जब अडानी-अंबानी जैसे उद्योगपति मित्रों के लिए इतने खेजड़ी के पे���़ कटा दिए, तो फिर लगाएंगे कहां से?
इसीलिए मोदी जी.. "पीपल को खेजड़ी" बताकर काम चला रहे हैं.. और किरकिरी होने पर पोस्ट डिलीट करा रहे हैं।
यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सरकारी कार्यक्रमों में भी भाजपा नेता बनकर ही व्यवहार करते हैं। आज प्रधानमंत्री जी ने रिफाइनरी के उद्घाटन पर कहा कि 2018 से 2023 तक कांग्रेस सरकार के दौरान रिफाइनरी का काम ठप रहा और भाजपा के ढाई साल में पूरा काम हुआ। ऐसी बातें सुनने में हास्यास्पद लगती हैं।
प्रधानमंत्री जी, आपको रिफाइनरी के काम से जुड़े लोगों से पूछना चाहिए था। वे आपको बताते कि कांग्रेस सरकार में कोविड जैसी मुश्किल परिस्थिति में भी यहां काम नहीं रुका और रिफाइनरी का 85% काम 2018 से 2023 के बीच पूरा हुआ। भाजपा सरकार ने तो बजट में अगस्त 2025 तक काम पूरा करने की घोषणा की थी जो करीब एक साल देरी से हुआ है।
@narendramodi@PMOIndia
पढ़े-लिखे और विषय की समझ रखने वाले नेताओं का लाभ अंततः जनता को मिलता है। भारी दबाव के बावजूद महँगे बॉयलर और पॉवर इक्विपमेंट्स से राजस्थान की जनता को मुक्ति मिली। लगभग 3,200 मेगावाट की करीब ₹3 लाख करोड़ लागत वाली महंगी बिजली परियोजना, जिसके लिए रिसोर्स एडेक्वेसी प्लान की अनदेखी करते हुए टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही थी, विपक्ष और राजस्थान के जागरूक नागरिकों द्वारा उठाए गए सवालों के बाद र���क गई।
अब भारत सरकार ने सस्ते पावर इक्विपमेंट्स के लिए चीनी कंपनियों को अनुमति दी है। इससे बिजली उत्पादन लागत कम होगी जिसका सीधा लाभ राजस्थान की जनता और उपभोक्ताओं को मिल सकता है।
यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री को स्वयं के राज्य की इतनी बड़ी परियोजना पचपदरा रिफाइनरी के इतिहास और शिलान्यास की बुनियादी जानकारी तक नहीं है। मीडिया के समक्ष उनका यह दावा कि वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इसका शिलान्यास किया था, पूरी तरह से तथ्यात्मक रूप से गलत है। पूर्व में रिफाइनरी में केन्द्र और राज्य की हिस्सेदारी को लेकर वे गलत बयानी कर चुके हैं।
मुख्यमंत्री जी को शायद यह ज्ञात ही नहीं है कि पचपदरा रिफाइनरी का वास्तविक शिलान्यास वर्ष 2013 में ही यूपीए चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी एवं तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री श्री वीरप्पा मोइली द्वारा किया जा चुका था। ये तस्वीरें उसी मौके की है।
इसके विपरीत, केंद्र सरकार और राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पांच साल तक ठंडे बस्ते में डालकर अटकाए रखा, जिससे इसकी लागत 37,000 करोड़ रुपए से दोगुनी बढ़कर लगभग 80,000 करोड़ रुपए हो गई।
राजस्थान में रिफाइनरी की स्थापना के लिए 'हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड' (एचपीसीएल) को राजी करना भी एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था। सामान्यतः रिफाइनरी परियोजनाओं में राज्य सरकार की कोई हिस्सेदारी नहीं होती है, परंतु एचपीसीएल को सहमत करने के लिए राजस्थान सरकार ने दूरदर्शिता दिखाते हुए रिफाइनरी में 26% (छब्बीस प्रति��त) की हिस्सेदारी ली। इसी के परिणामस्वरूप यह 'एचपीसीएल राजस्थान रिफाइनरी लिमिटेड' (एचआरआरएल) नामक संयुक्त उद्यम (जॉइंट वेंचर) बना, जिसने इस रिफाइनरी का निर्माण किया है।
मुख्यमंत्री जी को यदि इतिहास की जानकारी नहीं है, तो वे सार्वजनिक रूप से गलत बयानबाजी करने के बजाय अपने अधिकारियों से सही आंकड़े और दस्तावेज मंगवाकर पढ़ लें।
बॉम्बे हाईकोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति माधव जमदार की सख्त टिप्पणियों ने भाजपा सरकार के दमनकारी और अलोकतांत्रिक चरित्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। सरकार को इन टिप्पणियों पर केवल 'मनन' नहीं, बल्कि अपने कृत्य पर शर्म करनी चाहिए। लोकतंत्र में विरोध की आज़ादी ही उसकी आत्मा है, लेकिन भाजपा ने इसे 'बनाना रिपब्लिक' बना दिया है, जहां महज राजनीतिक नारेबाजी को भी बदले की कार्रवाई का आधार बना लिया जाता है। सत्ता के अहंकार में चूर भाजपा सरकारों की यह कायरतापूर्ण और तानाशाहीपूर्ण कार्रवाइयां लोकतंत्र पर कलंक हैं।
पिछले 12 वर्षों में देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है जहां सरकार के विरोध को 'देशद्रोह' का रूप दे दिया जाता है। भाजपा नेता भूल गए कि UPA शासन में वे खुद कितनी आक्रामकता से विरोध करते थे और कांग्रेस उसे सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया मानती थी। आज केवल सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलने पर भाजपा शासित राज्यों में पत्रकारों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर FIR कर उन्हें महीनों-वर्षों तक जेल में बंद रखा जा रहा है।
यह सच को दबाने और देश में भय का माहौल बनाने की सोची-समझी साजिश है, जो लोकतंत्र की सरेआम हत्या है। सार्वजनिक जीवन में नेतृत्व करने वालों में आलोचना सुनने की सहनशक्ति होनी चाहिए। पुलिस और जांच एजेंसियों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी जवाबदेही सिर्फ और सिर्फ देश के संविधान के प्रति है, किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं।
The RSS is a wolf in sheep's clothing.
Dattatreya Hosabale's performative condemnation is not about exposing the loot of Ram Mandir funds. It is desperate damage control aimed at sanitising it.
The video's real purpose is to lend legitimacy to the UP government's SIT – constituted even before an FIR was registered, functioning without making its report public despite the sensitivity of the matter, and designed to protect the crocodiles while sacrificing a few expendable pawns.
The loot of Ram Mandir funds has deeply hurt the faith of Hindus across the country. But what adds insult to this injury is the RSS's sudden outrage over the alleged theft of Ram Mandir donations.
The truth is that if the RSS were sincerely committed to safeguarding devotees' donations, embezzlement on such a scale would never have taken place at a temple that is directly under its own watch.
This is the real face of the RSS: Piety is a performance; plunder is the profession.
गृह मंत्री से अपने मुलाकात पर चल रहे अटकलों के बीच राजस्थान के प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने बताया कि कैसे वो प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा के साथ मिलकर राजस्थान के ��मिटी पर चर्चा कर रहे हैं। सुनिए दोनों नेताओं का क्या कहना है..
@Sukhjinder_INC @GovindDotasra
पंजाब की कानून-व्यवस्था एवं सीमावर्ती इलाकों में शांति व सुरक्षा से जुड़े विषय किसी दल की नहीं, पूरे देश की जिम्मेदारी है।
पंजाब की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में गृह मंत्री रहते हुए श्री सुखजिंदर सिंह रंधावा जी के द्वारा देश-विरोधी ताकतों के खिलाफ सख्त कार्रवा�� करने एवं राष्ट्रहित के मुद्दे पर उनका लगातार विरोध करने के कारण रंधावा परिवार को लंबे से समय से धमकियां मिलती रही है।
इन्हीं गंभीर विषयों को लेकर आज @Sukhjinder_INC जी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी से मुलाकात की है। इसे राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
एक सच्चे कांग्रेसी की पहचान यही है कि वह विचारधारा पर अडिग रहते हुए भी राष्ट्रहित के ���र मुद्दे पर जिम्मेदारी निभाए। रंधावा जी ऐसे परिवार से आते हैं, जिसने पंजाब के सबसे कठिन दौर में भी आतंकवाद और अलगा��वाद के सामने कभी घुटने नहीं टेके। उनके परिवार ने हमेशा देश की एकता और अखंडता के लिए आवाज़ उठाई। यही विरासत आज भी उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान है।
ऐसे गंभीर विषय पर अनावश्यक राजनीतिक बयानबाजी करना न तो पंजाब के हित में है, और न ही देश के। राष्ट्रहित दलगत राजनीति से हमेशा बड़ा होता है। @INCIndia @INCPunjab
I refute the mischievous political slant being given to my meeting with the Union Home Minister by certain sections of the media.
The meeting was pre-scheduled for today in connection with my representation on the deteriorating law and order in the State of Punjab.
RSS वह संगठन है जिसने अपनी पूरी पहचान चाल, चरित्र और चेहरे के नारे पर खड़ी की है। इसी के दम पर संगठन की ब्रांडिंग भी खूब की गई और मार्केटिंग भी ज़ोरदार हुई। एक ऐसे संगठन की छवि गढ़ी गई, जो त्याग, ईमानदारी और नैतिक श्रेष्ठता का उपदेश भी देता रहता है और कहता है कि वो उन पर अमल भी करता है।
संघ का वादा था कि वह राजनीति की अनैतिक सौदेबाज़ियों और राजनीतिक मजबूरियों से ऊपर उठेगा। मगर संघ ने जिस राजनीतिक दल बीजेपी को पाला-पोसा, वह आज भ्रष्टाचारियों को गले लगाने और राजनीतिक अनैतिकता को वैधता देने में सबसे आगे है। “वॉशिंग मशीन” आज बीजेपी की पहचान बन गई है।
लेकिन RSS के किसी व्यक्ति को इस राजनैतिक पतन की आलोचना करते कभी नहीं सुना गया। संघ द्वारा इस ज़ुबानी निंदा तक नहीं हुई। नैतिकता के स्वघोषित पैरोकार सत्ता मिलते ही अनैतिकता के चैंपियन बन गए।
भ्रष्टाचार की यह सड़ांध सिर्फ राजनैतिक गलियारों तक नहीं है। ये उन गर्भगृहों तक भी पहुँच गई है, जिनकी रक्षा का दावा संघ करता रहा है। हिंदू मंदिरों के प्रबंधन को लेकर चोरी और वित्तीय अनियमितता के आरोप मँडरा रहे हैं, राम मंदिर के चढ़ावे से लेकर बद्रीनाथ और महाकालेश्वर की मंदिर-अर्थव्यवस्थाओं तक पर सवाल उठ रहे हैं।
अपने चुनिंदा लोगों की देख रेख में मंदिरों के खज़ानों की संगठित लूट-खसोट पर RSS के भीतर न कोई नैतिक हिचकिचाहट दिखती है, न ही कोई सच्चा आक्रोश।
नैतिकता का मुखौटा तार-तार है, और उसके पीछे से जो चेहरा उभर रहा है, उसमें से लालच, छल और उसी ईश्वर के साथ धोखे की छवि उभर रही है, जिसमें विश्वास का दावा RSS की राजनीति का केंद्र बिंदु है।
बड़ी विडंबना है कि #पर्ची_सरकार के मंत्री केवल ट्रांसफर आवेदन ले सकते हैं, ट्रांसफर के अधिकार पर "ऊपर से अंकुश" लगा है।
जानकारी में आया है कि विभागों से तबादलों की हर सूची पहले CMO में जांच के लिए जाएगी, जहां तय होगा कि ट्रांसफर होगा या नहीं।
इसके क्या मायने हैं.. क्या मंत्री सक्षम नहीं हैं, या भाजपा में भ्रष्टाचार इस ���़दर हावी है कि मुखिया को अपने मंत्रियों पर भरोसा नहीं है, या फिर कर्मचारियों को कहीं 'ऊपर' के काउंटर पर पर्ची कटानी पड़ेगी?
जब हर ट्रांसफर लिस्ट मुख्यमंत्री कार्यालय से ही पास होनी है, तो फिर विभागीय मंत्री किस बात के हैं? ये अधिकारों का विकेंद्रीकरण नहीं, सत्ता का केंद्रीकरण है। इसके पीछे चाहे जो कारण हो।
सरकार में विभाग हैं...मंत्री भी हैं...सचिव भी हैं...फिर भी फैसलों का सिर्फ एक ही ठिकाना तो सवाल स्वाभाविक है। आखिर सरकार सचिवालय से चल रह�� है.. या सिर्फ़ एक भवन से?
मणिपुर सालों से जल रहा है, और आज फिर नफ़रत और हिंसा की आग में 20 घर राख हो गए।
दो सरकारों और राष्ट्रपति शासन के बावजूद संघर्ष गहराता ही जा रहा है। हज़ारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, अनगिनत परिवार उजड़ गए हैं - मणिपुर जिस असहनीय पीड़ा से गुज़र रहा है, उसकी कल्पना भी मुश्किल है।
यह मोदी सरकार की उस विभाजनकारी विचारधारा का नतीजा है, जो लोगों को धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और पहचान के नाम पर बाँटती है।
आज मणिपुर ही नहीं, पूरा देश प्रधानमंत्री से संवेदना के दो शब्द की भी उम्मीद छोड़ चुका है, कार्रवाई की बात तो दूर गई।
मणिपुर बेहतर का हक़दार है - और इसके लिए भारत जोड़ना ही एकमात्र रास्ता है।
अचानक मोदी के इतने विदेश दौरे क्यों?
अभी AI से बनाये गये अवार्ड लेकर मोदी सेशेल्स से लौटे हैं अब ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इंडोनेशिया के लिये सूटकेस तैयार है.
क्यों हो रहे हैं इतने विदेश दौरे?
दरअसल देश में अब मोदी जी की ज़रूरत ही नहीं है.
एक कॉकस देश चला रहा है और उसे हैंडओवर का काम मोदी कर चुके हैं.
अब वो रहें या न रहें, दफ़्तर जायें, न जायें, देश या विदेश में बिना कारण घूमते रहे हैं, कोई इवेंट करते रहें इससे इस कॉकस को फर्क नहीं पड़ता.
मोदी बस अब एक बिजूका (scarecrow) हैं.
ये कॉकस अब सिर्फ कुछ उद्योगपतियों और लॉबीज़ के फायदे के लिये काम करता है.