"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा!" 🇮🇳
आज 21 अक्टूबर को आजाद हिंद फौज (Indian National Army) के स्थापना दिवस और नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा सिंगापुर में गठित भारत की पहली अस्थायी सरकार 'आज़ाद हिंद सरकार' के स्थापना दिवस पर मां भारती के सभी वीर सेनानियों को कोटिशः नमन।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अदम्य साहस और कुशल नेतृत्व में खड़ी हुई इस सशक्त राष्ट्रीय सेना ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। आजाद हिंद फौज के रणबांकुरों का हर एक बलिदान हमें आज भी अटूट राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और देश सेवा की प्रेरणा देता है।
आइए, इस ऐतिहासिक अवसर पर हम सब मिलकर आजाद हिंद फौज के अमर शहीदों की वीरता को याद करें और राष्ट्र की संप्रभुता व अखंडता की रक्षा का संकल्प लें।
जय हिंद! 🫡🇮🇳
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"खाकी सिर्फ़ एक वर्दी नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्य और सर्वोच्च बलिदान की पहचान है।" 🇮🇳
आज #पुलिस_स्मृति_दिवस के अवसर पर हम मातृभूमि की रक्षा, आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले सभी वीर पुलिसकर्मियों को कोटि-कोटि नमन करते हैं।
कड़ी धूप, कड़कड़ाती ठंड या फिर तूफानी रात—अपनी जान की परवाह किए बिना देश को सुरक्षित रखने वाले इन सच्चे रक्षकों का देश हमेशा ऋणी रहेगा।
वे अमर सपूत कर्तव्य पथ पर जो विलीन हो गए, उनकी शहादत को हमारा विनम्र प्रणाम। 🙏✨
जय हिंद! जय भारत! 🦅
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21 अक्तूबर/पुण्य-तिथि
दिल्ली में सत्याग्रह की शान बहिन सत्यवती
1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय दिल्ली में जिस वीर महिला ने अपने साहस, संगठन क्षमता एवं अथक परिश्रम से चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली घरेलू महिलाओं को सड़क पर लाकर ब्रिटिश शासन को हैरान कर दिया, उनका नाम था बहिन सत्यवती।
सत्यवती का जन्म अपने ननिहाल ग्राम तलवन (जिला जालंधर, पंजाब) में 26 जनवरी, 1906 को हुआ था। स्वाधीनता सेनानी एवं परावर्तन के अग्रदूत स्वामी श्रद्धानंद जी उनके नाना थे। उनकी माता श्रीमती वेदवती धार्मिक एवं सामाजिक कार्याें में सक्रिय थीं। इस प्रकार साहस एवं देशभक्ति के संस्कार उन्हें अपने परिवार से ही मिले। विवाह के बाद वे दिल्ली में रहने लगीं।
उनका विवाह दिल्ली क्लॉथ मिल में कार्यरत एक अधिकारी से हुआ, जिससे उन्हें एक पुत्र एवं पुत्री की प्राप्ति हुई। अपने पति से उन्हें दिल्ली के उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों की दुर्दशा की जानकारी मिली। इससे उनका मातृत्व जाग उठा। वे श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए मैदान में कूद पड़ीं। इस प्रकार उन्होंने 1936-37 में दिल्ली में श्रमिक आंदोलन को एक नयी दिशा दी।
उनके उग्र भाषणों से घबराकर शासन ने उन पर कई प्रतिबंध लगाये; पर वे पुलिस को चकमा देकर निर्धारित स्थान पर पहुंच जाती थीं। इससे दिल्ली की महिलाओं तथा युवाओं में उनकी विशेष पहचान बन गयी। हिन्दू क१लिज एवं इन्द्रप्रस्थ कन्या विद्यालय के छात्र-छात्राएं तो उनके एक आह्नान पर सड़क पर आ जाते थे। उन्होंने ‘कांग्रेस महिला समाज’ एवं ‘कांग्रेस देश सेविका दल’ की स्थापना की। वे ‘कांग्रेस समाजवादी दल’ की भी संस्थापक सदस्य थीं।
नमक सत्याग्रह के समय उन्होंने शाहदरा के एक खाली मैदान में कई दिन तक नमक बनाकर लोगों को निःशुल्क बांटा। कश्मीरी गेट रजिस्ट्रार कार्यालय पर उन्होंने महिलाओं के साथ विशाल जुलूस निकाला। इस पर शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर अच्छे आचरण का लिखित आश्वासन एवं 5,000 रु0 का मुचलका मांगा; पर बहिन सत्यवती ने ऐसा करने से मना कर दिया। परिणाम यह हुआ कि उन्हें छह महीने के लिए कारावास में भेज दिया गया।
उनके नेतृत्व में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का भी दिल्ली में बहुत प्रभाव हुआ; पर बार-बार की जेल यात्राओं से जहां एक ओर वे तपेदिक से ग्रस्त हो गयीं, वहां दूसरी ओर वे अपने परिवार और बच्चों की देखभाल भी ठीक से नहीं कर सकीं। उनकी बेटी ने दस वर्ष की अल्पायु में ही प्राण त्याग दिये। शासन ने पुत्री के अंतिम संस्कार के लिए भी उन्हें जेल से नहीं छोड़ा।
1942 के आंदोलन के समय बीमार होते हुए भी उन्होंने चांदनी चौक की गलियों में घूम-घूमकर महिलाओं के जत्थे तैयार किये और उन्हें स्वाधीनता के संघर्ष में कूदने को प्रेरित किया। शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर अम्बाला जेल में बंद कर दिया। वहां उनकी देखभाल न होने से उनका रोग बहुत बढ़ गया। इस पर शासन ने उन्हें टी.बी चिकित्सालय में भर्ती करा दिया।
जब वे जेल से छूटीं, तब तक आंदोलन ठंडा पड़ चुका था। लोगों की निराशा दूर करने के लिए उन्होंने महिलाओं एवं सत्याग्रहियों से संपर्क जारी रखा। यह देखकर शासन ने उन्हें घर पर ही नजरबंद कर दिया। रोग बढ़ जाने पर उन्हें दिल्ली के ही एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 21 अक्तूबर, 1945 को उनका देहांत हो गया। उनकी स्मृति को चिरस्थायी रखने के लिए दिल्ली में "सत्यवती कॉलेज" की स्थापना की गयी है।
(संदर्भ : स्वतंत्रता सेनानी सचित्र कोश.. आदि)
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21 अक्तूबर/जन्म-दिवस
प्रथम भारतीय सर्वेक्षक पंडित नैनसिंह रावत
पर्वतीय क्षेत्र में सर्वेक्षण का काम बहुत कठिन है। आज तो इसके लिए अनेक सुविधाएं तथा वैज्ञानिक उपकरण उपलब्ध हैं; पर जब यह नहीं थे, तब सर्वेक्षण करना बहुत साहस एवं सूझबूझ का काम था। पंडित नैनसिंह रावत ऐसे ही एक व्यक्तित्व थे। अतः उनके काम को विश्व भर में मान्यता मिली।
पंडित नैनसिंह का जन्म 21 अक्तूबर, 1830 को ग्राम मिलम (मुनस्यारी, उत्तराखंड) में श्री अमर सिंह के घर में हुआ था। उनके दादा श्री धामसिंह को कुमाऊं के राजा दीपचंद्र ने 1735 में कई गांवों की जागीर दी थी। घर चलाने के लिए वे अध्यापक बने, इसीलिए उनके नाम के साथ पंडित जुड़ गया।
पंडित नैनसिंह भोटिया जनजाति में जन्मे थे। उन्होंने एक डायरी में अपने मिलपवाल गोत्र की उत्पत्ति धारानगर के क्षेत्री पंवार वंशियों से बताई है। अपने पिता के साथ व्यापार के लिए वे कई बार तिब्बत और लद्दाख की लम्बी यात्राओं पर गये। इससे यात्रा और अन्वेषण उनकी रुचि का विषय बन गया। उनकी इस प्रतिभा तथा साहसी स्वभाव का ब्रिटिश शासन ने पूरा उपयोग किया।
कर्नल मांटगुमरी से सर्वेक्षण के नये उपकरणों का प्रशिक्षण लेकर उन्होंने 1865-66 में पहली यात्रा ल्हासा (तिब्बत) की ओर की। वे अल्मोड़ा से काठमांडू और वहां से तिब्बत पहुंचकर ब्रह्मपुत्र नदी के साथ-साथ चलते गये। ऊंचाई की गणना वे पानी उबलने में लगे समय तथा तापमान से करते थे। तारों तथा नक्षत्रों से वे भोगौलिक स्थिति तथा कदमों से दूरी नापते थे। यह आश्चर्य की बात है कि उनकी गणनाएं आज भी लगभग ठीक सिद्ध होती हैं।
उन्होंने इस यात्रा की कठिनाइयों की चर्चा करते हुए लिखा है कि वहां के शासक अंग्रेजों या उनके कर्मचारियों तथा धरती की नाप के उपकरण देखकर भड़क जाते थे। अतः वे कभी व्यापारी तो कभी बौद्ध लामा की तरह ‘ॐ मणि पद्मे हुम्’ का जाप करते हुए वेश बदल-बदल कर यात्रा करते थे।
1867 में वे फिर तिब्बत गये। इस यात्रा में कई बार वे भटक गये और खाना तो दूर पानी तक नहीं मिला। यहां खान से सोना निकालने की विधि उन्होंने लिखी है। उनकी कई डायरियां अप्राप्य हैं। उनकी तीसरी यात्रा 1873-74 में यारकन्द खोतान की हुई। उन्होंने लिखा है कि वहां के बूढ़े मुसलमान 8-10 साल की कन्या से भी निकाह कर लेते हैं। कई बालिकाएं इससे मर जाती हैं। वहां पुरुष कई निकाह करते हैं और इसे प्रतिष्ठा की बात माना जाता है।
पंडित नैनसिंह ने अपनी पांच प्रमुख यात्राओं में हर जगह की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति, भाषा-बोली, खेती, रीति-रिवाज आदि का अध्ययन किया और दुर्गम पुराने व्यापार मार्गों के मानचित्र बनाये। उन्होंने कई नदियों के उद्गम की खोज की। उनकी पुस्तक ‘अक्षांश दर्पण’ का वर्तमान सर्वेक्षक भी उपयोग करते हैं। उन्होंने नये सर्वेक्षकों को प्रशिक्षित भी किया।
1876 में उनका काम ‘राॅयल मैगजीन’ में प्रकाशित हुआ। 1877 में पेरिस के भूगोलशास्त्रियों ने उन्हें सोने की घड़ी देकर सम्मानित किया। ‘राॅयल ज्योग्राफिकल सोसायटी, लंदन’ ने 18 मई, 1877 को उन्हें स्वर्ण पदक देकर मध्य एशिया के क्यून ल्यून पहाड़ की एक अनाम शृंखला को ‘नैनसिंह रेंज’ नाम दिया। 1961 तक की ‘रीडर्स डाइजेस्ट एटलस’ में यह नाम मिलता है; पर फिर न जाने क्यों इसे बदलकर ‘नांगलौंग कांगरी’ कर दिया गया।
1877 में अवकाश प्राप्ति पर ब्रिटिश शासन ने उन्हें एक हजार रु0 तथा रुहेलखंड के तराई क्षेत्र में एक गांव पुरस्कार में दिया। 1895 में वहां पर ही घूमते समय हुए हृदयाघात से उनका देहांत हुआ। 27 जून, 2004 को भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया है।
(संदर्भ : अंतरजाल पर उपलब्ध सामग्री) #NainSinghRawat
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ठाकुर प्यारेलाल सिंह (21 दिसम्बर 1891 - 22 अक्टूबर 1954) भारत के एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा क्रांतिकारी थे। वे छत्तीसगढ़ में श्रमिक आंदोलन के सूत्रधार तथा सहकारिता आंदोलन के प्रणेता थे। उन्होने राजनीति में भी भाग लिया।
उनका जन्म 21 दिसम्बर 1891 को राजनांदगांव जिले के दैहान ग्राम में हुआ। पिता का नाम दीनदयाल सिंह तथा माता का नाम नर्मदा देवी था। आपकी शिक्षा राजनांदगांव तथा रायपुर में हुई। नागपुर तथा जबलपुर में आपने उच्च शिक्षा प्राप्त कर 1916 में वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाल्यकाल से ही आप मेधावी तथा राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत थे।
1906 में बंगाल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आकर क्रांतिकारी साहित्य के प्रचार आरंभ किया और विद्यार्थियों को संगठित कर जुलूस के समय वन्देमातरम् का नारा लगवाते थे। 1909 में सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना की। 1920 में राजनांदगांव में मिल-मालिकों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई, जिसमें मजदूरों की जीत हुई। आपने स्थानीय आंदोलनों और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए जन-सामान्य को जागृत किया।
1925 से आप रायपुर में निवास करने लगे। आपने छत्तीसगढ़ में शराब की दुकानों में पिकेटिंग, हिन्दू-मुस्लिम एकता, नमक कानून तोड़ना, दलित उत्थान जैसे अनेक कार्यो का संचालन किया। देश सेवा करते हुए आप अनेक बार जेल गए। मनोबल तोड़ने के लिए आपके घर छापा मारकर सारा सामान कुर्क कर दिया गया, परन्तु आप नहीं डिगे।
राजनैतिक झंझावातों के बीच 1937 में रायपुर नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए। 1945 में छत्तीसगढ़ के बुनकरों को संगठित करने के लिए आपके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ की स्थापना हुई। प्रवासी छत्तीसगढ़ियों को शोषण एवं अत्याचार से मुक्त कराने की दिशा में भी आप सक्रिय रहे।
वैचारिक मतभेदों के कारण सत्ता पक्ष को छोड़कर आप आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा पार्टी में शामिल हुए। 1952 में रायपुर से विधानसभा के लिए चुने गए तथा विरोधी दल के नेता बने। विनोबा भावे के भूदान एवं सर्वोदय आंदोलन को आपने छत्तीसगढ़ में विस्तारित किया। 22 अक्टूबर 1954 को भूदान यात्रा के समय अस्वस्थ हो जाने से आपका निधन हो गया। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में सहकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए 'ठाकुर प्यारेलाल सिंह सम्मान' स्थापित किया है।
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21 अक्तूबर,/पुण्यतिथि
सम्पर्क में तज्ञ दिनेश गोयल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री दिनेश गोयल का जन्म शनिवार 29 जनवरी, 1944 (वसंत पंचमी) को ग्राम चांग (जिला भिवानी, हरियाणा) में एक सामान्य कृषक श्री लक्खीराम एवं श्रीमती सरबती देवी के घर में हुआ था। यद्यपि विद्यालय में उनकी जन्मतिथि 13 दिसम्बर, 1943 लिखी है। छह भाई-बहिनों में उनका नंबर तीसरा है। गांव में मुसलमानों की संख्या अधिक होने के कारण विभाजन के समय प्रायः सभी हिन्दुओं ने गांव छोड़ दिया। श्री लक्खीराम जी भी भिवानी आकर एक व्यापारी के पास मुनीम हो गये।
दिनेश जी ने कक्षा 12 तक की शिक्षा भिवानी में पायी। 1955 में अपने एक कक्षामित्र के साथ शाखा जाने से उनका संघ जीवन प्रारम्भ हुआ। उन्होंने 1958, 59, 61 और 63 में क्रमशः प्राथमिक और तीनों संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1967 में हिसार से बी.ए. कर वे प्रचारक बने।
उन पर क्रमशः फरीदाबाद नगर, बल्लभगढ़ तहसील, गुड़गांव जिला, रोपड़ जिला, तरनतारन जिला, फरीदकोट जिला, भटिंडा जिला, फिरोजपुर विभाग और जम्मू विभाग प्रचारक की जिम्मेदारी रही। कुछ समय वे अमृतसर कार्यालय प्रमुख भी रहे। विशेष अभिरुचि के कारण वे शारीरिक और घोष वर्गों में भी जाते रहे। वे दो बार संघ शिक्षा वर्ग में मुख्यशिक्षक बने। 1984 में सरसंघचालक श्री बाला साहब देवरस ने अपने अबोहर प्रवास में घोष की बहुत प्रशंसा की।
आपातकाल में प्रवास के दौरान गीदड़बाहा में वे पकड़े गये। दो माह वहीं जेल में रखकर फिर उन्हें भटिंडा और फरीदकोट भेजा गया। साधारण धाराएं होने के कारण भटिंडा जेल से वे रिहा हो गये थे; पर पुलिस ने उन्हें फिर जेल भेज दिया। 1977 की जनवरी में वे फरीदकोट जेल से रिहा हुए। इस बार कार्यकर्ता तैयार थे। वे उन्हें एक गाड़ी में बैठाकर पुलिस की नजरों से दूर ले गये। दिनेश जी अपनी सायं शाखा के मुख्य शिक्षक अजीत जैन और वरिष्ठ प्रचारक श्री प्रेम गोयल का अपने संघ जीवन में विशेष योगदान मानते हैं।
1987 में उन्हें जम्मू-कश्मीर प्रांत का विश्व हिन्दू परिषद का संगठन मंत्री बनाया गया। 1988 में उन्हें महाकौशल प्रांत का काम दिया गया। वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य तब उस प्रांत में ही था। 1991 से 99 तक वे अंदमान-निकोबार में संगठन मंत्री रहे। इस दौरान वहां सर्वप्रथम ‘श्रीराम पादुका पूजन’ कार्यक्रम हुए। इसके बाद कई मंदिरों में साप्ताहिक सत्संग तथा बस्तियों में संस्कार केन्द्र प्रारम्भ हुए। इससे वहां ईसाइयों का आना बंद हो गया।
2000 से 2003 तक पटना केन्द्र बनाकर वे पहले मध्य बिहार और फिर बिहार क्षेत्र संगठन मंत्री रहे। फिर एक वर्ष वे नेपाल भी रहे। 2004 में सुनामी आपदा के बाद उन्हें फिर अंदमान बुला लिया गया। उन्होंने अपने व्यापक सम्पर्क के कारण वहां सेवा व पुनर्वास कार्यों में विशेष योगदान दिया। 2009 में कोलकाता आकर उन्होंने दक्षिण बंगाल प्रांत का विशेष सम्पर्क विभाग का काम संभाला।
दिनेश जी 1989 में जबलपुर में थे। उस दौरान अयोध्या में कारसेवा के आह्नान पर अपेक्षा से बहुत अधिक लोग गये। 1992 की कारसेवा में अंदमान से श्री विष्णु पद राय (सम्प्रति भा.ज.पा. सांसद) के नेतृत्व में 21 लोग गये। जाने से पूर्व ‘तिरंगा पार्क’ में उनका सार्वजनिक सम्मान हुआ। बाबरी ढांचे के ध्वंस के बाद वि.हि.प. पर प्रतिबंध लग गया। कांग्रेसियों के दबाव पर पुलिस ने उन्हें एक रात थाने में रखा; पर अगले ही दिन न्यायालय ने छोड़ दिया। रामसेतु रक्षा आंदोलन के समय अंदमान में तैरती हुई ‘रामशिला’ को रथ पर सजाकर 125 स्थानों पर ले जाया गया। कई विरोधियों ने उसे जांचने के लिए दूसरे पानी में डाला; पर उसे पूर्ववत तैरते देख वे भी श्रद्धालु बन गये। 2012 से वे वि.हि.प. के दिल्ली स्थित केन्द्रीय कार्यालय पर रहकर विशेष सम्पर्क विभाग के केन्द्रीय कार्यालय को संभाल रहे थे। 21 अक्तूबर, 2021 को दीर्घ बीमारी के बाद उनका देहांत हो गया। सादर नमन, विनम्र श्रद्धांजलि।
#DineshGoyal
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#पुण्यतिथि
#Punyatithi
*🚩--आज का पंचांग*🚩
*अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत मन्वन्तरे, अष्टाविंशति-तमे, युग चतुष्के कलियुगे, कलि प्रथम चरणे सिद्धार्थी* (विक्रमी सम्वत) *पराभव* (शक सम्वत) नाम संवत्सरे
*युगाब्द* 5128
*विक्रमी संवत्* 2083
*शिवशके* 352-53
*शके* 1948
*अयन* दक्षिणायन
*ऋतु* शरद
*मास* आश्विन
*पक्ष* शुक्ल
*नक्षत्र* धनिष्ठा, शततारका
*योग* गण्ड, वृद्धि
*करण* गर, वणिज, विष्टि
*तिथि* नवमी
*वार* मंगलवार
*तदनुसार*
21 अक्टूबर 2026
*दिन विशेष*
भरत मिलाप
नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्वतन्त्र भारत सरकार की घोषणा, आजाद हिन्द फौज स्थापना दिवस
भारतीय जनसंघ स्थापना दिवस
*जन्मदिवस*
1. हिमालयी क्षेत्रों की खोज करने वाले नैन सिंह रावत
2. पुरातत्ववेत्ता काशीनाथ नारायण दीक्षित
3. महान दार्शनिक एवं सन्त मध्वाचार्य जयन्ती
*पुण्यतिथि*
1. मुत्तुस्वामी दीक्षितार
2. दिल्ली में सत्याग्रह की शान बहन सत्यवती
3. सम्पर्क मे तज्ञ विहिप के वरिष्ठ प्रचारक दिनेश जी गोयल
*आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो*
🙏🕉️🙏
भारतीय वायुसेना की प्रथम महिला अधिकारी विंग कमांडर विजयलक्ष्मी रमणन जी की पुण्यतिथि पर शत-शत नमन! 🇮🇳✨
भारतीय वायुसेना के इतिहास में महिला शक्ति की सशक्त नींव रखने वाली, विशिष्ट सेवा पदक (VSM) से सम्मानित देश की पहली महिला कमीशन अधिकारी, विंग कमांडर डॉ. विजयलक्ष्मी रमणन जी की पुण्यतिथि पर हम उन्हें सादर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
18 अक्टूबर 2020 को 96 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहने वाली डॉ. रमणन का जीवन साहस, कर्तव्यपरायणता और नारी सशक्तिकरण की एक अद्भुत मिसाल है।
उनके जीवन से जुड़ी कुछ प्रेरणादायक बातें:
• ऐतिहासिक शुरुआत: उन्होंने 1955 में बतौर सैन्य डॉक्टर आर्मी मेडिकल कोर ज्वाइन किया और वायुसेना में प्रतिनियुक्त होने वाली पहली महिला अधिकारी बनीं।
• युद्धों में अद्वितीय सेवा: उन्होंने 1962, 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान विपरीत परिस्थितियों में हमारे घायल वीर सैनिकों की चिकित्सा सेवा की और अनगिनत जानें बचाईं।
• आत्मनिर्भरता की मिसाल: जब वायुसेना में महिला अधिकारियों के लिए कोई औपचारिक वर्दी नहीं थी, तब उन्होंने स्वयं वायुसेना की विशिष्ट 'साड़ी वर्दी' को डिजाइन किया, जो आज भी गौरव का प्रतीक है।
• संगीत में भी निपुण: देश सेवा के साथ-साथ वह ऑल इंडिया रेडियो पर एक ए-ग्रेड की प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत कलाकार भी रहीं।
आज भारतीय वायुसेना में हमारी बेटियां जिस ऊंचे आसमान में सुखोई और राफेल जैसे लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, उसकी राह विंग कमांडर विजयलक्ष्मी जी ने ही आसान बनाई थी। उनका सर्वोच्च देश-प्रेम और निस्वार्थ सेवाभाव आने वाली हर पीढ़ी को प्रेरित करता रहेगा।
💐 शत्-शत् नमन। जय हिन्द! 🇮🇳
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी: युगप्रधान आचार्य तुलसी 💫
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के नौवें अधिशास्ता, महान समाज सुधारक और मानवता के मसीहा आचार्य श्री तुलसी (20 अक्टूबर 1914 – 23 जून 1997) को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन! 🙏✨
आचार्य तुलसी केवल एक आध्यात्मिक संत नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील विचारक और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे。 उन्होंने समाज को रूढ़ियों से निकालकर मानवीय मूल्यों की एक नई दिशा दिखाई।
उनके जीवन के प्रमुख स्तंभ, जो आज भी प्रेरणा देते हैं:
🔸 अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता: वर्ष 1949 में उन्होंने 'अणुव्रत आंदोलन' की शुरुआत की, जिसने जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर हर व्यक्ति को मद्यपान-मुक्त, चरित्रवान और प्रामाणिक जीवन जीने का मार्ग दिखाया।
🔸 पदलिप्सा से परे अनूठा विसर्जन: जब दुनिया पद और प्रतिष्ठा के पीछे भागती है, तब आचार्य श्री ने 1994 में अपने ऊर्जस्वल आचार्य पद का विसर्जन कर महाप्रज्ञ जी को आचार्य पद सौंपा और निरुपाधि बनकर मानवता की सेवा की।
🔸 शिक्षा और नारी उत्थान: लाडनूं (राजस्थान) में 'जैन विश्व भारती संस्थान' की स्थापना कर उन्होंने मूल्य-आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया और महिलाओं को समाज में अग्रणी स्थान दिलाने के लिए 'नया मोड़' जैसे ऐतिहासिक कदम उठाए।
🔸 जीवन विज्ञान और प्रेक्षाध्यान: आधुनिक समाज को मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने जीवन विज्ञान और प्रेक्षाध्यान (Meditation) जैसी अमूल्य पद्धतियाँ प्रदान कीं।
वह एक कुशल शिल्पी थे, जिन्होंने पत्थरों जैसे इंसानों को तराशकर उन्हें उत्कृष्ट संत और साध्वी बनाया। आइए, आज उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।
"साधु संप्रदाय के आचार्य होते हुए भी, जो जन-जन के कल्याण की सोचे — वही सच्चे अर्थों में युगप्रधान है।" 🕊️
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"लेखन केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और संस्कृति की आत्मा होता है।"
आज गुजराती साहित्य के आकाशदीप, महान उपन्यासकार श्री गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी जी की जन्म-जयंती है।
महाकाव्यात्मक उपन्यास 'सरस्वतीचंद्र' के माध्यम से उन्होंने न केवल गुजराती साहित्य को एक नई ऊंचाई दी, बल्कि तत्कालीन समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का जो सजीव चित्रण किया, वह आज भी प्रासंगिक है। उनके विचार और साहित्य साधना युगों-युगों तक भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी।
साहित्य जगत के इस महान मनीषी को उनकी जयंती पर सादर नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि! 💐✍️
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20 अक्तूबर/जन्म-दिवस
संघ सुगन्ध के विस्तारक शरद मेहरोत्रा
कन्नौज (उ.प्र.) के प्रसिद्ध इत्र निर्माता व नगर संघचालक श्री हरिहर नाथ एवं श्रीमती सरला के घर में 20 अक्तूबर, 1942 को शरद जी का जन्म हुआ। संघचालक होने के कारण संघ के कार्यकर्ताओं का प्रायः उनके घर आगमन होता था; पर वे अपनी किताबों में डूबे रहते थे। इस कारण कन्नौज में वे संघ से नहीं जुड़ पाये। सेठ वासुदेव सहाय इंटर कालिज से इंटर और फिर विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म महाविद्यालय, कानपुर से उन्होंने अर्थशास्त्र में एम.ए किया।
कानपुर में 1962 में उनका सम्पर्क फरुखाबाद जिला प्रचारक श्री शिवप्रसाद जी के माध्यम से विभाग प्रचारक श्री अशोक सिंघल से हुआ। उस समय रज्जू भैया और भाऊराव देवरस भी कानपुर आते रहते थे। इनके सान्निध्य ने शरद जी के जीवन में संघ की लौ जला दी। इसका परिणाम यह हुआ कि 1964 में 22 वर्ष की अवस्था में एम.ए करते ही वे प्रचारक बन गये।
प्रचारक के नाते सर्वप्रथम उन्हें मथुरा भेजा गया। मथुरा की मस्ती उनके स्वभाव के अनुकूल थी, इसलिए वे वहां रम गये। वे अत्यन्त सम्पन्न परिवार के थे, जबकि प्रचारक को सादगी से रहते हुए अपने व्यय का हिसाब प्रति माह व्यवस्था प्रमुख को देना होता है। शाही खर्च के आदी शरद जी को इससे कठिनाई होती थी; पर धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं को इस अनुसार ढाल लिया।
वे आगरा, अलीगढ़ और एटा में जिला व विभाग प्रचारक रहे। मथुरा में दीनदयाल जी के पैतृक ग्राम फरह में शरद जी ने उनके जन्मदिवस पर मेला प्रारम्भ कराया। ऐसे कई अभिनव कार्यक्रमों से उन्होंने सैकड़ों नये कार्यकर्ताओं को संघ से जोड़ा।
शरद जी बहुत सिद्धांतनिष्ठ व्यक्ति थे। आपातकाल में वे जब जेल में थे, तो उनके परिवारजन जेलर के माध्यम से प्रायः उनसे मिल लेते थे। शरद जी ने इसके लिए उन्हें डांटा। 1977 में जब प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी, तो कल्याण सिंह उसमें स्वास्थ्य मंत्री थे। शरद जी के परिजनों ने उनसे मिलकर और शरद जी का नाम लेकर अपने एक संबंधी का स्थानांतरण रुकवा लिया। इससे भी शरद जी बहुत नाराज हुए।
1981 में वे मध्यभारत में सहप्रांत प्रचारक और 1985 में प्रांत प्रचारक बने। वहां उन्होंने अपने परिश्रम से शाखाओं का भरपूर विस्तार किया। श्री रामजन्मभूमि आंदोलन में पूरे भारत की भांति मध्यभारत प्रांत भी सक्रिय रहा। साहित्य निर्माण, विद्यालयों का विस्तार, धर्म जागरण से लेकर सेवा तक सब कामों में उन्होंने नये आयाम स्थापित किये। उन दिनों म.प्र. में भाजपा का शासन था। ऐसे में सिद्धांतों पर दृढ़ रहते हुए संगठन और सत्ता में तालमेल बनाये रखने में भी वे सफल हुए।
बचपन से ही शरद जी का जबड़ा कुछ कम खुलता था। उसे सक्रिय रखने के लिए वे प्रायः कुछ चबाते रहते थे; पर यही आगे चलकर मुख कैंसर में बदल गया। मुंबई में टाटा अस्पताल की जांच से जब यह पता लगा, तब तक बात बहुत आगे बढ़ गयी थी। कई तरह के इलाज किये गये; पर रोग बढ़ता गया।
उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि चार-छह माह का जीवन बढ़ाने के लिए अ१परेशन, रेडियेशन या कीमोथेरेपी आदि का प्रयोग वे नहीं करेंगे। धीरे-धीरे उनका मुंह बिल्कुल बंद हो गया और वे लिखकर बात करने लगे। उन्होंने स्वयं को प्रभु चरणों में समर्पित कर दिया और आयुर्वेदिक दवा लेते रहे।
कैंसर में रोगी को अत्यन्त शारीरिक पीड़ा होती है; पर शरद जी ने किसी को इसका अनुभव नहीं होने दिया। जब तक संभव था, वे बीमारी में भी प्रवास करते रहे। इसी प्रकार समय निकलता गया और 30 जनवरी, 1993 को सुंगध नगरी के इस सुगंधित पुष्प ने स्वयं को भारतमाता के चरणों में विसर्जित कर दिया। देहांत से एक घंटे पूर्व उन्होंने श्री माणिक चंद्र वाजपेयी को स्लेट पर लिखकर एक संदेश दिया, जो सब कार्यकर्ताओं के लिए आज भी पाथेय है।
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20 अक्तूबर/बलिदान-दिवस
गोरक्षक डा. राशिद अली
गाय का भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान है। सभी भारतीय मत-पंथ इसे पूज्य मानते हैं। इस्लाम में भी गोहत्या या गोमांस खाने का आदेश नहीं है; पर हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए मुस्लिम शासकों द्वारा चालू की गयी कुप्रथा आज भी जारी है। इस बारे में कानून भी स्पष्ट और कठोर नहीं है।
लेकिन अनेक समझदार एवं देशभक्त मुसलमान गाय को हितकारी पशु मानकर उसकी सेवा एवं रक्षा का प्रयत्न करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयास से ऐसे मुसलमानों को संगठित करने का प्रयास भी हो रहा है। इसके लिए ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ तथा ‘माई हिन्दुस्तान’ जैसे संगठन सक्रिय हैं।
डा. राशिद अली ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ के सक्रिय कार्यकर्ता थे। उनका जन्म ग्राम नगला झंडा (जिला सहारनपुर, उ.प्र.) के एक पठान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री हफीजुर्रहमान था। चिकित्सा का प्रशिक्षण (बी.आई.एम.एस.) प्राप्त कर वे अपने गांव में ही चिकित्सा कार्य करने लगे।
डा. राशिद अली के मन में सम्पूर्ण मानवमात्र के लिए प्रेम और करुणा की भावना थी। अतः मांसाहारी परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने शाकाहार को अपनाया। उनका मत था कि हिन्दू और मुसलमानों की एकता से ही भारत की उन्नति होगी, और इसके लिए गोहत्या बंद होनी बहुत आवश्यक है।
गोप्रेमी होने के कारण उन्होंने इससे सम्बन्धित कानूनों का अध्ययन किया। इससे उन्हें पता लगा कि एक ट्रक में छह से अधिक गायों को नहीं ले जाया जा सकता; पर पशुओं के व्यापारी एक साथ 20-25 गायों को ठूंसकर काटने के लिए उन्हें पशु मंडी में ले जाते थे। पुलिस और प्रशासन भी घूस खाकर अपनी आंख बंद कर लेता है। इससे उनका मन बहुत दुखी होता था।
पश्चिमी उ.प्र. में मुसलमानों की जनसंख्या बहुत अधिक है। उसकी सीमाएं हरियाणा से भी लगती हैं। सहारनपुर जिले में ही ऐसे कई गांव हैं, जहां खुलेआम गोहत्या होती थी। मुसलमान वोटों के लालच में राजनेता भी इस ओर ध्यान नहीं देते थे। ऐसे में डा. राशिद अली ने इसके विरुद्ध कमर कस ली तथा 1998 में अपना चिकित्सालय बंद कर पूरा समय गोरक्षा को समर्पित कर दिया।
जब भी उन्हें यह सूचना मिलती कि गायों को हत्या के लिए ले जाया जा रहा है, वे अपनी मोटर साइकिल लेकर निकल पड़ते। इस प्रकार उन्होंने हजारों गोवंश की प्राणरक्षा की; पर यह काम इतना सरल नहीं था। एक ओर कट्टरपंथी मुल्ला, तो दूसरी ओर गोहत्यारे उनके पीछे पड़ गये। उन्हें धमकियां मिलने लगीं; पर उन्होंने अपने संकल्प से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
वर्ष 2002 में घर जाते समय कुछ लोगों ने उन्हें घेर कर चाकुओं से हमला कर दिया। पेट में गहरे घाव होने से वे बेहोश हो गये; पर गोमाता के आशीर्वाद तथा समय पर सहायता मिलने से वे शीघ्र ही स्वस्थ हो गये। कुछ दिन बाद हुए एक समारोह में उन्होंने कहा कि ‘‘ये घाव तो कुछ भी नहीं हैं। गोमाता की रक्षा के लिए यदि मुझे प्राण भी देने पड़ें, तो मैं पीछे नहीं हटूंगा।’’
20 अक्तूबर, 2003 को उन्हें दूरभाष से किसी ने सूचना दी कि ग्राम खुजनापुर में कहीं से एक ट्रक भर कर गाय लाई गयी हैं, जिन्हें अगले दिन काटा जाएगा। यह सुनते ही उन्होंने अपने भाई आसिफ अली को मोटर साइकिल पर बिठाया और वहां पहुंच कर सभी 25 गायों को छुड़ा लिया।
पर इससे गोहत्यारे बहुत नाराज हो गये। जब डा. राशिद घर वापस जा रहे थे, तो चार लोगों ने उनका पीछा किया और अपने गांव नगला झंडा पहुंचने से कुछ पहले ही उनके सीने में गोली दाग दी। गोली लगते ही वे गिर गये। जब तक लोग सहायता के लिए आये, तब तक उनके प्राण पखेरू उड़ गये।
इस प्रकार एक मुसलमान गोरक्षक ने अपने संकल्प को पूरा करते हुए प्राणों की आहुति दे दी।
(संदर्भ : पैगाम ए मादरे वतन, अपै्रल 2008)
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं देश के नव-निर्माण में समान योगदान देने वाले कुशल राजनीतिज्ञ एच. सी. दासप्पा जी की पुण्यतिथि पर सादर स्मरण एवं विनम्र श्रद्धांजलि। 🙏💐
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले और आज़ादी के बाद देश के विकास को नई दिशा देने वाले एच. सी. दासप्पा जी का जीवन राष्ट्र सेवा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने गांधीवादी मूल्यों और रचनात्मक कार्यों को सदैव सर्वोपरि रखा।
• मैसूर असेंबली के सदस्य के रूप में संसदीय मूल्यों को मजबूत किया।
• आज़ादी के बाद वित्त और उद्योग मंत्री तथा केंद्रीय रेल मंत्री के रूप में देश के बुनियादी ढांचे और नव-निर्माण को गति दी।
राष्ट्र निर्माण में उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक सुधार और निस्वार्थ सेवा देशवासियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। माँ भारती के इस सच्चे सपूत को कोटि-कोटि नमन।
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*⛳जय भारत🌞वन्दे मातरम्⛳*
*🌷प्रभाते करदर्शनम्*🌷
*🪂संस्कृति अपनी एक चिरन्तन 🪂*
*हिमालयात्समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्*
*तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते*
*हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक उस देवनिर्मित भूमि को हिन्दुस्तान कहते हैं। अर्थात इस भूमि में देवत्व निहित है, स्वयं ईश्वर ने भारतभूमि का निर्माण किया है।*
🪷*विजयदशमी के पावन अवसर पर हम अपने लोभ, काम, क्रोध, मोह रूपी रावण पर विजय प्राप्त करें*🪷
राष्ट्र सेविका समिति के स्थापना दिवस की मंगलकामनाएँ। हमें इसका ध्येय *तेजस्वी हिन्दु राष्ट्र का पुनर्निर्माण* कभी विस्मृत न हो।
*ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय*
*सुप्रभात जय श्रीकृष्ण*
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भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 'पहली' बनने से लेकर 'मिसाल' बनने तक का सफर! ⚖️
आज भारत की महान न्यायविद् और 'मदर ऑफ लॉ' कही जाने वाली न्यायमूर्ति लीला सेठ जी की जयंती है। वे केवल एक न्यायाधीश नहीं थीं, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं और समानता के अधिकारों के लिए कई बंद दरवाजों को खोला।
उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियां:
👉 लंदन बार परीक्षा में टॉप करने वाली पहली महिला (1958)
👉 दिल्ली उच्च न्यायालय की पहली महिला जज (1978)
👉 देश के किसी राज्य (हिमाचल प्रदेश) के उच्च न्यायालय की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (1991)
समाज में उनका योगदान:
• बेटियों को पिता की संपत्ति में बराबर का हक दिलाने वाले हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम संशोधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
• महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनों को सख्त बनाने के लिए जस्टिस वर्मा समिति की सदस्य के रूप में काम किया।
"अपने बेटों की परवरिश भी अपनी बेटियों की तरह करें, ताकि वे शालीनता और संवेदनशीलता सीख सकें।" – जस्टिस लीला सेठ
आइए आज उनकी जयंती पर उनके साहस, निष्पक्षता और समानता के विचारों को याद करें। उनके विचार आने वाली पीढ़ियों को न्याय की राह पर चलने के लिए हमेशा प्रेरित करते रहेंगे।
🙏 शत्-शत् नमन और श्रद्धांजलि!
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*त्रिजटा : संवेदना और विवेक का संगम*
नवरात्रि में स्त्रीशक्ति के विविध स्वरूपों का स्मरण करते हुए रामचरितमानस की त्रिजटा का चरित्र संवेदना और विवेक के विशिष्ट समन्वय को सामने लाता है। राक्षसी होते हुए भी त्रिजटा सीता के प्रति करुणा और सहानुभूति रखती है। सीता की व्यथा को समझने और उनकी मानसिक स्थिति के अनुरूप व्यवहार करने की उसकी क्षमता उसके चरित्र को विशिष्ट बनाती है।
रावण की अशोक वाटिका में वियोग और अपमान से व्यथित सीता जीवन त्यागने की इच्छा व्यक्त करती हैं;
*तजौं देह करु बेगि उपाई।*
*दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥*
सीता की व्याकुलता पर त्रिजटा कहती है;
*निसि न अनल मिलि सुनु सुकुमारी।*
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
त्रिजटा का चरित्र स्त्रीशक्ति के उस रूप को सामने लाता है, जिसमें संवेदना के साथ मनोस्थिति को समझने और संकट की घड़ी में व्यवहारकुशलता दिखाने की क्षमता भी जुड़ी है। सीता जब असहनीय विरह में देह त्यागने की बात कहती हैं, तब त्रिजटा उन्हें उपदेश नहीं देती। वह रात में अग्नि न मिलने की बात कहकर उनका ध्यान उनकी पीड़ा से हटाकर तत्काल की परिस्थिति की ओर मोड़ देती है।
मनःस्थिति में परिवर्तन कई बार परिस्थिति के प्रति हमारी प्रतिक्रिया बदल देता है। यह छोटा-सा संवाद बताता है कि संकट की घड़ी में ध्यान की दिशा बदलना भी मन को नई स्थिति में ला सकता है। त्रिजटा की संवेदना केवल सीता की पीड़ा को समझने में नहीं, बल्कि उनकी मनःस्थिति के अनुरूप व्यवहार करने में भी प्रकट होती है।
दुर्गा के व्यापक शक्ति-स्वरूप में शक्ति का अर्थ केवल दुष्टता का प्रतिकार करना नहीं, बल्कि संकट की प्रकृति को पहचानकर उसके अनुरूप व्यवहार करना भी है। जहां प्रतिकार आवश्यक हो, वहां साहस; जहां विवेक अपेक्षित हो, वहां उचित निर्णय; और जहां मन टूटने लगे, वहां संवेदना; शक्ति के ये सभी रूप हैं। त्रिजटा का चरित्र इसी स्त्रीशक्ति का परिचायक है, जो करुणा और व्यवहारकुशलता के माध्यम से संकट की घड़ी में भी नई संभावना का द्वार खोलती है।
*या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।*
*नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥*