अमन चोपड़ा ने सिर्फ़ इतना किया था कि झारखंड के छात्रों की आवाज पूरे देश म���ं पहुंचाई थी।
सिर्फ़ वहाँ से रिपोर्टिंग करने के आधार पर पुलिस उनसे पूछताछ कर रही है।
एक महीने के अंदर ही इस विपक्ष के लोकतंत्र का कच्चा चिट्ठा जनता के सामने खुल रहा है।
OBC को आंकड़ों का खेल नहीं, हिस्सेदारी चाहिए, आपस में लड़ाने की राजनीति बंद कीजिए।
13 महीने बाद ओबीसी आयोग की रिपोर्ट आई, लेकिन आज किसी को कुछ नहीं पता इसमें क्या है। अखबारों में रोज़ OBC के जातिवार संख्या क�� आंकड़े छप रहे हैं।
सवाल है, अगर ये जातिगत आंकड़े हैं, तो फिर भाजपा सरकार रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं कर रही? OBC क�� आबादी कितनी है और आबादी के अनुपात में उनका आरक्षण 21% ही रहेगा या बढ़ेगा? सरकार इस पर चुप क्यों हैं? अगर OBC की आबादी 55% है तो फिर 50% आरक्षण की सीमा पर सरकार अपना रुख स्पष्ट क्यों नहीं करती? OBC को उसकी आबादी और भागीदारी के अनुपात में हक क्यों नहीं है?
लेना था दोषियों पर एक्शन, लेकिन उलटा झारखंड पुलिस प्रदर्शनकारी छात्रों पर एक्शन ले रही है।
रांची में प्रदर���शनकारी छात्रों के विधानसभा घेराव मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई। JPSC-JSSC की परीक्षाओं में धांधली एवं परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग कर रहे छात्रों पर झारखंड पुलिस ने वाटर कैनन चलाया और लाठीचार्ज किया।
अभी ये चुनाव आयोग और एक-दो अन्य मुद्दों पर भी अपनी ताकत टेस्ट करने की कोशिश करेंगे। जंतर-मंतर पर जो भीड़ उमड़ी और जैसा माहौल बना, उसके पीछे कई फैक्टर थे और शायद CJP नेतृत���व इस बात को जानता होगा।
अगली बार जब वे चुनाव आयोग या अन्य किसी मुद्दों को लेकर जनता के ब���च जाएंगे, तब सरकार, विपक्ष, मीडिया और जनता-सभी अलग तरीके से तैयार होंगे। ऐसे में उन परिस्थितियों में उन्हें जनता से कैसा रिस्पांस मिलता है, यह देखना दिलचस्प होगा।
फिर से यह खबर मीडिया में तैर रही है कि 2,000 रुपये से ऊपर के UPI ट्रांजेक्शन पर चार्ज लगेगा। फिर पब्लिक की तरफ से बैकलैश होगा, और फिर सरकार कहेगी कि हमने ऐसा कब कहा? फिलहाल हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं है।
भयावह 🤬
जो हालात पहले बिहार में थे अब रोज राजस्थान में हो रहा है!
भरतपुर में एक ग्रामीण किसान महिला जो अपने खेतों से गाय भैंस के लिए चारा लेकर आ रहीं थी,
किसी पुरानी मामूली सी बात पर महिला की बीच रास्ते में गोली मारकर हत्या कर दी!
दुःखद 🤬
@PMOIndia
लगता है दवाई एकदम सही जगह पड़ी है!!
अगर भारत की संसद विदेशी फंडिंग से जुड़े FCRA नियमों को और सख्त करने जा रही है, तो उससे अमेरिका के एक सांसद को इतनी बेचैनी क्यों हो रही है?
इसका जवाब तो वह स्वयं दे रहे हैं। उनका कहना है कि प्रस्तावित बदलाव ईसाई समुदाय पर सीधा हमला है और इससे सरकार को चर्चों तथा धार्मिक परोपकारी संस्थाओं पर नियंत्रण का अधिकार मिल जाएगा।
मतलब, एक तरह से वे यह स्वीक���र कर रहे हैं कि NGO की आड़ में विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल भारत में धर्मांतरण जैसी गतिविधियों के लिए किया जाता है? वरना इस बयान का क्या तुक है?
कुछ ही समय पहले अमेरिका के विदेश मंत्री भारत दौरे पर आए थे और उन्होंने अपनी यात्रा की शुरुआत कोलकाता स्थित मदर टेरेसा की संस्था से की थी। जबकि उस संस्था को लेकर अतीत में धर्मांतरण से जुड़े आरोप लगते रहे हैं। तभी से यह चर्चा थी कि अमेरिका FCRA नियमों में प्रस���तावित बदलाव को लेकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करेगा।
अब इस अमेरिकी कांग्रेस सांसद के बयान से यह चर्चा और भी मजबूत होती दिखाई देती है।
जिस तरह हजारों की संख्या में छात्र अपनी वाजिब मांगों को लेकर रांची में डटे हुए हैं, यह इस आंदोलन की ताकत को दिखाता है। यह आंदोलन जरूर कामयाब होगा।
छात्रों की मांग है कि JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं की CBI जांच कराई जाए, भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए और गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
इस आंदोलन में शामिल हजारों छात्र ही इसक��� सबसे बड़ी ताकत और चेहरा हैं। धीरे-धीरे @khurpenchh , @TheLallantop अन्य स्थानीय मीडिया की वजह से इस आंदोलन की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर भी होने लगी है।
कम से कम दिल्ली में हुए आंदोलन से सीख लेते हुए झारखंड सरकार को समय रहते पहल करनी चाहिए।
आज यह खबर देखकर और सुनकर एक विचार आया जो आपके सामने रखना चा���ूंगा।
एक समय था जब दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी समाज को राष्ट्रीय दलों के बड़े नेताओं को माला पहनाने तक का अवसर भी नही मिलता था। उन्हें केवल रैलियों की भीड़ और तालियां बजाने तक सीमित समझा जाता था।
आज वही साधारण आदिवासी भाई राजधानी जयपुर में आमंत्रित किए जा रहे हैं और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी द्वारा उनका माल्यार्पण किया जा रहा है।
यह परिवर्तन अपने आप नही आया है। यह उस राजनीतिक जा��रूकता और आत्मसम्मान का परिणाम है, जिसे बाप पार्टी की विचारधारा ने मजबूत किया है। बाप पार्टी ने केवल दक्षिणी राजस्थान की पहचान को ही नही, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के आत्मविश्वास और राजनीतिक महत्व को भी नई पहचान दिलाने का कार्य किया है।
उसी क्रम में कमल-कांग्रेस के नेता भी बाप पार्टी का नाम लेकर अपने शीर्ष नेतृत्व के सामने अपनी राजनीतिक उपस्थिति के साथ नम्बर बढ़ाने का प्रयास ��र रहे हैं। यह अपने आप में एक बड़ा संकेत है कि बाप पार्टी ने प्रदेश की राजनीति में अपनी एक प्रभावशाली पहचान बनाई है।
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