"पुलिसवालों ने हमें मारा, मैं गिर गई थी, उन्होंने मदद नहीं की"...लड़की ने कहा
◆ ज्यादा जानकारी दे रहे हैं संवाददाता युसूफ
#JantarMantar || Jantar Mantar Protest
2011 में जब अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे, तब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी।
उस दौर में सरकार और प्रधानमंत्री की खुलकर आलोचना होती थी, लेकिन आलोचकों को राष्ट्रविरोधी या धर्मविरोधी कहकर निशाना बनाए जाने की चर्चा आज जैसी नहीं थी।
आज सोनम वांगचुक के आंदोलन के बीच एक बार फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति को लेकर बहस तेज़ हो गई है। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना या उसकी आलोचना करना देशविरोध माना जाना चाहिए?
अन्ना हजारे और सोनम वांगचुक के आंदोलनों के बीच सबसे बड़ा फर्क सिर्फ मुद्दों का नहीं, बल्कि विरोध की बदलती राजनीति और उसे देखने के नजरिए का भी है।
अपने शो शेखर टूनाइट में शेखर सुमन ने सोनम वांगचुक के अनशन का समर्थन किया और सरकार को बहरी, तंगदिल और संवेदनहीन कहा।
ये बंदा दंगेशाहों से डर क्यूं नहीं रहा।
#SonamWangchuck
जब सत्ता सवालों से डरने लगे, तब लोकतंत्र सबसे ज़्यादा घायल होता है। भूख से लड़ते एक इंसान को उठाया जा सकता है, लेकिन उसके इरादों को नहीं। इतिहास हमेशा याद रखता है कि किसने आवाज़ उठाई… और किसने उसे दबाने की कोशिश की।” 🖤 “लोकतंत्र सिर्फ़ वोट डालने का नाम नहीं, बल्कि असहमति को सम्मान देने का भी नाम है।” #sonamwangchuk
@mansamirdha किसान को राष्ट्रहित में यह बात समझनी चाहिए कि . . .आख़िर 35 - 40 लीटर की ��ंकी वाले एक ट्रैक्टर से काम क्यों चलाए . . . .4-5 ट्रैक्टर 🚜और खरीद ले... फिर सभी की टंकियाँ फुल करवाकर आराम से 200 लीटर घर ले आए। 🤣
आस्था केवल तुम्हारी नहीं आस्था हमारी भी है
तुम पत्थर को भगवान मानते हो हम प्रकृति को भगवान मानते हैं
अपनी आस्था के चक्कर में तुम हमारी आस्था को चोट पहुंचाते हो
जैसे मेरे ये कहने से कि गणेश भगवान नहीं, उसमें कोई ताकत नहीं, ये सब ड्रामा है, तो तुम्हारी आस्था को ठेस पहुंचती है
वैसे ही जब तुम उस गणेश की मूर्ति को लेकर पब्लिक रोड़ पर चलते हो, तेज आवाज में DJ बजाकर हुड़दंग करते हो, पूरे रोड़ पर गंदगी गुलाल फेंकते चलते हो, रोड़ पर जाम लगाकर नाचते हो और अपनी भक्ति का अनावश्यक प्रदर्शन करते हो, अपने भगवानों की कैमिकल से बनी मूर्तियों का विसर्जन तुम उन नहरों में करते हो जिन नहरों का हम पानी पीते हैं, ऐसा करक�� तुम जल को और प्रकृति को प्रदूषित करते हो
तब हमारी भी मान्यता, नजरिये, विश्वास और आस्था को ठेस पहुंचती है!
प्रकृति में आस्था रखने ��ाले क्या करें अब??
जो लोग पाकिस्तान का पानी रोकने के दावे कर रहे थे, वो किसानों का काला सोना भी नहीं बचा पा रहे।
पानी के साथ करोड़ों रुपयों की भैंसें भी पाकिस्तान जा रही हैं।
#Flood#Punjab
आप को क्या लगता है कि देश में जो धनाढ्य लोग हैं वे उनकी किसी काबिलियत की वजह से धनाढ्य हैं ..?? अगर हां तो आप गलत सोच रहे हैं, दरअसल वे अपनी लाइजनिंग की वजह से धनाढ्य हैं, देश के सत्ताधीश ब्यूरोक्रेट्स सब कॉरपोरेट्स के साथ मिले हुए होते हैं, सबके हित आपस में जुड़े हुए हैं, देश की तरक्की और जनहित की आड़ में सब अपना घर भरते हैं
👉🏽 अखबार की इस खबर पर नजर डालिये, दिवंगत राकेश झुंझनुवाला की पत्नी किसी onilne गेमिंग फर्म नजारा के अपने शेयर बेच कर निकल गई, और ये शेयर रेखा ने 13 जून को ही निकाल दिये थे (यानी कि 2 महीने पहले)
👉🏽 अब 3 दिन पहले आए उस फैसले पर ध्यान दीजिये जिसमें online gaming पर रोकथाम के लिये सरकार द्वारा विधेयक लाकर उसे कानून का रूप दे दिया है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उसे मंजूरी देते हुए अंतिम मोहर भी लगा दी है
उपरोक्त दोनों ��बरों को कनैक्ट करके पढ़ेंगे तब समझ आएगा कि सरकार कौन सा फैसला लेने जा रही है कुछ लोगों को वो काफी पहले से पता होता है या उन्हें बता दिया जाता है
यानि कि बाजार की मोटी व्हेल मछलियों तक प्रॉपर अपडेट होता है कि सरकार कब क्या करवट लेने जा रही है और उससे पहले आपको एहतियात बरतनी है, फिर मोटी मछली निकल जाती हैं और गाज गिरती है छोटी मछलियों मतलब छोटे शेयर होल्डर्स (आम आदमी) पर
क्या आपको लगता है कि नोटब��्दी वाले फैसले का देश के कुछ नामी गिरामी मोटे मगरमच्छों को पहले से पता नहीं होगा ..??
अगर आपको लगता है कि किसी को नहीं पता था, अगर आप नोटबन्दी को देशभक्ति से जोड़ते हैं, आगर आप नोटबन्दी को आतंकवादियों व पाकिस्तान की कमर तोड़ने से जोड़ते हैं, अगर आप उसे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के प्रयासों से जोड़ कर देखते हैं तो आप बहुत भोले हैं 😁
देश ���ें शिक्षा ,स्वास्थ्य ,रोजगार , न्याय , रेलवे , इन्फ्रास्ट्रक्चर , सड़क , तकनीकी ,खेल ,इत्यादि कितने ही मुद्दे पड़े हैं जो जनता के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं
लेकिन भारत में चर्चा किस बात पर हो रही है 🤡
1. बुलेट कौन चलाता है और तेजस में कौन बैठता है?
2. पहले अंतरिक्ष यात्री हनुमान जी थे या कोई और?
3. पत्रकार और कथावाचक में कौन सही है?
4. धर्मगुरु चमत्कारी हैं या जगतगुरु अवतारी हैं?
बेशर्म नेता और दल्ले पत���रकार और भा��़े के आईटी सेल वाले दिन रात जनता को मूर्ख बनाने का चूरन बांटते रहते हैं ताकि असल मुद्दों पर कभी न बात हो ,न चुनाव हो।
जिसके चलते जनता की सोच भी केवल धर्म ,महजब , जाति, पार्टी सिमट कर रह गई है।
सत्ता की चाटुकारिता और जाट समाज का म��न दर्द
- के. पी. मलिक
जाट समाज का इतिहास संघर्ष, साहस और आत्मसम्मान का रहा है। लेकिन आज, कुछ स्वार्थी नेता इस गौरवशाली इतिहास पर धूल झाड़ने में लगे हैं। सत्ता के दरबार में चिलम भरने और “मोदी-मोदी” के जयकारे लगाने वाले ये लोग भूल गए हैं कि जिस जमीन पर वे खड़े हैं, वहां ७०० से ज़्यादा किसानों का खून मिला, वहां पहलवान बेटियों का अपमान हुआ और वहां नेताओं की गरिमा कुचली गई है। इतिहास की क़िताबो में भरतपुर की शान जाटों के ��ौरवशाली इतिहास को धूमिल करने और मिटाने की शाजिश हो रही है! और हम जयकारे लगाकर धार्मिक भावनाओं से आनंदित हो रहे हैं।
साल 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे से लेकर आज तक जाट समाज लगातार निशाने पर है। किसान आंदोलन में 700 से अधिक किसानों की मौत, दिल्ली बॉर्डर पर जमीन बचाने की लड़ाई, खाद के लिए किसानों का मरना, पहलवान बेटियों का अपमान! ये घटनाएं सिर्फ आंकड़े नहीं, समाज के जख्म हैं। इन जख्मों को देखने के बावजूद, कुछ चेहरे सत्ता की दलाली में इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें अपने समाज के आंसू तक नहीं दिखते।
सवाल यह है कि क्या सत्ता की कुर्सी इतनी ऊंची है कि वहां से अपने ही समाज का दर्द दिखाई नहीं देता? क्या चंद फायदे, सरकारी कृपा और राजनीतिक पद के लिए अपनी कौम के अपमान को निगल लेना अब नेताओं का नया आदर्श है? जाट समाज का सबसे बड़ा नुकसान विरोधियों ने नहीं, बल्कि अपने घर के अंदर ब��ठे चाटुकारों ने किया है। दुश्मन सामने से वार करता है, लेकिन यह “अंदर का गद्दार” पीठ में छुरा घोंपता है। यही वजह है कि समाज बार-बार कमजोर होता है और सत्ता के लिए आसान निशाना बन जाता है।
आज जरूरत है कि जाट समाज अपने इतिहास, अपने गौरव और अपने असली हितैषियों को पहचाने। जो सत्ता के खिलाफ सच बोलने का साहस रखता है, वही असली नेता है और बाकी सिर्फ भाड़े के ढोल हैं, जो सत्ता के इशारे पर बजते हैं। अगर यह जागरूकता अभी नहीं आई, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ़ नहीं करेंगी। इतिहास में हमारा नाम योद्धाओं के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता की चाटुकारिता में डूबे मौन गुलामों के रूप में लिखा जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और तल्ख़ टिप्पणीकार हैं)
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