टपरी-जहाँ चाय की गरमाहट और शायरी का जादू मिलता है। ज़िन्दगी के हर रंग को अल्फ़ाज़ में पिरोकर, दिल की बातें शब्दों में बयां करते हैं। मोहब्बत, गम, खुशी सब कुछ है
नक्श दिल पर कैसी कैसी सूरतों का रह गया
कितनी लहरें हमसफ़र थीं फिर भी प्यासा रह गया
कैसी कैसी ख्वाइशें मुझसे जुदा होती गयीं
किस क़दर आबाद था और कितना तनहा रह गया
उससे मिलना याद है मिलकर बिछड़ना याद है
क्या बता सकता हूँ क्या जाता रहा क्या रह गया
-- मुज़फ्फ़र वारसी
अगर तू इत्तिफ़ाक़न मिल भी जाए
तिरी फ़ुर्क़त के सदमे कम न होंगे
'हफ़ीज़' उन से मैं जितना बद-गुमाँ हूँ
वो मुझ से उस क़दर बरहम न होंगे
– हफ़ीज़ होशियारपुरी
शहर की बे-चराग़ गलियों में
ज़िंदगी तुझ को ढूँडती है अभी
सो गए लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी
तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी
वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी
-नासिर काज़मी
हर साँस उखड़ जाने की कोशिश में परेशाँ
सीने में कोई है जो गिरफ़्तार बहुत है
पानी से उलझते हुए इंसान का ये शोर
उस पार भी होगा मगर इस पार बहुत है
-फ़रहत एहसास
ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ मोहब्बत का कारोबार चले
मज़ा तो जब है कि हर लम्हा ज़िक्र-ए-यार चले
उदास देख के माहौल-ए-मय-कदा साक़ी
नियाज़-मंद-ए-वफ़ा आज सोगवार चले
~मैकश नागपुरी
महबस में कुछ हब्स है और ज़ंजीर का आहन चुभता है,
फिर सोचो, हाँ फिर सोचो, हाँ फिर सोचो, ख़ामोश रहो!
महबस - prison
हब्स - suffocation
आहन - iron
इब्न ए इंशा