ईशा फाउंडेशन को श्मशान के संचालन की ज़िम्मेदारी मिली है। इसके बाद हो-हंगामा हो रहा है कि अरे शव जलाने का शुल्क लगेगा। क्यों नहीं लगेगा? राजा हरिश्चंद्र को भी देना पड़ा था।
जो सुविधाएँ देगा, वो ��ुल्क तो लेगा। वहाँ ईशा फाउंडेशन के स्वयंसेवक भी होंगे, जो न केवल शवदाह में मदद करेंगे बल्कि अपने ज्ञान से शोकाकुल परिजनों को धैर्य भी बँधाएँगे। इलेक्ट्रिक शवदाह होगा तो बिजली का ख़र्चा आता ही है, इतना बड़ा परिसर है तो बिजली-पानी-सफाई समेत मेंटेनेंस में ख़र्च आएगा ही।
पंडित होते हैं, डोम होते हैं - तो ख़र्च लगेगा ही। लकड़ी ख़रीदने की सुविधा है, वो पैसे से ही मिलता है। फिर हो-हल्ला कैसा? फिर जो ��क रुपए में ज़मीन दिए जाने की बात कही जा रही है, वहाँ सद्गुरु बड़ा निवेश करेंगे।
आपको भी सैकड़ों करोड़ निवेश करने हैं जो जाइए दावा ठोकिए। भूमि की माँग कीजिए। रोज़गार दीजिए, इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कीजिए - आपको भी मिल जाएगी ज़मीन। गुजरात में टाटा से लेकर अडानी तक को भूमि दी गई, आज देखिए वहाँ कितनी ख़ुशहाली है।
हर चीज में नुक़्स निकालना कुंठित मानसिकता की निशानी है। भावना सहयोग की होनी चाहिए, अगर कोई आपके राज्य में आकर पैसे लगाना चाह रहा है तो। एक ईशा फाउंडेशन के कारण कोयम्बटूर का एक ग्रामीण इलाक़ा वैश्विक पर्यटन का केंद्र बना हुआ है। शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में वहाँ सद्गुरु की टीम योगदान दे रही है।
अडानी और सद्गुरु नहीं तो निवेश कौन करेगा? एलन मस्क और जेफ़ बेज़ोस?
हम सबके लिए यह गर्व की बात है कि उत्तर प्रदेश भारत के सेमीकंड��्टर इकोसिस्टम का एक बड़ा सेंटर बनने जा रहा है। HCL और Foxconn की नई फैक्ट्री टेक्नोलॉजी पावरहाउस के रूप में यूपी की नई पहचान को और सशक्त करेगी।
पटना में NEET की आकांक्षी छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत और उसके बाद की पूरी कार्रवाई ने एक बार फिर सिस्टम की गहरी सड़ांध को उजागर कर दिया है।
पीड़ित परिवार ने जब निष्पक्ष जाँच और न्याय की माँग की, तो वही पुराना भाजपा-NDA मॉडल सामने आ गया - केस को भटकाओ, परिजनों को प्रताड़ित करो और अपराधियों को सत्ता का संरक्षण दो।
इस बेटी के लिए न्याय की आवाज़ बनकर साथी सांसद पप्प��� यादव जी मजबूती से खड़े हुए।
आज उनकी गिरफ़्तारी साफ़ तौर पर राजनीतिक प्रतिशोध है ताकि जवाबदेही माँगने वाली हर आवाज़ को डराया और दबाया जा सके।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि यह घटना किसी एक मामले तक सीमित नहीं दिखती।
यह एक भयावह साज़िश और खतरनाक पैटर्न की ओर इशारा करती है, जहाँ और भी बेटियाँ शिकार बन रही हैं और सत्ता ��स खौफ़नाक सच्चाई से आँखें मूँद कर बैठी है।
यह राजनीति नहीं, इंसाफ़ का सवाल है। यह बिहार की बेटी की इज़्ज़त और सुरक्षा का सवाल है।