"समाज की विडम्बना कुछ इस प्रकार है कि,
समाज द्वारा हुई भूल–चुक तो क्षमा योग्य है परंतु
किसी व्यक्ति विशेष द्वारा हुई भूल–चुक पूर्णत्या अनुचित ही नहीं बल्कि अक्षम्य अपराध से बढ़ के हो जाती है।"
दोबारा पढ़िए और झांकिए अपनी अंतर आत्मा में कहीं यह समाज स्वयं आप ही तो नहीं...🪶