लहरों की उनकी उम्र और बरगद की मूछों से उनका हाल ,नहीं पूछता हूँ,
मैं याद रखता हू तुम्हारे बात चीत के लहज़े को,
मेरे बारे में क्या है खयाल,नहीं पूछता हूँ.
@paninianand
बाबा
इंसान की स्थिति उस चिड़िया जैसी है,जो बारिश ना होने पर,पानी की परेशानी से जूझती है भूख से और प्यास से और बारिश होने पर पंख पसारे,खुले घोसलों में अपने चूज़ों को उन्हीं पंखों से ढ़के हुए चाहती है कि एक बूँद भी ना पड़े पानी की.
अगर तुमसे पूछ के इश्क़ होना हो,
तो फिर इन बातों, एहसासों का क्या ही करू,
और गर डूब ही जाना है,इस छिछले से पानी में,
तो चल तू भी साथ मेरे, मैं अकेला ही यूं क्यूँ हीं मरु..
जब कह लेने भर की उम्मीद का रस,
कह दे कि बस अब बाकी क्या है.
संपूर्ण हो जाना, बल भर फैल जाना,
आधे का पौने से बकाया ना मांगना,
क्या उधार तब भी रहेगा..
@paninianand
@Mahsar_khan@grok कोई फैसला नहीं कर पाएगा किसी पथर का,
जिसने मेसोपोटैमिया और इंडस का हाल देखा है,
जो अपढ़, गवार और जाहिल हैं,
उनका तो तिनका फतेह करना ही गालिब है.
कान पकड़ के बोल रहा गालिब के लिए तू तो दाल बराबर नहीं, फ़र्ज़ी खुश हो रहा था.
@Mahsar_khan देखी है पहली बार ऐसी चिमनिया,
लगता है पिछ्वाड़े मे लोहबान जला रख है,
दिखाने को तो बहुत है जलवे इनके पास,
सुना है भाई ने घर मे मेहमान बुला रखा है.
जा माफ किया आज.
कल फिर आना 😆
जटिल से जटिल सोच भी उतनी जटिल नहीं होती, जितनी जटिलता उम्मीदों में घर की हुई बैठी रहती है, खामोश, अदृश्य और अक्शर तकलीफदेय.
उम्मीदें बढ़ी,दुर्घटना घटी, 🙂
बहुत गहरी बातें ना समझ पाने का अफसोस नहीं होता मुझको,
अफसोस इस बात का है कि कैसे निकल गयी वो हल्की फुल्की सी बातें मेरे सामने से बीसियों बार, जिनमें इतनी गहराई थी,समझ थी,सुलझाव भी था.
लोक से बिलगाव का दिखावा, एलीट सोच रखने का भ्रम, ये क्या बना रहा है मुझे?
@kamleshksingh बुझा दो शहर का हर एक चिराग,
खंडित कर दो सारे प्राचीनतम प्रतिमानों को,
इस हद तक रौशनी का दमन कर दो,
कि अँधेरा भी खुद को देख कर घबरा जाए,
आँखों का होना ना होना सब एक सा हो जाने सा लगे,
सिर्फ़ बचा रहे गहरी गहरी सासों का कोलाहल,
और कुछ भी शेष ना बचे तब तक खंडित करो, करते रहो..