर सच्चाई भी मौजूद है। अनेक क्षेत्रों में सिस्टम आज भी कमजोर है: जमीन की खरीद-फरोख्त, यातायात प्रबंधन, हाउस टैक्स संग्रह, नगर बसावट, आदि।
भर्ती: समस्या की जड़
किसी भी विभाग की गुणवत्ता उसकी भर्ती प्रक्रिया से तय होती है और यहीं सबसे बड़ी चुनौती छिपी है। UPSC जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा के माध्यम से विभिन्न सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है। विडंबना यह है कि भारतीय विदेश सेवा के लिए चयनित अधिकारियों ने राजनीति शास्त्र का अध्ययन नहीं किया होता है और न ही कोई विदेशी भाषा जानते हैं। कर और लेखा अधिकारी अकाउंट्स या आडिट की पढ़ाई नहीं किए होते। सबसे अहम बात यह है कि IAS को छोड़कर अधिकांश अभ्यर्थी उस सेवा में जाने का लक्ष्य लेकर नहीं आते, जिसमें उन्हें नियुक्त किया जाता है। जब न योग्यता हो और न रुचि, तो उत्कृष्टता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस स्थिति को बदलने के लिए आवश्यक है कि विभिन्न सेवाओं जैसे विदेश सेवा, राजस्व, पुलिस, आडिट के लिए अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां विकसित की जाएं। इस दिशा में कुछ सकारात्मक प्रयोग हुए भी हैं। उत्तर प्रदेश में हास्पिटैलिटी क्षेत्र के स्नातकों को कार्यालयों में व्यवस्था अधिकारी, मीडिया स्नातकों को सूचना अधिकारी और माइनिंग स्नातकों को खनन अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया है। इसके उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। इसे आगे बढ़ाना होगा।
विशेषज्ञता की कमी
आज की प्रशासनिक संरचना में विशेषज्ञता का गंभीर अभाव दिखाई देता है। लोक नीति के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों का चयन उनके ज्ञान के आधार पर नहीं होता। परिणाम, चाहे सार्वजनिक शौचालय का प्रबंधन हो या मेडिकल कॉलेज का निर्माण, हमारा सिस्टम प्रभावी व्यवस्था बनाने में सफल नहीं होता। नगर आयुक्तों द्वारा नगरीय प्रशासन की शिक्षा नहीं ली गई होती। पुलिस अधिकारियों को सर्विस में कानून, फॉरेंसिक विज्ञान की डिग्री लेने या, शारीरिक फिटनेस को अच्छा रखने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं है। ग्राम सचिव के चयन के लिए भी ग्रामीण विकास की पढ़ाई जरूरी नहीं होती। हाँ, कुछ अधिकारी बहुत अच्छा काम करते हैं, लेकिन वे अपवाद हैं, सामान्य परिस्थिति नहीं।
प्रतिस्पर्धा और विकल्प का अभाव
जहां प्रतिस्पर्धा नहीं होती, वहां ठहराव आ जाता है। पोस्टिंग में प्रायः योग्यता या रुचि का ध्यान नहीं रखा जाता। इसके विपरीत, भारतीय राजस्व सेवा में एक व्यवस्थित, विकल्प-आधारित प्रणाली देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने भी ‘चॉइस-कम-मेरिट’ मॉडल अपनाकर सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए हैं। यदि अन्य मंत्रालय भी इस दिशा में कदम बढ़ाएं- जैसे स्वास्थ्य मंत्रालय में डाक्टरों को नीति निर्माण में लगाया जाए तो सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। भारतीय वन सेवा के अधिकारियों को वन मंत्रालय में नियुक्त होना चाहिए। शिक्षकों को शिक्षा मंत्रालय में और वित्तीय विशेषज्ञों को वित्त मंत्रालय में नियुक्त होना चाहिए।
लैटरल एंट्री और एग्जिट की आवश्यकता समय की मांग है कि प्रशासनिक व्यवस्था में लचीलापन लाया जाए। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रणाली अपनाई जा सकती है, जहां प्रोफेशनल्स को निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है और हर कार्यकाल के बाद उन्हें पुनः प्रतिस्पर्धा में शामिल होना पड़ता है। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है। इसी सिद्धांत को जमीनी स्तर तक भी लागू किया जा सकता है। ग्राम प्रधानों द्वारा सचिवों के असहयोग की शिकायतें आम हैं। ऐसे पदों के लिए पारदर्शी चयन प्रक्रिया, जिसमें प्रधान का मुख्य रोल हो, न केवल कार्यक्षमता बढ़ाएगी, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही को भी मजबूत करेगी।
विकसित भारत की यात्रा
यदि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसकी प्रशासनिक व्यवस्था को भी उसी गति से विकसित होना होगा। अब यह प्रश्न पूछना होगा: क्या ‘स्टील फ्रेम’ से काम चल जाएगा या भारत की नई आकांक्षाएं एक ऐसे ढांचे की मांग करती हैं, जो अधिक लचीला और प्रभावी हो, ठीक कार्बन फाइबर की तरह? समय बदल चुका है। अब प्रशासन को भी बदलना होगा।
आधुनिकता, नवाचार और टेक्नोलॉजी से भारतीय रेल को नई रफ्तार देने वाले मा. केंद्रीय मंत्री और मेरे मित्र श्री अश्विनी वैष्णव जी को जन्मदिन की ढेरों बधाई एवं शुभकामनाएं।
@AshwiniVaishnaw
सूचना
मा. मुख्यमंत्री जी के साथ कल अति आवश्यक कार्य हेतु गाजियाबाद में रहना होगा। अतः, कल कन्नौज के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम नहीं हो सकेंगे। असुविधा के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।
असीम अरुण
मेरठ के टीपी नगर में घटित हृदयविदारक बलात्कार और हत्या की घटना के पीड़ित परिवार से लंबी बातचीत हुई और विवेचना की गहन समीक्षा की, निर्देशित किया:
▪️गिरफ्तार किए गए दो अभियुक्तों के विरुद्ध ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य संकलन करें
▪️परिवार द्वारा जिन अन्य व्यक्तियों पर शंका व्यक्त की गई उनके संबंध में गहन परीक्षण हो, दूध का दूध और पानी का पानी हो
▪️पुलिस ऐसी घटनाओं में त्वरित और गहन विवेचना किया करें, किसी को प्रदर्शन करने की जरूरत ही ना पड़े
▪️किसी को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए
भागीदारी भवन, लखनऊ में श्री कन्हैया दीक्षित जी, श्री रामजीवन राजपूत जी, श्री रजनीश राजपूत जी, एवं श्री रजत द्विवेदी जी से विस्तृत चर्चा हुई।
भाजपा के सम्मानित कार्यकर्ता रजनीश राजपूत जी को मिलेगा पूरा न्याय।
डॉ. संतोष कुमार सिंह जी से dwarfism (लघु कद वाले व्यक्तियों) के विषय में विस्तृत चर्चा हुई।
उन्होंने अपने गहन अनुसंधान के आधार पर बताया कि इस समूह के सामने स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सुगम पहुंच (accessibility) और सामाजिक स्वीकार्यता जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं।
योगी सरकार हाशिये पर खड़े हुए हर वर्ग और व्यक्ति के साथ है। लघु कद वाले व्यक्तियों के कल्याण और सम्मानपूर्ण जीवन के लिए भी हम पूरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ कार्य करेंगे।
यदि आपकी जानकारी में कोई संस्था है जो इस क्षेत्र में कार्य कर रहा हो, तो कृपया कमेन्ट में बताएं।
सरकार और समाज मिलकर इस समूह के लिए क्या-क्या कदम उठा सकते हैं, कृपया अपने सुझाव दें।
हम मिलकर योजना को मज़बूत तरीके से बनाकर अपने बहन भाई की मदद कर सकते हैं।
आज योगी जी से उत्तर प्रदेश टेबल टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री संजीव पाठक जी एवं सचिव श्री अरुण बनर्जी जी के साथ भेंट कर उन्हें प्रदेश में टेबल टेनिस की प्रगति से अवगत कराया और लघु टेबल टेनिस टेबल एवं किट भेंट की।
@myogiadityanath