आज 1 नवंबर है। साल का एक और महीना चुपचाप सामने आ खड़ा हुआ है। वक्त जैसे हवा के झोंके की तरह बिना रुके बीतता जा रहा है – पहले जनवरी था, अब नवंबर है, और मैं अब भी वहीं का वहीं। मन बार-बार पूछता है – आखिर करूं क्या? किस ओर बढ़ूं? कुछ शुरू करने की सोचता हूं, पर फिर उदासी की एक हल्की परत सब ढक लेती है।
दिन ���े उजाले में उम्मीद टिमटिमाती है, मगर रात की खामोशी में वही सवाल लौट आता है। हर पल गुजरता हुआ लगता है जैसे किसी अधूरी कहानी का पन्ना हो, जो अभी लिखी जानी बाकी है। पर शायद यही ठहराव किसी सुबह का इशारा है।
शायद आने वाला कल मेरे भीतर की इस धुंध को हटाकर एक साफ़ आसमान उकेरेगा। तब तक मैं इस बेचै��ी को अपनी साथी मान लेता हूं – क्योंकि कभी-कभी भटकना भी खुद तक पहुंचने का रास्ता होता है। 🌾🌼
ग़ज़ल
मैं हाथों से छूट गया था क्या करता,
गिरते ही मैं टूट गया था क्या करता??
मेरे जितने अपने थे उनमें ही से,
कोई मुझको लूट गया था क्या करता??
कब तक ढोता बोझा अपने सर पर मैं,
पाप घड़ा था फूट गया था क्या करता??
कब तक बचता मैं ग़र्दिश के चक्कर से,
कह्र मुझी पर टूट गया था क्या करता??
चलते चलते चाल मिरी थम जाती थी,
सब कुछ पीछे छूट गया था क्या करता??
– दीपक पंडित🌷
नई व सही राजनीतिक व्यवस्था व बदलाव के लिए मैं राजस्थान की अंता विधानसभा उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी हु,
जनता के नए विकल्प के रूप में कांग्रेस भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ रहा हूँ "आम आदमी पार्टी" क��� राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय अरविंद केजरीवाल जी समेत सम्पूर्ण आम आदमी पार्टी से आग्रह करता हूँ कि मुझे समर्थन व सहयोग करके मुझे ताकत प्रदान करे!
@ArvindKejriwal @AamAadmiParty
कहते हैं कि बेईमानी की कमाई में बरकत नहीं होती है लेकिन आज के समय में नेताओं और अधिकारियों को देखकर लगता है कि ईमानदारी में बरकत नहीं है । जितनी बरकत बेईमानी और चापलूसी में है ।
#todayquote
"बिहारी बहुत जगहों पर सफ़ल है, लेकिन बिहार नहीं।"
प्रिय बिहार,
तुम्हारी माटी से दूर, ��स धूल और प्रदूषण में डूबे एक शहर में बैठा हूं, लोग इसे दिल्ली कहते हैं। यहां सांस लेना ऐसा है मानो हर सांस के साथ कोई बोझ भीतर उतरता जा रहा हो। आज धनतेरस है। लोग झाड़ू खरीद रहे हैं, सोना खरीद रहे हैं, धन की देवी को पुकार रहे हैं। लेकिन मैं सोचता हूं, तुम्हारे पास कितना धन है, बिहार? क्या तुम धनतेरस मना सकते हो?
नहीं, मैं तुम्हें गरीब नहीं कह रहा… बस इतना कह रहा हूं कि तुम्हारे बेटे बहुत जगहों पर सफल ���ैं, लेकिन तुम खुद अब तक सफल नहीं हो पाए। बिहारी बहुत जगहों पर अमीर हैं, लेकिन बिहार अब भी वही हो, टूटी हुई सड़कों, धुंधली उम्मीदों और अधूर�� सपनों के बीच खड़ा हुआ एक राज्य।
बिहार, कल रात मैंने एक अजीब सपना देखा… बहुत डरावना। मैं मुसल्लहपुर हाट के किसी पुराने से कमरे से बाहर निकला। बाहर सड़कों पर पानी और कीचड़ का ऐसा गठजोड़ था मानो बरसात ने शहर से दुश्मनी निभाई हो। नालियां बजबजा रही थीं। हर कदम पर सड़ांध थी। बगल में एक छोटा सा भाजपा का टेंट लगा था, प्लास्टिक के कुर्सियों में कार्यकर्ता जी बैठे थे, कीचड़ के बगल में अपनी सफ़ेद कुरते की चमक बचाने की कोशिश में। उसी कीचड़ में से कुछ गाड़ियां गुजर रही थीं, चुनावी प्रचार की। भाषणों के स्पीकर फट रहे थे, और जनता? जनता कीचड़ में गुम थी।
थोड़ा आगे बढ़ा तो देखा एक लड़का एक न्यूज वाले से बात कर रहा है। उसकी आंखों में चमक नहीं था, सिर्फ़ ज़रूरत थी, बेहतर सड़कें चाहिए थीं, अच्छे अस्पताल चाहिए थे, स्कूल चाहिए था और सबसे ज़्यादा, रोज़गार चाहिए था। वो बोल रहा था, सपनों की भाषा में… और मैं सुन रहा था, टूटी हुई सड़कों पर खड़ा हुआ।
अचानक उस लड़के के पीछे एक पोस्टर लहराया, “अनंत सिंह ज़िंदाबाद।" फ़िर दूसरा पोस्टर "गोपाल मंडल जिंदाबाद।" फिर तीसरा पोस्टर "आनंद मोहन जिंदाबाद।" वो पोस्टर किसी दीवार पर नहीं, बल्कि उसकी उम्मीदों के चेहरे पर तमाचा बनकर चिपक गया। अनंत सिंह, जिसे विध���नसभा की सीटों का भी ठीक से हिसाब नहीं मालूम… वो क्या देगा उसे अस्पताल? गोपाल मंडल जो कहता है कि मैं अपने बेटे को अपशब्द कहता हूं, वो क्या दे पायेगा बिहारियों को इज्ज़त और रोजगार। पार्टियों ने ग़लत लोगों को टिकट देकर पहले ही बिहारियों के मुंह पर तमाचा दे मारा है, बता दिया है कि बिहार नहीं बदलेगा।
सपने में ही पटना स्टेशन पहुंच गया मैं। वहां थोक में लौटते बिहारी थे, वही लोग जो दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात की फैक्ट्रियों में अपने सपनों को पसीने में गलाकर रुपये में बदलते हैं। किसी ने कहा, “दो दिन का सफर था, सीट नहीं मिली, खड़े-खड़े आया हूं।” कोई कह रहा था, “बस अपने बच्चे को देख लूं, सारी थकान उतर जाएगी।” उनकी आंखों में थकान थी, लेकिन दिल में मिट्टी की गंध थी। जिस मिट्टी ने उन्हें गरीबी दी, वही मिट्टी उन्हें घर लौटने का कारण भी बनती है। अजीब है न, बिहार, तुम अपने ब��्चों को सब कुछ नहीं दे पाए, फिर भी वो सबसे पहले तुम्हारे पास ही लौटते हैं।
बिहार, क्या तुम सच में सोचते हो कि ये चुनाव तुम्हारे लिए हो रहा है? तुम्हारे लोगों के लिए हो रहा है? नहीं। ये चुनाव तुम्हारे नाम पर है, तुम्हारे लिए नहीं। ये चुनाव तय करेगा, अब अगली बारी किसकी है। अब कौन सी पार्टी तुम्हारी मिट्टी को ठेके में बेचेगी। अब कौन सी पार्टी अस्पतालों में लोगों की जान बचाने की बजाय चुनावी भाषणों म���ं आंकड़े गढ़ेगी। अब कौन सी पार्टी बालू माफियाओं से धन एकत्रित करेगा।
अब कौन अपने बेटों को विदेश से बुलाकर ��ुम्हारे बेटों की मेहनत को लूटेगा। तुम्हारे गांवों में अब भी सड़कों की जगह कीचड़ है, तुम्हारे अस्पतालों में अब भी ऑक्सीजन से पहले जुगाड़ चलता है, तुम्हारे बच्चों के पास अब भी बैग तो है लेकिन स्कूल नहीं… फिर भी हर पांच साल में चुनाव आता है, और चला जाता है। बदलता है तो सिर्फ़ झंडे का रंग। नेता वही रहते हैं, चेहरे पर मुस्कान, हाथ में झूठ।
बिहार, तुम कोई ज़मीन का टुकड़ा नहीं हो, तुम वो मिट्टी हो जिसन��� आज भी अपने बच्चों को उम्मीद दी है। लेकिन सच ये है–तुम्हारे बच्चों ने तुम्हें बहुत कुछ दिया, और तुमने उन्हें सिर्फ़ प्रवास। कभी सोचना… जो राज्य अपने बच्चों को रोक नहीं पाता, वो राज्य बदलने का सपना कैसे देखेगा?
ख़त लिखने वाला लड़का।
चाय इश्क़ और राजनीति।
यह जानते हुए ��ी
कि आगे बढना
निरंतर कुछ खोते जाना
और अकेले होते जाना है
मैं यहाँ तक आ गया हूँ
जहाँ दरख्तों की लंबी छायाएं
मुझे घेरे हुए हैं......
~~ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना