स्वाभिमान एवं सम्मान - जानने की कोशिश करते हैं इन शब्दों का अर्थ क्या है?
1)
रामायण और महाभारत में सनातन के दो महायुद्ध का वर्णन, जिनके पीछे मुख्य कारण स्त्री सम्मान की रक्षा ही था। भगवान श्री राम ने अपनी पत्नी के सम्मान हेतु उनका अपहरण करने वाले राजा पर आक्रमण कर उसका समूल नाश कर दिया। वहीं महा��ानी द्रौपदी का अपमान वाले कौरवों का भी समूल नाश हो गया।
2)
आचार्य विष्णुगुप्त ने भरे दरबार में अपने अपमान का बदला मगध के शक्तिशाली सम्राट धनानंद का समूल नाश करके लिया।
3)
अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु हमारे देश के सैनिक अपना सर्वोच्च बलिदान दे देते हैं जिससे हमारे देश के सम्मान पर कोई आंच ना आए।
इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि सम्मान की रक्षा चाहे मातृ भूमि की हो, धर्म की हो या स्त्री की (मृत देह की भी) ही क्यों ना हो, वह सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जो कि सम्मान की रक्षा का अर्थ समझते हैं। समय अनुरूप लोगों की सोच बदलती रहती है लेकिन आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा आपके जीवित और वीर होने का प्रमाण देते हैं।
रानी पद्मिनी ने अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए मृत्यु का वरण किया। उस कालखंड में जब पराजित राजाओं की रानियों और उस राज्य की महिलाओं के साथ व्याभिचार किया जाता था, उन्हें हरम में डाल दिया जाता था अथवा सैनिकों के सामने छोड़ दिया जाता था; उन महिलाओं की स्थिति नर्क जैसी हो जाती थी, उन परिस्थितियों में उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा हेतु मृत्यु का वरण करना ज्यादा उचित लगा। यह उनका व्यक्तिगत फैसला था इसके लिए उन्हें कोई बाध्य नहीं करता था।
मृत्यु का वरण करना ही हर चीज का समाधान नहीं होता, एक म���नसिक स्थिति है। विवेक तय करता है कि किस स्थिति को आप अपना अपमान मानेंगे। नगरवधुएं हमेशा से थी और आज भी रेड लाइट एरिया लगभग हर शहर में मिल जाते हैं। उन स्त्रियों ने अपनी परिस्थितियों से compromise करके जीना सीख लिया है। जहां नगरवधुएं अपनी स्थिति को स्वीकार कर सारा जीवन व्यतीत कर देती हैं, वही एक रानी ने उस स्थिति को अपना अपमान मानते हुए उसको प्राप्त करने से पहले ही स्वयं को स���ाप्त कर लिया।
आधुनिक परिवेश में रेप पीड़ित महिला और उस समय के युद्ध की बंदी महिलाओं की स्थिति की तुलना नहीं की जा सकती। रेप में महिला को अंदाज़ा नहीं होता है कि उसके साथ ऐसा होगा. जौहर से पहले महिलाओं को मालूम होता था कि आक्रांता के हाथ आने पर ना सिर्फ़ वह बर्बर, बीभत्स यौन हिंसा का शिकार होंगी, बल्कि असह्य पीड़ा और नारकीय जीवन को मजबूर होंगी. रेप से पहले अगर महिला को पता हो जाए कि सामने वाला उ���को अपनी हवस का शिकार बनाएगा तो वह जान पर खेलकर भागने का प्रयास करेगी या फिर सामने वाले को मार डालने की भरसक कोशिश करेगी।
अगर विचार करें तो यह तो साफ ही है स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा करना, चाहे उसके लिए अपनी प्राण ही की आहुति क्यों न दी जाए, वीरों के ही वश में है। सामान्य व्यक्ति, सब चलता है कहकर compromise कर लेता है। हालांकि दोनों ही अपनी जगह सही है किसी को भी गलत नहीं कहा जा सकत��� क्योंकि ना ही तो हर कोई अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है और ना ही हर कोई उन स्थिति से compromise.
वर्तमान समय में जो अपने body count बताने में गौरव महसूस करते हैं, वह इस सम्मान की भावना को समझ नहीं पाएंगे। मेरा लिंग मेरी मर्जी और मुगलों की परंपरा पालन करने वाले व्यक्तियों के बिस्तर गर्म करने वाली महिलाएं स्वाभिमान और सम्मान पर ज्ञान न हीं दें तो बेहतर है।
हिन्दू पचांग का लोकप्रिय और व्यवस्थित रूप राजा विक्रमादित्य के काल में सामने आया। इसे 'विक्रम संवत' भी कहा जाता है। उसके गणनाऐं है आज भी उतनी ही सटीक हैं जितनी पहले हुआ करती रही होंगी।
भारत में जंतर-मंतर (खगोलीय वेधशालाएं) का निर्माण महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय द्वारा 1724 से 1735 के बीच किया गया था। इनका निर्माण खगोलीय गणनाओं और समय की सटीक���ा को मापने के लिए किया था।
ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुकला, इंजीनियरिंग और खगोल विज्ञान का एक उत्कृष्ट और अद्वितीय उदाहरण है।
इनसे अलग अनेक प्राचीन मंदिर एवं उत्कृष्ट साहित्य है जिनको भिन्न भिन्न राजाओं के राज्य में बनाया और लिखा गया है।
यदि इतनी सारी उपलब्धियां अपने देश में पहले से मौजूद है, तो क्या कारण होगा कि एक विदेशी आक्रमणकारी (भले ही वह पढ़ा लिखा हो) का महिमामंडन जाए।
इनकी बातें सुनकर राहुल जी के लिए मेरी धारणा ही बदल गई है। मुझे लगता है वह सामान्य पुरुष तो है ही नहीं, वह तो दिव्य पुरुष है जिन्हें संसार के सभी धर्म का ज्ञान है और वह उन पर चर्चा भी करते हैं (करते इन नमूनों के साथ है, वह अलग बात है) मुझे लगता है वे प्रधानमंत्री जैसे छोटे-मोटे पद के लिए योग्य ही नहीं है। उन्हें तो महादेव की आराधना करनी चाहिए, हो सकता है महादेव उनको सोने की लंका अथवा इंद���र का आसन हीं भेंट कर दें। इतना योग्य व्यक्ति तो अगर पूरे ब्रह्मांड अधिपति बन जाए तो भी कम है। इनकी अटूट भक्ति निश्चय ही उन्हें इस ब्रह्मांड के सर्वोच्च पद तक ले जाएगी। नमो नमो।
इस्लाम बहुत उदार है। अल्लाह के हुक्मनामे #कुरान_मजीद में गुलाम, रण्डी, लौंडिया, जजिया...हरेक की बहुत विस्तृत व्याख्या है। पूरी व्यवस्था है।
@ReallySwara ने कुरान मजीद की इन व्यवस्थाओं में अपने लिए सम्मानजनक एक राह चुनी, लेकिन वो वीरांगनाएं #कायर थीं, जिन्होंने "अल्लाह के हुक्म" को ख���रिज कर #जौहर क��� मार्ग चुना।
वरना #जौहर_व्रती_वीरांगनाओं के सामने क्या मजबूरी थी जो इन #मोहतरमा की मांनिद गुलाम, रण्डी या लौंडिया का रास्ता अख्तियार ना किया? आखिर कुरान इतना सम्मानजनक ओहदा तो दे रहा है ना?
ध्यान रहे, अल्लाह के हुक्म #कुरान का एक लफ्ज तो क्या, जेर, जबर, नुक्ता तक बदलने की ताकत #इंसान में नहीं है।
स्वरा भाष्कर #ब्राह्मण हैं ऐसे ब्राह्मणों के लिए हिन्दू व्यवस्था में एक शब्द है, #पतित_ब्राह्मण। पतित शब्द सिर्फ ब्राह्मण के लिए आरक्षित है। अन्य किसी वर्ण को यह #उपाधि नहीं मिलती।
खैर अब स्वरा की सफाई आ रही है, जिसमें उन्होंने कहा, "...अंग्रेजी में मैंने कहा, क्या रेप विक्टिम को जीने का हक नहीं है? कम जानकर समझ नहीं पाए!"
तो अब तीन सवाल..
■ क्या बलात्कार पीड़ित को #कुरान ससम्मान जीने का हक देता है? कृपया कुरान या हदीस के हवाले से बताएं?
■ दूसरे, क्या जानबूझ कर ��लात्कार को आमंत्रित करना चाहिए? बलात्कार होने की प्रतीक्षा करो? फिर #मृत्युपरांत मृत देह के साथ #नेक्रोफिलिया होने दो?
■ तीसरा और आखिरी सवाल, निकाह के बाद नाम क्यों नहीं बदला? खुद को मुस्लिम घोषित करने में #शर्म क्यों? #नबी पर यकीन नहीं? यदि अभी भी हिन्दू हो तो कुरान में आपका दर्जा #रखैल का है। और आपका शौहर #वाजिब_उल_कत्ल के काबिल। आप दोनों ने अभी तक कितनी बार #हज किया?
स्वाभिमान एवं सम्मान - जानने की कोशिश करते हैं इन शब्दों का अर्थ क्या है?
1)
रामायण और महाभारत में सनातन के दो महायुद्ध का वर्णन, जिनके पीछे मुख्य कारण स्त्री सम्मान की रक्षा ही था। भगवान श्री राम ने अपनी पत्नी के सम्मान हेतु उनका अपहरण करने वाले राजा पर आक्रमण कर उसका समूल नाश कर दिया। वहीं महारानी द्रौपदी का अपमान वाले कौरवों का भी समूल नाश हो गया।
2)
आचार्य विष्णुगुप्त ने भरे दरबार में अपने अपमान का बदला मगध के शक्तिशाली सम्राट धनानंद का समूल नाश करके लिया।
3)
अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु हमारे देश के सैनिक अपना सर्वोच्च बलिदान दे देते हैं जिससे हमारे देश के सम्मान पर कोई आंच ना आए।
इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि सम्मान की रक्षा चाहे मातृ भूमि की हो, धर्म की हो या स्त्री की (मृत देह की भी) ही क्यों ना हो, वह सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जो कि सम्मान की रक्षा का अर्थ समझते हैं। समय अनुरूप लोगों की सोच बदलती रहती है लेकिन आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा आपके जीवित और वीर होने का प्रमाण देते हैं।
रानी पद्मिनी ने अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए मृत्यु का वरण किया। उस कालखंड में जब पराजित राजाओं की रानियों और उस राज्य की महिलाओं के साथ व्याभिचार किया जाता था, उन्हें हरम में डाल दिया जाता था अथवा सैनिकों के सामने छोड़ दिया जाता था; उन महिलाओं की स्थिति नर्क जैसी हो ज���ती थी, उन परिस्थितियों में उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा हेतु मृत्यु का वरण करना ज्यादा उचित लगा। यह उनका व्यक्तिगत फैसला था इसके लिए उन्हें कोई बाध्य नहीं करता था।
मृत्यु का वरण करना ही हर चीज का समाधान नहीं होता, एक मानसिक स्थिति है। विवेक तय करता है कि किस स्थिति को आप अपना अपमान मानेंगे। नगरवधुएं हमेशा से थी और आज भी रेड लाइट एरिया लगभग हर शहर में मिल जाते हैं। उन स्त्रियों ने अपनी परिस���थितियों से compromise करके जीना सीख लिया है। जहां नगरवधुएं अपनी स्थिति को ��्वीकार कर सारा जीवन व्यतीत कर देती हैं, वही एक रानी ने उस स्थिति को अपना अपमान मानते हुए उसको प्राप्त करने से पहले ही स्वयं को समाप्त कर लिया।
आधुनिक परिवेश में रेप पीड़ित महिला और उस समय के युद्ध की बंदी महिलाओं की स्थिति की तुलना नहीं की जा सकती। रेप में महिला को अंदाज़ा नहीं होता है कि उसके साथ ऐसा होगा. जौहर से पहले महिलाओं को मालूम होता था कि आक्रांता के हाथ आने पर ना सिर्फ़ वह बर्बर, बीभत्स यौन हिंसा का शिकार होंगी, बल्कि असह्य पीड़ा और नारकीय जीवन को मजबूर होंगी. रेप से पहले अगर महिला को पता हो जाए कि सामने वाला उसको अपनी हवस का शिकार बनाएगा तो वह जान पर खेलकर भागने का प्रयास करेगी या फिर सामने वाले को मार डालने की भरसक कोशिश करेगी।
अगर विचार करें तो यह तो साफ ही है स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा करना, चाहे उसके लिए अपनी प्राण ही की आहुति क्यों न दी जाए, वीरों के ही वश में है। सामान्य व्यक्ति, सब चलता है कहकर compromise कर लेता है। हालांकि द��नों ही अपनी जगह सही है किसी को भी गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि ना ही तो हर कोई अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है और ना ही हर कोई उन स्थिति से compromise.
वर्तमान समय में जो अपने body count बताने में गौरव महसूस करते हैं, वह इस सम्मान की भावना को समझ नहीं पाएंगे। मेरा लिंग मेरी मर्जी और मुगलों की परंपरा पालन करने वाले व्यक्तियों के बिस्तर गर्म करने वाली महिलाएं स्वाभिमान और सम्मान पर ज्ञान न हीं दें तो बेहतर है।
@ReallySwara
स्वाभिमान एवं सम्मान - जानने की कोशिश करते हैं इन शब्दों का अर्थ क्या है?
1)
रामायण और महाभारत में सनातन के दो महायुद्ध का वर्णन, जिनके पीछे मुख्य कारण स्त्री सम्मान की रक्षा ही था। भगवान श्री राम ने अपनी पत्नी के सम्मान हेतु उनका अपहरण करने वाले राजा पर आक्रमण कर उसका समूल नाश कर दिया। वहीं महारानी द्रौपदी का अपमान वाले कौरवों का भी समूल नाश हो गया।
2)
आचार्��� विष्णुगुप्त ने भरे दरबार में अपने अपमान का बदला मगध के शक्तिशाली सम्राट धनानंद का समूल नाश करके लिया।
3)
अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु हमारे देश के सैनिक अपना सर्वोच्च बलिदान दे देते हैं जिससे हमारे देश के सम्मान पर कोई आंच ना आए।
इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि सम्मान की रक्षा चाहे मातृ भूमि की हो, धर्म की हो या स्त्री की (मृत देह की भी) ही क्यों ना हो, वह सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जो कि सम्मा�� की रक्षा का अर्थ समझते हैं। समय अनुरूप लोगों की सोच बदलती रहती है लेकिन आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा आपके जीवित और वीर होने का प्रमाण देते हैं।
रानी पद्मिनी ने अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए मृत्यु का वरण किया। उस कालखंड में जब पराजित राजाओं की रानियों और उस राज्य की महिलाओं के साथ व्याभिचार किया जाता था, उन्हें हरम में डाल दिया जाता था अथवा सैनिकों के सामने छोड़ दिया जाता था; उन महिलाओं की स्थिति नर्क जैसी हो जाती थी, उन परिस्थितियों में उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा हेतु मृत्यु का वरण करना ज्यादा उचित लगा। यह उनका व्यक्तिगत फैसला था इसके लिए उन्हें कोई बाध्य नहीं करता था।
मृत्यु का वरण करना ही हर चीज का समाधान नहीं होता, एक मानसिक स्थिति है। विवेक तय करता है कि किस स्थिति को आप अपना अपमान मानेंगे। नगरवधुएं हमेशा से थी और आज भी रेड लाइट एरिया लगभग हर शहर में मिल जाते हैं�� उन स्त्रियों ने अपनी परिस्थितियों से compromise करके जीना सीख लिया है। जहां नगरवधुएं अपनी स्थिति को स्वीकार कर सारा जीवन व्यतीत कर देती हैं, वही एक रानी ने उस स्थिति को अपना अपमान मानते हुए उसको प्राप्त करने से पहले ही स्वयं को समाप्त कर लिया।
आधुनिक परिवेश में रेप पीड़ित महिला और उस समय के युद्ध की बंदी महिलाओं की स्थिति की तुलना नहीं की जा सकती। रेप में महिला को अंदाज़ा नहीं होता है कि उसके साथ ऐसा होगा. जौहर से पहले महिलाओं को मालूम होता था कि आक्रांता के हाथ आने पर ना सिर्फ़ वह बर्बर, बीभत्स यौन हिंसा का शिकार होंगी, बल्कि असह्य पीड़ा और नारकीय जीवन को मजबूर होंगी. रेप से पहले अगर महिला को पता हो जाए कि सामने वाला उसको अपनी हवस का शिकार बनाएगा तो वह जान पर खेलकर भागने का प्रयास करेगी या फिर सामने वाले को मार डालने की भरसक कोशिश करेगी।
अगर विचार करें तो यह तो साफ ही है स्वाभिमान और सम��मान की रक्षा करना, चाहे उसके लिए अपनी प्राण ही की आहुति क्यों न दी जाए, वीरों के ही वश में है। सामान्य व्यक्ति, सब चलता है कहकर compromise कर लेता है। हालांकि दोनों ही अपनी जगह सही है किसी को भी गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि ना ही तो हर कोई अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है और ना ही हर कोई उन स्थिति से compromise.
वर्तमान समय में जो अपने body count बताने में गौरव महसूस करते हैं, वह इस सम्मान की भावना को समझ नहीं पाएंगे। मेरा लिंग मेरी मर्जी और मुगलों की परंपरा पालन करने वाले व्यक्तियों के बिस्तर गर्म करने वाली महिलाएं स्वाभिमान और सम्मान पर ज्ञान न हीं दें तो बेहतर है।
@ReallySwara
स्वाभिमान एवं सम्मान - जानने की कोशिश करते हैं इन शब्दों का अर्थ क्या है?
1)
रामायण ��र महाभारत में सनातन के दो महायुद्ध का वर्णन, जिनके पीछे मुख्य कारण स्त्री सम्मान की रक्षा ही था। भगवान श्री राम ने अपनी पत्नी के सम्मान हेतु उनका अपहरण करने वाले राजा पर आक्रमण कर उसका समूल नाश कर दिया। वहीं महारानी द्रौपदी का अपमान वाले कौरवों का भी समूल नाश हो गया।
2)
आचार्य विष्णुगुप्त ने भरे दरबार में अपने अपमान का बदला मगध के शक्तिशाली सम्राट धनानंद का समूल नाश करके लिया।
3)
अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु हमारे देश के सैनिक अपना सर्वोच्च बलिदान दे देते हैं जिससे हमारे देश के सम्मान पर कोई आंच ना आए।
इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि सम्मान की रक्षा चाहे मातृ भूमि की हो, धर्म की हो या स्त्री की (मृत देह की भी) ही क्यों ना हो, वह सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जो कि सम्मान की रक्षा का अर्थ समझते हैं। समय अनुरूप लोगों की सोच बदलती रहती है लेकिन आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा आपके जीवित और वीर होने का प्रमाण देते हैं।
रानी पद्मिनी ने अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए मृत्यु का वरण किया। उस कालखंड में जब पराजित राजाओं की रानियों और उस राज्य की महिलाओं के साथ व्याभिचार किया जाता था, उन्हें हरम में डाल दिया जाता था अथवा सैनिकों के सामने छोड़ दिया जाता था; उन महिलाओं की स्थिति नर्क जैसी हो जाती थी, उन परिस्थितियों में उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा हेतु मृत्यु का वरण करना ज्यादा उ���ित लगा। यह उनका व्यक्तिगत फैसला था इसके लिए उन्हें कोई बाध्य नहीं करता था।
मृत्यु का वरण करना ही हर चीज का समाधान नहीं होता, एक मानसिक स्थिति है। विवेक तय करता है कि किस स्थिति को आप अपना अपमान मानेंगे। नगरवधुएं हमेशा से थी और आज भी रेड लाइट एरिया लगभग हर शहर में मिल जाते हैं। उन स्त्रियों ने अपनी परिस्थितियों से compromise करके जीना सीख लिया है। जहां नगरवधुएं अपनी स्थिति को स्वीकार कर सारा जीवन व्यतीत कर देती हैं, वही एक रानी ने उस स्थिति को अपना अपमान मानते हुए उसको प्राप्त करने से पहले ही स्वयं को समाप्त कर लिया।
आधुनिक परिवेश में रेप पीड़ित महिला और उस समय के युद्ध की बंदी महिलाओं की स्थिति की तुलना नहीं की जा सकती। रेप में महिला को अंदाज़ा नहीं होता है कि उसके साथ ऐसा होगा. जौहर से पहले महिलाओं को मालूम होता था कि आक्रांता के हाथ आने पर ना सिर्फ़ वह बर्बर, बीभत्स यौन हिंसा का शिकार होंगी, बल्कि असह्य पीड़ा और नारकीय जीवन को मजबूर होंगी. रेप से पहले अगर महिला को पता हो जाए कि सामने वाला उसको अपनी हवस का शिकार बनाएगा तो वह जान पर खेलकर भागने का प्रयास करेगी या फिर सामने वाले को मार डालने की भरसक कोशिश करेगी।
अगर विचार करें तो यह तो साफ ही है स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा करना, चाहे उसके लिए अपनी प्राण ही की आहुति क्यों न दी जाए, वीरों के ही वश में है। सामान्य व्यक्ति, सब चलता है कहकर compromise कर लेता है। हालांकि दोनों ही अपनी जगह सही है किसी को भी गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि ना ही तो हर कोई अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है और ना ही हर कोई उन स्थिति से compromise.
वर्तमान समय में जो अपने body count बताने में गौरव महसूस करते हैं, वह इस सम्मान की भावना को समझ नहीं पाएंगे। मेरा लिंग मेरी मर्जी और मुगलों की परंपरा पालन करने वाले व्यक्तियों के बिस्तर गर्म करने वाली महिलाएं स्वाभिमान और सम्म���न पर ज्ञान न हीं दें तो बेहतर है।
@ReallySwara
स्वाभिमान एवं सम्मान - जानने की कोशिश करते हैं इन शब्दों का अर्थ क्या है?
1)
रामायण और महाभारत में सनातन के दो महायुद्ध का वर्णन, जिनके पीछे मुख्य कारण स्त्री सम्मान की रक्षा ही था। भगवान श्री राम ने अपनी पत्नी के सम्मान हेतु उनका अपहरण करने वाले राजा पर आक्रमण कर उसका समूल नाश कर दिया। वहीं महारानी द्रौपदी का अपमान वाले कौरवों का भी समूल नाश हो गया।
2)
आचार्य विष्णुग��प्त ने भरे दरबार में अपने अपमान का बदला मगध के शक्तिशाली सम्राट धनानंद का समूल नाश करके लिया।
3)
अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु हमारे देश के सैनिक अपना सर्वोच्च बलिदान दे देते हैं जिससे हमारे देश के सम्मान पर कोई आंच ना आए।
इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि सम्मान की रक्षा चाहे मातृ भूमि की हो, धर्म की हो या स्त्री की (मृत देह की भी) ही क्यों ना हो, वह सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जो कि सम्मान की रक्षा ���ा अर्थ समझते हैं। समय अनुरूप लोगों की सोच बदलती रहती है लेकिन आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा आपके जीवित और वीर होने का प्रमाण देते हैं।
रानी पद्मिनी ने अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए मृत्यु का वरण किया। उस कालखंड में जब पराजित राजाओं की रानियों और उस राज्य की महिलाओं के साथ व्याभिचार किया जाता था, उन्हें हरम में डाल दिया जाता था अथवा सैनिकों के सामने छोड़ दिया जाता था; उन महिलाओं की स्थिति नर्क जैसी हो जाती थी, उन परिस्थितियों में उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा हेतु मृत्यु का वरण करना ज्यादा उचित लगा। यह उनका व्यक्तिगत फैसला था इसके लिए उन्हें कोई बाध्य नहीं करता था।
मृत्यु का वरण करना ही हर चीज का समाधान नहीं होता, एक मानसिक स्थिति है। विवेक तय करता है कि किस स्थिति को आप अपना अपमान मानेंगे। नगरवधुएं हमेशा से थी और आज भी रेड लाइट एरिया लगभग हर शहर में मिल जाते हैं। उन स्त्र��यों ने अपनी परिस्थितियों से compromise करके जीना सीख लिया है। जहां नगरवधुएं अपनी स्थिति को स्वीकार कर सारा जीवन व्यतीत कर देती हैं, वही एक रानी ने उस स्थिति को अपना अपमान मानते हुए उसको प्राप्त करने से पहले ही स्वयं को समाप्त कर लिया।
आधुनिक परिवेश में रेप पीड़ित महिला और उस समय के युद्ध की बंदी महिलाओं की स्थिति की तुलना नहीं की जा सकती। रेप में महिला को अंदाज़ा नहीं होता है कि उसके साथ ऐसा होगा. ��ौहर से पहले महिलाओं को मालूम होता था कि आक्रांता के हाथ आने पर ना सिर्फ़ वह बर्बर, बीभत्स यौन हिंसा का शिकार होंगी, बल्कि असह्य पीड़ा और नारकीय जीवन को मजबूर होंगी. रेप से पहले अगर महिला को पता हो जाए कि सामने वाला उसको अपनी हवस का शिकार बनाएगा तो वह जान पर खेलकर भागने का प्रयास करेगी या फिर सामने वाले को मार डालने की भरसक कोशिश करेगी।
अगर विचार करें तो यह तो साफ ही है स्वाभिमान और सम्मान की रक��षा करना, चाहे उसके लिए अपनी प्राण ही की आहुति क्यों न दी जाए, वीरों के ही वश में है। सामान्य व्यक्ति, सब चलता है कहकर compromise कर लेता है। हालांकि दोनों ही अपनी जगह सही है किसी को भी गलत नहीं कहा जा सकता क्य���ंकि ना ही तो हर कोई अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है और ना ही हर कोई उन स्थिति से compromise.
वर्तमान समय में जो अपने body count बताने में गौरव महसूस करते हैं, वह इस सम्मान की भावना को समझ नहीं पाएंगे। मेरा लिंग मेरी मर्जी और मुगलों की परंपरा पालन करने वाले व्यक्तियों के बिस्तर गर्म करने वाली महिलाएं स्वाभिमान और सम्मान पर ज्ञान न हीं दें तो बेहतर है।
@ReallySwara
वातानुकूलित कमरों की विलासिता में बैठकर, 'फेमिनिज्म' के आयातित चश्मे से भारतीय इतिहास को देखने वाली, उस धधकती हुई आग की तपन @ReallySwara कभी महसूस नहीं कर सकती।
जौहर कोई विवशता में की गई आत्महत्या या 'कायरता' नहीं थी। वह उन वहशी आक्रांताओं के मुँह पर क्षत्राणियों का सबसे प्रखर और अंतिम तमाचा था, जिनके लिए स्त्री महज़ युद्ध की लूट (War Booty), मंडियों में टके सेर बिकने वाला मांस का लोथड़ा और उम्रकैद की यौन-दासी (Sex Slave) थी।
एक आधुनिक समाज में किसी जघन्य अपराध (बलात्कार) के बाद जीवित बचकर संघर्ष करना एक बात है, लेकिन एक ऐसे मध्यकालीन पिशाच के हाथ में पड़ना जो प्रतिदिन दर्ज़नों सैनिकों से आपका सामूहिक चीरहरण करवाए, आपको बाज़ारों में नीलाम करे, और ताउम्र एक मनोरोगी की रखैल बनाकर रखे बिल्कुल अलग परिस्थिति है। क्या उन माताओं को यह स्वीकार कर लेना चाहिए था? क्या चित्तौड़ की उन रानियों को खिलजी की फौज की हवस का खिलौना बन जाना चाहिए था, ताकि सदियों बाद कोई स्वरा भास्कर आकर उन्हें 'बहादुर' का सर्टिफिकेट दे सके?
ज़रा उस खौफ़नाक मंज़र की कल्पना कीजिए। किले के दरवाज़े टूट रहे हैं। बाहर अल्लाउद्दीन खिलजी ने 30,000 निर्दोष हिन्दुओं के खून की नदियां बहा दी हैं। अब वे खून से सने दरिंदे निवास की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में अपने सतीत्व, अपनी अस्मिता और अपनी सभ्यता की रक्षा के लिए हंसते-हंसते धधकते अग्निकुंड को गले लगा लेना कोई साधारण कृत्य नहीं था�� सोचिए उस गर्भवती माँ के बारे में, जिसने आग में कूदना इसलिए चुना क्योंकि वह अपने अजन्मे बच्चे को उन सनकी अत्याचारियों का गुलाम बनते नहीं देख सकती थी। उन्होंने आग को आभूषण की तरह पहना और उन इस्लामी आक्रांताओं को यह अमर संदेश दिया कि तुम हमारी मिट्टी जीत सकते हो, नरसंहार कर सकते हो, लेकिन हमारी देह और हमारी चेतना पर तुम्हारा हुक्म कभी नहीं चलेगा।
जब कोई सैनिक सीमा पर ग्रेनेड पर लेटकर अपने साथियों की जान बचाता है, तो हम उसे कायर नहीं, अमर बलिदानी कहते हैं। फिर अपने सभ्यतागत आत्मसम्मान के लिए चिता पर लेट जाने वाली वो देवियां कायर कैसे हो गईं? यह इस वामपंथी 'इकोसिस्टम' की अज्ञानता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी वैचारिक धृष्टता है। उस क्रूर आक्रांता की वहशी युद्ध-संस्कृति पर एक शब्द न बोलना, जहाँ ��िजय के बाद महिलाओं को उपभोग की वस्तु माना जाता था, और सारा दोष उन पीड़ित माताओं पर मढ़ देना—यह अत्याचारी का बचाव और पीड़िताओं को कटघरे में खड़ा करने का सबसे नीच प्रपंच है।
आज जो लोग जौहर का मज़ाक उड़ा रहे हैं और ज्ञान बघार रहे हैं कि महिलाओं को "जीवित रहना चाहिए था" (चाहे यौन-दास बनकर ही क्यों न हो), वे दरअसल उसी कायरता और आत्मघाती 'सहिष्णुता' के वारिस हैं जिसने इस सभ्यता को हमेश�� खून के आंसू रुलाए हैं। जब-जब इस देश में दरिंदों ने माताओं-बहनों की अस्मिता पर हाथ डाला, तब-तब इसी पाखंडी जमात ने उन्हें कायरता का पाठ पढ़ाया है।
स्वाभिमान एवं सम्मान - जानने की कोशिश करते हैं इन शब्दों का अर्थ क्या है?
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रामायण और महाभारत में सनातन के दो महायुद्ध का वर्णन, जिनके पीछे मुख्य कारण स्त्री सम्मान की रक्षा ही था। भगवान श्री राम ने अपनी पत्नी के सम्मान हेतु उनका अपहरण करने वाले राजा पर आक्रमण कर उसका समूल नाश कर दिया। वहीं महारानी द्रौपदी का अपमान वाले कौरवों का भी समूल नाश हो गया।
2)
आचार्य विष्णुगुप्त ने भरे दरबार में अपने अपमान का बदला मगध के शक्तिशाली सम्राट धनानंद का समूल नाश करके लिया।
3)
अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु हमारे देश के सैनिक अपना सर्वोच्च बलिदान दे देते हैं जिससे हमारे देश के सम्मान पर कोई आंच ना आए।
इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि सम्मान की रक्षा चाहे मातृ भूमि की हो, धर्म की हो या स्त्री की (मृत देह की भी) ही क्यों ना हो, वह सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जो कि सम्मान की रक्षा का अर्थ समझते हैं। समय अनुरूप लोगों की सोच बदलती रहती है लेकिन आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा आपके जीवित और वीर होने का प्रमाण देते हैं।
रानी पद्मिनी ने अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए मृत्यु का वरण किया। उस कालखंड में जब पराजित राजाओं की रानियों और उस राज्य की महिलाओं के साथ व्याभिचार किया जाता था, उन्हें हरम में डाल दिया जाता था अथवा सैनिकों के सामने छोड़ दिया जाता था; उ��� महिलाओं की स्थिति नर्क जैसी हो जाती थी, उन परिस्थितियों में उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा हेतु मृत्यु का वरण करना ज्यादा उचित लगा। यह उनका व्यक्तिगत फैसला था इसके लिए उन्हें कोई बाध्य नहीं करता था।
मृत्यु का वरण करना ही हर चीज का समाधान नहीं होता, एक मानसिक स्थिति है। विवेक तय करता है कि किस स्थिति को आप अपना अपमान मानेंगे। नगरवधुएं हमेशा से थी और आज भी रेड लाइट एरिया लगभग हर शहर में मिल जाते हैं। उन स्त्रियों ने अपनी परिस्थितियों से compromise करके जीना सीख लिया है। जहां नगरवधुएं अपनी स्थिति को स्वीकार कर सारा जीवन ���्यतीत कर देती हैं, वही एक रानी ने उस स्थिति को अपना अपमान मानते हुए उसको प्राप्त करने से पहले ही स्वयं को समाप्त कर लिया।
आधुनिक परिवेश में रेप पीड़ित महिला और उस समय के युद्ध की बंदी महिलाओं की स्थिति की तुलना नहीं की जा सकती। रेप में महिला को अंदाज़ा नहीं होता है कि उसके साथ ऐसा होगा. जौहर से पहले महिलाओं को मालूम होता था कि आक्रांता के हाथ आने पर ना सिर्फ़ वह बर्बर, बीभत्स यौन हिंसा का शिका�� होंगी, बल्कि असह्य पीड़ा और नारकीय जीवन को मजबूर होंगी. रेप से पहले अगर महिला को पता हो जाए कि सामने वाला उसको अपनी हवस का शिकार बनाएगा तो वह जान पर खेलकर भागने का प्रयास करेगी या फिर सामने वाले को मार डालने की भरसक कोशिश करेगी।
अगर विचार करें तो यह तो साफ ही है स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा करना, चाहे उसके लिए अपनी प्राण ही की आहुति क्यों न दी जाए, वीरों के ही वश में है। सामान्य व्यक्ति, सब चलता ���ै कहकर compromise कर लेता है। हालांकि दोनों ही अपनी जगह सही है किसी को भी गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि ना ही तो हर कोई अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है और ना ही हर कोई उन स्थिति से compromise.
वर्तमान समय में जो अपने body count बताने में गौरव महसूस करते हैं, वह इस सम्मान की भावना को समझ नहीं पाएंगे। मेरा लिंग मेरी मर्जी और मुगलों की परंपरा पालन करने वाले व्यक्तियों के बिस्तर गर्म करने वाली महिलाएं स्वाभिमान और सम्��ान पर ज्ञान न हीं दें तो बेहतर है।
@ReallySwara
मेरा एक वीडियो क्लिप वायरल है- जिसे ग़लत रूप से झूठे ढंग से अनुवादित किया जा रहा है! मैंने कतई नहीं कहा कि रानी पद्मावती या कोई भी सती कायर थी । शर्मनाक है कि @ndtvindia और अन्य मीडिया चैनल और लोग बार बार झूठा इल्ज़ाम लगाकर लोगों को उत्तेजित कर रहे हैं ।
गाली देनी है तो दो- पर सही बयान पर दो!!!
सुनिए और शेयर कीजिए ।
महिलाओं को बलात्कार के बाद भी ज़िंदगी का हक़ है ।
#Padmavat #RightToLife #SurvivingRape
स्वाभिमान एवं सम्मान - जानने की कोशिश करते हैं इन शब्दों का अर्थ क्या है?
1)
रामायण और महाभारत में सनातन के दो महायुद्ध का वर्णन, जिनके पीछे मुख्य कारण स्त्री सम्मान की रक्षा ही था। भगवान श्री राम ने अपनी पत्नी के सम्मान हेतु उनका अपहरण करने वाले राजा पर आक्रमण कर उसका समूल नाश कर दिया। वहीं महारानी द्रौपदी का अपमान वाले कौरवों का भी समूल नाश हो गया।
2)
आचार्य विष्��ुगुप्त ने भरे दरबार में अपने अपमान का बदला मगध के शक्तिशाली सम्राट धनानंद का समूल नाश करके लिया।
3)
अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु हमारे देश के सैनिक अपना सर्वोच्च बलिदान दे देते हैं जिससे हमारे देश के सम्मान पर कोई आंच ना आए।
इन उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि सम्मान की रक्षा चाहे मातृ भूमि की हो, धर्म की हो या स्त्री की (मृत देह की भी) ही क्यों ना हो, वह सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जो कि सम्मान की रक��षा का अर्थ समझते हैं। समय अनुरूप लोगों की सोच बदलती रहती है लेकिन आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा आपके जीवित और वीर होने का प्रमाण देते हैं।
रानी पद्मिनी ने अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए मृत्यु का वरण किया। उस कालखंड में जब पराजित राजाओं की रानियों और उस राज्य की महिलाओं के साथ व्याभिचार किया जाता था, उन्हें हरम में डाल दिया जाता था अथवा सैनिकों के सामने छोड़ दिया जाता था; उन महिलाओं की स्थिति नर्क जैसी हो जाती थी, उन परिस्थितियों में उन्होंने अपने सम्मान की रक्षा हेतु मृत्यु का वरण करना ज्यादा उचित लगा। यह उनका व्यक्तिगत फैसला था इसके लिए उन्हें कोई बाध्य नहीं करता था।
मृत्यु का वरण करना ही हर चीज का समाधान नहीं होता, एक मानसिक स्थिति है। विवेक तय करता है कि किस स्थिति को आप अपना अपमान मानेंगे। नगरवधुएं हमेशा से थी और आज भी रेड लाइट एरिया लगभग हर शहर में मिल जाते हैं। उन स्��्रियों ने अपनी परिस्थितियों से compromise करके जीना सीख लिया है। जहां नगरवधुएं अपनी स्थिति को स्वीकार कर सारा जीवन व्यतीत कर देती हैं, वही एक रानी ने उस स्थिति को अपना अपमान मानते हुए उसको प्राप्त करने से पहले ही स्वयं को समाप्त कर लिया।
आधुनिक परिवेश में रेप पीड़ित महिला और उस समय के युद्ध की बंदी महिलाओं की स्थिति की तुलना नहीं की जा सकती। रेप में महिला को अंदाज़ा नहीं होता है कि उसके साथ ऐसा होगा. जौहर से पहले महिलाओं को मालूम होता था कि आक्रांता के हाथ आने पर ना सिर्फ़ वह बर्बर, बीभत्स यौन हिंसा का शिकार होंगी, बल्कि असह्य पीड़ा और नारकीय जीवन को मजबूर होंगी. रेप से पहले अगर महिला को पता हो जाए कि सामने वाला उसको अपनी हवस का शिकार बनाएगा तो वह जान पर खेलक�� भागने का प्रयास करेगी या फिर सामने वाले को मार डालने की भरसक कोशिश करेगी।
अगर विचार करें तो यह तो साफ ही है स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा करना, चाहे उसके लिए अपनी प्राण ही की आहुति क्यों न दी जाए, वीरों के ही वश में है। सामान्य व्यक्ति, सब चलता है कहकर compromise कर लेता है। हालांकि दोनों ही अपनी जगह सही है किसी को भी गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि ना ही तो हर कोई अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है और ना ही हर ���ोई उन स्थिति से compromise.
वर्तमान समय में जो अपने body count बताने में गौरव महसूस करते हैं, वह इस सम्मान की भावना को समझ नहीं पाएंगे। मेरा लिंग मेरी मर्जी और मुगलों की परंपरा पालन करने वाले व्यक्तियों के बिस्तर गर्म करने वाली महिलाएं स्वाभिमान और सम्मान पर ज्ञान न हीं दें तो बेहतर है।
@ReallySwara
@YeshiSeli@ReallySwara@IIC_Delhi There must be some reason behind choosing such a painful way to die. For 'whore' like @ReallySwara, however, making such absurd statements just to stay in the headlines seems like an easy task. They would probably even find a fantasy in necrophilia.
@richaanirudh मृत्यु के लिए इतना दर्दना�� तरीका चुनने के पीछे कोई तो वजह होगी। बाकी @ReallySwara जैसी बाजारू महिलाओं को सुर्खियों में रहने के लिए ऐसे ऊटपटांग बयान देना आसान काम दिखाई देता है। ये तो Necrophilia में भी fantasy ढूंढ लेंगी।
मुगलों को सामने डॉगी स्टाइल में झुक जाना आसान है मैडम..
जौहर का मतलब तुम जैसी “वेश्याएं” नहीं समझ पाएंगी।
कन्वर्ट होने के बाद मुगलपुत्रों के बिस्तर गर्म करना आपको आसान लगने लगा होगा, किन्तु जौहर एक तपस्या है, जहाँ अपने शरीर की पवित्रता के लिए खुद के जिन्दा देह को आग में झोंक लिया जाता था।
मजाहबी दरिन्दों से बचाने के लिए आज के दौर में भी पाकिस्तान में जब किसी सुंदर लड़की की मौत होती है तो उसके परिजन महीनों उसकी कब्र की पहरेदारी करते हैं...
क्योंकि सुंदर लड़की की कब्र को भी खोदकर हवसखोर मुर्दा लड़की के शरीर के साथ भी बलात्कार करते है!
म���स्र की साम्राज्ञी क्लियोपेट्रा ने जो मौत चुनी उससे दुनिया स्तब्ध थी! आखिर क्यों एक औरत नग्न अवस्था में अपने स्तन पर सांप से डसवाएगी लेकिन वो जानती थी कि जिसने मिस्र पर हमला किया है वे मजाहबी फ़ौज के लोग हैं!
स्तन पर डँस मरवाने से पूरे शरीर में ज��र फैल जाएगा तो कोई इंफेक्शन के डर से उसकी मृत देह के साथ नहीं कर पाएगा और साथ ही स्तन को मुँह में लेकर कुचल नहीं पाएगा! वहशियों का क्या वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।
फिर भी आपको बता दूं कि इतिहासकार कहते हैं कि मिस्र की साम्राज्ञी के शव के साथ तीन हज़ार बार बलात्कार किया गया था!
महारानी पद्मावती ने भी लड़कर मरने के बजाय जौहर इसीलिए चुना था!
अभी एक वेश्या ने कहा कि जौहर करने वाली रानियाँ कायर थी? जौहर क्यों चुना? आत्मसमर्पण ही कर देती..
...तो इसका स्प्ष्ट कारण था ख़िलजी और वैसे ही मजाहबी दरिंदो की फ़ौज ! महारानी जानती थी कि अगर लड़ते हुए उसने और उसकी साथी औरतों ने जान दी तो उसके शरीर के साथ क्या होगा ?
@TheAnuDagar मृत्यु के लिए इतना दर्दनाक तरीका चुनने के पीछे कोई तो वजह होगी। बाकी @ReallySwara जैसी बाजारू महिलाओं को सुर्खियों में रहने के लिए ऐसे ऊटपटांग बयान देना आसान काम दिखाई देता है। ये तो Necrophilia में भी fantasy ढूंढ लेंगी।
@RubikaLiyaquat@ReallySwara मृत्यु के लिए इतना दर्दनाक तरीका चुनने के पीछे कोई तो वजह होगी। बाकी @ReallySwara जैसी बाजारू महिलाओं को सुर्खियों में रहने के लिए ऐसे ऊटपटांग बयान देना आसान काम दिखाई देता है। ये तो Necrophilia में भी fantasy ढूंढ लेंगी।
बिल्कुल सही बात है इस देश के चिर युवा नेता से तो कभी कुछ हो नहीं पाया, अब Gen Z और उसके बाद अब Gen Alpha से ही उम्मीदें हैं कि वह कुछ परिवर्तन ला पाएंगे।
जिस देश में एक से बढ़कर एक वीर स्वतंत्रता सेनानी हुए जिन्होंने अलग-अलग मोर्चो पर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, उस देश में कैसे कायर और बुजदिल नेता हैं जो छोटे-छोटे बच्चों को अपनी ढाल बनाकर लड़ाई लड़ना चाह रहे हैं।
जातिगत भेदभाव हमारे समाज के कड़वी सच्चाई है। आजादी के बाद से आज तक उसमें कुछ सुधार अवश्य हुआ है परंतु पूरी तरह समाप्त हो गया, यह नहीं कहा जा सकता। बाकी एक सवाल राहुल जी से हैं - इनकी बत्ती इतने समय बाद क्यों जली? 2004 से 2014 तक कांग्रेस की सरकार थी। तब उन्होंने ऐसा मुद्दा क्यों नहीं उठाया? क्या उसे समय देश में ऐसा भेदभाव नहीं था? अगर था तो उन्होंने क्या प्रयास किए जिससे यह समाप्त होता?
सच तो यह है कि सबको सरकार बनाकर मलाई खानी है, जनता को होने वाली समस्याओं से किसी को कोई मतलब ही नहीं है। जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए कानूनों की नहीं, व्यापक जन आंदोलन की आवश्यकता है; लेकिन क���सी राजनेता में वो इच्छा शक्ति ही नहीं है कि ऐसा कोई जन आंदोलन खड़ा कर सके।
जातिगत भेदभाव हमारे समाज के कड़वी सच्चाई है। आजादी के बाद से आज तक उसमें कुछ सुधार अवश्य हुआ है परंतु पूरी तरह समाप्त हो गया, यह नहीं कहा जा सकता। बाकी एक सवाल राहुल ज��� से हैं - इनकी बत्ती इतने समय बाद क्यों जली? 2004 से 2014 तक कांग्रेस की सरकार थी। तब उन्होंने ऐसा मुद्दा क्यों नहीं उठाया? क्या उसे समय देश में ऐसा भेदभाव नहीं था? अगर था तो उन्होंने क्या प्रयास किए जिससे यह समाप्त होता?
सच तो यह है कि सबको सरकार बनाकर मलाई खानी है, जनता को होने वाली समस्याओं से किसी को कोई मतलब ही नहीं है। जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए कानूनों की नहीं, व्यापक जन आंदोलन की आवश्यकता है; लेकिन किसी राजनेता में वो इच्छा शक्ति ही नहीं है कि ऐसा कोई जन आंदोलन खड़ा कर सके।