Maths मेरे नाम में विषय नहीं, सोचने का तरीका,तर्क और विश्लेषण भी है। है।
जहाँ आँकड़े होंगे, वहाँ Maths होगी।
चाहे EXAM का Paper हो या देश की अर्थव्यवस्था।
लोग कहते हैं मेरे tweet Maths के syllabus से बाहर है।
मैं कहता हूँ बेरोज़गारी, GDP, बजट, महंगाई, टैक्स, शेयर बाज़ार - सब Numbers की भाषा हैं।
Maths सिर्फ़ HCF-LCM तक सीमित नहीं है।
देश की अर्थव्यवस्था से लेकर शेयर बाज़ार तक, पूरी दुनिया Numbers पर चलती है।
इसलिए Abhinay Maths नाम है, Abhinay Chapter-7 Exercise-3 नहीं।
MATHS = Mindset, Analysis, Truth, Humanity & Statistics
MATHS = Mindset And Thinking Handling Society
इसलिए सवाल चाहे परीक्षा का हो, अर्थव्यवस्था का हो या समाज का - चर्चा जारी रहेगी।
दिल्ली-NCR के इंदिरापुरम में current लगने से एक व्यक्ति की मौत हो गई।.लेकिन अब होगा भी क्या?
ठेकेदारों से क्या कहेंगे? जिम्मेदार अधिकारियों से क्या कहेंगे? नेताओं से क्या कहेंगे?
कहीं ऐसा न हो कि कल कोई सवाल पूछे तो जवाब मिले-खुद ही सड़क का पानी निकाल देते, खुद ही करंट का पता लगाकर हटा देते! एक इंसान की जान चली गई। हर रोज़ किसी न किसी की जान यह बदहाल सिस्टम ले ही रहा है।
आख़िर बदला क्या?
जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या बदला?
जिम्मेदार नेताओं ने क्या बदला?
जवाबदेही तय करने वालों ने क्या बदला?
हर हादसे के बाद फिर अगला हादसा हो जाता है।
पहली ही बारिश में सड़कें टूटने लगती हैं, गड्ढे बन जाते हैं, कहीं हाईवे धंस जाते हैं तो कहीं पुलों में दरारें दिखने लग��ी हैं। और सबसे दुखद बात यह है कि यह कोई नई घटना नहीं, बल्कि हर साल की कहानी बन चुकी है।
फिर भी न किसी ठेकेदार पर सख्त कार्रवाई होती है, न घटिया निर्माण करने वाली कंपनियों पर कोई जवाबदेही तय होती है।
हर दिन किसी न किसी की जान जोखि�� में पड़ती है, हादसे होते हैं, लोग परेशान होते हैं लेकिन सिस्टम पर कोई फर्क पड़ता हुआ नहीं दिखता।
भ्रष्टाचार और धांधली ने पूरे तंत्र को इस तरह खोखला कर दिया है कि जनता की शिकायतों की कोई कीमत नहीं रह गई। 😠जनता के टैक्स के पैसों को घटिया निर्माण, भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी की भेंट चढ़ाया जा रहा है।
विश्वगुरु बनने निकलते हैं,
विश्व-विदूषक बनकर लौट आते हैं।
ये कितने हास्यास्पद होते जा रहे हैं, न इनको कोई बताने वाला है, न इनको इतनी मामूली सी समझ बची है। इससे बेहतर होता कि अधिकारी लिखकर दे देते और ये बांच देते।
इनसे ज्यादा है शाहरुख़ khan, virat कोहली की - popularity मतलब best pm ???
बजाओ तालिया - सब चंगा सी है | यही media वालों ने pm को गुमराह कर रखा है - इतनी ताली बजाते है उनकी व्यक्तिगत सफलताओं पर कि जनता कि आह उन तक पहुँच ही नहीं पाती ||
@jpsin1 जिस बात पर प्रधानमंत्री ने मंच से ��िप्पणी की, उसी पर मैंने टिप्पणी की।
अगर sarcasm से दिक्कत है तो तर्क रखिए।
गाली देना आपकी मजबूरी हो सकती है, मेरी नहीं।
मैं इतना free नहीं हूँ कि आपकी बत्तमीजियो का जवाब देता रहु | भगवान जल्दी आंखें खोले कि - वास्तविकता देख पाओ देश की ||
मैं पुछु कि "तू कौन होता है ये पूछने वाला " तो कैसा लगेगा आपको महाशय - चाटुकारिता में इतने डूबे कि संस्कार भूल गये खेर जब cm तिलमिला रहे ह���
Minster तिलमिला रहे हो आप क्यूँ पीछे रहेंगे खामखा number काट जायेंगे ||
चढ़ावा चोरी | paper लीक | पुलों का गिरना | - ऐसा kro इन सब को भी प्राकृतिक आपदा घोषित करदो |
और सुनो modi जी के साथ तस्वीर का मतलब नहीं है कि कुछ भी बत्तमीजी करोगे आगे से हिसाब से लिखना - इससे सलाह नहीं warning समझना | ऐसा 8-10 बार कर चुके इसीलिए!!
सवाल बारिश से नहीं, उस ��िस्टम से है जो हर साल पहली तेज़ बारिश में ही डूब जाता है।
अगर हर विफलता का जवाब सिर्फ़ "प्राकृतिक आपदा" है, तो फिर "Smart City" का दावा किस बात का?
अबे तू कैसे टीचर बन गया बे ??
24 घंटे में 18 इंच बारिश क्या ���ोती है तुझे पता है??
बादल फटना क्या होता है तुझे पता है ??
प्राकृतिक आपदा क्या होती है तुझे पता है??
तू बच्चों को क्या पढ़ाता होगा बे ??
इससे भीषण प्राकृतिक आपदा केरल में आई लेकिन हमने उस पर केरल सरकार को कुछ भी नहीं कहा
क्योंकि प्राकृतिक आपदाएं सरकारों के नियंत्रण में नहीं होती
आधा अधूरा विडियो डालो और झूठ फैलाओ.. आप जैसे धूर्त लोगों ने ठेका ले रखा है।
ये रहा पूरा विडियो @NationalDastak और अगर आपने अधूरा विडियो अपने handle से नहीं हटाया तो क़ानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहिएगा।
अब विकास का नया पैमाना यही है... रील बनाओ, स्लो मोशन में चलो,
और जनता ताली बजा दे।
इसकी 2 वजह हो सकती हैं। एक तो हमारे ये नेताओं की सोच उतनी ही बड़ी है और उन्हें लगता है ��ि 2-4 चीज़ें करके देश को उन्होंने बहुत आगे पहुँचा दिया। बाहर-बाहर से वो भी... या फिर वो भी बॉस की तरह एक्टिंग कर रहे हैं, मालूम सब है... maximum इसमें से खूब लंदन, पेरिस जाते हैं...
hahahahha.......extra 2ab से निकले ही थे कि अब ये नई गणित आ गई| इधर देश बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जवाब चाहता है...और उधर भाषणों में तारीख़ों के अंकों का योग मिलाया जा रहा है।
अगली नीति भी अंकों के योग से ही बनेगी, अब नीति आयोग की जगह "अंक ज्योतिष आयोग" खोल देना चाहिए।
डेटा, तर्क और तथ्य पुरानी बातें है - नई राजनीति में 2+6 = 8 और 1+7 = 8 ही सबसे बड़ा कनेक्शन है।
ये सब न्यूज़ वाले... एक ये दीदी, दूसरे वो गज़बे भाई... डिजिटल बोर्ड पर न्यूज़ में कैसी नौटंकी करते हैं।
आजकल न्यूज़ चैनलों में पत्रकार कम, शिक्षक बनने का शौक ज़्यादा हो गया है।कभी कोई डिजिटल बोर्ड लेकर माइलेज पढ़ा रहा है, कभी कोई अर्थशास्त्��, कभी कोई विज्ञान...
इतना ही पढ़ाने का शौक है तो न्यूज़रूम छोड़िए, क्लासरूम आइए... शिक्षक बन जाइए। बोर्ड पकड़ लेने से कोई शिक्षक नहीं बन जाता।
शिक्षक बनने के लिए वर्षों का अध्ययन, अनुभव और ईमानदारी चाहिए...
उलूल-जुलूल डेटा का आधा-अधूरा विश्लेषण करके देश को गुमराह मत कीजिए।
खुद पाठशाला में सही से पढ़ लिया होता, तो आज देश के वास्तविक दृश्य पर चर्चा करते, सरकार से सवाल करते और जनता के हित को समझते...PR की क्लास नहीं चलाते।देश को न्यूज़ चाहिए... न्यूज़ के नाम पर नौटंकी नहीं।
घर की चोरी और इतने बड़े मंदिर की चोरी में ज़मीन-आसमान का फर्क है।
इसमें लंबी मिलीभगत के बिना संभव नहीं लगता।
दूसरी बात, अनुपम भाई... चोर यहाँ घर का ही बंदा है। दोनों चोरी में अंतर समझिए।
इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच चोरी हुई है, मज़ाक नहीं है। तो सिर्फ़ चोर पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर सवाल है।
मंदिर को तो कोई बदनाम नहीं कर रहा, यह कहना अनुचित है।श्रद्धा पर नहीं, व्यवस्था पर सवाल हैं।
घर में अगर चोरी होती है तो हम चोर को दोष देते हैं, घर को नहीं।
इसलिए राम में जिसने चोरी किया उसे सजा दिया जाए, राम मंदिर को बदनाम न किया जाए।
चोर हर जगह होते हैं, इससे मंदिर की गरिमा या पवित्रता कम नहीं होती।
जिस मंदिर की स्थापना में 500 साल लगे हों,
उसकी मर्यादा कुछ लोगों की हरकतों से प्रभावित नहीं हो सकती।
: अनुपम खेर, बॉलीवुड, अभिनेता
गडकरी जी, अगर लाखों वाहन मालिक माइलेज कम होने, इंजन की दिक्कत या दूसरे अनुभव साझा कर रहे हैं, तो उन्हें सिर्फ़ अज्ञान मान लेना ठीक नहीं।
जनता के अनुभवों को भी उतनी ही गंभीरता से सुनिए|
अगर E20 वा��्तव में बेहतर है, तो पारदर्शी, स्वतंत्र और व्यापक परीक्षण के आँकड़े सामने रखिए।विश्वास तर्क और प्रमाण से बनता है, भाषणों से भरोसा नहीं बनेगा|
मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह रहा हूँ कि मेरी डीज़ल गाड़ी का माइलेज पेट्रोल गाड़ी से कहीं बेहतर आ रहा है।
यदि किसी नीति से जुड़े निर्णय लेने वाले या उनके परिवार का उस उद्योग से कोई व्यावसायिक हित है, तो पारदर्शिता सबसे ज़्यादा ज़रूरी हो जाती है- conflict of interest.
आप श्रीराम की बात करते हैं। श्रीराम वन गए, क्योंकि धर्म पुत्र-मोह से ऊपर था।यदि महाराज दशरथ पुत्र-मोह में निर्णय लेते, तो शायद श्रीराम को कभी वन नहीं जाने देते। अंत में उनकी जान भी पुत्र-मोह में ही चली गई, लेकिन धर्म सबसे ऊपर रहा।
नीति भी तभी स्वीकार होगी, जब जनता को लगे कि उसमें केवल राष्ट्रहित है, किसी भी अन्य हित की छाया नहीं।
20 Fuel, गाड़ियों में Ethanol विवाद पर क्या बोले Nitin Gadkari? Manish Kashyap के वीडियो को बताया प्रोपेगेंडा?
Full Video here:
https://t.co/D4MhE6PRQM
मीडिया का स्तर देखिए...
वाह ... मुख्यमंत्री जनता के सवालों का जवाब शालीनता से दें या न दें, लेकिन उनकी भद्दी भाषा को भी "Roasted 🔥" बताकर प्रमोट किया जा रहा है।
जनता पुल गिरने पर सवाल पूछे, जवाबदेही मांगे... और जवाब में विधानसभा के भीतर ऐसी भाषा?
यही लोकतांत्रिक जवाबदेही है?
मीडिया का काम सत्ता से सवाल पूछना है या सत्ता की कटु भाषा को भी मनोरंजन बनाकर पेश करना?
पुल क्यों गिरा, जिम्मेदार कौन है, व्यवस्था कहाँ विफल हुई- इन स��ालों पर बहस कम... भाषा पर तालियाँ है।लोकतंत्र में आलोचना का जवाब तानों से नहीं दिया जाता।
Smart City सूरत ! विकास की बड़ी-बड़ी बातें , स्मार्ट सिटी के बड़े-बड़े दावे लेकिन एक बारिश ने सारी हकीकत सामने ला दी।
REEL में सब कुछ चमकता हुआ दिखाई देता है, लेकिन ��़मीन पर कुछ देर की बारिश ही पूरे System की पोल खोल देती है।
हर मानसून में जनता को जलभराव, टूटी सड़कें और बदहाल व्यवस्था ही मिलेगी।
दिल्ली का यह दृश्य सिर्फ़ एक शहर की कहानी नहीं है, बल्कि हर बरसात में देश के कई हिस्सों की हकीकत बन चुका है।
ऐसे ग���दे, भरे और जानलेवा पानी से होकर स्कूल जाने को मजबूर बच्चों के साथ कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
बरसात आने से पहले तैयारी ह���नी चाहिए, लेकिन हर साल होता सिर्फ़ खानापूर्ति है।
राजीव रंजन को सुबह से घेरा जा रहा है, सब लगे हुए हैं। पता नहीं वो गलत हैं या सही, मैं व्यक्तिगत रूप से उन्हें जानता नहीं हूँ। मगर देश में इतने बड़े-बड़े मुद्दे - पेपर लीक, स्वास्थ्य, शिक्षा, मिलावट, बेरोज़गारी जैसे गंभीर मुद्दे भी मौजूद हों हैं, उन पर इतनी प्रतिक्रिया सरकार के लोगों से आ जाती तो कितनी तसल्ली की बात थी।
समाज की संवेदनशीलता सिर्फ इससे नहीं पता चलता कि हम किस पर बोलते हैं... बल्कि इससे भी कि हम किन मुद्दों पर चुप रहते हैं।
सीता रसोई में निःशुल्क भोजन प्रसादी मिलती है।
होटल का बिल दिखाकर अयोध्या को बदनाम करके ये पत्रकार महोदय अपनी वामपंथी कुटिल मानसिक��ा ही प्रकट कर रहे हैं।