सिद्धांत जब सत्ता की सीढ़ी बन जाएँ: राघव चड्ढा प्रकरण और भारतीय लोकतंत्र की नैतिक परीक्षा
आम आदमी पार्टी के नाम वाली एक खास पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ भाजपा में विलय का ऐलान किया है। चड्ढा ने यह भी कहा है कि राज्यसभा में आप के दो-तिहाई सदस्य संवैधानिक प्रावधानों के तहत भाजपा में विलय कर रहे हैं। इस ख़बर की अंतिम कानूनी स्थिति राज्य��भा के सभापति और आगे की संवैधानिक प्रक्रिया से स्पष्ट होगी। हालांकि इसमें किसी तरह की दिक्कत होगी, इसकी संभावना नगण्य है; फिर भी राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न तत्काल और तीखा है।
भारतीय लोकतंत्र में दल-बदल कोई नया रोग नहीं है; यह वह पुराना बुखार है, जिसकी पहली कुख्यात तपिश हरियाणा के “आया राम, गया राम” प्रसंग से राष्ट्रीय शब्दकोश में प्रविष्ट हुई थी। 1967 में गया लाल के बार-बार दल ��दलने से निकला यह मुहावरा बाद में भारतीय राजनीति की आत्मा पर चिपका हुआ एक पीला दाग बन गया।
दरअसल, गया लाल 1967 में हरियाणा के हसनपुर (अब होडल) विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित एक निर्दलीय विधायक थे, जिन्होंने 15 दिनों के भीतर तीन बार पार्टी बदली थी। उन्होंने कांग्रेस से संयुक्त मोर्चा, फिर वापस कांग्रेस और पुनः संयुक्त मोर्चा में शामिल होकर 9 घंटे में तीन बार दलबदल किया। इस घटना के बाद ही भारतीय रा��नीति में "आया राम, गया राम" जुमला मशहूर हुआ था।
यह कोई हैरानी नहीं है कि गयाराम की राह पर आज राघव चड्ढा चल पड़े हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इत्ता है कि तब दल-बदल में ढिठाई अधिक थी, आज उसकी भाषा में संवैधानिक चमक, नैतिक तर्क और “जनहित” की मुलायम मखमली चादर डाल दी जाती है। गयाराम की तुलना में राघव चड्ढ़ा का चेहरा बहुत सौम्य और सम्माेहक प्रतीत हो��ा है। लेकिन फ़र्क ये है कि गयाराम एकदम गत्ते जैसे नेता थे और राघव चड्ढा एक रीसाइकल्ड प्लास्टिकनुमा।
भारतीय संविधान में दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून ऐसे ही राजनीतिक चरित्र-स्खलन को रोकने के लिए 1985 में संविधान में लाई गई थी। लेकिन उसी कानून में यह रास्ता भी है कि यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय के पक्ष में हों तो वे अयोग्यता से बच सकते हैं।
यही वह जगह है, जहाँ कानू��� और नैतिकता दो अलग-अलग कमरों में खड़े दिखाई देते हैं। कानून कह सकता है दरवाज़ा खुला है; लेकिन लोकतंत्र पूछता है, आप इस दरवाज़े से आए हैं या रात के अँधेरे में जनादेश की पीठ पर पाँव रखकर निकले हैं?
राघव चड्ढा का मामला इसलिए भी अधिक प्रतीकात्मक है कि वे आम आदमी पार्टी के उस युवा, शहरी, शिक्षित, चमकदार चेहरे में गिने जाते थे, जिसके माध्यम से पार्टी ने अपने को पुराने दलों की धूल, दलाली और दरबारीपन से अलग बताया था। आप का जन्म ही इस दावे के साथ हुआ था कि राजनीति को “व्यवस्था परिवर्तन” की देह मिलेगी यानी स्वच्छ, बेचैन, पसीने से भरी, सड़क की धूप में तपती हुई; वह पुरानी सत्ता की ठंडी संगमरमरी देह नहीं होगी। ऐसे में यदि वही नेता उस दल में चले जाएँ, जिसके विरुद्ध वर्षों तक वैचारिक और चुनावी युद्ध लड़ा गया तो यह केवल एक सांसद का स्थानांतरण नहीं रहता; यह वचन की ���्वचा पर खिंचती हुई वह लंबी खरोंच बन जाता है, जिसे जनता बहुत देर तक महसूस करती है।
लेकिन यह उसी दिन तय हो गया था कि जब अरविंद केजरीवाल ने इंसान का इंसान से हो भाईचारा गया और योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को गीत की अनुगूंज ख़त्म होते-होते निकाल बाहर किया। भारतीय राजनीति में जब भी कोई नेता प्रेम का गीत गाता है तो तय होता है कि ��ुछ टूटने वाला है, कोई वीरता की बात करता है तो तय होता है कि इसने ज़रूर कहीं लीद की है और जब कोई विकास की बात करता है तो तय होता कि वह कुछ विनाशकारी करके आया है और जब कोई मुहब्बत की बात करता है तो तय है कि कहीं न कहीं गहरी घृणा बेची जा रही है।
यह भी सच है कि किसी नेता को अपनी पार्टी से असहमति रखने का अधिकार है। कोई भी दल पवित्र गाय नहीं; कोई भी नेतृत्व त्रुटिहीन नहीं; कोई भी संगठन समय के साथ अपने आरंभि��� वादों से भटक सकता है। राघव चड्ढा या उनके साथियों को यदि सचमुच लगता है कि आम आदमी पार्टी अपने मूल्यों से दूर चली गई है तो उन्हें यह कहने का लोकतांत्रिक अधिकार है।
रिपोर्टों में यह भी आया है कि आप ने कुछ सप्ताह पहले चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता पद से हटाया था और पार्टी कोटे से बोलने का अवसर न देने की बात भी सामने आई थी। इसलिए इस प्रकरण को केवल एकतरफा नैतिक कोड़े से नहीं समझा जा सकता। दलों के भी���र लोकतंत्र की कमी, नेतृत्व-केंद्रित निर्णय, असहमति के लिए कम जगह आदि सब भी भारतीय राजनीति की महाबीमारियाँ हैं।
लेकिन असहमति का सबसे उजला रास्ता दल-बदल नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही है। यदि कोई नेता कहता है कि उसकी पार्टी भ्रष्ट, समझौतापरस्त या मूल्यों से विमुख हो गई है तो उसे पहले जनता के सामने दस्तावेज़ रखने चाहिए, अपने तर्कों को खोलना चाहिए, अपने पद से त्यागपत्र देकर नैतिक जनादेश माँगना चाहिए। राज्यसभा सदस्य भले सीधे जनता से नहीं चुने जाते, पर वे हव��� से भी नहीं आते; वे विधायकों के माध्यम से उस राजनीतिक विश्वास की प्रतिनिधि कुर्सी पर बैठते हैं, जिसे किसी पार्टी, कार्यक्रम और मतदाता-समूह ने निर्मित किया होता है। उस कुर्सी पर बैठकर प्रतिद्वंद्वी दल में चले जाना वैसा ही है जैसे किसी ने जनता से दीपक माँगा हो और फिर उसी लौ से दूसरे दरबार की आरती उतार दी हो।
भाजपा के लिए भी यह प्रसंग केवल “बड़ा राजनीतिक झटका” या “सफल रणनीति” नहीं होना चाहिए। ल���कतंत्र में यदि हर विचार, हर असहमति, हर टूटन अंततः स��्ता के विशाल पेट में समा जाए तो राजनीति बहुदलीय नहीं रहती; वह एक भूखी नदी बन जाती है जो किनारों को भी पानी समझकर निगलने लगती है। किसी भी सत्ताधारी दल को यह समझना चाहिए कि विपक्ष का क्षरण लोकतंत्र की विजय नहीं, लोकतंत्र की साँस का छोटा होना है। विपक्ष अगर कमजोर है तो सरकार की जवाबदेही भी कमजोर होती है; और जवाबदेही कमजोर हो जाए तो सत्ता का स्पर्श जनसेवा का नहीं, स्वामित्व का हो जाता है।
इस पूरे प���रसंग में आम आदमी पार्टी के लिए भी आत्मावलोकन की घड़ी है। दल-बदल करने वालों को अवसरवादी कह देना आसान है, पर यह पूछना कठिन है कि पार्टी के भीतर ऐसी दरारें क्यों बनीं, संवाद क्यों टूटा, संस्थागत लोकतंत्र कितना बचा, और क्या वह सचमुच अपने आरंभिक आदर्शों—पारदर्शिता, लोकपाल, स्वराज, भ्रष्टाचार-विरोध, आमजन की राजनीति—की लौ को बचा पाई? कोई भी पार्टी केवल विरोधियों की साजिश से नहीं टूटती; वह भीतर की बंद खिड़कियों, तिक्त चुप्पियों और नेतृत्व के अहंकार से भी झरती ��ै।
फिर भी, अंतिम नैतिक प्रश्न वही है: क्या राजनीति केवल करियर है, या वचन भी है? क्या चुनावी घोषणापत्र केवल कागज़ है या जनता से किया गया स्पर्श-संविदा? लोकतंत्र की देह काग़ज़ी नहीं होती; उसमें स्मृति की नसें होती हैं। मतदाता याद रखता है कि किसने किसके खिलाफ वोट माँगा था, किसने किसे “भ्रष्ट” कहा था, किसने किस व्यवस्था को बदलने की शपथ ली थी और फिर किसने उसी व्यवस्था की गोद में अपना सिर रख दिया।
भारतीय राजनीति को आज ऐसे नेताओं की ज़रूरत है जो पार्टी बदलने से पहले जनता के सामने खड़े होकर कह सकें, “मैंने जो वादा किया था, उससे क्यों हट रहा हूँ; मैंने जिस दल से जनादेश पाया, उसे क्यों छोड़ रहा हूँ; और मैं अपनी कुर्सी जनता को लौटाकर फिर से क्यों नहीं पूछता कि क्या वह मुझे इस नए रास्ते पर भेजना चाहती है?” यही लोकतंत्र की शालीनता है। यही संवैधानिकता की आत्मा है।
वरना संविधान की धाराओं के भीतर से गुजरता हुआ दल-बदल भी कभी-कभी नैतिक पराजय का जुलूस ��गता है—कानूनी रूप से व्यवस्थित, कैमरों से प्रकाशित, मुस्कानों से सुशोभित, पर भीतर से सूना। राजनीति में सिद्धांत यदि केवल सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी बन जाएँ तो जनता अंततः यह समझ जाती है कि उसके नाम पर बोए गए बीज किसी और बाग़ में फूल रहे हैं। और तब लोकतंत्र की मिट्टी, जिसे हर चुनाव में उम्मीद से सींचा जाता है, धीरे-धीरे संदेह की कड़ी पपड़ी में बदलने लगती है। राघव चड्ढा प्रकरण का असली अर्थ यही है: य��� एक दल का संकट नहीं, भारतीय राजनीति की वचनबद्धता की परीक्षा है।@raghav_chadha #RaghavChadha @AamAadmiParty #राघव_चड़्ढा #आमआदमीपार्टी
भुजिया किंग शिवरतन अग्रवाल की कहानी : भुजिया को जिन्होंने क���यले की भट्ठियों से निकालकर बिजली की भट्ठियों और बीकानेर के लोकल मार्केट से 50 देशों तक पहुंचाया
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कार्तिकेय मिश्र (GEN),
श्याम सुंदर ज्यानी (OBC),
नर्मदा इंदौरिया (GEN),
सुरे�� कुमार वर्मा (SC)
अन्य सेवाओं से IAS प्रमोशन के लिए UPSC द्वारा मेरिट सूची में शामिल ये चार ��धिकारी लगभग 90 दिन बाद भी राज्य सरकार के निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं।सूत्र बताते हैं कि UPSC ने कई बार रिमाइंडर भेजे, लेकिन सरकार फाइल आगे बढ़ाने में असमर्थ या अनिच्छुक दिख रही है, जबकि पिछली बार सरकार ने सिर्फ़ 3 दिन में फाइल क्लियर कर UPSC को भेज दी थी।
जानकार मौजूदा देरी को जातीय समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं, क्योंकि पिछली बार चारों प्रोमोटेड उम्मीदवार General Category से थे, जबकि इस बार सूची में OBC और SC वर्ग के अधिकारी भी शामिल हैं।
आज एक अखबार ने आईपीएस अधिकारियों की संपत्ति की खबर उनकी ओर से दिए गए ब्यौरे के आधार पर प्रकाशित की है.एक दो अधिका��ी ऐसे बताए गए हैं जिनके नाम कोई संपत्ति नहीं है जबकि सर्व विदित है कि एक अधिकारी ने तो उदयपुर-पाली राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट हजारों बीघा बेनामी संपत्ति खरीद रखी है.
यह उदयपुर के किसान नारायण सिंह के जज्बे की कहानी है कि उन्होंने चीन व अमेरिका देशों की उपज मानी जाने वाली स्ट्रॉबेरी की खेती के सपने को राजस्थान में साकार कर डाला. इंडिया टुडे हिंदी चैनल पर सिंह की सफलता की कहानी देखिए.स्टोरी कमेंट बॉक्स में पढ़ सकते हैं.
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