यह कविता 1950 में लिखी गई... हम नए नए आजाद हुए थे। गोरे आकाओं की विदाई से जो सिंहासन खाली हुआ उ��े भूरे साहबों की ज़रूरत थी और राजनीति उस तख़्त तक पहुँचने का सबसे मुफ़ीद ज़रिया बन ��ई। यह कविता भारत के विभाजन, राजनीतिक स्वार्थपरता, आम नागरिक की असहायता और आज़ादी के बाद आदर्शों के पतन पर तीखा व्यंग्य करती है।
बिहार की धरती से जन्मे बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र) द्वारा लिखी गई इन पंक्तियों की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही अक्षुण्ण और प्रभावशाली बनी हुई है। सरल भाषा में गिनती के माध्यम से... अंत में केवल "अण्डा" बचना राजनीतिक शून्यता दर्शाता है।
ठीक ऐसी ही शून्यता अब बेबा��� कवियों की भी है... अब 'विश्वास' नाम धर कर, मेकअप से चमचमाते, धन अर्जन की विधा में पारंगत, चरणचुम्बक, मूंछमुंडे स्वघोषित कवि मिलेंगे पर बाबा नागार्जुन जैसे प्रखर जनकवि नहीं मिलेंगे।
अपनी सहज भाषा में किसानों, श्रमिकों और आम जन की पीड़ा, राजनीतिक विडंबना और सामाजिक यथार्थ को निर्भीकता से स्वर देने वाले बाबा नागार्जुन की आज जन्मजयंती है। बारम्बार प्रणाम 🙏🙏
सातवीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग हज़ारों मील का सफ़र तय कर भारत पहुंचे थे, जिन्होंने भारत के अपने अनुभवों पर एक किताब भी लिखी.
@rehanfazalbbc के साथ विवेचना में आज कहानी चीनी यात्री ह्वेनसांग की, जो फ़िदा थे भारत पर.
वीडियो: सदफ़ ख़ान
@sanjeevsinghx Sir ye Rampurvwa kahan par hai. Exact location daaliye please. Maine ek video me dekha ki Kaanit, near Muzaffarpur ke pas unke parinirvan ka sthan bataya hai.