A civilization cannot be built in one night, nor can it be destroyed in one night.History is written only by the brave,and Iran has shown that it will protect its motherland at all costs. After this war, America's downfall is certain. #war#Iran#مزاحمت_سے_زنجیریں_ٹوٹیں_گی
बीते दिनों मैंने प्रेमानंद बाबा का सुना। असल में मैं उनके व्यवहारिक प्रवचनों का प्रशंसक रहा हूँ। लेकिन जब उनकी कथा सुनी तो वे वही कपोल रटंत कहानियाँ जन में परोस रहे हैं। ईश्वर वे, ईश्वर ये। ऐसा स्वर्ग, ऐसी अप्सराए��। बस हवाई बातें। जिन स्वर्ग, ईश्वर और अप्सराओं को आज तक ��न्होंने ख़ुद देखा भर नहीं, उनसे पहले भी किसी ने असल में देखा नहीं, उनकी कहानियों को इतने चाप लेकर कह रहे हैं जैसे हर रोज़ अप्सराओं से मिलना हो, जैसे हर हफ़्ते महीने स्वर्ग आना जाना लगा हो। इतना आत्मविश्वासी होने का कुछ तो आधार हो। वही पंडितों पुरोहितों की लिखी बातें दोहराए जा रहे हैं।
उन्हीं कहानियों को कथावाचक रटंत तोते की तरह दशकों से गाए जा रहे हैं।
कल मैंने कहा कि विराट कोहली भाग्यवाद क��� चरणो में हैं तो अधिकतर को बुरा लग गया।
भारत के लोग कब तक पुराणों की गपोल-कपोल लुभावन कहानियों में ख़ुद की ऊर्जा खर्च करते रहेंगे। भारत का बड़ा हिस्सा इन कहानियों को बैठकर सुनने में अपनी ऊर्जा खर्च कर रहा है। और भाग्यवाद को ही अपनी इति मान ले रहा है। तभी भारत की ये दुर्गति है। यहाँ की पुलिस, प्रशासन, क़ानून, अनुशासन, गाँव, शहर इसीलिए इतने दोयम दर्जे के हैं। इतनी ईश्वरीय कहानियाँ सुनकर भी इनके चित में न्याय और समानता नहीं है।
घंटों बड़े-बूढ़े अधेड़ अपने मोबाइलों को चलाकर इन कहानियों को सुन रहे हैं। उनकी आधी ऊर्जा इन्ही प्रार्थनाओं, दर्शनों, तीर्थों, प्रसादों में जा रही है। जैसे इससे ही इन्हें निवृत्ति मिलेगी। पुरोहितों ने उन्हें ऐसी ही कथाएं सुनाकर ये भ्रम दिया है।
🇮🇳 महापरिनिर्वाण दिवस: अमर श्रद्धांजलि
आज, हम भारत रत्न डॉ. बी.आर. अम्बेडकर जी को उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर गहरी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
वह एक अडिग राष्ट्रवादी, करुणामय सुधारक और वंचितों के अधिकारों के निर्भीक प्रहरी थे। उन्होंने कभी झुकना नहीं सीखा और समानता के लिए संघर्ष किया।
बाबासाहेब का संघर्ष और विजन हमें हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
जय भीम! ✊🏾 #महापर��निर्वाण_दिवस
*A new Buddhist site with rock-cut caves, and sculptures surfaced accidentally at Geddapalem
village, S Rayavaram,
Anakapalli dist., #AndhraPradesh.
(6th century CE)
*The sculptures represent Vajrayana phase of Buddhism based on the features of iconography.
_Director (Epi), ASI
चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की मां कमलाताई गवई ने बेटे पर हुए हमले क�� “अत्यंत निंदनीय” और “असंवैधानिक” बताया। कुछ दिन पहले इन्होंने RSS का न्योता भी ठुकरा दिया था। संविधान के मूल्यों पर अडिग ऐसी माताएं ही भारत की असली ताकत हैं।
मेरे अकेले के प्रयास से समाज नहीं बदल सकता है लेकिन मैं प्रयास इसलिए करता हूं कि,
पानी में हलचल मचाने के लिए एक पत्थर ही काफी है।
~ मान्यवर कांशीराम साहब
मान्यवर कांशीराम जी "परिनिर्वाण दिवस" पर उन्हें शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि!
देश का सर्वोच्च न्यायिक पद जिसे सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस नहीं बल्कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) कहा जाता है।
ऐसे सम्मानित पद पर आसीन CJI न्यायमूर्ति बी. आर. गवई साहब के खिलाफ अनिरुद्ध राम तिवारी उर्फ अनिरुद्धाचार्य का बयान “तुम्हें अगर अपनी छाती फड़वानी है.." उसकी जातिवादी और घटिया सोच का परिचायक है। भारत के मुख्य न्यायाधीश को खुलेआम इस तरह की धमकी संविधान और न्यायपालिका पर हमला है। यह बयान बताता है कि अधर्म के ठेकेदार अब धर्म की आड़ में नफ़रत और हिंसा का कारोबार कर रहे हैं।
परम पूज्य बाबा साहेब ने चेताया था कि “अगर अंधविश्वास को बढ़ावा दिया गया, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।” आज वही सच साबित हो रहा है, जहाँ तथाकथित बाबा खुद को संविधान से ऊपर साबित करना चाहते हैं।
@AzadSamajParty@PMOIndia और @UPGovt से माँग करती है कि इस तरह की ज़हर फैलाने वाली, जातिवादी मानसिकता से ग्रसित घृणित बयानबाज़ी पर तुरंत कार्रवाई हो और संविधान विरोधी भाषा बोलने वालों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया जाए।
@CMOfficeUP@myogiadityanath
लद्दाख की जनता की आवाज़ पर्यावरणवादी, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जेल में डालना लोकतंत्र पर हमला और सरकार की विफलता है। ये कायरता पूर्ण कदम साबित करता है मोदी सरकार तानाशाह और निरंकुश हो चुकी है।
अपनी ज़मीन, रोज़गार और पहचान की लड़ाई लड़ना कब से देशद्रोह हो गया?
@azadsamajparty सोनम वांगचुक व लद्दाख की जनता व उनकी मांगों के साथ खड़ी है। अब लद्दाख की लड़ाई देश की लड़ाई है!
#FreeSonamWangchuk
सुप्रिया सुले का आरक्षण विरोधी बयान बेहद आपत्तिजनक और निंदनीय है। यह बयान संविधान की मूल आत्मा, सामाजिक न्याय और समान अवसरों के अधिकार के खिलाफ जाता है। आरक्षण केवल सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की भरपाई का उपाय नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक अन्याय और जातिगत उत्पीड़न को संतुलित करने का संवैधानिक प्रावधान है।
आरक्षण का विरोध करना उन लाखों दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के लोगों की मे���नत, संघर्ष और बलिदान का अपमान है, जिन्होंने समान हक़ और सम्मान की लड़ाई लड़ी। सुप्रिया सुले जैसे नेताओं को याद रखना चाहिए कि वे जिस लोकतांत्रिक भारत की राजनीति कर रहे हैं, वह भारत बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के संविधान से संभव हुआ है, जिसमें सामाजिक न्याय की गारंटी दी गई है।
उनका यह बयान न केवल संविधान विरोधी है बल्कि वंचित समाज के आत्मसम्मान और अधिकारों पर सीधा हमला है। इसकी कड़ी निंदा क�� जानी चाहिए और समाज को ऐसे विचारों का पुरज़ोर विरोध करना होगा।
आरक्षण एक गरीबी उन्मूलन कार्यकम नहीं है, यह सामाजिक रूप से वंचित लोगों को हिस्सेदारी देने का कार्यक्रम है,
बस इतनी सी बात नेपो किड सुप्रिया सुले ��र उसके सुवर्ण साथियों को समझ नहीं आती । #सुप्रियासुले_माफी_मांगो
गुजरात सरकार द्वारा मजदूरों से 8 घंटे की जगह 12 घंटे काम कराने का कानून न सिर्फ़ अमानवीय है बल्कि भारत के संविधान और परम पूज्य बाबा साहेब की श्रम सुधार विरासत का भी खुला अपमान है।
याद रखना होगा कि 1942 में बाबा साहेब ने अंग्रेज़ों की 12 घंटे की मजदूरी समाप्त कर भारत में 8 घंटे कार्यदिवस का कानून लागू किया था। गुजरात सरकार का यह कदम उसी अंग्रेज़ी हुकूमत के काले कानून की पुनरावृत्ति है।
2020 में ही गुजरात सरकार ने एक अध्यादेश लाकर अस्थायी रूप से कारखानों में 8 घंटे की जगह 12 घंटे कार्यदिवस की अनुमति दी थी। तब इसे महामारी और श्रम संकट के बहाने लागू किया गया। अब उसी औपनिवेशिक सोच को स्थायी बनाने की कोशिश की जा रही है। यह कदम पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाओं और परिवार पर भी गंभीर असर डालता है, क्योंकि लंबे कार्य घंटे महिलाओं के रोजगार, सुरक्षा और घरेलू जीवन को प्रभावित करते हैं।
यह कानून केवल ऐतिहासिक और संव���धानिक विरासत का उल्लंघन नहीं है, बल्कि मजदूरों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी सीधा हमला है। लंबे कार्य घंटे थोपना जन-स्वास्थ्य और जीवन स्तर को बेहतर बनाने की राज्य की जिम्मेदारी (अनुच्छेद 43 और 47, DPSP) के खिलाफ है।
साथ ही, यह कदम अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के 1919 के Hours of Work (Industry) Convention और अन्य वैश्विक श्रम मानकों का भी उल्लंघन है, जिनमें कार्यदिवस 8 घंटे और कार्यसप्ताह 48 घंटे से अधिक नहीं होना तय है। भारत इन मानकों का सदस्य होने के नाते उनका पालन करने के लिए बाध्य है।
गुजरात मॉडल पहले ही मजदूरों को आउटसोर्सिंग और संविदा व्यवस्था के ज़रिए सस्ता श्रम बना चुका है। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी गुजरात के उद्योगपतियों को सौंप दिए गए। अब 12 घंटे का कार्यदिवस थोपकर मजदूरों को अंग्रेज़ों जैसी गुलामी में धकेला जा रहा है।
हमारा सवाल है प्रधानमंत्री @narendramodi जी से ,क्या गुजरात में मजदूरों और महिलाओं पर थोपा गया यह 12 घंटे का काला कानून अब पूरे देश में लागू करने की तैयारी है?
हम स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि मजदूरों और महिलाओं की पीठ पर उद्योगपतियों का मुनाफ़ा लादना बंद कीजिए। भारत संविधान से चलेगा, किसी उद्योगपति की गुलामी से नहीं।
@mygovindia
@PMOIndia