कविता- सिर्फ राम नहीं आएं हैं, एक मौका लौट कर आया है।
भाग 1: राम दशरथ संवाद
लेखक, प्रस्तुति- क्षितिज भारद्वाज
Platform- KavyaManch
Production- DC Productions
Editing- Dheeraj Kumar
ये हकीकत है कि प्रोटेस्ट को लीड करने वाले लेफ्ट विंग के हैं।
पर उससे भी बड़ी हकीकत है कि इसमें भाग लेने वाले बच्चों को इस बात से घंटा फर्क नहीं पड़ रहा।
आम बच्चों ने इसे अपनी जिद बना लिया है कि प्रधान का इस्तीफा लेना है। अब आप चेतावनी देते रहिए कि इसमें असामाजिक तत्व आ गए हैं, हिंसा हो सकती है (जो यक़ीनन होगी), पाकिस्तानी, CIA, फलाना, फलाना।
दिल्ली पुलिस ने जो छिछोरेबाजी दिखाई है-- एक महिला के प्राइवेट पार्ट की तरफ डंडा करना, एक निहत्थे मां बेटी को मारना, एक लड़की को गाल पर थप्पड़ मारना, पेलेट बंदूक का इस्तेमाल करना (RAF), पैर लगा कर एक प्रदर्शनकारी को गिराना... इसने आग लगाई है।
और सोशल मीडिया के सरकारी धुरंधरों ने जो आम बच्चों के लिए लिखा है- तिलचट्टे, हिजडे, डीप स्टेट, बलात्कारी... उसने आग में थोक के भाव घी डाला है।
अब करते रहिए बातचीत बातचीत।
#CJP
#Jantarmantar
प्रोटेस्ट न तो अब CJP के हाथ में है और न ही वांगचुक के।
प्रोटेस्टर्स ने इस पर कब्जा कर लिया है। इसे खत्म करने का एक ही तरीका है, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा...
It's a game, they are not here to compromise.
जितनी देर होगी, बात उतनी ही बढ़ेगी
तिलचट्टा, पाकिस्तानी, CIA, हिजड़े, नपुंसक और अब बलात्कारी
इन्हें लगता है ये शब्द बोल कर ये सामान्य बच्चों को इस आंदोलन से बाहर ले लाएंगे।
दिल्ली पुलिस ने जब महिला के प्राइवेट पार्ट की तरफ डंडा किया था वो क्या था?
जिस वीभत्स कार्य को डिफेंड करने के लिए कोई argument नहीं बना, उसे defend कर रहे हैं ये
दिल्ली पुलिस ही अराजक तत्वों और व्यवस्था के मध्य का अंतर है। आप @DelhiPolice को इस प्रदर्शन से हटा दो, यही अराजकतावादी, अपने ही साथ आई लड़कियों के रेप करने से नहीं चूकेंगे क्योंकि हर अराजकता का अंतिम शिकार स्त्रियाँ ही होती हैं।
पुलिस से हमें बहुत सारी समस्याएँ हो सकती हैं, पर दंगा नियंत्रण में जिस संयम का प्रयोग हमें दिख रहा है, वह अनुकरणीय है। कई शहरों में पुलिस को वाटर कैनन आदि का प्रयोग करना पड़ा है, पर यहाँ केवल माइल्ड लाठी चार्ज और आँसू गैस से अभी तक काम हुआ है।
उनके कर्मी चिकित्सालयों में घाव ठीक करवा रहे हैं। यदि बच्चे यह कह रहे हैं कि ‘कुछ लोग’ घुस गए हैं जो माहौल बिगाड़ रहे हैं, तो मेरा प्रश्न है कि तुम उन्हें स्वयं क्यों नहीं पकड़ रहे?
सत्य यह है कि बच्चों की संख्या 20% है और दंगाई 80%। योगेन्द्र यादव अपने खतना वाले लिंग पर हाथ रखे क्रांति की राह देखता स्खलित हो रहा है कि अब गिरी सरकार, तब गिरी सरकार। वह कह रहा है कि लोकतंत्र अब सड़क तय करेगा!
विद्यार्थियों को स्वयं के भीतर के कचरे को बाहर करना चाहिए। अब तो @narendramodi तक भी गर्मी पहुँची है, चुप्पी टूटी है। तुम्हारे नाम पर ये पत्थरबाजी, हिंसा सब लादे जाएँगे।
Interestingly, four years ago, while hearing the Nupur Sharma case, a SC bench, comprising Justice Suryakant, said:
"Your (Nupur) loose tongue has set the entire country on fire."
घुटनों में दिमाग, और दिमाग में गोबर भरके चलने वाली भीड़ को ये नहीं पता कि मॉब लिंचिंग की इस कहानी में उनका कोई अपना भी पिट सकता है।
या तो इतना जिगरा रखो कि सामने वाले को One-to-one fight के लिए ललकार सको, या अपने तर्कों से विरोध करो।
ये झुंड में जाके पीटने की नपुंसकता मत दिखाओ
Times Now के पत्रकार देव कोटक की आज जंतर मंतर पर पिटाई हुई है। कपड़े फाड़ दिए गए। भीड़ ने उनके चैनल पर "गोदी मीडिया" होने का आरोप लगाया। सोचिए, TV एंकर एजेंडा सेट करते हैं और भुगतना फील्ड रिपोर्टरों को पड़ता है।
सूत्रों से पता चल रहा है कि साथी की पिटाई के बाद देश की "सबसे बड़ी पत्रकार" नविका कुमार अब खुद जंतर मंतर पर मोर्चा संभालने जा रही हैं।
प्रिय नरेंद्र मोदी जी,
मेरी राजनीति की समझ आपको देख कर बनी है। विचारधारा क्या होती है, उसकी बुनियाद आपके भाषणों से पड़ी है।
मेरे स्कूल की 10वीं क्लास की बेंचों पर आज भी अबकी बार मोदी सरकार लिखा मिलेगा।
आपसे जुड़ाव सिर्फ आपके भाषणों से नहीं था। आपकी उस यात्रा से था, जो एक गरीब परिवार से शुरू हुई और सत्ता के शीर्ष तक पहुंची।
2020 तक आपने जो भी कार्य किया, उनकी वजह से आपसे हमेशा जुड़ाव रहा। कश्मीर से धारा 370 हटाने पर हमने आपके लिए कॉलेज में केक काटा था। आपके आह्वान पर डॉक्टर्स को धन्यवाद करने के लिए थाली बजाते हुए की तस्वीरें आज भी मिल जाएंगी।
किताबों को पढ़कर विचारधारा और संस्कृति की जो जो समझ आई, उसे आपके द्वारा हकीकत में बदलते हुए पाया। पर उसके बाद फिर कुछ बदल सा गया।
मणिपुर में 2 लड़कियों की निर्वस्त्र हुए तस्वीर आई। दिल झकझोर गया। आप कुछ नहीं बोले। लगा कि आपकी चुप्पी स्थिति संभालने के लिए है।
कोविड की दूसरी लहर में जब लाशें गंगा में तैर रही थी, तो आपकी सरकार ने कहा कि कोविड के कारण तो एक भी मौत नहीं हुई। लगा कि आप शायद वैज्ञानिक कारणों पर चलते हैं।
बालासोर में ट्रेन हादसा हुआ, मोरबी में ब्रिज गिरा, दोनों में लगभग 400 लोग मरे। लोगों ने अपेक्षा की कि नैतिक जिम्मेदारी का धर्म निभाया जाएगा। मंत्रियों को बर्खास्त किया जाएगा, और जनता को संदेश दिया जाएगा कि आपकी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। पर कुछ भी नहीं हुआ।
देश को जातियों में बांटने की जो कोशिशें आपको कभी अर्बन नक्सली लगती है, आपके समर्थक उसी को आपकी उपलब्धि बताने लगे।
लोगों ने E20 को लेकर अपनी चिंता जाहिर की, तो आपकी सरकार ने कहा कि जनता को समझ नहीं है। लोगों ने कहा हमें E0, E10 का ऑप्शन देदो, उसमें आपको विदेशी साजिश की बू आने लगी।
नीट पेपर लीक के बाद जब 20 लाख बच्चे तनाव में थे, और प्रोत्साहन मांग रहे थे, आपने कोई परीक्षा पर चर्चा नहीं की।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगने वाले बच्चों पर निर्लज्जता से पुलिस ने लाठियां चलाई। आप चुप रहे। एक लड़की के गुप्तांग पर पुलिस वाले ने डंडा दिखाया। आप इस पर भी अभी तक खामोश ही हैं।
2024 में आपने कहा था कि आपकी सफलता का कारण कोई दैवीय शक्ति है। चम्पत राय ने भी कहा था कि आप भगवान विष्णु के अवतार हैं। पिछले 5-6 सालों में आपके सलाहकारों एवं सोशल मीडिया के कट्टर शेरों ने आपको ये आभास दिलाया है कि आप तमाम आलोचनाओं और सवालों के परे हैं।
कभी आपकी सादगी की चर्चा हुआ करती थी, आज इस बात की होती है कि आप दिन में दो बार ड्रेस बदलते हैं। कभी आप तपस्वी नजर आते थे, आज आप पर तंज कसा जाता है कि 75+ का फार्मूला देकर अपने विरोधियों को ठिकाने लगा दिया, और जब खुद की बारी आई तो कुर्सी से लगाव हो गया।
विचारधारा की बात करते करते आप खुद विचारधारा से बड़े हो गए। जिस हिंदुत्व का आप हिस्सा हुआ करते थे, वो हिंदुत्व आज आपका हिस्सा हो गया। आपकी आलोचना मतलब हिंदुत्व की आलोचना, विचारधारा से गद्दारी।
ये माहौल जो आपके सोशल मीडिया के धुरंधरों ने आपके सामने परोसा है, वो आपकी छवि को किस कद्र नुकसान पहुंचा रहे हैं आप जानते तक नहीं।
मॉब लिंचिंग किसी की ठीक नहीं होती। विजेता दहिया बिना रीढ़ की हड्डी वाला इंसान है, जो ना अपनों का हुआ ना परायों का। फिर भी है तो सामान्य इंसान ही, कोई आतंकवादी तो नहीं?
घर से अकेले आप भी निकलते होंगे, आपके परिवार वाले भी। समाज में आग लगेगी, तो लपेटे में सब आएंगे।
विजेता भाई, आपके साथ जो हो रहा है, यह देखना दुखद है। मैं कभी इस तरह अकेले पाकर हैकल करने का समर्थक नहीं हूँ, पर आप हैं। आप अपने विरोधियों के साथ इसी तरह के व्यवहार के पक्षधर हैं। आपके लिए लोगों में यह गुस्सा सिर्फ़ कल के लिए नहीं है। केरला स्टोरी से है।
The absence of any public endorsement from Canada came as a setback for Pakistan, which has been seeking international support after India suspended the treaty.
Read the full report (@kshitizreal)
https://t.co/AZM8FIYFtk
मंत्री बोला राजा जी, एक बात तो सुन जाओ ना,
गलती करता हूं हर साल, मेरी कुर्सी तो बचाओ ना।
एक छोटे से पेपर लीक से, बस 20 ज़िंदगियाँ जाती हैं,
140 करोड़ के देश में, क्या इतनी भी गिनती आती है?
मेरा विजन बड़ा है राजा जी, बस अपनी मोहर लगाओ ना,
भेजो पुलिस को लाठी देके, मेरा सरदर्द मिटाओ ना।
पढ़ने वाले सड़कों पर हैं, उनको थोड़ा समझाओ ना,
डंडों की भाषा सबसे अच्छी, ये संदेश सुनाओ ना।
किताबों से जो प्रश्न उठें, उनको देशद्रोह बताओ ना,
क्षितिज की आवाज़ दबाने को, कुछ नए नियम बनवाओ ना।
आँसू गैस के बादल छोड़ो, सच का सूरज ढक जाएगा,
फुटपाथों पर खून जो बिखरा, अख़बारों से मिट जाएगा।
कुर्सी बचती रहे हमारी, बस इतना-सा अभियान रहे,
शिक्षा चाहे हार भी जाए, सत्ता का सम्मान रहे।
मंत्री हंसा, दरबार हंसा, ताली खूब बजाई गई,
क्षितिज के चेहरे पर लेकिन मायूसी ही छाई रही।
@amitkilhor@Hindi_panktiyan@sanjayuvacha
ये जो पुलिसवाला एक छात्रा के प्राइवेट पार्ट की तरफ डंडा कर रहा है ये सही है?
एक व्यक्ति जो भाग रहा है, उसे एक पुलिसवाला पैर लगा कर गिरा है वो सही है?
बिना यूनिफॉर्म के पुलिसवाले डंडा लेकर बच्चों को मार रहे हैं वो सही है?
हो सकता है किसी केस में आपको पुलिस का सहयोग चाहिए, इसलिए ऐसे ट्वीट कर रहे हो। हमें नहीं चाहिए।
If the video is from yesterday's protest, then I have no words.
There's something called professionalism. No matter how bad the situation is, at least use a dignified method to disburse the crowd.
First those policemen in civil dress with lathis and now this. Besharm Police!
Don't expect any action; I am right here in Delhi. Muslims have infiltrated the protests on a massive scale, dressed in ordinary clothes. The Delhi Police is completely controlled by the AAP, and incorrect information is being fed to the higher ups. This protest will escalate, and a major riot will break out in Delhi in the coming days, innocent Hindus will be killed, and then by labeling the perpetrators as students killed by police the blame will be shifted onto the BJP... while we just keep tweeting like fools.
Nice strategy CP sir. But since BNS has come in place of IPC, please try to make required changes.
Also it is very kind of you to not issue a shoot at sight order.
Had I been tasked as CP, Delhi Police to handle today's anarchy, I would have followed KPS Gill module.
The whole action would have looked like this:
1. Sonam Wangchuk wouldn't been evicted on 17th/18th. He would have been allowed to stay as it is.
2. By evening of 19th, being Sunday, I would have made all shops and eateries including. 24*7 ones in CP, Pandara Road and Bengali Market close earlier than their time. By 10 all ordinary shops and by 11:45 all bars would have been closed.
3. Mobile internet speeds would have been shadowed down by 6 PM on Sunday in whole Delhi and virtually stopped by midnight.
4. In total 5 batallions of PAC, 10 batallions of CAPFs and QRT would have been deployed right in evening at various places across Lutyens Delhi. By 11:30 PM Barakhamba Road, Copernicus Marg, Tilak Marg, Kartavya Path, and Sansad Marg would have been sealed completely. Same for all the roads towards Chankyapuri and Safdarjung.
4. All metro stations in area except Mandi House and Rajiv Chowk would have been rendered unoperational in advanced.
5. Any electricity connection, water supply, and other supplies to protest venue would have been shut by 5 PM of 19th.
6. Post midnight IPC 144 would have bee imposed in Lutyens' along with shadow pause on cellular network for next 7-8 hours.
7. My own guys from intelligence and OGW groups would have been tasked to identify loopholes in crowd, and positioning of journalists and cameramen. By 12:30 AM they would have been ordered to exploit the loopholes and disturb movement of journalists along with their cameramen and OB Vans. Would have made some of them to come out of venue. For the rest, a simple phone call to their owners would have been enough.
7. By 01:00 AM I would have reached protest venue myself, along with personal batallion, and a pool of CATs to announce IPC 144 imposition. People would have been scared enough with a window of 40-50 minutes for "safe exit". DTC buses would have been arranged for their safe exit. They would have been made to exit via Karol Bagh route in sub-urbs outside Ring Road and UER.
8. For those who didn't bend by this time, batton charge, tear gas, my own CATs with extra judicial stuff would have started doing their job. Anyone alive would have been detained in buses. The dead would have been kept in trucks. Both would have been made to exit Delhi via Delhi Mumbai expressway to reach likes of Bundi, Kota, Bharatpur, Neemuch and Ratlam. By morning they would have been illegally detained in the jails there.
9. By morning internet would have been shadow banned in neighbouring districts of NCR.
10. Holiday would have been announced for all the schools and non-essential service providers around Lutyens. Anyone without any purpose wouldn't have been allowed to enter Lutyens subject to IPC 144.
11. By 11:30 AM, IPC 144 would have been lifted, internet would have been restored and optics of normalcy would have been showcased ahead of #ParliamentMonsoonSession.
12. The leaders and surrounding top-30 people would have been either detained under NSA/UAPA or blackmailed through their personal lives. Once done, they would be taken to Dibrugarh jail in Assam.
13. Anyone amongst detainees, who had possesed ability to act as witness in courts later on would have been handled by STF through encounters and the bodies would have been declared either abandoned or would have been dumped after been amputed enough to not to be able to identify.
मंत्री बोला राजा जी, एक बात तो सुन जाओ ना,
गलती करता हूं हर साल, मेरी कुर्सी तो बचाओ ना।
एक छोटे से पेपर लीक से, बस 20 ज़िंदगियाँ जाती हैं,
140 करोड़ के देश में, क्या इतनी भी गिनती आती है?
मेरा विजन बड़ा है राजा जी, बस अपनी मोहर लगाओ ना,
भेजो पुलिस को लाठी देके, मेरा सरदर्द मिटाओ ना।
पढ़ने वाले सड़कों पर हैं, उनको थोड़ा समझाओ ना,
डंडों की भाषा सबसे अच्छी, ये संदेश सुनाओ ना।
किताबों से जो प्रश्न उठें, उनको देशद्रोह बताओ ना,
क्षितिज की आवाज़ दबाने को, कुछ नए नियम बनवाओ ना।
आँसू गैस के बादल छोड़ो, सच का सूरज ढक जाएगा,
फुटपाथों पर खून जो बिखरा, अख़बारों से छिप जाएगा।
कुर्सी बचती रहे हमारी, बस इतना-सा अभियान रहे,
शिक्षा चाहे हार भी जाए, सत्ता का सम्मान रहे।
मंत्री हंसा, दरबार हंसा, ताली खूब बजाई गई,
क्षितिज के चेहरे पर लेकिन मायूसी ही छाई रही।
Mockery of the system. No one knows if they are policemen in casual clothes or some goons sent by Dharmendra Pradhan to disrupt the march.
The kind of pathetic behaviour that Delhi Police has shown today has shook people's trust in the system.
Who knows if these men, protected by the police, are the ones who were doing stone pelting at some places to shape the narrative or someone else.
We have seen what happened on June 10th👇, when one of the Pradhan's symphathisers sent a person in protest to defame the movement by saying "I don't care if India gets divided into multiple pieces".
Hope High Court, Supreme Court take cognizance of this. Hope
Will GoI explain who are these goons in casual clothes who are beating students with sticks in their hands ?
BJP Government should clarify whether they had hired goons to beat up the students ?
संसद भवन के सामने लाठीचार्ज समझ भी आता है कि सांसदों की रक्षा करनी है। जंतर मंतर पर लाठीचार्ज क्यों?
देश की ब्यूरोक्रेसी को थोड़ा सा भी जानने वाले ये बता देंगे, कि ऐसा आदेश पीएम आवास से नहीं आता, बल्कि IAS/IPS (नए जमाने के भूरे साहब) देते हैं। मालिक के सामने अपनी हवा बनाने को।
20 बच्चों ने कागज पर सॉरी लिख कर आत्महत्या कर ली थी क्योंकि वो दोबारा नीट का पेपर देने के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर पाए।
उनके हक की आवाज उठाने वालों को जॉर्ज सोरोस का एजेंट, पाकिस्तानी दल्ला, डीप स्टेट, हिजड़ा... कह कर बेइज्ज़त किया गया।
जो व्यक्ति इन सब के लिए धर्मेंद्र प्रधान की जिम्मेदारी तय करने आया, उसे 20 दिनों तक सड़क पर भूखा पड़े रहने दिया गया।
आज जब लोग मार्च निकालने लगे तो लाठियां भांजी गई, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, बंदूक ताने सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया, लोगों के सर फोड़े गए।
लेकिन आप कुछ मत बोलिए क्योंकि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना मतलब हिंदुत्व को धोखा देना है।
आप कुछ मत बोलिए क्योंकि जो 20 बच्चे मरे हैं वो आपके घर के नहीं थे।
आप कुछ मत बोलिए क्योंकि जिन 22 लाख बच्चों को मानसिक प्रताड़ना दी गई है वो आपके अपने नहीं थे।
आप कुछ मत बोलिए क्योंकि आपकी आत्मा मर गई है।
आज के 10 साल बाद सोचिएगा इस दिन को। सिर्फ अच्छी शिक्षा की मांग करने के कारण लोगों का सर फोड़ा है दिल्ली पुलिस ने।
22 लाख वामपंथी बच्चों को दी गई मानसिक प्रताड़ना एवं 22 वामपंथियों की आत्महत्या का बदला लेने के लिए, वामपंथियों ने अच्छा माहौल जमाया है जंतर मंतर पर।
जॉर्ज सोरोस और डीप स्टेट और जोड़ दे भाई, थोड़ी और फील आएगी। धर्मेंद्र प्रधान को बचाने के लिए इतना तो कर ही सकते हैं कलम के सिपाही।