#make_judiciary_accountable
राष्ट्रपति के लिए तीन माह की समय सीमा तय करने वाले जज को अपने कोर्ट केसों पर फैसला देने के लिए भी तीन वर्ष की समय सीमा तय करनी चाहिए।
Ethanol will hurt the BJP electorally, not because of car owners, the are just 8% of the population, but because of bike owners, who make up 60%.
Every issue with a bike, irrespective of whether it's due to ethanol or not, is being blamed on ethanol. Remember that the overwhelming majority of car and bike mechanics are not your voters and, in fact, they hate you and you know why. They are actively telling anyone with any bike issue that it is due to ethanol. Not only does it serve a political purpose, but it is also easy and convincing.
Car and bike dealers are equally happy to lean into this excuse because it completely deflects blame away from the manufacturers and their own service centers. If a part fails prematurely or a vehicle suffers from a chronic engineering defect, blaming ethanol allows dealers to shift the responsibility onto government policy rather than admitting to poor build quality or honoring warranty claims. It gives them a convenient, politically charged scapegoat that customers readily accept, shielding the automotive brands from reputational damage.
It's up to the BJP to smell the coffee. The issue is no longer on Twitter and no longer raised just by English-speaking metro car owners. It has gone to the ground. There is still time to wake up and make corrections.
P.S. I'm not defending ethanol here. It does damage engines and parts. I've been strongly opposing it and will keep doing so. I'm only saying what's happening on the ground. The BJP should do a course correction on ethanol solely because its implementation was wrong and correcting it is only logical. However, since politicians see every controversy from the standpoint of electoral gains and losses, I'm telling them that it will hurt them electorally too.
यही बात आप गडकरी जी की गोदी में बैठकर कहते तो अधिक विश्वसनीय लगता! ये दोगले अब बता रहे हैं हैं कि चाहे E10 डालो या E20, गाड़ियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता!
@nitin_gadkari और @narendramodi किसी भी स्तर का प्रोपेगंडा करवा लो, सत्य यह है कि गाड़ियाँ ख़राब हो रही हैं, माइलेज 20-30% तक गिर रहा है। आ��� लोग सीधा चुप क्यों नहीं रहते जो आजकल आप लोगों का SOP है, इस पर क्यों इतना डिफेंस?
जितने वीडियो देख रहा हूँ लोगों के, जो पेट्रोल पम्प से सीधे बोतलों में पेट्रोल भरवा रहे हैं, उनमें से अधिकांश तो ऐसा दिखता है कि सरकार ने संभवतः E85 को E20 के नाम पर डालना आरम्भ कर दिया है।
फ्यूल और एथनॉल का सेपरेशन दिख रहा है। एक जगह देखा उसका रंग गुलाबी है ना कि डार्क ऑरेंज। कहीं तो लीची के जूस जैसा रंग भी दिखा।
यह अविश्वास इसलिए भी है क्योंकि @nitin_gadkari, @HardeepSPuri और @PMOIndia ने बिना किसी जागरूकता अभियान के, या उपभोक्ता सहमति के, पेट्रोल कह कर E20 हमारी टंकियों में डलवाना चालू कर दिया था, दो साल बाद पता चला कि ये तो पेट्रोल है नहीं और हमारी गाड़ी भी उसके लिए उचित रूप से तैयार नहीं है।
अब @narendramodi बताएँ कि ये क्या बिक रहा है पम्प पर? क्या पेट्रोल पम्प वाले अपनी तरफ़ से भी कुछ घपला कर रहे हैं? स्थानीय पुलिस फिर क्या कर रही है? आप हर बात को चुप्पी या फिर सोरोस का एजेंट कह कर टाल नहीं सकते��
कोषाध्यक्ष स्वयं नैतिकता के किस मानदंड के आधार पर बैठे हुए हैं? कोष में ही डाका पड़ा और वह वक्तव्य-वक्तव्य खेल रहे हैं?
पूरा बोर्ड भंग होना चाहिए क्योंकि ये सब के सब चोर हैं या अंधे हैं। यदि चोर नहीं हैं तो पद पर रहने के योग्य नहीं हैं क्योंकि यह डकैती चलती रह�� और ये सोते रहे।
चंपतवा का जो घर-दिखाई और लंगोट-धोती गिनाई हो रही है कि कितना आदर्श जीवन जीते हैं, उनसे एक ही वाक्य कहूँगा: इनके ‘मानसपुत्रों’ के घर और लंगोट-धोती भी गिनो कभी जा कर।
ये निंजा तकनीक हमने संघ-विहिप के कई नेताओं के स���थ देख रखा है कि प्रचारक तो फटा कुरता पहनते हैं, पर दिल्ली-मुंबई-लखनऊ-चेन्नई हर स्थान पर इनके ‘मानसपुत्रों’ के भव्य भवन होते हैं जहाँ ये पाँच-सितारा लग्जरी पाते हैं।
चंपतवा ने भगवान राम के कपड़े तक सिलने का ठेका अपने निकटस्थ व्यक्ति को दिलवा रखा है। दिल्ली में कपड़े सिलते हैं, हर दिन अयोध्या भेजा जाता है। उन्हें कौन सिल रहा है, कैसे सिल रहा है, इसकी कोई चिंता नहीं।
जब कोई कार्य, जो परिसर में ही हो सकता है, उसके लिए दिल्ली के बॉलवुडिया डिजायनर को ठेका देने में यात्रा खर्चा समेत डिजायनर का ब्रांड वैल्यू का भी खर्चा मंदिर न्यास क्यों उठाती है?
ये तो वही बात हो गई कि कैब भाड़े पर लगा रखा है और साल भर में बिल इतना बना दिया कि दो कारें आ जाएँ।
पूरा ट्रस्ट अनियमितताओं का अड्डा बन चुका है। हर दिन जो समाचार आ रहे हैं, लगता है कि हम हिन्दुओं को छला जा रहा है। जो लोग योगी जी जयजयकार कर रहे ���ैं, वो बताएँगे कि पुलिस की लोकल इंटेलिजेंस यूनिट वहाँ घास छील रही थी? उनको क्यों पता नहीं चल पाया?
चंपत राय जैसे लोग हिन्दू-द्रोही हैं। इसका अहंकार, नैतिकता का संपूर्ण अभाव और ड्राइवर तक को इतनी शक्ति दे देना बताता है कि यह व्यक्ति नीच और अधम है। इसको नग्न कर के, पूरी देह पर कालिख-चूना लगा कर, गधे पर बिठा कर, अयोध्या में घुमाना चाहिए।
Neither Ashoka was great,
Nor Akbar was great,
Both
Were radical religious fanatics who butchered and converted people at the point of their swords
&
The #British built this fake narrative of their greatness
To
Hide the true great kings like #ShivajiMaharaj and dynasties like #Chola
That
Would make us proud of our #SanatanDharma lineage!!
🙏🙏🙏
If you call Virus Chinese, you are Racist
If you call Grooming Gangs Pakistani, you are Islamophobic
If you call Patriarchy Brahminical, you are Rocket Scientist
मैंने कल एक रोते हुए बच्चे की वीडियो देखी कि उसके पास पैसे नहीं हैं, वो पुनः जाँच क्यों करवाए पैसे दे कर? उसे ‘एसेंशियल रिपीट’ में डाल दिया @cbseindia29 इवैलुएटर ने।
ऐसा तो है नहीं कि कॉपी भेजनी है डाक से। जब हर परीक्षार्थी के हर कॉपी की स्कैन PDF उपलब्ध है, तो वह बच्चों को तो निःशुल्क मिलनी चाहिए। वो लॉगिन करे, उसकी हर कॉपी उसे दिखे, और जब उसे दोबारा जाँच में भिजवानी हो, तो CBSE एक रिफंडेबल अमाउंट ले।
पता नहीं क्यों ये बकलोली कि कॉपी देखने के भी पैसे लगेंगे। कोई तर्क नहीं, कोई अतिरिक्त खर्चा नहीं, बस बच्चों को सताओ। 98 लाख कॉपियाँ हैं, 18 लाख बच्चे हैं। हर बच्चे की एक प्रोफाइल और कॉपी के pdf लिंक क्यों नहीं डाल देते ये लोग साइट पर?
वहीं आप बगल में लगा दें री-इवैलुएशन का बटन। पेमेंट ले लो। यदि बात सही निकले तो पेमेंट रिटर्न कर दो।
पूरा दिन टाइमलाइन केवल ऐसे बच्चों के कॉपी के पन्नों से पटा पड���ा है जिसमें लगता है भाँग खा कर जाँच की गई है। फिजिक्स और कैमिस्ट्री के सबसे अधिक। कहीं पन्ने मिसिंग हैं, कहीं ब्लैंक पेज लिखा है, कहीं रॉन्ग क्वेश्चन नंबर लिखा है, कहीं स्टेप के नंबर नहीं दिए, कहीं उत्तर ही मिस कर दिया, कहीं MCQ को गलत कर दिया…
@EduMinOfIndia यदि थोड़ी भी लज्जा बाकी है, तो ढंग का काम कर दो। और ��ाँ @narendramodi @PMOIndia, @dpradhanbjp को निकालिए मत, उनको प्रमोट कर के रक्षा मंत्री टाइप कुछ बना दीजिए। किसी राज्य का राज्यपाल या विदेश में राजदूत टाइप का कुछ। रिवार्ड कीजिए, बहुत बढ़िया कार्य कर रहे हैं।
CBSE जाँच के जितने ट्वीट आ रहे हैं, संभव है एकाध घंटे में वैसे उत्तर पत्र फ़र्ज़ी भी बनाए जाएँ, ताकि जो लोग जेन्युइन हैं, उनको पाकिस्तानी और तुर्की बताया जा सके।
अतः, एक बेसिक लेवल चेक अवश्य करें। बहुत बच्चे वही होंगे जिन्होंने केवल इसलिए एक्स पर अकाउंट खोला होगा ताकि उनकी बात सुनी जा सके। इसलिए, ऐसे बच्चों को डिसक्रेडिट भी ना करें।
धर्मेंद्र प्रधान एक नकारा मंत्री है, फोकस वहीं रखना है। और साथ में @narendramodi को भी पूछना है क�� ऐसा कौन सा हीरा है ये आदमी जो इसको ढोये जा रहे हो!
प्रधान, सरकारी नाकामी और CBSE स्कूलों की नई SMC
धर्मेंद्र प्रधान @dpradhanbjp जाते-जाते एक और कांड कर के जा रहा है। वैसे प्राइवेट स्कूल, जिसमें सरकार एक पैसा नहीं देती, उनमें SMC (स्कूल मैनेजमेंट कमिटी) में 75% अभिवावकों का होना अनिवार्य कर दिया गया है। यानी, स्कूल के मालिक अब यह तय नहीं करेंगे कि स्कूल कैसे चले।
ऊपर से आपको लगेगा कि यह तो अच्छी बात है, स्कूल मनमानी फीस लेते हैं, अब नकेल बँधेगी। हालाँकि ऐसा कुछ नहीं है। फीस नियंत्रित करना है तो ब्रैकेट बना दो, फ्रेमवर्क बना दो कि कितनी फैसिलिटी पर कितनी फीस मान्य है।
एसी और स्वीमिंग वाले स्कूल की फीस आपके बगल के आठ कमरों वाले स्कूल के फीस के बराबर नहीं होगी। हाँ, यूनिफॉर्म और किताब के नाम पर बाध्यता बंद होनी चाहिए। और ये कार्य वहाँ करो जहाँ सरकार पैसे देती है।
खैर, अब ये जो SMC है, उसमें 75% अभिभावक होंगे, तो स्कूल का पैसा कहाँ खर्च होगा, वही तय करेंगे। कौन से शिक्षक पढ़ाएँगे, वही तय करेंगे। किस शिक्षक की कितनी सैलरी होगी, वही तय करेंगे।
इस कमिटी में वस्तुतः स्कूल के मालिक के अलावा सब हैं। 8% स्थानीय प्रशासन के लोग, 8% शिक्षक, 8% में आंगनवाड़ी, आशा बहू एवम् अन्य स्थानीय लोग होंगे। सरकारी बना नहीं सकते, वहाँ से पैसा आता नहीं, तो प्राइवेट का दोहन करो।
और तो और, ये कमिटी ही यह तय करेगी कि स्कूल अपनी बाउंड्री बनाने से ले कर लैब बनवाने, स्मार्ट क्लास का काम या अन्य बड़े कार्य किस ठेकेदार को दे। यानी, अब अभिभावक यह बताएँगे कि स्कूल जिस ठेकेदार से कम में काम करा रहा है उसकी जगह वो अ���िभावकों के बी�� के किसी व्यक्ति को ठेका दें, वह भी PWD रेट पर!
सरकार इस पर यही कहेगी कि ‘ये स्कूल और स्कूल के ट्रस्टी की मनमानी रोकने के लिए है’। फिर तो सरकार को हर दुकान, हर कम्पनी में ‘उपभोक्ता की कमिटी’ बना देनी चाहिए कि पारले का बिस्कुट कितने में बिकेगा, मारुति की कार कितने में आनी चाहिए। प्राइवेट का मतलब फिर क्या होता है?
सरकार नकारी है, घटिया शिक्षा देती है इसलिए उसका लोड प्राइवेट स्कूल उठाते हैं। वो मनम���नी न करें, इसलिए आप एक रेगुलेशन ले कर आते हैं। प्राइवेट स्कूल को @cbseindia29 तब रिकग्नाइज करती है जब उसके पास कुछ मूलभूत सुविधाएँ हों: लैब है, स्मार्ट क्लास है, सीसीटीवी है, ग्राउंड है, शिक्षकों की डिग्री क्या है, कितने बच्चों पर कितने शिक्षक हैं आदि।
क्या यह फ्रेमवर्क काफी नहीं है? या अब माता-पिता ही तय करेंगे कि उनके बच्चे को जिस शिक्षक ने डाँटा, अब उसे निकाला जाए? क्या माता-पिता बताएँगे कि स्मार्टब���र्ड का टेंडर फलाने की जगह ढिमका को दिया जाए क्योंकि वो इनके मित्र हैं? जब सरकार वित्तीय सहायता नहीं देती, तो वह उसके आर्थिक विषयों में इतना हस्तक्षेप क्यों करना चाहती?
तुमने गाँव के स्कूलों में पंचायत समिति का बवासीर डाल रखा है जो ग्रामीण राजनीति के कारण वहाँ भी नकारापन फैलाती दिखती है। सरकारी शिक्षक जनगणना से ले कर चुनाव ड्यूटी और सामूहिक विवाह तक में ड्यूटी दे रहे होते हैं। दाल-चावल का हिसाब रखना होता है, वह अलग।
RTE के माध्यम से, अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए आपने प्राइवेट में भी गरीब बच्चों के लिए व्यवस्था की। सरकारी में क्यों नहीं डालते? क्योंकि आप जानते हो वहाँ रद्दी शिक्षा मिलती है। प्राइवेट आपका लोड कम करता है, और आप वहाँ 75% माता-पिता के हाथों में नियंत्रण देना चाहते हैं।
अब ये जो गुलाबी बात कही जा रही है, उसका फॉलआउट ये नहीं जानते। स्कूल बंद होने लगे, तो क्या सरकार स्कूल खोलेगी? जिस माता-पिता को व�����्यालय मनमानी वाला लगता है, उनके पास विकल्प है कि वो दूसरे विद्यालय में चले जाएँ। आपको एसी चाहिए बच्चों के लिए तो आपको पैसे भी देने पड़ेंगे।
पुनः कहूँगा कि यूनिफॉर्म-पुस्तक का केवल डिजाइन, नाम और सिलेबस स्कूल को देना चाहिए। बच्चों को स्वतंत्रता हो कि वो कहाँ से लें। फीस का ब्रेकेट तय करे सरकार स्कूल की सुविधाओं के आधार पर। इससे इतर यदि निजी स्वामित्व के विद्यालयों में माता-पिता को 75% नियंत्��ण दिया गया तो समाजवाद तो आ जाएगा, पर समाजवादी पैरेंट्स के बच्चों को पढ़ाने के लिए विद्यालय नहीं बचेंगे।
NEET में 22 लाख विद्यार्थियों की मानसिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थिति पर मूत्र त्याग करने वाली NTA, वर्तमान सरकार और मंत्री पर चर्चा न कर के, आज जब PM, राज्यों के CM के कारों की संख्या और कहीं दूर हो रहे बुलडोज़र एक्शन पर पूरा 'समर्थक तंत्र' केंद्रित है।
क्यों? क्योंकि इसमें आप कोई जाति नहीं निकाल सकते, ना ही कहीं भाग सकते हैं। हर एक बीतते दिन में @BJP4India नीचे गिरती जा रही है। हाँ, कुछ लोग कह देंगे कि हरियाणा नगर निकाय चुनावों में हुई भारी जीत बताती है कि @narendramodi की लोकप्रियता अधिकतम स्तर पर है। अच्छी बात है!
धर्मेंद्र प्रधान या अ��्य लोगों से मेरी व्यक्तिगत शत्रुता नहीं है। मेरे घर में अभी ना तो कोई कॉलेज में हैं, ना अगले 18 वर्षों में होगा। फिर भी लिखना-बोलना आवश्यक है क्योंकि इस सरकार ने हमें 'मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस' और 'पार्टी विथ अ डिफरेंस' कह कर वोट माँगा था।
उन रोते बच्चों, परेशान माता-पिता, प्रसन्न माफिया और निकृष्ट मंत्री-सरकार को देख कर भी यदि आप सिर्फ़ इसलिए कुछ नहीं लिख रहे कि मोदी जी कमज़ोर हो जाएँगे, तो याद रखिए कि एक दिन मोदी को युगपुरुष लिखने वाला पिता आज उनसे ही प्रश्न पूछ कर रो रहा है कि उसकी बेटी का भविष्य क्या है।
नेता की भक्ति अच्छी है, पर रेंगना और जीभ को सैंडपेपर बना कर चाटना आपकी प्रासंगिकता समाप्त करता है।
जब मैंने कहा था कि धर्मेंद्र प्रधान को अपमानित करके (कहा तो मैंने ���ुछ और ही था) कैबिनेट से निकाला जाना चाहिए, तो कई लोगों को (UGC के कारण मेरे सरकार विरोध में होने से) समस्या हो गई थी।
इस नकारे मंत्री के कार्यकाल में NEET 2026 रद्द हो गई। इ��से पेपर लीक रुक नहीं रहा, DU में सवर्ण सहायक प्रोफेसरों को चिह्नित करके निकाला जा रहा है, VC वामपंथी लेख लिख रहे हैं, नई शिक्षा नीति लागू हो रही है पर पन्नों में ब्राह्मण ब्रिटिश को न्योता दे कर बुलाता दिखाया जा रहा है, NCERT में आज भी डिस्टॉर्टेड इतिहास पढ़ाया जा ही रहा है, फिर यह व्यक्ति क्या एक प्लेस होल्डर मात्र है?
हर 58 मिनट में एक छात्र आत्महत्या करता है। उसका कारण स्ट्रेस है, चिंता है, असफलता है, तंत्र द्वारा उसकी परीक्षा लेना है। निर्धन छात्र पैसे ले कर नए नगर में परीक्षा देने जाता है, प्लेटफार्म पर अख़बार बिछा कर सोता है, सड़क किनारे जल पीकर परीक्षा देता है कि एक दिन परिणाम आने पर उसकी चिन्ताएँ समाप्त हो जाएँगी, पर तंत्र उसे तड़पाता रहता है।
धर्मेंद्र प्रधान एक निकृष्ट और नकारा नेता है, उस से भी गया०बीता मंत्री। ऐसे लोगों को कोई घर का गराज सं��ालने ने दे, ये देश की शिक्षा घंटा सँभालेगा? @narendramodi जी, यदि UGC के 118 दिन बाद आपकी सरकार ने सवर्णों को औक़ात दिखा दी हो, और आपका ईगो शांत हो गया हो कि क्या उखाड़ लिया, गुजरात निगम और असम-बंगाल चुनाव जीत गए, तो प्लीज़ इस निकम्मे धर्मेंद्र प्रधान को विदा कीजिए।
यदि, चुनाव के आँकड़े ही आपके लिए एक मात्र मोटिवेशन हैं और देश की शिक्षा गर्त में जाते अच्छी लगती है, तो फिर कोई बात नहीं, UP चुनाव के लिए रैलियाँ कीज��ए।
NEET 2026 पेपर लीक पर यदि हम शिक्षा मंत्री जी और पूर्व NTA DG सुबोध कुमार सिंह की जातियाँ बता दें तो क्या कॉन्ग्रेसी दलाल कह दिए जाएँगे? पेपर लीक की घटना के बाद उन्हें सस्पेंड नहीं कि��ा, थोड़े दिन हटा कर रखा फिर, इनके रहमोकरम से सुबोध जी छतीसगढ़ चला रहे हैं।
सरकार कुछ नहीं करेगी क्योंकि सरकार चुनाव जीत रही है। वही एक मात्र मापदंड बचा है अब गवर्नेंस का। आपको कट्टर समर्थक बता देंगे कि मोदी जी की लोकप्रियता अखंड और अक्षुण्ण है, इसलिए ये सब बात जो भी कर रहा है वो सोरोस का एजेंट है।
इसके बाद आप कुछ बोल नहीं सकते। नए DG भी कुछ बढ़िया नहीं ही कर रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान जी मंत्रालय चलाने की जगह हर वह कार्य करते हैं जो मंत्री का नहीं है। मोदी जी की कौन सी विवशता है कि इस व्यक्ति को ढोया जा रहा है, समझ में नहीं आता।
पेपर लीक थम नहीं रहा। माफिया को हाई कोर्ट बेल नहीं देती तो सुप्रीम कोर्ट से मिल जाता है। कंपनी ब्लैकलिस्ट होती है, फिर कुछ समय बाद उसे ही काम मिल जाता है, या मालिक नई कंपनी बना कर काम ले लेता है।
आप इस सरकार में अपवाद रूप में ही कभी सुनोगे कि किसी अधिकारी को निलं��ित किया गया या निकाला गया। मंत्री तो रहने ही दीजिए। और ये लोग शिक्षा को डिकोलोनाइज़ करने निकले थे। &% हो रहा है डिकोलोनाइज़।
मंडल की नीली टट्टी से लिपाई कर��ी भाजपा
पहले मंडल ने हगा कि सवर्ण और मुसलमान भाजपा को वोट नहीं करते। ट्विटर से डिलीट मारा, फेसबुक पर रहने दिया। फिर भाजपा के आधिकारिक हैंडलों से बाढ़ आई यह बताने के लिए भाजपा को दलितों ने, आदिवासियों ने बंगाल जीत कर दे दिया।
फिर हमें मालवीय, त्रिवेदी, पात्रा समेत कई सवर्ण हैंडलों से बताया गया कि 75% रहा है दलित आरक्षित सीटों का स्ट्राइक रेट। यह नहीं बताया कि इनका कुल स्ट्राइक रेट भी 70% है। यह भ�� नहीं बताया की SC सीट में केवल SC नहीं होते, सवर्ण भी होते हैं।
भाजपा का प���रा बल इस बात पर रहा कि बंगाल चुनाव के बाद ये लोग स्वयं को दलित पार्टी घोषित कर, ‘ब्राह्मण-बनिया’ वाला दाग मिटा लें। ये लोग स्वयं ही इसको दाग मानते हैं, मैं नहीं मान रहा। इस चक्कर में जो हरा-नारंगी चार्ट दिखाया इन लोगों ने कि क्या कहा जाए!
बंगाल चुनाव रैलियों में इनके किसी नेता ने अंबेडकर का अ नहीं बोला, क्योंकि वहाँ ये बकलोली नहीं चलती। अब जीतने के बाद इनको मतुआ, नमोशूद्रो समेत दलित आदि याद आने लगे। वह भी तब जब बंगाल ‘जय श्री राम’ के झंडे तले हिन्दू बना नाच रहा है।
मैंने जब त्रिवेदी जी को कोट किया तो मुझे ज्ञान देने लगे कि वो तो… ये तो… अजी घंटा मेरा! कॉपी-पेस्ट पोस्ट हो रहे हैं, हर नेता एक ही बात लिख रहा है। हमें यह बताने के प्रयास हो रहे हैं कि सवर्ण अप्रासंगिक हैं क्योंकि ये इकट्ठे नहीं हैं।
@BJP4India और @narendramodi को लगता है कि एक ‘वंदे मातरम्’ मारेंगे, लोग नाचने लगेंगे। कर द���या न समकक्ष जन-गण-मन के? कितने लोगों ने चर्चा की? ओवैसी के अलावा कहीं चर्चा भी सुनी कि ऐसा कुछ हुआ? क्योंकि अब सवर्णों को इसमें कोई रूचि नहीं है कि ‘मोदी जी ने मुसलमानों की कह के ले ली’।
अब आपका त्रिपुंड, चाहे आप कितने ही भाव से लगाओ, बहुत लोगों को नौटंकी लगने लगी है, सब चुनावी मैनेजमेंट का सोचा-समझा मैनिक्योर्ड प्लान लगता है। मुझे लगता है या नहीं, वो मैं नहीं बता रहा। आप रैलियों में हिन्दुओं का आह्वान करते हो, जीतते ही दलीत-पीड़ीत-शोषीत-वंचीत का गुणगान।
इसलिए, आज जब रात के 11 बजे आपको पोस्ट करना पड़ता है कि ‘सभी वर्गों का साथ मिला’ तो वह टट्टी पर मिट्टी डाल कर, पैर चिपकाए, दाँत निपोड़े खड़े होना है कि हाँ भैया, थोड़ी-सी हो गई।
लीपते रहो, मंडल को पालते रहो। वह देगा नई मस्त योजनाएँ। अभी ब्राह्मण को केवल जिहादी बताया ��ै, मजा नहीं आ रहा। अभी बोलो लेख लिखे कि बंगाल में अंबेडकर की आवश्यकता है, बंगालियों को पता ही नहीं है कि बाबा साहेब ने उनके लिए संविधान लिखा, उन्हीं के कारण विवेकानंद पढ़ाई कर पाए, नेताजी विदेश जा पाए आदि।