भक्ति कोई कर्मकांड या मंदिर में बैठकर की जाने वाली एकांत क्रिया मात्र नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक सर्वोच्च कला है। तत्वज्ञान हमें यह बताता है कि हम शरीर नहीं, आत्मा हैं; और भक्ति उस आत्मा को परमात्मा की सेवा में लगाती है।
मानस की चौपाई, "अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहउँ निरबान", यही सिद्ध करती है कि एक सच्चा भक्त भगवान से दुनिया के सुख तो क्या, स्वयं की मुक्ति (मोक्ष) भी नहीं मांगता। वह केवल भगवान के चरण���ं में अहैतुकी (बिना किसी स्वार्थ के) रति या प्रेम मांगता है। यही मनुष्य जीवन की चरम सार्थकता है।
- देव बाबा उवाच
@Satyam_On_Web Yesterday, Tesla app was deleted in my phone.. luckily I had the backup Google Pixel so no impact. A note to anyone who is trying the beta, make sure to have a stable backup phone...
'आदिपुरुष' और हमारे रीलबाज़: एक अटूट प्रेम कथा
मानो या न मानो, 'आदिपुरुष' सिनेमा के इतिहास की वो इकलौती फिल्म है जिसने दर्शकों की आँखों से खून और कानों में सुकून एक साथ दिया! फिल्म के डायलॉग और VFX भले ही सीधे कचरापेटी में डालने लायक थे, लेकिन भाई साहब... उसका बैकग्रा��ंड म्यूज़िक? एकदम गदर!
और हमारे इंस्टाग्राम के शूरवीरों (यानी रीलबाज़ों) का तो क्या ही कहना! उनके लिए तो फिल्म किसी 'संजीवनी बूटी' से कम नहीं था।
मोहल्ले के नुक्कड़ वाले शिव मंदिर से लेकर केदारनाथ की चढ़ाई तक, हर दर्शन स्लो-मोशन में ही हुए और बैकग्राउंड में बस एक ही चीज़ गूंज रही थी, “राम सिया राम”!!
इन रीलबाज़ों की आधी श्रद्धा तो इस गणित में निकल गई कि इस म्यूजिक के किस 'बीट' पर सीढ़ियाँ चढ़नी हैं, किस बीट पर बालों में हाथ फेरना है, और म्यूजिक ड्रॉप होते ही कैसे आँखें बंद करके 'परम-भक्त' वाला पोज़ देना है।
भगवान भी ऊपर से सोच रहे होंगे कि ये हाथ जोड़ने आया है या कैमरा एंगल सेट करने!
थिएटर में फिल्म ��े भले ही नाक कटवा ली हो, लेकिन रीलबाज़ों की 'दिखावा-ए-भक्ति' को जो भयंकर टीआरपी इस म्यूजिक ने दी है ना... उसके लिए मेकर्स को एक अलग से नोबेल पुरस्कार तो जरूर मिलना चाहिए! 😂😂
It's been over two years and I still haven't met a real person who uses the camera control button.
Probably one of the biggest gimmick Apple ever shipped.