पिछले दिनों दो महत्वपूर्ण घटनाएँ हुई हैं!
केरलम के गृह विभाग ने 2006 में कथित भ्रष्टाचार और आत्महत्या के मामले की फ़ाइल निकलवाई है, ज्ञानेश कुमार उस जाँच के घेरे में थे!
सुप्रीम कोर्ट 2005 के सोहराबुद्दीन एनकाउंटर में सभी 22 आरोपियों के बरी होने के ख़िलाफ़ अपील की सुनवाई करेगा। इस केस में अमित शाह भी आरोपी थे!
सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति के एनकाउंटर केस में सभी 92 गवाह कोर्ट में पलट गए थे!
सुप्रीम कोर्ट ने इसे “गंभीर” कहा है, और अभियोजन पक्ष की घोर नाकामी की तरफ़ इशारा किया है!
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस मामले में अमित शाह का डिस्चार्ज वर्तमान अपील के दायरे में नहीं होगा,
लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट को लगा कि इस मामले में सभी आरोपियों का बरी होना “मिसकैरेज ऑफ़ जस्टिस” है, लिहाज़ा पुनः ट्रायल होना चाहिए।
और ट्रायल के दौरान इन 92 गवाहों में से किसी एक ने भी अमित शाह की भूमिका पर कुछ “प्रकाश” डाला या कोई “नया सबूत” सामने आया तब कोर्ट क्या करेगा, ये फ़िलहाल स्पष्ट नहीं है!
वहीं दूसरी तरफ़ गुजरात से हज़ारों मील दूर केरल की एक घटना है जो सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के एक साल बाद घटी थी!
2006 में ज्ञानेश कुमार केरल में सचिव थे, इनके विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार से तंग आकर एक इंजीनियर ने आत्महत्या कर ली थी!
अपने सुसाईड नोट में मृतक ने ज्ञानेश कुमार का नाम भी लिया था!
तत्कालीन केरल सरकार के विजिलेंस विभाग और क्राइम ब्रांच ने जांच शुरू की, पर कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया!
अब केरलम में कांग्रेस के नेतृत्व में यूडीएफ की सरकार है।
बीस साल पुराने उस मामले की फ़ाइल फिर से खोली जा रही है!
चूँकि आपराधिक मामले चाहे जितने पुराने हों, नए तथ्यों की रोशनी में उसपर कभी भी संज्ञान लिया जा सकता है, मुक़दमा चलाया जा सकता है।
इसलिए आज जो बड़े पदों पर बैठे हैं, चारों तरफ़ सेटिंग करके ख़ुद को सुरक्षित समझ रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि किसी का भूतकाल कभी भी उसका पीछा नहीं छोड़ता!
बदले वक़्त, बदले हालात और बदले निज़ाम में हर गुनाह का हिसाब होता है!
लिहाज़ा कौन सा गुनाह, किस रूप में न्याय बन जाए, ये कोई नहीं जानता!!
और शायद इसीलिए इन्हें चुनाव आयोग के ज़रिए चुनाव “सेट” करने की इतनी घनघोर ज़रूरत है…
पंजाब में बीजेपी सरकार बनाने के बाद तीन साल में उसे “ड्रग फ़्री” करेगी…
ये दावा है देश के गृह मंत्री अमित शाह का, तीन दिन या तीन महीने नहीं, पूरे तीन साल!
लगता है अगले तीन साल के लिए “माल” का ऑर्डर दिया जा चुका है, लिहाज़ा उसकी “खपत” के लिए इन्हें तीन साल चाहिए!
वैसे अमित शाह पिछले सात सालों से देश के गृह मंत्री हैं, देश की सीमाओं पर चौकसी इनकी ज़िम्मेदारी है।
सभी जानते हैं कि पंजाब में ड्रग्स विदेशों से आता है, ये आज तक इसे रोक नहीं पाए।
और अब अगर पंजाब में इनकी सरकार बन गई तो न जाने किस जादू से उसे “ड्रग फ्री” करेंगे, वो भी अगले तीन साल में!
एक और बात, देश अब तक कई बार देख चुका है कि मोदी या शाह की “गारंटी” का कोई मतलब नहीं है!!
ये वही अमित शाह हैं जिन्होंने 2021 में पाँच साल माँगे थे असम को “बाढ़ मुक्त” करने के लिए, मिले पाँच साल, पर असम फिर भी डूबा, और इस साल पहले से भी ज़्यादा डूबा!
लिहाज़ा, ये सिर्फ़ बड़े बड़े दावे ही कर सकते हैं, किसी समस्या का हल नहीं कर सकते, क्योंकि ये ख़ुद समस्या हैं…
अश्विनी कुमार से जुड़ा एक और किस्सा…
अश्विनी कुमार वही हैं जिन्होंने तीन साल पहले बतौर डिविज़नल कमिश्नर, दिल्ली के तत्कालीन मुख्यसचिव नरेश कुमार के बेटे का बचाव किया था, भ्रष्टाचार के मामले में!
फ़िलहाल इनके बेटे को एक महिला के साथ दुर्व्यवहार के मामले में दिल्ली पुलिस बचा रही है, ऐसा आरोप है पीड़िता की माँ का!
यानि नरेश कुमार के बेटे का बचाव अश्विनी कुमार करते हैं, और अब अश्विनी कुमार के बेटे का बचाव दिल्ली पुलिस कर रही है!
ग़ज़ब भाईचारा है दिल्ली की ब्यूरोक्रेसी में, भतीजों की “करतूतों” पर पर्दा अच्छे से डालते हैं!
नरेश कुमार के बेटे की कंपनी ने कुछ ज़मीन किसानों से ख़रीदी थी, जो कि द्वारका एक्सप्रेसवे के लिए NHAI ने अधिग्रहित की।
मुआवज़े की जितनी राशि सरकार ने तय की, उससे कई गुना ज़्यादा पैसा इस कंपनी को देने का आदेश दिल्ली के एक DM ने बतौर अपीलेट अथॉरिटी दिया!
आरोप था कि संबंधित DM का आदेश नरेश कुमार, तत्कालीन मुख्य सचिव से प्रभावित था!
ये आरोप बेबुनियाद है, इसकी गवाही देने के लिए अश्विनी कुमार ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की थी!
अमूमन कोई IAS अधिकारी अपने बॉस के बचाव में प्रेस कांफ्रेंस नहीं करता, पर अश्विनी कुमार ने किया!
नतीज़ा, भूमि अधिग्रहण में नरेश कुमार के बेटे की कंपनी को फ़ायद हुआ की नहीं, अगर हुआ तो उसमे नरेश कुमार की कोई भूमिका थी या नहीं, इसकी जाँच किसी एजेंसी ने नहीं की!
मामला दब गया, या यूँ कहिए दफ़न हो गया!
वक़्त बीता, कुछ महीने बाद अश्विनी कुमार MCD के कमिश्नर बना दिए गए। जून 2024 से फ़रवरी 2026 तक वो इस पद पर बने रहे।
अश्विनी कुमार के कार्यकाल में ही बीजेपी ने अप्रैल 2025 में फ़िर से जोड़तोड़ करके MCD में अपनी सरकार बना ली!
वैसे ये वही MCD है जिसे बीजेपी ने पिछले बीस सालों में भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया है।
और ये वही MCD है जो अभी सत्य निकेतन में गिरी बिल्डिंग और उससे हुई सात छात्रों की मौत की ज़िम्मेदार है!
वैसे पिछले दो सालों में दिल्ली में बिल्डिंग गिरने की 34 घटनाएँ हो चुकी है, जिसमें 90 जानें गई हैं!
यानि अश्विनी कुमार जैसे अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल सिर्फ़ ख़ुद के बेटे को बचाने के लिए करते हैं, न कि आम जनता के बेटे-बेटियों को सुरक्षित रखने के लिए!
शायद इसीलिए IAS को “स्टील फ्रेम ऑफ़ इंडिया” कहते हैं…
अश्विनी कुमार, दिल्ली के पूर्व डिविज़नल कमिश्नर और MCD कमिश्नर के बेटे पर दिल्ली पुलिस मेहरबान है!
इनके बेटे पर एक महिला ने घर में घुसकर मारपीट और धमकी का आरोप लगाया, पर पुलिस ने FIR दर्ज़ नहीं की!
ये वही दिल्ली पुलिस है जो स्वाति मालीवाल के “गढ़े आरोप” पर अरविंद केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार को तुरंत गिरफ़्तार कर लेती है!
ये वही दिल्ली पुलिस है जो इस बात की भी तफ्तीश नहीं करती कि विभव कुमार पर मारपीट का आरोप उस जगह लगा है जहाँ CCTV कैमरे थे, कई सरकारी कर्मचारी ड्यूटी पर थे। न कोई फ़ुटेज, न किसी और का बयान, बस सीधे गिरफ़्तारी, और तीन महीने तक “नो बेल, ओनली जेल”!
और अश्विनी कुमार के बेटे के मामले में दिल्ली पुलिस कुछ नहीं करती, जबकि मारपीट, यौन उत्पीड़न पीड़िता के घर में हुआ है, पीड़िता की शिकायत पर FIR तक दर्ज़ नहीं करती!
दरअसल देश में अब क़ानून का शासन नहीं, क़ानून पर कंट्रोल करने वालों का शासन है!
लिहाज़ा एक IAS अधिकारी का बेटा देश की राजधानी में एक महिला के ख़िलाफ़ ज़ुर्म करके भी ख़ुलेआम घूमता है, FIR भी नहीं होती, पीड़िता को सुरक्षा और न्याय के लिए दर दर भटकना पड़ता है।
और आम जनता या राजनैतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ झूठे आरोप पर भी बुलडोज़र चलता है, गिरफ़्तारी होती है…
कितने लाचार हैं बेचारे परवेश वर्मा…
दिल्ली की अवैध बीजेपी सरकार में मंत्री हैं, पर इनकी कोई नहीं सुनता, सब कुछ अकेले करना पड़ता है!
जैसे, सड़क निर्माण में कांट्रैक्टर्स से “कमीशन” माँगने की जाँच ACB को करनी चाहिए, पर ये काम मंत्री जी ख़ुद करने गए थे!
यही नहीं, एक युवा वीडियो बनाकर “सरकारी काम में बाधा” डाल रहा था, बेचारे मंत्री जी को “बाधा हटाने” के लिए उसे थप्पड़ मारना पड़ा!
सरकारी काम से बाधा हटाने का काम दिल्ली पुलिस का है, पर उसे भी मंत्री जी को करना पड़ा!
अब जब मंत्री जी ने सरेआम किसी को थप्पड़ मारा है, जो कि भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध है, तो दिल्ली पुलिस FIR दर्ज़ नहीं कर रही है!
अर्थात् दिल्ली पुलिस अब ये चाहती है कि मंत्री जी अपने ख़िलाफ़ FIR भी ख़ुद ही लिखवायें!
ऐसे में हर तरफ़ से हताश होकर अब बेचारे मंत्री जी को अपने परिवार का इस्तेमाल करना पड़ रहा है!
इन्हें भी मोदी जी की तरह यही बोलना पड़ा कि इनके “परिवार को गाली” दी गई थी!
अब “परिवार” और “गाली” के आगे क्या कहा जा सकता है?
आख़िर वो गाली तो मंत्री जी को बुरी लगेगी ही जिसे वहाँ मौजूद किसी और ने न सुनी हो, इतनी सारी रिकॉर्डिंग में न क़ैद हुई हो!
लिहाज़ा क़ानून ख़ुद ब ख़ुद मंत्री जी के हाथ में उतर गया, और वही क़ानून बिलकुल ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से उनके हाथ ने किसी के गाल तक पहुँचा दिया!!
ऐसे में, अब मंत्री जी इतनी सारी ज़िम्मेदारी निभाने के बाद, एक ही संदेश अच्छे से दे पा रहे हैं कि वो किसी भी ज़िम्मेदारी के लायक़ नहीं हैं,
पर यही “नालायक़ियत” ही इन्हें बीजेपी की अवैध सरकार में मंत्री बनने के “योग्य” पाती है…
वाक़ई पिछले साढ़े चार सालों में पंजाब की भगवंत मान सरकार ने ज़बरदस्त काम किया है…
इतना ज़बरदस्त काम कि काँग्रेस और अकाली मिलकर भी कोई कमी नहीं ढूँढ पा रहे हैं!
इसलिए आगामी चुनाव में इनका एकमात्र मुद्दा है “पाँच सरकारी बंगले”!
मान सरकार के कामकाज़, मंत्रियों के परफॉरमेंस पर ये कुछ भी नहीं बोल पा रहे हैं, सबकुछ इस क़दर दुरुस्त है!
लिहाज़ा आगामी चुनाव में कांग्रेस-अकाली का एकलौता चुनावी मुद्दा है, “कौन कहाँ रहता है”
और अगर पंजाब की जनता ने कांग्रेस या अकालियों को अपना वोट देकर जीता दिया तो ये “केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़” में स्थित इन पाँच बंगलों को मुक्त करा लेंगे, ये इनका मैनिफेस्टो होगा!
यानि वर्तमान सरकार के पिछले पाँच साल “बंगलों की जवाबदेही” और अगर अकाली या कांग्रेस की सरकार बनती है तो अगले पाँच साल “बंगलों की मुक्ति” होगी, बाक़ी सब तो चंगा सी!!
पर इन सब के बीच बीजेपी कहाँ है?
आख़िर बीजेपी बंगलों की राजनीति क्यों नहीं कर रही?
वो इसलिए क्योंकि बीजेपी को फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कौन कहाँ रह रहा है!
बीजेपी को इस बात से फ़र्क़ पड़ता है कि कौन क्या “खा” रहा है!
तो हो सकता है अगले कुछ दिनों में बीजेपी इस बात का दावा करे कि इन पाँच बंगलों में लंच और डिनर के लिए क्या पकता है!
और लगे हाथ, पश्चिम बंगाल की तरह बीजेपी वाले पंजाब को भी “चिकेन-मटन” मुक़्त बनाने की घोषणा कर दें!!
तो पंजाब वालों, कमर कस लीजिए क्योंकि मान सरकार को चुनौती देने के लिए आपके सामने हैं कांग्रेस-अकाली-बीजेपी जिनका एक मात्र चुनावी मुद्दा है:
“कौन कहाँ रहता है, कौन क्या खाता है”
चुनाव आयोग को राजनैतिक दलों और उनकी फंडिंग का SIR करना चाहिए, न की वोटर्स का!
22 राजनैतिक दलों के पास 2024 के इलेक्शन के दौरान ₹18,742 करोड़ थे, वो भी सफ़ेद!
राजनैतिक दलों को दिए गए डोनेशन पर आयकर की छूट मिलती है, पर केवल 42% डोनेशन पर छूट क्लेम की गई!
तो आख़िर बाक़ी 58% पैसा किसका था जिसपर किसी ने आयकर की छूट का लाभ नहीं उठाया!
यानि राजनैतिक डोनेशन के नाम पर इस देश में हज़ारों करोड़ के काले धन को सफ़ेद करने का कारोबार चल रहा है!
पर न तो चुनाव आयोग और न ही ED इस पर संज्ञान ले रहा है!
दरअसल मोदी सरकार माहिर हो चुकी है जनता का ध्यान दूसरी तरफ़ भटकाने में, ताकि ये ख़ुद आसानी से लूट का माल समेट सकें!
इसलिए फ़िलहाल जनता को व्यस्त कर दिया गया है अपना नाम वोटर लिस्ट में क़ायम रखने में, और मोटी मछलियाँ लगी हैं अपने काले धन को सफ़ेद करने में!
और हाँ, ये सब वो करवा रहे हैं जो कहते थे, “न खाएँगे, न खानें देंगे…”
नोट: डिटेल्स के लिए पढ़ें अशोक लवासा, पूर्व चुनाव आयुक्त का ये लेख।
2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान अशोक लवासा चुनाव आयुक्त हुआ करते थे…
नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट के उल्लंघन की शिकायतें आयोग को मिली!
पुलवामा में शहीद सैनिकों और बालाकोट स्ट्राइक के नाम पर नरेंद्र मोदी ने वोट माँगा था, लवासा को इस पर आपत्ति थी!
मोदी-शाह के ख़िलाफ़ पाँच शिकायतों पर अशोक लवासा की राय तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और दूसरे आयुक्त सुशील चंद्रा से अलग थी!
चूँकि चुनाव आयोग की मेजोरिटी मोदी-शाह के ख़िलाफ़ कार्यवाही के पक्ष में नहीं थी, लिहाज़ा उन्हें क्लीन चिट मिल गई!
चुनाव नतीजे आने के बाद दोबारा नरेंद्र मोदी की सरकार बनी, और अमित शाह गृह मंत्री बने!
फ़िर अशोक लवासा की पत्नी को पुराने रिटर्न पर इनकम टैक्स का नोटिस मिला!
अशोक लवासा के बेटे की कंपनी के ख़िलाफ़ ED ने ₹7.5 करोड़ के फ़ेमा उल्लंघन का मामला दर्ज़ किया।
अशोक लवासा की बहन को इनकम टैक्स का नोटिस मिला, गुरुग्राम में उनके द्वारा खरीदे गए फ्लैट की जाँच पड़ताल हुई!
फिर अशोक लवासा ने 2020 में चुनाव आयुक्त के पद से इस्तीफ़ा दे दिया!
हालाँकि सीनियोरिटी के हिसाब से वो अगले मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते थे, पर उन्होंने एशियन डेवलपमेंट बैंक के वाईस प्रेसिडेंट का “अतिमहत्वपूर्ण” पद स्वीकार किया।
अब छह साल बाद, बतौर चुनाव आयुक्त सुख़बीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव आयोग में लिए जा रहे “ग़ैर क़ानूनी फ़ैसलों” पर आपत्ति दर्ज़ की है!
सब जानते हैं ये फ़ैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार किसके लिए ले रहे थे!
ऐसे में ये सोचना तो बनता है कि आख़िर संधू और जोशी के घर में कौन कौन है?
-क्या सबने ढंग से इनकम टैक्स रिटर्न भरा है?
-क्या बीस साल पहले की कोई फाइल कहीं दबी पड़ी है?
-क्या जिनके साथ कारोबार किया है उन्होंने बराबर सभी नियमों का पालन किया है?
और अगर सब कुछ ठीक ठाक किया भी है तो क्या ये सब दस बार एजेंसियों के दफ़्तर जाकर, सुबह से रात तक बैठकर, उन्ही सवालों का सौ बार जवाब देने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं?
अगर नहीं, तो शायद संधु-जोशी को भी जल्द ही कोई “एशियन डेवलपमेंट बैंक” जैसी “बड़ी” पोस्टिंग स्वीकार करनी पड़ सकती है…
“दिल्ली की अवैध बीजेपी सरकार”
दिल्ली की सत्ता पर क़ाबिज़ वर्तमान सरकार के लिए शुरू से मेरा यही संबोधन रहा है!!
अब कन्फ़र्म हो रहा है कि देश में और भी कई सारी “अवैध सरकारें” विराज़मान हैं…
“पंचायत की बात तो मानेंगे, पर खूँटा यहीं गाड़ेंगे।”
ज्ञानेश कुमार के कारनामों पर चुनाव आयोग और बीजेपी के स्पष्टीकरण का ये सार है!
चुनाव आयोग के अनुसार एक दूसरे के बीच असहमति होना “डिसिजन मेकिंग प्रोसेस” का हिस्सा है!
बीजेपी का कहना है, मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा दोनों आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद अकेले निर्णय लेना “लोकतंत्र की निशानी” है!
दोनों के स्पष्टीकरणों से ये सिद्ध होता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, बीजेपी की शह पर उपरोक्त कहावत के अनुसार काम कर रहे थे…
NDA सरकार में इस्तीफ़ा नहीं होता…
लेकिन धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा!
लेकिन ज्ञानेश कुमार को इस्तीफ़ा देना पड़ेगा!
NDA सरकार किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है…
लेकिन सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा, SIR रद्द करना पड़ेगा!
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव…
ये भारत गणतंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत है, इसके साथ बेईमानी हुई है, धोखा हुआ है!
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर राजद्रोह का मुक़दमा चलना चाहिए!
भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 152 कहती है, “जो कोई, भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालता है या ऐसे कृत्य में सम्मिलित होता है वो आजीवन कारावास का दायी होगा”
भारत की संप्रभुता संविधान के ज़रिए भारत सरकार में निहित है।
सरकार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के ज़रिए ही बननी चाहिए, तभी वो संवैधानिक होगी।
लेकिन अगर चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं कराता है, तो ऐसे चुनाव के ज़रिए बनी सरकार संवैधानिक नहीं हो सकती, यानि भारत की संप्रभुता उसमें निहित नहीं हो सकती!
मतलब ज्ञानेश कुमार नें देश में असंवैधानिक सरकार बनवाकर भारत की संप्रभुता को ख़तरे में डाला है, जो कि राजद्रोह है!
चूँकि राजद्रोह का अपराध ज्ञानेश कुमार के स्पष्ट निर्देश पर हुआ है इसलिए इन पर, इनके जीवन काल में ही, BNS की धारा 152 के तहत मुक़दमा चलाया जाना चाहिए…
The Election Commission of India is under fire like never before.
The SIR has struck 13 crore names off draft rolls, putting the EC at the centre of intense public debate over its role in deciding who gets to vote — and who doesn’t.
HOWEVER, what nobody knew: through that same period, some of the sharpest questions were being asked from inside.
Out today, after months of work. Our #ExpressInvestigation 🧵
(1/10)
Looks like Arunachal Pradesh has become a “dumping ground” for officers shunted out of Delhi…
The head of Delhi Government’s Anti-Corruption Branch has also been given a marching order to Arunachal!
What’s cooking—or what’s being covered up?
Big Breaking
Two Sr IAS Officers heading very sensitive departments of Excise & Revenue have been shunted out of Delhi with in 24 hours. Both Depts are directly under CM @gupta_rekha.
Since, it’s claimed that BJP CM does transfers & postings, Will CM Rekha Gupta explain the reason for these unceremonious transfers ?
Is it related to some large scale corruption caught red handed by CBI ?
Is it related to CBI raid yesterday on excise officer in west delhi leading to recovery of 1.5 crores cash ?
Was the bribe money being collected for some Sr officers or Neta ?
English newspapers may not publish this news so read it here.
नोटबंदी में बैंक की लाईन में खड़े होने के बाद अब देश SIR के दफ़्तर की लाईन में खड़ा है…
मेरी समझ ये थी कि SIR फ़ॉर्म जमा करने के बाद जारी ड्राफ्ट लिस्ट में जिनका नाम होगा, वो सुरक्षित होंगे, अपील उन्हें करनी होगी, जिनका नाम कटा है!
पर ऐसा नहीं था, जिनका नाम सिरे से कटा है, वो तो सरकार की नज़र में हैं ही नहीं, यानि वो “अस्तित्वविहीन” हैं!
इसके अलावा जिनका नाम दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में है उनमें से भी एक तिहाई वो हैं जिनके होने पर, यानि “अस्तित्व” पर सरकार को शक है!
यानि इन्हें प्रमाण देना होगा कि ये वही हैं, जो होने का दावा कर रहे हैं!
साफ़ शब्दों में कहें तो दिल्ली में 1.45 करोड़ वोटर्स थे, जिनमें से 47.5 लाख अब नहीं रहे।
बचे 97.5 लाख में से 32 लाख को अपने होने का प्रमाण देना है, तभी उन्हें अगले चुनाव में वोट देने लायक माना जाएगा!
ख़ैर, ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत मानता हूँ कि मैं उन 32 लाख में हूँ, 47.5 लाख में नहीं!
और तो और, संतोष इस बात का है कि मेरे साथ दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, सांसद बांसुरी स्वराज, विदेश मंत्री जयशंकर, देश के चुनाव आयुक्त सुख़बीर संधू, देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, और हज़ारों बड़े बड़े लोगों को भी अपने होने का प्रमाण देना है!
ये बिलकुल वही वाली फीलिंग है जैसी नोटबंदी के समय थी!
पर जैसे तब किसी भी “बड़े आदमी” को लाईन में नहीं खड़ा होना पड़ा था, केवल आम जनता ने ही धक्का खाया था,
वैसे ही इस बार भी आम जनता ही लाईन में खड़ी है, एक बार फिर अपने होने का सुबूत देने के लिए!!
वो भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि एक आत्ममुग्ध हुक्मरान को लगता है कि इतने लोगों को लाईन में खड़ा करके ही वो अगला चुनाव जीत सकता है…
मोदीनामा…
अपना ही पैसा लेने के लिए बैंक/ATM की लंबी लाईन में खड़े होना, इसे नोटबंदी कहते हैं!
ख़ुद के होने का सुबूत देने की लाईन में खड़े होना, इसे SIR कहते हैं!
जिस वस्तु पर सरकार पहले ही टैक्स ले चुकी है, उसे भी खरीदने के लिए एक्स्ट्रा पैसे देना, इसे UPI चार्ज कहा जाएगा!
देश के 250 जिलों में 25% युवा न पढ़ाई कर रहे हैं, न कोई रोज़गार और न ही कोई ट्रेनिंग…
ये हालात किसी भी ज़िम्मेदार सरकार के लिए चिंता का विषय है, पर “दीया जलाने” में व्यस्त व्यवस्था को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता!
बिहार, यूपी, हरियाणा, जहाँ दशकों से डबल इंजन सरकारें हैं, वहाँ के तीन चौथाई जिलों में युवा कुछ नहीं कर रहे हैं!
15-29 की उम्र के ऐसे युवाओं को NEET कहते हैं यानि Not in Employment, Education or Training.
भारत सरकार के नीति आयोग के अनुसार देश में “NEET” युवाओं की संख्या लगभग 9 करोड़ हो सकती है!
यानि इतनी बड़ी संख्या में देश के नौजवान कुछ नहीं कर रहे हैं, या हो सकता हैं इन्ही में स्वतंत्र भारद्वाज जैसे लाखों युवा भी हों, जो “सनातन धर्म” या “गौ माता” की “तथाकथित रक्षा” वाली ड्यूटी में लगे हों!
ख़ैर, लगता है आज देश के सामने मुद्दा ये नहीं है कि करोड़ों युवाओं के पास कुछ पॉजिटिव करने के अवसर नहीं हैं,
बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता मोदी जी को “आशीर्वाद” देना, उनकी “दीर्घायु” के लिए दिये जलाना है!
लिहाज़ा दीया जलाते रहिए, मोदी मोदी जपते रहिए…
दिल्ली सरकार के स्कूलों में अब शिक्षा और परीक्षा की कोई बात नहीं होती है…
दिल्ली में बीजेपी की अवैध सरकार आने के बाद से बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम की समीक्षा बंद हो गई!
2024 के बाद से इस वार्षिक समीक्षा की रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय की वेबसाइट पर नहीं डाली गई!
शिक्षा निदेशालय के स्तर पर रिजल्ट्स समीक्षा की शुरुआत 2006 में हुई, 2015 से केजरीवाल सरकार ने इसे अपनी प्राथमिकता में शामिल किया।
बतौर शिक्षा मंत्री, मनीष सिसोदिया ख़ुद प्रिंसिपल्स के साथ जिले स्तर पर रिज़ल्ट की समीक्षा करते थे!
बोर्ड परीक्षा में स्कूल वाइज पास प्रतिशत, कितने स्कूलों का शत प्रतिशत रिज़ल्ट रहा, कितने छात्रों को 90% से अधिक मार्क्स मिले, किन स्कूलों के नतीजे औसत से कम रहे, इत्यादि,
इन सभी आंकलन की डिटेल्ड रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार की वेबसाइट पर अपलोड कर दी जाती थी, ताकि कोई भी इसे देख सखे!
पर दिल्ली में बीजेपी की अवैध सरकार ने आते ही ये परंपरा रोक दी, लिहाज़ा 2025 और 2026 की रिपोर्ट वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है!
चूँकि अब देश में शिक्षा का मतलब “ज्ञान प्राप्ति” नहीं, बल्कि “मोदी भक्ति” में लीनता हो गया है,
इसलिए शिक्षा निदेशालय कम से “मोदी भक्ति की रिपोर्ट” ही ज़ारी करें!
बतायें कि मोदी जी के लिए स्कूलों नें कितने दिये जलाये, मोदी जी के कितने चित्र बच्चों नें बनाए, मोदी जी पर कितनी रील बनाई, मोदी जी की शान में कितने भाषण दिए…
अभी परीक्षा के न जाने और कितने “रूप” मोदी जी दिखायेंगे…
“परीक्षा पे चर्चा” और “परीक्षा लीक” के बाद अब लेटेस्ट रिलीज़ है “परीक्षा की छुट्टी”!
तो इस बार बच्चे अपनी परीक्षा के दौरान मोदी जी का जन्मदिन मनायेंगे, वो भी एक दिन नहीं, पूरा महीना!
यानि बच्चे भले ही परीक्षा की वजह से ख़ुद का जन्मदिन न मना सकें, पर उन्हें मोदी जी का “जन्मोत्सव” ज़रूर मनाना है!
दिल्ली सरकार के स्कूलों में मिड टर्म परीक्षा 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच हो रही है।
पर शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार का फ़रमान है कि 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक सभी स्कूलों में “सेवा संकल्प अभियान” मनाया जाए!
छह पेज लंबे फ़रमान में कहा गया है कि स्कूलों में कला और भाषण प्रतियोगिता आयोजित की जाए,
“मेरी सेवा, मेरा संकल्प” की थीम पर बच्चों से रील बनवाई जाए।
17 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच स्कूल स्तर पर ये कार्यक्रम होंगे, यानि बिल्कुल परीक्षा के बीचो बीच!
स्कूल के बाद, ज़िले और राज्य स्तर पर भी प्रतियोगिता होगी जो कि 13 अक्टूबर तक चलेगी, और फ़िर इनाम बटेंगे!
ये फ़रमान प्राइवेट स्कूलों पर भी लागू है!
वैसे बेहतर होता अगर शिक्षा निदेशालय इस साल पढ़ाई लिखाई बंद और परीक्षा कैंसिल करके सभी स्कूलों में सिर्फ़ “मोदी वर्ष” आयोजित करती!
वैसे भी आख़िर पढ़ लिख कर बच्चे क्या ही करेंगे?
उत्सव मनाये, मोदी जी की दीर्घ आयु के लिए प्रार्थना करें, इसी से बच्चों का “कल्याण” होगा। बेकार में पढ़ लिख लिया तो नौकरी माँगेंगे, परीक्षा लीक न हो ऐसी उम्मीद करेंगे।
इन झंझटों से तो अच्छा है कि बच्चे पढ़े ही न!
ख़ैर, शिक्षा निदेशालय ने ये आदेश अपने कलेजे पर पत्थर रखकर जारी किया है, इसलिए सिर्फ़ “पिछले 25 सालों की जनसेवा” ही लिखा है, “सेवा” वाले का नाम नहीं लिखा!
शायद दिल्ली के 45 लाख बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले आदेश को लिखते वक़्त इन शिक्षा अधिकारियों के हाथ काँपे होंगे, गुस्सा भी आया होगा!
सोच रहे होंगे कि आख़िर कब तक इन्हें एक “शिक्षा विरोधी” सरकार के “अशैक्षिक फैसलों” को मानना पड़ेगा…
So, this is how Modi ji won Delhi. By massively tampering with the voter lists.
Congratulations Modi ji for killing Indian democracy
Happy birthday
@narendramodi
VIDEO | Mumbai: Addressing a press conference on BJP's 'Seva Sankalp Abhiyan', Home Minister Amit Shah (@AmitShah ) says, "The 12 programmes I am about to outline will be conducted nationwide spanning from every single booth to the pan-India level. There will be a 'Seva Diwas' featuring blood donation drives, ceremonial lamp lighting, and 'Jan Abhaar', an expression of gratitude to the public for the trust they have placed in PM Modi ji over the past 25 years. A nationwide painting and speech competition titled 'Mere Sapno Ka Bharat' will be organised for children, adolescents, and the youth. Additionally, musical plays titled 'Namo Seva Ki Unkahi Kahaniyan' will be presented in local languages that will reach out to villages across the country..."
(Full video available on PTI Videos - https://t.co/bIyFWTfmBd)