1. सपा, कांग्रेस व अन्य विरोधी पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा बी.एस.पी. का शुरु से ही चला आ रहा नीला रंग अब यह इनके गले का गमछा व कपड़े पहनने से तथा स्टेज आदि में भी नीला कपड़ा इस्तेमाल करने से इनकी सर्वसमाज में से ख़ासकर ग़रीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़े व अन्य उपेक्षित वर्गों के प्रति वर्षों से चली आ रही इनकी जातिवादी, संकीर्ण, सामन्तवादी एवं प���ँजीवादी सोच नहीं बदल सकती है तथा ना ही ये लोग दिल से अम्बेडकरवादी होने एवं कहलाने वाले हैं। इसीलिये ’बहुजन समाज’ के वास्तविक हित व कल्याण के प्रति पहले वे अपना दिल व दिमाग़ तो पाक-साफ करें।
2. वैसे भी ये लोग इन वर्गों के मामले में आए दिन गिरगिट की तरह ही रंग बदलते रहते हैं अर्थात् ये कहते कुछ हैं ��र करते उसके ठीक विपरीत हैं। ख़ासकर इनके सपा के PDA के मामले में तो इनकी सोच, चाल, चरित्र व चेहरा आदि हमेशा दोग़ला व बईमान ही रहा है, जिसके अनेकों उदाहरण हैं, ये सभी जानते हैं। इसलिए इन वर्गों की एकमात्र हितैषी व अम्बेडकरवादी पार्टी केवल बी.एस.पी. ही है, जो सर्वविदित है।
3. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अन्य पार्टियों की तरह बी.एस.पी. के जो भी लोग पार्टी में अनुशासनहीनता आदि के कारण समय-समय पर निष्कासित कर दिये जाते हैं तो वे अधिकतर इन्हीं सब कारणों से अब तक कई पार्टी बदल चुके हैं, जो किसी से छिपा नहीं है। इसी से ही अन्दाज़ा लगा लेना चाहिये कि ये लोग पूरे स्वार्थी व अवसरवादी हैं और वे किसी भी पार्टी के हित में नहीं हो सकते हैं।
4. इतना ही नहीं बल्कि जिनको पार्टी से निकाल दिया जाता है तो उनमें से कुछ लोग दूसरी पार्टियों के हाथों में खेलकर छोटी-छोटी पार्टियाँ व संगठन आदि भी बना लेते हैं, जिनसे ’बहुजन समाज’ का सामूहिक हित नहीं हो सकता है,
5. हालांकि ऐसी पार्टियाँ बिना किसी गठबन्धन के भी चुनाव नहीं लड़ सकती हैं तथा किसी भी पार्टी की सरकार बनने पर सरकार में शामिल हुये बिना भी नहीं रह सकती हैं, जो पार्टी से निकाले हुये लोगों को अक्सर अपनी पार्टी में लेने की बात करते हैं या उन्हें पार्टी बनाने की भी सलाह देते हैं, तो वे पहले अपने गिरेबान में भी झ���ँककर ज़रूर देख लें।
6. ख़ासकर कांग्रेस पार्टी, जिन निकाले हुये लोगों को अपनी पार्टी में लेने की बात कर रही है, तो ऐसी पार्टी में जो डूबते जहाज़ की तरह है, उसमें भला कौन शामिल होकर अपने भविष्य को अन्धकार में डालेगा, जबकि ख़ासकर इस पार्टी से दूरी बनाने के लिये बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर जी ने अपने जीते-जी बहुजन समाज के लोगों को अगाह (चेताया) भी किया था। इसलिये यह सब वर्तमान हालात में, पार्टी व मूवमेन्ट के हित में बी.एस.पी. के लोगों को जानना व समझना भी बहुत ज़रूरी है तो यह उचित होगा।
7. यहां यह भी बताना बहुत जरूरी है ��ि जिस दिन बी.एस.पी. ने श्री अशोक सिद्धार्थ को राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दी थी तो उस दिन इन्होंने इनके उपर काफी दबाव पड़ने के बावजूद भी अपने संन्यास लेने की घोषणा तब तत्काल नहीं की थी।
8. क्योंकि उस दिन यह पूरी रातभर इसे रुकवाने के लिए क़िस्म-क़िस्म के हथकण्डे इस्तेमाल करते रहे जिसमें कामयाबी नहीं मिलने पर, फिर मजबूरी में, अगले दिन यह सोच कर इनको लगभग प्रातः 6ः30 बजे अपने संन्यास की काफी किन��तु-परन्तु वाली घोषणा करनी पड़ी है, कि कहीं ज्यादा देरी होने पर और भी बड़ा नुकसान ना हो जाये, जिसके बारे में सही समय आने पर पार्टी के लोगों को और भी बहुत कुछ ज़रूर बताया जायेगा।
"बहन मायावती जी अपने वायदे से मुकर गईं।"
अभी कल बहन जी ने कहा था कि अगर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास ले लेते हैं तो आकाश आनंद को BSP में पुनः पद के साथ काम करने का रास्ता साफ हो जाएगा।
आज सुबह अशोक सिद्धार्थ जी ने राजनीति से संन्यास ले लिया। उन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और पद तक का त्याग कर दिय���, लेकिन उनके संन्यास के बाद बहन जी अपने ही कहे हुए वादे से पीछे हटती दिखाई दे रही हैं। अब उनका तर्क है कि अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद की नीयत में अभी भी खोट है।
इसके लिए आपने दो तर्क दिए हैं;
पहला, अशोक सिद्धार्थ ने कल के पोस्ट के तुरंत बाद राजनीति से संन्यास क्यों नहीं लिया? चूंकि उन्होंने आज सुबह संन्यास लिया, इसलिए कुछ घंटों की देरी को उनकी नीयत में खोट और राजनीतिक अभिलाषा बरकरार रहने का प्��माण माना गया।
लेकिन क्या किसी व्यक्ति को अपनी जिंदगी के इतने बड़े फैसले पर कुछ घंटे सोचने और शांत होकर परिस्थितियों को समझने का भी अधिकार नहीं है? राजनीति से संन्यास लेना कोई सामान्य घोषणा नहीं है। वर्षों की राजनीतिक यात्रा को एक झटके में समाप्त करने का फैसला है। इसके बावजूद उन्होंने कुछ ही घंटों में संन्यास ले लिया और कहा कि संन्यास तो बहुत छोटी चीज है, बहन जी के लिए तो जान भी हाजिर है।
दूसरा, आकाश आनंद ने बहन जी के कल के पोस्ट को रीट्वीट नहीं किया। इसलिए यह निष्कर्ष निकाल लिया गया कि उन्हें पार्टी और मूवमेंट से अधिक अपने रिश्तों की चिंता है।
बहन जी, आप देश की इतनी बड़ी नेता हैं। फिर भी इतना हल्का और बचकाना तर्क? क्या किसी व्यक्ति की पार्टी के प्रति निष्ठा अब किसी पोस्ट को रीट्वीट करने से तय होगी? सिर्फ आपका पोस्ट रीट्वीट न करने के कारण आपने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। हद होती है। कोई व्यक्ति दुख में हो सकता है, आहत हो सकता है, चुप रह सकता है। हर चुप्पी विद्रोह अथवा साजिश नहीं होती है।
बहन जी, शा���द आपको अंदाजा भी नहीं है कि आप जिस तरह बार-बार आकाश आनंद को सार्वजनिक रूप से जलील कर रही हैं, वह Human Dignity के खिलाफ है। कोई भी व्यक्ति लगातार ऐसी परिस्थितियों में मानसिक रूप से टूट सकता है। आप स्वयं कल्पना कीजिए कि आकाश आनंद कितनी वेदना, पीड़ा और घुटन में जी रहे होंगे। ऐसे समय में उनसे ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सक्रिय रहने की उम्मीद करना ही अपने आप में असंवेदनशील है।
मुझे दुख इस बात का है कि करोड़ों बहुजनों की आद��्श नेता होने के बावजूद इतनी गंभीर परिस्थिति में इतनी छोटी-छोटी बातों पर आकाश आनंद को जलील कर रही हैं।
असली खेल धूर्त पदाधिकारियों का है, जो वर्षों से बहन जी को गुमराह करके पार्टी को खोखला करने में लगे हुए हैं। बहन जी को यह समझना ही होगा कि जो पदाधिकारी हर बात को अपने हिसाब से छानकर नेतृत्व तक पहुंचाते हैं, जो अपने हित के मुताबिक दूसरों को अच्छा-बुरा साबित करते हैं, दरअसल वही लोग पार्टी और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच दीवार बने हुए हैं। और संगठन को सबसे ज्यादा खतरा इन्हीं लोगों से है।
अपने आसपास के उन धूर्त पदाधिकारियों को पहचानिए, जो अपनी कुर्सी, प्रभाव और अकूत धन की लूट को बचाए रखने के लिए जानबूझकर पार्टी को पारिवारिक कलह में धकेल दिए हैं। अगर कोई व्यक्ति पार्टी में रहकर संगठन को मजबूत करने के बजाय आंतरिक कलह से अपना प्रभाव मजबूत कर रहा है, तो वह पार्टी का हितैषी नहीं हो सकता।
करो���़ों बहुजनों की पहुंच बहन जी तक डायरेक्ट होनी चाहिए, लेकिन अफसोस कि आज वह धूर्त पदाधिकारियों के चंगुल में फंस चुकी हैं। ये वही लोग हैं, जो हर उस मिशनरी की बात को तोड़-मरोड़कर बहन जी तक पहुंचाते हैं, जो पार्टी में कुछ अच्छा करने और मूवमेंट को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है। जब ये लोग भूखे गिद्धों की तरह आकाश आनंद का राजनीतिक करियर नोचने पर आमादा हैं, तो सोचिए हम जैसे सामान्य कार्यकर्ताओं की बिसात ही क्या है।
इन मक्कार पदाधिकारियों की कुर्सी बचाना आसान है, लेकिन एक पूरी पीढ़ी के राजनीतिक भविष्य को नुकसान ��हुंचने के बाद उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
बहन जी, आपके आसपास के पदाधिकारी आते-जाते रहेंगे, लेकिन यह आंदोलन और करोड़ों बहुजनों की उम्मीदें स्थायी हैं। इसलिए किसी भी पदाधिकारी को आपके और बहुजन समाज के बीच दीवार मत बनने दीजिए। जिस दिन आम मिशनरी अपनी बात सीधे आप तक पहुंचा सकेगा और आप बिना किसी फिल्टर के जमीनी सच्चाई सुन पाएंगी, उसी दिन आपको पता चलेगा कि ये धूर्त एवं मक्कार पदाधिकारी आपको क��या बता रहे थे और जमीन पर वास्तव में क्या हो रहा है। इस चंगुल से बाहर निकलना अब सिर्फ आपकी मजबूरी ही नहीं, बल्कि बहुजन आंदोलन के भविष्य की जरूरत भी है। आपको इस चंगुल से बाहर निकलना ही होगा।
आपका शुभचिंतक: सूरज कुमार बौद्ध@Mayawati @AnandAkash_BSP
1. आज श्री अशोक सिद्धार्थ द्वारा राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा अति-देर से उठाया गया यह सही क़दम है।
2. वैसे लोगों का यही कहना है कि अगर यह फैसला वे काफी पहले ही ले लेते तो बी.एस.पी., बहुजन समाज व बहुजन मूवमेन्ट तथा उनके दामाद श्री आकाश आनन्द को भी लगातार विपरीत परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता और ना ही मुझे विधानसभा आमचुनाव एवं ख़ासकर यूपी में पाँचवीं बार सरकार बनाने की ज़बरदस्त तैयारियों के बीच, पार्टी व मूवमेन्ट के व्यापक हित के मद्देनज़र इनके बारे में कई बार कड़े फैसले लेने आदि की ज़रूरत पड़त���।
3. वैसे यह भी सर्वविदित है कि बहुजन समाज पार्टी की अम्बेडकरवादी राजनीति की परम्परा, परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के पदचिन्हों पर चलने वाली ज़बरदस्त त्याग, तपस्या, संघर्ष व कुर्बानी आदि के साथ-साथ सबसे बढ़कर निजी व पारिवारिक स्वार्थ से दूर रहने की विशिष्ठ पहचान की है, जिसे मान्यवर श्री कांशीराम जी की तरह ही मैं भी समर्पित हूँ और जिससे पार्टी के सभी लोगों को ज़रूर सबक़ सीखकर बी.एस.पी. में आगे बढ़ाने के लिये निजी व पारिवारिक स्वार्थ एवं पद आदि की लालसा से ऊपर उठना चाहिये तभी फिर यहाँ सदियों से शोषित, पीड़ित, उपेक्षित व तिरस्कृत ’बहुजन समाज’ ’शासक वर्ग’ बन पायेगा और इस क्रम में हमेशा याद रहे कि जितना महान लक्ष्य, उतनी ही बड़ी कुर्बानी की भी ज़रूरत होती है।
4. कुल मिलाकर, श्र�� अशोक सिद्धार्थ का राजनीति से संन्यास लेने का फैसला ’देर आये दुरुस्त आये’ की कहावत की तरह ही यह अच्छी बात है।
5. किन्तु श्री अशोक सिद्धार्थ को, अपने दामाद श्री आकाश आनन्द के उज्जवल भविष्य के साथ ही बी.एस.पी. पार्टी व इसके अम्बेडकरवादी बहुजन मूवमेन्ट के व्यापक हित के प्रति थोड़ी भी सही चिन्ता होती, (जो कि उनमें स्वाभाविक तौर पर होनी ही चाहिये), तो वे बिना देरी किये कल फ़ौरन ही राजनीति से संन्यास ���ेने की घोषणा कर देते और जिससे श्री आकाश आनन्द की पार्टी व मूवमेन्ट के प्रति सक्रियता काफी हद तक सुनिश्चित हो सकती थी, किन्तु ऐसा कुछ नहीं होना यह साबित करता है कि श्री अशोक सिद्धार्थ की नीयत में खोट व अभिलाषा कम नहीं हुई है बल्कि अभी तक भी पूरी तरह से बरक़रार है।
6. इतना ही नहीं बल्कि श्री आकाश आनन्द द्वारा भी अपने कैरियर से अधिक अपने ससुर श्री अशोक सिद्धार्थ के प्रति इस हद तक लगाव क़ायम है कि उन्होंने बी.एस.पी प्रमुख के सोशल मीडिया एकाउण्ट ’एक्स’ पर तत्सम्बंधी पोस्ट को रिपोस्ट करना भी उचित नहीं समझा, हालाँकि यह पोस्ट उनके ही सकारातमक व भलाई के लिये था।
7. जबकि इससे पहले वे बी.एस.पी. प्रमुख के ’एक्स’ पर पोस्ट क��� रिपोस्ट करके अपनी वफादारी का सबूत देने का प्रयास करते रहे हैं। इससे भी यही लगता है कि श्री अशोक सिद्धार्थ व श्री आकाश आनन्द दोनों को पार्टी व मूवमेन्ट की सफलता में कम व अपने निजी व पारिवारिक स्वार्थ का ज़्यादा मोह है, जबकि बी.एस.पी. ने ही इन दोनों को व अन्य अनेकों लोगों को भी फर्श (ज़मीन) से अर्श (आसमान) की बुलन्दी पर पहुँचाया है और जिसके लिये उन सभी लोगों द्वारा बी.एस.पी. व उसके नेतृत्व का जितना भी वे लोग अहसान मानें व शुक्रगुज़ार हों, वह कम ही होगा, ऐसा सभी लोगों का मानना है।
8. ऐसे हालात में श्री आकाश आनन्द को पार्टी व मूवमेन्ट के वास्तविक हित तथा इससे जुड़े अपने कैरियर की भी परवाह कम तथा रिश्ते-नातों आदि का मोह ज़्यादा ��ै तो ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि श्री आकाश आनन्द डबल माइण्ड होकर फिर बी.एस.पी. पार्टी व मूवमेन्ट का भला कैसे कर सकते हैं?
9. इसीलिये पार्टी के लोगों को यही बेहतर लगता है कि उन्हें पहले दिनांक 3 सितम्बर 2026 को जिस प्रकार से पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक के अति-महत्वपूर्ण पद की सभी अहम ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया था, उसी प्रकार अब उन्हें पार्टी में भी आज से पूरी तरह से फ्री (आज़ाद) कर दिया जाये। अतः श्री आकाश आनन्द पार्टी में अब स्वतंत्र रहना चाहते हैं तो वे स्वतंत्र हैं अर्थात ऐेस में अब इनको पार्टी से पूरेतौर से मुक्त कर दिया गया है।
10. अन्त में यही कहना है कि बी.एस.पी के सभी लोगों को, विरोधियों के साम, दाम, दण्ड, भेद आदि सभी प्रकार के हथकण्डों का डट कर सामना करते हुये ख़ासकर यूपी में फिर से पूर्ण बहमत की अपनी ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की ज़बरदस्त क़ानून-व्यवस्था व बेहतरीन ���िकास वाली आयरन हुकूमत बनाने के संघर्ष में, पूरे जी-जान से अर्थात पूरे तन, मन, धन की लगन से लगे रहें, बस यही लक्ष्य सर्वोपरि है।
परम आदरणीय बहन जी सादर चरण स्पर्श!
माननीया बहन जी आपको अवगत कराना है कि, मेरे लिए आपका आदेश दुनिया की किसी भी चीज़ से बढ़ कर है। आपके आदेश के आगे मेरे रिश्ते नाते, परिवार सभी बेहद छोटे हैं। आपके मार्गदर्शन में, मैं बीते पैंतीस वर्षों से बीएसपी ��र मान्यवार साहेब श्री कांशीराम जी और बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर के मिशन के लिए समर्पित रहा हूं। आपने आज तक जो भी जिम्मेदारी दी है उसे अपने पूरे सामर्थ्य के साथ निभाने की कोशिश की है। आप मेरी राजनैतिक गुरू हैं, मेरी बड़ी बहन हैं, आपने मुझ जैसे अदने से व्यक्ति को क्या कुछ नहीं दिया, आपकी वजह से ही मैं विधान परिषद और राज���य सभा तक का सदस्य रहा हूँ । आपने मुझे इस लायक समझा कि आपने मुझ जैसे मामूली से कार्यकर्ता को अपने परिवार का सदस्य बनाया। ये आपका ऋण है, जो मैं इस जीवन में चुका भी नहीं सकता।
परमपूज्य आदरणीय बहन जी, मेरे आराध्य तथागत भगवान गौतम बुद्ध और मेरे राजनीतिक आदर्श मान्यवर साहेब श्री कांशीराम जी की क़सम खाता हूँ , कि मैंने कभी भी पार्टी के हित के खिलाफ कोई काम नहीं किया और आपके खिलाफ कुछ भी करने का तो मैं सपने में भी सोच नहीं सकता हूं। मेरा और मेरे परिवार का ये पूरा जीवन आपका ऋणी है। आदरणीय बहन जी, आपकी एक-एक नसीहत और आदेश मेरे लिए अंतिम शब्द हैं।
आदरणीय बहन जी, माननीय आकाश जी को सलाह देना तो दूर बीते कई महीनों से मेरी उनसे मुलाकात भी कुछ एक अवसर पर तब हुई जब उनके कार्यक्रम उन राज्यों में लगे जिनकी जिम्मेदारी आपने मुझे दी हुई थी।
मान० बहन जी हमारी पार्टी के ही कुछ साथी मुझे आपसे मिले सम्मान के कारण मुझ पर ये आरोप लगाते हैं कि मैं पार्टी पर कब्जा करना चाहता हूं, मैं माननीय आकाश आनंद जी को गुमराह करने की कोशिश कर रहा हूं...इसमें लेशमात्र भी सच्चायी नहीं है! आदरणीय बहन जी मैं आपसे विनम्र निवेदन के साथ कहा रहा हूं कि ये मेरे राजनैतिक विरोधियों की साजिश है ,जो पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं, जिसकी सच्चाई एक न एक दिन आपके सामने ज़रूर आ जाएगी।
आदरणीय बहन जी, मेरी आपसे हाथ जोड़ कर विनती है कि मेरे सन्यास लेने को आप आकाश जी की वापसी से मत जोड़िए, माननीय आकाश आनंद जी मेरे दामाद से पहले आपके भतीजे हैं, और आदरणी��� आनंद भाईसाहब के बेटे हैं। उनके अंदर आपका खून बहता है, उन्होने जीवन के दो दशक आपकी छत्र छाया और देख-रेख में बिताए हैं, मेरे जैसा मामूली सा कार्यकर्ता भला उनको क्या ही गुमराह कर पाएगा। उनका अच्छा-बुरा आप किसी और से ज्यादा बेहतर समझती हैं, उनको वापस जिम्मेदारी देना या ना देना ये आपका फैसला है !🙏 इसे मेरे सन्यास लेने से जोड़ कर आप मुझ जैसे मामूली कार्यकर्ता को उसकी हैसियत से ज्यादा महत्त्व दे रह��� हैं।
आदरणीय बहन जी, आप खुद में त्याग और दया की मूर्ती हैं, जब बात समाज के हित की आई तो आपने मुख्य मंत्री की कुर्सी और राज्यसभा के सदस्य पद को भी ठोकर मार दी, आ��रणीय बहन जी, आप हमारी मार्गदर्शक ही नही हमारी आदर्श भी हैं, और अगर आज आपको लगता है कि मेरे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में रहने से हमारे संतो , गुरुओं और महापुर्षों के बनाए हुए बहुजन मिशन को नुकसान पहुंच रहा है तो मैं अभी इसी वक्त राजनैतिक और सामाजिक जीवन से सन्यास ले रहा हूं। आदरणीय बहन जी, मेरा ये जीवन आपका ऋणी है, ऐसे में सन्यास तो बहुत छोटी चीज है आपके लिए अगर मुझे कभी अपनी जान भी देनी पड़े तो वो ��ी मेरे लिए फक्र की बात होगी।
ससम्मान , जय भीम!! जय भारत!!!
जय बहुजन समाज!
आपका कार्य कर्ता
अशोक सिद्धार्थ
नोट- देरी के लिए क्षमा प्रार्थी!!!
@MP_SiddharthBSP पूरा पोस्ट पढ़ते-पढ़ते आंसू आ रहें थे। आपने परम् आदरणीया बहनजी की बातों को मानकर , उनका स��्मान करके आपने ये बता दिया है कि सबसे पहले मिशन मूवमेंट व परम् आदरणीया बहनजी की कहीं हुई बात।
जय भीम जय भारत 💙 💐 🙏
1. जैसाकि सर्वविदित है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड व पंजाब में विधानसभा का आमचुनाव अब बहुत नज़दीक है और ये तीनों ही राज्य, परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के ’बहुजन समाज’ को ’शोषित से शासक वर्ग’ बनने हेतु उनके आत्म-सम्मान एवं स्वाभिमान के कारवाँ को आगे बढ़ाने के लिये बी.एस.पी. पार्टी व बहुजन मूवमेन्ट के लिये अति-महत्वूपर्ण ही नहीं बल्कि बहुत विशेष भी हैं, जिसको ध्यान में रखकर ही बी.एस.पी. के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ता, पदाधिकारी, पार्टी के समर्थक एवं शुभचिन्तक सभी लोग पूरे तन, मन, धन अर्थात हर प्रकार की कुर्बानी देकर पूरे जी-जान से यहाँ सत्ता प्राप्ति का अच्छा रिज़ल्ट लाने की मुहिम/मिशन में डटेे हुये हैं।
2. ऐसे समय में जबकि ख़ासकर विरोधी पार्टियों तथा जातिवादी तत्वों आदि से ’बहुजन समाज’, बी.एस.पी. पार्टी व ’बहुजन मूवमेन्ट’ को, बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के समय जैसा ही ख़ासकर आरक्षण आदि को लेकर कड़े चैलेन्जों का सामना है, देश की सर्वमान्य अम्बेडकरवादी पार्टी बी.एस.पी. को सर्वसमाज के सभी लोगों से सहयोग की अपील है और इस क्रम में ’बहुजन समाज’ के हर अंगों में से ख़ासकर दलित समाज के लोगों को निजी या पारिवारिक स्वार्थ में ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिये जो इसमें बाधा उत्पन्न करे और इतिहास उन्हें माफ ना कर पाये।
3. इसीलिये बी.एस.पी. की शीर्ष नेतृत्व इन बातों का ख़ास ध्यान देते हुये भूले-भटके हुये लोगों को उनके अचार-व्यवहार आदि को ध्यान में रखकर पार्टी में शामिल कर रहा है, और जो लोग इसकी राह में थोड़ा भी रुकावट बनने की कोशिश कर रहे हैं, उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई आदि भी की जा रही है, जिसका चर्चित उदाहरण हैं बी.एस.पी. के राज्यसभा सांसद भी रहे श्री अशोक सिद्धार्थ।
4. पार्टी ने इनको सुधरने का एक नहीं बल्कि कई बार मौक़ा दिया, लेकिन बी.एस.पी. के मिशन से अधिक इन्होंने अपने निजी व पारिवारिक स्वार्थ व महत्वकांक्षा आदि को ज़्यादा महत्व दिया, जिसका ख़ामियाज़ा इनके साथ-साथ इनके दामाद श्री आकाश आनन्द को भी भुगतना पड़ा है।
5. कुल मिलाकर इन्होंने अपने निजी स्वार्थ में श्री आकाश आनन्द व बी.एस.पी. मूवमेन्ट की भी कभी सही से परवाह नहीं की है, जबकि इसके लिये श्री अशोक सिद्धार्थ को औरों से कहीं अधिक बढ़चढ़ कर त्याग-तपस्या व कुर्बानी की मिसाल पार्टी व सामाज के सामने देनी चाहिये थी, किन्तु ऐसा ना होकर ठीक इसके उलटा ही होता रहा है।
6. ऐसे में बी.एस.पी. पार्टी व मूवमेन्ट के हित के साथ-साथ ख़ुद उनके परिवार एवं अपने दामाद श्री आकाश आनन्द के भविष्य को ध्यान में रखकर श्री अशोक सिद्धार्थ के पास अभी भी मौक़ा है कि वे अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को त्याग कर व निजी स्वार्थ आदि से ऊपर उठकर राजनीति से पूरी तरह से संन्यास ले लें। तब ऐसी स्थिति में श्री आकाश आनन्द का फ्री होकर पार्टी में काम करना संभव होगा और तभी फिर पार्टी उनको उनकी ज़िम्मेदारियाँ वापस देने पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी, ताकि वे पार्टी में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सकें, ऐसी पार्टी में आम राय है।
BSP धूर्त पदाधिकारियों की पार्टी नहीं है।
करोड़ों बहुजनों ने इसे अपने त्याग से खड़ा किया है लेकिन कुछ पदाधिकारी अकूत धन कमाने के मोह में बहन जी को गलत सूचनाएं देकर आकाश आनंद भाई को बाहर करके करोड़ों बहुजनों का भविष्य कुचल देना चाहते हैं।
इन निकम्मे लोगों का बहिष्कार होना चाहिए।
मैं आकाश आनंद भाई के साथ हूं।
राजनीति में जब कोई व्यक्ति मुश्किल दौर से गुजर रहा होता है, तब उसके साथ खड़ा होना सबसे कठिन होता है। लेकिन मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो किसी के अच्छे दिनों में उसके साथ खड़े रहें और बुरे दिनों में उससे किनारा कर लें।
मैं आकाश आनंद के साथ इसलिए हूँ, क्योंकि मैंने उनमें बहुजन समाज के लिए कुछ करने की बेचैनी देखी है। मैंने देखा है कि किस तरह उन्होंने युवाओं के बीच जाकर BSP की बात रखी, नई पीढ़ी से संवाद किया और यह बताने की कोशिश की कि मान्यवर कांशीराम एवं माननीया बहन जी का संघर्ष केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं, बल्कि आने ��ाली पीढ़ियों के भविष्य की लड़ाई भी है।
अगर उनसे कुछ गलती हुई भी है तो उन्हें समझाइए। अगर वह जल्दबाजी करते हैं तो उन्हें रोकिए। अगर उनमें कमी है तो उन्हें सिखाइए। लेकिन उन्हें बार-बार अपमानित करते हुए सार्वजनिक रूप से यह मत कहिए कि वह "इमैच्योर" हैं या कुछ कर ही नहीं सकते। जहां तक पब्लिक डोमेन में उपलब्ध बातों का सवाल है, मुझे आकाश आनंद बहुत ही परिपक्व, योग्य एवं बेबाक नेता लगते हैं। धूर्त पद��धिकारियों के बहकावे में आकर बहन जी द्वारा ससुर और ससुराल के बहाने पग-पग पर उनके पांव रोकना हरगिज जायज नहीं है।
कांशीराम साहब ने भी बहन जी को एक दिन में तैयार नहीं किया था। उन्होंने उन्हें अवसर दिया, जिम्मेदारी दी, समझाया और समय के साथ तराशा। बहन जी स्वयं इस बात की सबसे बड़ी मिसाल हैं कि एक युवा कार्यकर्ता को अगर सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो वह इतिहास बदल सकता है। इसलिए आकाश आनंद को भी सीखने और खुद को साब��त करने का अवसर मिलना चाहिए।
माननीया बहन जी को समझना होगा कि आज AI के इस दौर में युवाओं के सवाल अलग हैं, उनकी भाषा अलग है, उनके माध्यम अलग हैं और उनके सपने अलग हैं। अगर बहुजन आंदोलन को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है, तो उसके नेतृत्व को भी उस पीढ़ी से संवाद करना पड़ेगा। इसीलिए बहुजन आंदोलन को नई पीढ़ी चाहिए।
BSP को सिर्फ पुराने 15-20 धूर्त पदाधिकारियों की पार्टी बनाकर नहीं रखा जा सकता। इनमें से अधि��ांश पदाधिकारी धूर्त, स्वार्थी एवं बहन जी से मिलाने एवं टिकट दिलाने के नाम पर अकूत धन ऐंठने वाले हैं। ऐसे में पार्टी को हर उस युवा तक भी पहुंचना होगा, जो मोबाइल पर राजनीति देखता है, सोशल मीडिया पर बहस करता है और अपने भविष्य को लेकर सवाल पूछता है। आकाश आनंद ने इस दिशा में शानदार कोशिश की थी। वह इसमें कुछ हद तक सफल भी रहे।
आज अगर आकाश के साथ खड़े होने का मतलब यह है कि मैं अकेला दिखाई दूंगा, तो भी मुझ�� मंजूर है। क्योंकि राजनीति में समर्थन सिर्फ तब नहीं दिखना चाहिए, जब आपके नेता के पास पद हो, मंच हो और हजारों लोग उसके आसपास ��ड़े हों। असली समर्थन तब होता है, जब उसके पास कुछ भी न बचा हो और फिर भी आप कहें; "भाई आप संघर्ष करें, हम आपके साथ हैं।"
आज जब आकाश आनंद बार-बार मुश्किल परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, तब उनके साथ खड़ा होना और भी जरूरी है। अच्छे समय में किसी के साथ खड़े होने वाले बहुत लोग मिल जाते हैं, लेकिन जब वही व्यक्ति अपमान और अकेलेपन से गुजर रहा हो, तब उसके साथ खड़े होने वाले कम होते हैं। मैं उन कम लोगों में रहना पसंद करूंगा।
आकाश आनंद भाई, यह आपके लिए परीक्षा की घड़ी है। शांत रहना समस्या का समाधान नहीं है। पार्टी के धूर्त पदाधिकारियों ने बहन जी के इर्द-गिर्द जो मकड़जाल बना रखा है, आपको उसे तोड़ना ही होगा। आपको गिराया जा सकता है, रोका जा सकता है, आपकी जिम्मेदारी छीनी जा सकती है, लेकिन इसे अपनी राजनीतिक यात्रा का अंत हरगिज नहीं होने देना है।
भाई आप हिम्मत मत हारना। आपके हिस्से शुरू से ही संघर्ष आया है। आ��� का समय मुश्किल है, लेकिन इसे अपनी कहानी का अंत मत समझना। राजनीति लंबी यात्रा है। इसमें बहुत से उतार-चढ़ाव आते हैं। यह एक योद्धा की जिम्मेदारी है कि वह इस साजिश को भेदकर बाहर ��िकले।
इन मुश्किलों से टूटें नहीं, बल्कि इस पूरे अनुभव से और मजबूत होकर निकलें। अपने भीतर के विश्वास को मत खोएं। हम आपके साथ हैं.. किसी पद के लिए नहीं, किसी रिश्ते के लिए नहीं, किसी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं इस युवा में बहुजन आंदोलन को आगे बढ़ाने की संभावना देखता हूं।
आपका शुभचिंतक- सूरज कुमार बौद्ध
@Mayawati @AnandAkash_BSP
बहन जी, धूर्त पदाधिकारियों के चंगुल से बाहर निकलें!
आकाश आनंद को फिर से जिम्मेदारी से हटाए जाने की खबर से करोड़ो युवा आहत हैं। बहन जी द्वारा आकाश को बार-बार पार्टी से बाहर करना और सार्वजनिक रूप से 'इमैच्योर' बताकर जलील करना Human Dignity के खिलाफ है।
बहन जी, आपने 40 साल तक अपने शासन, प्रशासन और अनुशासन से समाज में जो सम्मान और पहचान बनाई है, आपके इन फैसलों से आपकी बहुत नकारात्मक छवि बन रही है। इतना तो कोई अपने दुश्मन को भी जलील नहीं करता। मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि आपका का यह फैसला BSP और बहुजन हितों के खिलाफ है।
यकीनन आपने बहुजन समाज के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया है। तमाम विरोध के बावजूद BSP को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। इसलिए हमें विश्वास है कि आप उपलब्ध जानकारी और अपने विवेक के आधार पर ही निर्णय लेती हैं। लेकिन अगर आप ही 'कान की कच्ची' हो जाएंगी, तो आसपास बैठे धूर्त लोग सूच��ाओं को तोड़-मरोड़कर पेश करके कुछ भी करवा सकते हैं। इन बेईमानों का क्या है? वे तो प्रभारी बनकर टिकट दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये लूटकर ��ले जाएंगे, लेकिन नुकसान किसका होगा? पार्टी का, आपका और पूरे बहुजन समाज का।
बसपा समर्थकों के मन में यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस युवा चेहरे ने वर्षों से निष्क्रिय पड़ी BSP में नई ऊर्जा पैदा की, उसी आकाश आनंद को बार-बार जिम्मेदारी से दूर क्यों किया जा रहा है? पिछले कुछ वर्षों में BSP को राजनीतिक नैरेटिव से बाहर समझा जाने लगा था, लेकिन आकाश आनंद के सक्रिय होने के बाद युवाओं में फिर से उम्मीद जगी।
उन्ह���ंने युवाओं से संवाद किया, बेबाकी से अपनी बात रखी और यह एहसास कराया कि बहुजन आंदोलन सिर्फ अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की लड़ाई भी है। इसलिए आकाश आनंद को सिर्फ एक पदाधिकारी या बहन जी के रिश्तेदार के रूप में नहीं, बल्कि उस युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में देखिए, जो बहुजन आंदोलन को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाना चाहता है।
आकाश आनंद कोई परिपूर्ण व्यक्ति नहीं हैं। उनसे भी गलतियां हो सकती हैं। युवा नेतृत्व से गलतियां होंगी तो उन्हें समझाया जा सकता है, सुधारा जा सकता है। लेकिन हर गलती का जवाब उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करके बाहर करना ही क्यों?
कांशीराम साहब ने भी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को तैयार किया था। बहन जी स्वयं उसी प्रक्रिया की सबसे बड़ी मिसाल हैं। साहब कांशीराम ने उन्हें तराशा, गलतियों पर समझाया और उन्हें बहुजनों के इतिहास की सबसे स्वाभिमानी नेताओं में स्थापित किया। अगर उस समय उन्हें भी सिर्फ उनकी गलतियों के आधार पर रोक दिया जाता, तो शायद बहुजन समाज की राजनीति आज जिस मुकाम पर है, वहां नहीं पहुंचती।
धूर्त पदाधिकारी आते-जाते रहेंगे, लेकिन आंदोलन और उसका विजन किसी व्यक्ति या पदाधिकारी से बड़ा होता है।
आज जरूरत है कि बहन जी धूर्त पदाधिकारियों के प्रभाव से बाहर निक���ें। उनके और आकाश आनंद के बीच कोई दीवार न हो। बहन जी तक कार्यकर्ताओं और जनता की वास्तविक आवाज सीधे पहुंचे। क्योंकि BSP का भविष्य सिर्फ वर्तमान पदाधिकारियों का सवाल नहीं है। यह उस पूरी बहुजन पीढ़ी का सवाल है, जो इस आंदोलन को आगे लेकर जाएगी।
मुझे सबसे ज्यादा चिंता आकाश आनंद को लेकर होती है। उन्होंने बहुजन आंदोलन को नई ऊर्जा देने का सपना तो देखा, लेकिन शुरू से ही अपने हर कदम पर धूर्त पदाधिकारियों की साजिशों से घिरे हुए हैं। उन्हें हर पग पर अपमान ही झेलना पड़ा है। न जाने उसके भीतर कितनी बातें होंगी, कितनी पीड़ा होगी लेकिन वह अपनी पीड़ा कहें किससे? कितनी बार वह खुद को समझाता होगा कि सब ठीक हो जाएगा। जिस उम्र में उसे संगठन को मजबूत ��रने, युवाओं को जोड़ने और अपनी राजनीतिक पहचान बनाने का अवसर मिलना चाहिए, उस उम्र में उसे बार-बार ससुर और ससुराल के बहाने अपमान का घूंट पीने को मजबूर होना पड़ रहा है। आखिर वह भी इंसान है, उसके भी सपने हैं, भावनाएं हैं और आत्मसम्मान है।
अतः माननीया बहन जी, आकाश आनंद को तोड़िए मत, उसे तराशिए। उसे अकेला मत कीजिए, उसे सहारा और मार्गदर्शन दीजिए। क्योंकि किसी युवा को बार-बार जलील करके तोड़ देना बहुत आस���न है, लेकिन उसके भीतर की उम्मीद बचाकर उसे एक सक्षम नेतृत्व में ढालने में पूरी पीढ़ी लग जाती है।
आपका शुभचिंतक: सूरज कुमार बौद्ध
@Mayawati @AnandAkash_BSP
1. दक्षिण दिल्ली के पाँच मंज़िला पीजी हास्टल के ढहने से 5 लोगों की हुई मौत तथा मध्य प्रदेश के सागर ज़िला में भी ज़हरीली शराब पीने से 18 लोगों की कल हुई मौत व लगभग 190 बीमार लोगों के अस्पताल में इलाज के लिये दाख़िल होने की घटना एवं यूपी व बिहार आदि राज्यों म��ं बाढ़ के कारण जान-माल की तबाही की ख़बरें अति-दुखद व चिन्तनीय।
2. इन घटनाओं से यह साबित होता है कि शासन-प्रशासन अपनी ज़िम्मेदारियों को सही से नहीं निभा रहा है, जिस कारण जनहित व जनकल्याण के सम्बंध में सरकारों को चुस्त-दुरुस्त होने की सख़्त ज़रूरत है। इस प्रकार से अधिकारियों की घातक होती जा रही लापरवाही, उदासीनता व भ्रष्टाचार आदि पर भी सरकारों को सख़्ती से लगाम लगाने की ज़रूरत।
1. देश में एक नहीं बल्कि अनेकों ऐसे उदाहरण हैं जिससे लोगों को यह लग रहा है कि सीजेपी का जेन-जी (Gen-Z) अर्थात देश के युवाओं और बेरोज़गारों आदि की ज्वलन्त समस्याओं को लेकर इनका यह आन्दोलन विभिन्न राजनीतिक ��ार्टियों द्वारा हाईजैक कर लेने से युवाओं व छात्रों आदि को जंतर मंतर आन्दोलन के दौरान जो इनको बड़े-बड़े सपने दिखाये गये थे, वे अब स्वतंत्र कम व राजनीतिक ज़्यादा होकर गंभीर शंकाओं में घिर गये हैं।
2. किन्तु ख़ासकर जेन-जी (Gen-Z) व जेन-अल्फा (Gen-Alpha) की ज़रूरी माँगों को लेकर बी.एस.पी. को पूरी सहानुभूति व इसके प्रति चिन्ता भी हमेशा रही है और आगे उनके सहयोग के लिये बी.एस.पी. के सभी स्टेट यूनिटों को निर्देशित किया जाता है कि वे अपने-अपने राज्य व क्षेत्र में सम्बंधित अधिकारियों से मिलकर उनकी समस्याओं के शा��्तिपूर्ण तरीक़े से समाधान के लिये ज़रूर तत्पर रहें।
3. लेकिन बी.एस.पी. के अनुशासन के अनुसार पार्टी के लोग धरना, प्रदर्शन व आन्दोलन आदि नहीं करें और अपनी तन, मन, धन की शक्ति एवं ऊर्जा को चुनाव के लिये सुरक्षित रखें, ताकि करोड़ों दलितों व अन्य उपेक्षितों के सच्चे मसीहा परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के सपनों को साकार करने वाली ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की अपनी सरकार बना��र जेन-जी (Gen-Z) और जेन-अल्फा (Gen-Alpha) सहित सर्वसमाज की सभी दुख-तकलीफों आदि का स्थायी समाधान निकल सके, जैसाकि बी.एस.पी. की यूपी में चार बार रही सरकारों में करके भी दिखाया गया है।
4. इसके साथ ही, जेन-जी (Gen-Z) के जंतर मंतर आन्दोलन के दौरान पुलिस अगर समय से उचित कार्रवाई करती तो श्री संजय आज़ाद जैसी गंभीर घटना नहीं होती, किन्तु अब इस प्रकरण के अभियुक्तों के खिलाफ सख़्त से सख़्त क़ानूनी कार्रवाई ज़रूर होनी चाहि���े वरना फिर बी.एस.पी भी ऐसे मामलों में कोई पीछे नहीं रहेगी।
यूपी के ज़िला हापुड़ के थाना हापुर नगर के अन्तर्गत दो समुदायों में हुई आपसी रंजिश व झड़प में घायल हुये दलित समाज के लोगों में से एक व्यक्ति की आज हुई मौत अति-दुखद। सरकार आरोपियों को क़ानूनी सज़ा के साथ-साथ पीड़ित परिवार की भी सहायता ज़रूर करे तो यह उचित होगा। वैसे भी आपसी रंजिशों का ख़ून-ख़राबा में बदल जाना अति-निन्दनीय एवं चिन्तनीय तथा ऐसी घटनाओं को सरकारी हस्तक्षेप आदि से हर हाल में रोका जाना चाहिये ताकि विवाद संघर्ष तक ना पहुँच पाये।
@journalist_syed@Mayawati मुस्लिम समाज को सभी का कार्यकाल जरूर देखना चाहिए। कौन किसके लिए क्या किया है।
मेरा मानना है कि परम् आदरणीया बहनजी मुस्लिम समाज के साथ हमेशा चट्टान की तरह खड़ी रहती है।
1. ज़िला सहारनपुर की मस्जिद सहित पूरे उत्तर प्रदेश में आएदिन मस्जिदों को काफी आपाधापी में अवैध बताकर उनको ध्वस्त करने का जो सरकारी अभियान चल रहा है वह ठीक नहीं है तथा सरकार को ऐसे निगेटिव ह���लात से बचने के लिये इस पर तुरन्त रोक लगाकर इसके समाधान के अन्य उपाय ज़रूर करने चाहिये।
2. वैसे भी एक संवैधानिक सेक्युलर सरकार द्वारा सभी धर्मों के मानने वालों एवं उनके धार्मिक स्थलों आदि का एक समान आदर-सम्मान व उनकी सुरक्षा करने का उत्तरदायित्व बनता है। इस्लाम मज़हब में मस्जिदें हर दिन इबादत बल्कि दिन में कई बार जमात के साथ नमाज़ पढ़ने का मुख्य व अभिन्न अंग हैं, जिसको ध्यान में रखकर व भारती��� परम्परा के अनुसार सम्मान देना देश व व्यापक जनहित में ज़रूरी है।
3. इसके साथ ही, बिना नियम-क़ानून का समुचित अनुपालन किये हुये किसी भी अभियुक्त का मकान ध्वस्त करके उसके पूरे परिवार को सामूहिक तौर पर सज़ा देकर बेघर बार कर देने की कार्रवाईयों से भी लोग काफी विचलित हैं। ऐसे में बी.एस.पी सरकार की तरह का ’क़ानून द्वारा क़ानून का राज’ का व्यवहार ज़रूरी है।
4. अतः केवल सरकार ही नहीं बल्कि माननीय न्यायालय भी इस ओर समुचित ध्यान दें तो यह उचित होगा। लेकिन ऐसे हालात में सभी लोग सौहार्दपूर्ण वातावरण भी ज़रूर बना कर रखें, पार्टी की यह भी अपील है।
1. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर अर्थात जीडीपी ग्रोथ के सरकारी दावे को लेकर ज़बरदस्त बहस छिड़ी हुई है, और देश में ख़ासकर अति-महंगाई, अपार ग़रीबी, बेरोज़गारी आदि की मार से पीड़ित आमज��ता अचंभित भी है कि वह किस पर भरोसा करे और किस पर ना करे।
2. वैसे इसके सम्बंध में सरकार के आसमान छूते दावे को प्रथम दृष्टया मान लिया जाये तो यह अच्छी बात होगी, किन्तु अगर यह जुगाड़ के आँकड़े हैं तो यह चिन्ता की बात ज़रूर है। इसीलिये जनता में उम्मीद जगाने हेतु सरकार को विश्वसनीय ढंग से यह ज़रूर बताना चाहिये कि इस उच्च विकास दर का क्या लाभ देश की करोड़ों ग़रीब मेहनतकश जनता को मिला है और आगे में इसका क्या लाभ होगा।
3. इतना ही नहीं बल्कि यह मुद्दा आमजनहित से जुड़ा होने के कारण विकास के आँकड़े व दावे दोधारी तलवार की तरह हैं। इसीलिये उन्हें ज़मीनी हक़ीक़त से भी ज़्यादातर आँका जाता है अर्थात् विकास वही सही व उपयोगी जो जनता को भाये यानी जनता के जीवन में समतामूलक परिवर्तन लाये और लोग ख़ुश व खुशहाल बनें।
4. अतः जीडीपी ग्रोथ के आँकड़े व दावे आदि अपनी जगह है, लेकिन विकास की असल हक़दार देश की करोड़ो��� मेहनतकश जनता को भी इसका लाभ मिलना और उसे इसका महसूस होन��� भी देश व जनहित में ज़रूरी है, वरना यहाँ के लगभग 140 करोड़ लोग ’धनवान सरकार की ग़रीब जनता’ होने का बोझ लगातार ढोती रहेगी। देश का विकास तभी ’अच्छे दिन’ वाला होगा जब यहाँ की करोड़ों बहुजन मेहनतकश जनता ग़रीबी, बेरोज़गारी व भ्रष्टाचार आदि से मुक्त आत्म-सम्मान का थोड़ा सुखी जीवन जीने योग्य बनेगी।
5. इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आउटसोर्स कर्मचारियों का दोगुना तक मानदेय बढ़ाने तथा 20 लाख लागों को सुरक्षा कवर आदि यूपी आउटसोर्स सेवा निगम की स्थापना के माध्यम से देने के फैसले से कहीं बेहतर होता लोगों को सीधे तौर पर सरकारी नौकरी देना, ताकि यह व्यवस्था अफसरशाही की मनमानी, भ्रष्टाचार एवं शोषण आदि की जंजाल से मुक्त हो।