🙃Good morning 🙃
मन की बात
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- कवि सम्पत सरल
आया फिर रविवार है, रेडियो पर शोर है,
बातों के इस जाल में, फँसा कोई और है।
काम की कोई बात नहीं, बस किस्सों का अंबार है,
हकीकत की ज़मीन सूखी, शब्दों की बौछार है।
सिर्फ़ जुमलों की खेती, वादों का बाज़ार है,
ज़िम्मेदारी से किनारा, बस प्रचार ही प्रचार है।
मुद्दे गायब हैं यहाँ, बस मंत्रों का जाप है,
आम आदमी की पीड़ा, यहाँ चुपचाप है।
भक्तों का ये सम्मोहन, गजब का ये खेल है,
तर्कों की है विदाई, और सच्चाई से बेमेल है।
एक तरफा है ये धारा, सवाल पूछना मना है,
सुनने वालों के लिए बस, एक सपना बुना है।