चेचक की तरह होता है प्रेम,
सुना था मैंने,
एक बार हो जाए तो,
उसी जीवन में,
दुबारा होना लगभग,
असम्भव है।
हुआ तो जाना,
प्रेम जुकाम की तरह होता है,
आजीवन,
चढ़ता-उतरता रहता है।
सुधांशु रघुवंशी
मेरा जूता
जगह-जगह से फट गया है
धरती चुभ रही है
मैं रुक गया हूँ
जूते से पूछता हूँ—
'आगे क्यूँ नहीं चलते?'
जूता पलटकर जवाब देता है—
'मैं अब भी तैयार हूँ
यदि तुम चलो!'
मैं चुप रह जाता हूँ
कैसे कहूँ कि मैं भी
जगह-जगह से फट गया ह��ँ।
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना