Defining right and wrong ever since I made the groundbreaking discovery: I'm always right. Piety without consistency is just performance. Euthyphro’s student...
A Tit-Intellectual is a modern, algorithmically nurtured pundit who occupies a very specific niche in our public discourse. He presents himself with an aura of high-minded, academic independence. https://t.co/4D7hzvKaSh
कल तक जो लोग प्रधानमंत्री की स्वर्गीय मां को अपशब्द और गलियां देने पर तालियां बजा रहे थे, इसे जस्टिफाई कर रहे थे, जब उनको कुछ कह दिया तो तुरंत अजीत भारती पर SC/ST एक्ट लगा कर केस कर दिया। इतनी दोगलाई कहां से लाते हो भाई ?
Even Ajeet Bharti knows he made a wrong move this time.
And thus starts the usual whataboutery of "Even they do the same" logic by him and his close fraands.
How low of him to not understand the basics of democracy. So according to him she was the representative of only the people who voted for her. That is why one should always be wary of the Tit-Intellectuals. https://t.co/7zdOAoBRH2
If you didn’t vote for @smritiirani , on what basis do you demand that she fulfil her promises?
Yet, without making those promises, she delivered:
• 1 lakh+ homes for families
• A medical college in Amethi
• New highways and road infrastructure
• A 200-bed hospital
• Major investments in healthcare, education & connectivity
And now, the moment she became BJP’s National General Secretary, Congressi chamchas suddenly remembered Rahul Gandhi’s defeat in Amethi and put their entire ecosystem behind recycling her old videos.
So, why is she being remembered in Amethi today? Because work speaks louder than propaganda.
@Shehzad_Ind Hey @Shehzad_Ind, Can you please document what constitutes eligibility/fitness to be a JANNAYAK or even a booth level agent and give your verdict who in the current political patties is fit to be said so.
It's becoming hard for BJP IT Cell ecosystem to have the narrative control in the high stake indian politics drama since last 3 months. They always prepared for the known but CJP and genZ suddenly appeared out of syllabus before them.
ज्ञानी पेल रहे हैं ज्ञान, ओढ़कर छद्म-संस्कृति का चोला,
आदिपुरुष की टपोरी भाषा वाला आज मर्यादा पर बोला!
दूसरों की पंक्तियों पर जो नैतिकता का पाठ सिखाने आते हैं,
खुद की 'जलेगी भी तेरे बाप की' वाली तुकबंदी भूल जाते हैं!
हिन्दवी द्वारा कुशाग्र अद्वैत की बलि
कुछ लोग मुझे कवि मानते हैं। कुछ लोग मुझे कवि नहीं मानते हैं। लेकिन सभी लोग यह मानते हैं कि मैं लिखता हूँ। अच्छे और ब���रे का निर्णय एक लगातार चलती रहने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में उतार - चढ़ाव आते रहते हैं।
कुछ महीनों पहले मैं अपनी एक कविता "माधुरी दीक्षितियों के नाम" लिखकर ट्रोल हुआ था। गलती यह हुई थी कि मैंने माधुरी की फ़ोटो लगा दी थी। जबकि मुझे बहुत सारी हीरोइनों की तस्वीर लगानी थी। इससे होता यह कि बात अकेली माधुरी पर नहीं आती, बल्कि "डायल्यूट" हो जाती। बाद में इस कविता को मेरे एक फेसबुक मित्र अरुण खामख्वाह ने अपनी वाल पर लगा दिया।
और फिर जो तांडव हुआ, वह मैं और मेरा कलेजा ही जानता है। एक दशक से अधिक की काव्य यात्रा में मैंने जितने भी शत्रु बनाए, वे सभी उस वाल पर प्रकट ह���ने लगे। पूरा दिन उनके कमेंट्स पढ़ने में चला गया। सारी रात सो न सका।
ऊपर से यही दिखाता रहा कि मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन मन ही मन एक कंपन्न महसूस होता रहा। न निगलते बन रहा था न उगलते। लेकिन ट्रोलिंग झेलने का पूर्व - अभ्यास इतना तगड़ा था कि मेरा जीवन बहुत प्रभावित नहीं हुआ। दो दिन बाद मैंने वह कविता अपनी वाल से हटा दी।
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कुशाग्र की कविता का यह टुकड़ा पढ़ते ही मैं समझ गया था कि इस लड़के की ट्रोलिंग होगी। और वह हो भी रही है।
यह दो - तीन कारणों से है।
एक तो तमाम उम्र स्त्री के स्तनों में धंसे रहने की कल्पना करने वाले भी जब किसी कविता में स्तन शब्द देख लेते हैं, तो उनके भीतर का संस्कृति - कर्मी अचानक जा��� उठता है।
दूसरा यह कि लोग बहुत निकम्मे हैं। नाकारा हैं। वे जितना व्यस्त ख़ुद को दिखाते हैं, वे हैं नहीं। इसलिए अच्छी या बेहतर वस्तु पर न जाकर उनका ध्यान ऐसी ही किसी चीज़ पर जाता है।
तीसरा कि यह प्रकाशन की गलती है। पूरी तरह गलती है। प्रकाशन / सम्पादक इस बात को क्यों नहीं समझ रहा कि थोड़े से भी नेगेटिव कमेंट्स किसी को��ल हृदय को आत्महत्या के मुहाने तक ले जा सकते हैं। हर किसी में सोशल मीडिया विवाद को, ट्रोलिंग को या नकारात्मक प्रचार को पचाने की हिम्मत नहीं होती।
मैंने कुशाग्र की पूरी कविता पढ़ी। कच्ची कविता है। स्तन शब्द टाला जा सकता था। लेकिन क्यों ही टाला जाए। यदि किसी युवा कवि से आप ऐंदृकता की परिधि में उसकी कल्पना के व्यास को छीन लेंगे तो वह कभी कोई दुस्साहस नहीं कर पाएगा। कविता के अ - रसिकों और तथाकथित राष्ट्रवादी सांसांस्कृतिक-कर्मियों को यह पता ही नहीं है कि हिंदी अतुकांत में क्या और कैसा और कितना कुछ अ - रूप, वि - रूप, स्व - रूप, नि - रूप लिखा जा चुका है।
हिंदी अतुकांत कोई ग़ज़ल नहीं है, जो कोठों पर जवान हुई हो। यह तो तब विकसित हुई जब भीतर अंधियारे का विवर अपने उच्चतम पर था। हम मोहब्बत या गुरबत / चाहत या बिंदिया / निंदिया या शहर / ज़हर या लहर के काफ़िये मिलाने जैसे बचकानेपन से कोसों दूर हैं। हमारे यहाँ उस्ताद के जूते नहीं चाटे जाते। हमारे यहाँ एक स्वतंत्र मनुष्य का निर्माण उसके ध्वन्स की शर्तों पर होता है।
जिनके लिए छंद कविता की शर्त है, ऐसे लड़बहेर न भाषा की उत्पत्ति का विकास जानते हैं न ही उन्हें सभ्यताओं के विकास और विनाश की ही कोई समझ है।
वे एक कोने में पड़े उस्तादानुसार शेर में वज़न कम या ज़्यादा करते र���ते हैं और दरिया / सहरा / जाम / शाम करते हुए गिनती के नुकतों पर काफ़िया-पैमाई करते रहते हैं।
हिंदी अतुकांत दरअसल ही भीतरी अतुकांत का बाहरी तर्जुमा है। हालांकि यह वेस्ट से बेहद प्रभावित है। प्रभावित क्या है, अजी नकल ही कहिये। लेकिन नकल भी मौलिक हो जाती है यदि आपके पास निराला / शमशेर / मुक्तिबोध जैसे कवि हों।
कुशाग्र जैसे बच्चों को खुली छूट देनी होगी। आपको नहीं पसंद तो इग्नोर कर दीजिये। लेकिन कम से कम फ़तवेबाज़ी मत कीजिये।
फिर भी, मैं हिन्दवी के संपादक को एक गधा - संपादक कहूंगा जो "रिलेवेंस" में रहने के लिए अपनी ही शरण में आई प्रतिभा को सार्वजनिक हत्या के लिए चुनता है। मैं नहीं जानता हिन्दवी का संपादक किसे प्रसन्न करना चाहता है या उसकी "वामांग-माता" कौन है, जिसे वह नर-बलि चढ़ाता है। यह कोई पहली बार नहीं है। पहले भी कितने ही कवि इस घोंचू संपादक के कारण सार्वजनिक रूप से वि-वस्त्र हुए हैं।
ईश्वर! कुशाग्र को हर बला से बचाए। मेरा उससे कोई परिचय नहीं। लेकिन हिन्दवी अपने इस संपादक की अवैध हरकतों का संज्ञान ले। यह जानबूझकर उठाया हुआ क़दम है। कुशाग्र यदि स्वयं अपने संपादक के विरुद्ध नहीं बोल सकता, तो मैं तो बोल ही सकता हूँ।
मैं उस बच्चे और उस जैसे कई बच्चों की मजबूरी समझता हूँ। यह बच्चे इस भरम में हैं कि हिन्दवी से ही हिंदी - कविता का राजमार्ग निकलता है!
-मनमीत सोनी की फेसबुक पोस्ट
These are our journalists. The fourth pillar of democracy. My dear Sir, your duty was to ask questions to government. If you would have done that honestly, we would be seeing an even better India.
Looks like the fourth pillar gets tipsied often under the influence of those 90 MLs.
Chalo ek aur jumla Shuru ho gaya free coaching wala.
Unka future bhi agar sarkari schools wala hi hai to peet lo aaj chaati aur karo khoob waah-waah. Kyunki iske baad to kabhi kar nahin paoge inki badhai.
घर से निकल नहीं पायीं क्या दिल्ली की हालत दिखाने जलभराव के कारण?हमें लगा था दिल्ली की हालत दिखाओगी बरसात में अब।
अच्छा, हो सकता है पंजाब के वीडियो देख रही होंगी घर बैठकर। फिर रील बनाएंगी उस पर। इसीलिए न���ीं निकल पायीं घर से।
From Kanjivaram to Banarasi, from Paithani to Ikat, Indian handlooms have a richness that fast fashion can never match. Because Indian sarees are not mid. They are timeless.
Let’s proudly promote our culture, our heritage and support the artisans who keep this legacy alive. Let’s use this platform to celebrate the beautiful craft our handloom weavers create.
On Hon’ble PM Shri @narendramodi ji’s appeal, I join in requesting all influencers to promote Indian handlooms.
Happy National Handloom Day 🇮🇳
#NationalHandloomDay