बीजेपी को अपना नाम बदल कर बेशर्म पार्टी रख लेना चाहिए, क्योंकि इस हद तक छात्र छात्रों पर अत्याचार हो रहा है और बेशर्म पार्टी की महिला प्रवक्ता को कोई फर्क नही पड़ रहा है।
न्याय दो, अन्याय बंद करो।
आदरणीय श्री अखिलेश यादव जी के साथ छात्रों के हक की लड़ाई में सड़क पर उतरे। पुलिस की तानाशाही के तहत हमें हिरासत में लेकर छत्रसाल स्टेडियम डिटेंशन सेंटर में रखा गया।
वहीं डिटेंशन सेंटर से मीडिया के सामने छात्रों के मुद्दों पर अपनी बात रखी।
मुंबई में छात्रों के समर्थन में लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे,
तभी उनको ज़बरदस्ती हटाने के महाराष्ट्र पुलिस आ गई,
ये देखते ही एक हिम्मती महिला चट्टान की तरह पुलिस वैन के सामने खड़ी हो गई।
रिया अहीर जैसे युवाओं को सलाम है! 🫡
ये लवकुश प्रजापति है UP के बांदा जिले से है ये 16 दिनों से दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट का हिस्सा है।
20 तारीख को इनको इतना मारा कि इनका पै�� फैक्चर हो गया और लिगामेंट फट गया फिर भी यह डेट हुए है इनका कहना है जब तक अपने अधिकार की लड़ाई जीत नहीं लूंगा तब तक यहां से हटूंगा नहीं चाहे जान चली जाए..
जब पत्रकार अभिनव पांडे ने पूछा कि आपके मम्मी पापा आपकी फिक्र नहीं करते है तो इन्होंने भावुक जवाब देते हुए कहा कि हमारे मम्मी पापा आय हुए थे हमने उनको दोस्त के रूम पर भेज दिया है।
अगर यही लवकुश प्रजापति के बजाय लवकुश यादव होते तो एक बार सोचते क��� यह अखिलेश यादव जी की वजह से यहां से आया होगा..
लेकिन जिस हौसले के साथ लवकुश प्रजापति बोल रहा है इससे तो यही लगता है कि भाजपा की खतरे की घंटी बज चुकी है अब उसको कोई नहीं बचा सकता है आने वाले चुनाव में..
संसद में विपक्ष को बोलने नहीं दिया जाता, मीडिया विपक्ष को भाजपा के इशारे पर बदनाम करती है
तो आखिर विपक्ष बोले तो कहां? जनता की बात किस से कही जाए? कौन सुन रहा है?
भाजपा की सरकार तो अंधी बहरी है और सरकार ने विपक्ष के बोलने पर पाबंदी लगा रखी है, इसीलिए विपक्ष के लोग, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तथा पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी ने मिलकर सा��सदों के साथ शांतिपूर्ण तरीके से अपना धरना प्रदर्शन कर रहे थे, यह भी इस सरकार से बर्दाश्त नहीं हुआ और जबरन गिरफ्तार कर लिया गया
भारत में तानाशाही लागू कर दिया है भाजपा की सरकार ने, जहां बोलने की आजादी पर भी रोक लगाई जा रही है
प्रयागराज की सड़कों पर उमड़ा छात्��ों का जनसैलाब इस बात का संकेत है कि शिक्षा और युवाओं के भविष्य का सवाल अब किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहा।
जब तक छात्रों की आवाज़ सुनी नहीं जाएगी और उनकी चिंताओं का समाधान नहीं होगा, तब तक यह आंदोलन थमने वाला नहीं दिखता।