सफ़ेद लौह गोल पर्वत
मैं चाहता हूँ कि विद्रोह हो
और इतना ज़ोरदार हो कि
दिल्ली का सफ़ेद लौह गोल पर्वत
पिघल जाए
मैं उस पिघले लोहे से
हथियार बनाऊंगा
मज़दूरों के लिए
किसानों के लिए
मज़लूमों के लिए
ताकी दोबारा कोई
उस सफ़ेद लौह गोल पर्वत पर चढ़
स्वयं को ईश्वर न समझ बैठे
- रुद्राक्षधारी
दरिया ने भी तरसाया है प्यासों को
दरिया को भी प्यासा कर के देखा जाए
अब आँखों से और न देखा जाएगा
अब आँखों को अंधा कर के देखा जाए
ये सपने तो बिल्कुल सच्चे लगते हैं
इन सपनों को सच्चा कर के देखा जाए
घर से निकल कर जाता हूँ मैं रोज़ कहाँ
इक दिन अपना पीछा कर के देखा जाए
भारत भूषण पंत
आईने से पर्दा कर के देखा जाए
ख़ुद को इतना तन्हा कर के देखा जाए
हम भी तो देखें हम कितने सच्चे हैं
ख़ुद से भी इक वअ'दा कर के देखा जाए
दीवारों को छोटा करना मुश्किल है
अपने क़द को ऊँचा कर के देखा जाए
रातों में इक सूरज भी दिख जाएगा
हर मंज़र को उल्टा कर के देखा जाए
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हम लोग जो करते हैं वो होता ही नहीं है
होना जो नज़र आता है होना नहीं होता
जिस दिन के गुज़रते ही यहाँ रात हुई है
ऐ काश वो दिन मैं ने गुज़ारा नहीं होता
जब हम नहीं होते यहाँ आते हैं तग़य्युर
जब हम यहाँ होते हैं ज़माना नहीं होता
- मोहसिन असरार
जीने का दरस सब से जुदा चाहिए मुझे
अब तो निसाब-ए-ज़ीस्त नया चाहिए मुझे
ऐ काश ख़ुद सुकूत भी मुझ से हो हम-कलाम
मैं ख़ामुशी-ज़दा हूँ सदा चाहिए मुझे
- साबिर ज़फ़र
हुक्म आया है कि फ़ित्ने को भी फ़ित्ना न कहूँ
जैसा देखा है सुना है उसे वैसा न कहूँ
मेरे चुप रहने से क्या बात सँवर जाएगी
लोग ख़ुद भी तो समझते हैं कहूँ या न कहूँ
हुस्न ग़म्ज़े से छुटा इश्क़ फ़रामोश हुआ
ऐसे हालात में क्या शे'र भी सच्चा न कहूँ
- कर्रार नूरी
जनता का जीवन
अधिकांश जनता का
रद्दी की टोकरी का जीवन है;
संज्ञाहीन, अर्थहीन,
बेकार, चिरे-फटे टुकड़ों-सा पड़ा है !
देरी है-
एक दिन, एक बार, आग के छूने की,
राख हो जाना है।
- केदारनाथ अग्रवाल
तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे
हम ऐसे लोग ज़माने में फिर कहाँ होंगे
चले गए तो पुकारेगी हर सदा हम को
न जाने कितनी ज़बानों से हम बयाँ होंगे
लहू लहू के सिवा कुछ न देख पाओगे
हमारे नक़्श-ए-क़दम इस क़दर अयाँ होंगे
- इब्राहीम अश्क
शिकायत किसी से तो क्या थी मगर
गिला एक रस्म-ए-ख़राबात है
नया दुख तो मिलता है किस को यहाँ
मगर ग़म की हर शब नई रात है
हर इक शाम ताज़ा उमीद-ए-विसाल
हर इक रोज़ रोज़-ए-मुकाफ़ात है
- अहमद हमदानी
ये हमारी क़िस्मत के
जितने भी सितारे हैं
क़ुदरत-ए-इलाही ने
बे-मुराद रस्तों पर बाँध कर उतारे हैं
जिन की अपनी मंज़िल ही बे-निशान रस्ते हों
रौशनी जो ग़ैरों से मुस्तआ'र लेते हों
कैसे मैं यक़ीं कर लूँ
मेरी मंज़िलों के वो
मो'तबर इशारे हैं