सुदिनं सुदिनं जन्मदिनं तव, भवतु मंगलं जन्मदिनम्।
चिरं ���ीव कुरु पुण्यवर्धनम्, चिरं जीव कुरु कीर्तिवर्धनम्॥
सुदिनं पुनः पुनरावर्तताम्॥
भारत की कालजयी सनातन संस्कृति एवं जीवन-मूल्यों के संवाहक तथा लोककल्याण एवं सुशासन के प्रति समर्पित भारत के यशस्वी केंद्रीय रक्षा मंत्री माननीय श्री राजनाथ सिंह जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आपका सौम्य व्यक्तित्व, सहज विनम्रता, सशक्त नेतृत्व, दूरदर्शी चिंतन तथा राष्ट्रहित के प्रति अखण्ड समर्पण करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने, रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का स्वर्णिम अध्याय लिखने तथा एक समर्थ, सुरक्षित और आत्मविश्वासी भारत के निर्माण में आपका योगदान अत्यंत प्रशंसनीय एवं ऐतिहासिक है। शासन, प्रशासन और राष्ट्रीय नीति के विविध आयामों पर आपकी गहन दृष्टि, अनुभव एवं निर्णय क्षमता राष्ट्रजीवन को निरंतर नई दिशा प्रदान कर रही है।
परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना है कि आपक�� उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, अक्षुण्ण यश, अदम्य ऊर्जा एवं सतत् राष्ट्रसेवा का सामर्थ्य प्रदान करें ताकि आपके नेतृत्व में भारत निरंतर वैभव, सुरक्षा, समृद्धि और गौरव के शिखरों का स्पर्श करता रहे।
शुभमस्तु। मंगलमस्तु।
#राजनाथसिंह #रक्षामंत्री
@rajnathsingh @NeerajSinghSays @PankajSinghBJP
In a world that constantly encourages us to seek more, achieve more, and possess more, true peace often seems elusive. Yet the secret to a joyful and meaningful life has always remained simple : contentment.
Contentment is not the absence of ambition, nor is it settling for less than our potential. Rather, it is the noble ability to appreciate what we already have while continuing to move forward with wisdom and gratitude. A contented heart does not measure life by possessions, status, or comparison with others; it measures life by the abundance of blessings already received.
When we learn to be grateful, our perspective changes. Instead of focusing on what is missing, we begin to recognize the countless gifts that surround us- our health, our family, our friends, the beauty of nature, the opportunities before us, and the simple privilege of being alive. Gratitude transforms ordinary moments into sacred experiences and fills the heart with serenity.
Discontentment breeds anxiety, restlessness, and endless craving. It keeps the mind trapped in the pursuit of what lies beyond reach. Contentment, however, brings balance and inner freedom. It allows us to enjoy the present moment without being burdened by regrets of the past or worries about the future.
Every day offers an opportunity to cultivate this beautiful virtue. Begin by appreciating the blessings that often go unnoticed. Offer thanks for the people who care for you, the lessons learned through challenges, and the countless ways life supports your growth. The more grateful you become, the richer your life will feel.
True happiness does not come from having everything we desire; it comes from valuing everything we have. A grateful heart is a peaceful heart, and a peaceful heart is a truly prosperous one. Be grateful. Be contented. Value your blessings. In contentment lies peace, and in peace lies the greatest wealth of life.
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो
विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः ।
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक
इन्मही देवस्य सवितुः परि��्टुतिः ।।४।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र वैदिक अध्यात्म की अत्यन्त सूक्ष्म एवं रहस्यमयी साधना-दृष्टि को उद्घाटित करता है। यहाँ उपनिषद् केवल किसी बाह्य यज्ञ-विधान अथवा देवोपासना का निरूपण नहीं कर रही, अपितु मानव-चेतना के अन्तर्मुखी जागरण, मन-बुद्धि के संयमन तथा परमात्मतत्त्व में उनके एकीकरण की दिव्य प्रक्रिया का संकेत दे रही है। भगवद्पादाचार्��� भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य की अद्वैत-वेदान्त-दृष्टि से यह मन्त्र आत्मविद्या की ओर अग्रसर साधक की अन्तःयात्रा का गम्भीर दिग्दर्शन करता है।
इस मन्त्र में प्रयुक्त “युञ्जते” पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। “युज्” धातु से बना यह शब्द योग, संयम, एकाग्रता और समर्पण इन सभी भावों का वहन करता है। उपनिषद् कहती है - “युञ्जते मनः, युञ्जते धियः” अर्थात्, ज्ञानीजन अपने मन और बुद्धि को संयमित करते हैं, उन्हें किसी लौकिक विषय में नहीं, अपितु “विप्रस्य बृहतो विपश्चितः” उस सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, महान् चेतन तत्त्व में प्रतिष्ठित करते हैं। शाङ्करभाष्य के आलोक में यहाँ “बृहत्” शब्द ब्रह्म का बोधक है - जो देश, काल, वस्तु और समस्त उपाधियों से अतीत, अनन्त, अखण्ड और सर्वव्यापक है। “विपश्चित्” अर्थात्, जो स्वयं प्रकाशस्वरूप चैतन्य है, जो सबको जानता है, किन्तु जिसे कोई अन्य ज्ञाता प्रकाशित नहीं कर सकता।
अद्वैत वेदान्त के अनुसार मन और बुद्धि स्वभावतः बहिर्मुख हैं। मन विषयों की ओर भागता है, बुद्धि नाम-रूप के भेदों में उलझती है; परिणामस्वरूप जीव संसार के अनन्त विक्षेपों में भटकता रहता है। किन्तु जब साधक विवेक और वैराग्य से सम्पन्न होकर गुरु-उपदेश तथा श्रुति-वाक्यों के प्रभाव से अन्तर्मुख होता है, तब वही ��न और बुद्धि आत्मसाक्षात्कार के साधन बन जाते हैं। भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि अशुद्ध, चञ्चल और विषयासक्त अन्तःकरण ब्रह्मविद्या का अधिकारी नहीं हो सकता। अतः साधना का प्रथम चरण है - चित्तशुद्धि, अन्तःकरण-नैर्मल्य और एकाग्रता।
यहाँ “विप्राः” शब्द भी अत्यन्त सूक्ष्म है। सामान्य अर्थ में विप्र विद्वान् या ऋषि को कहते हैं, किन्तु शाङ्करवेदान्त में वास्तविक विप्र वह है, जिसने आत्��तत्त्व का चिन्तन किया हो, जिसकी बुद्धि सत्य की ओर जागृत हो चुकी हो। ऐसा साधक जानता है कि बाह्य जगत् की समस्त गति परिवर्तनशील है; नित्य सत्य केवल आत्मा है। इसलिए वह अपने मन और बुद्धि को बाह्य विषयों से हटाकर उस अखण्ड चैतन्य में स्थित करता है।
मन्त्र का अगला चरण - "वि होत्रा दधे वयुनाविदेकः” और भी गूढ़ है। “वयुनावित्” अर्थात्, समस्त कर्मों, गतियों, रहस्यों एवं सृष्टि-विन्यास को जानने वाला परम��श्वर। वही एक परम देव अपने द्वारा विविध “होत्रा” अर्थात् यज्ञरूप कर्मों, इन्द्रियों की प्रवृत्तियों और प्राणशक्तियों का विधान करता है। अद्वैतदृष्टि से सम्पूर्ण जगत् उसी ब्रह्म की मायाशक्ति का अभिव्यक्त रूप है। समस्त क्रियाएँ, यज्ञ, ज्ञान, प्रेरणाएँ और चेतन-गतियाँ उसी परम चेतना में अधिष्ठित हैं। जीव स्वयं को कर्ता मानता है, परन्तु भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार वास्तविक सत्ता केवल आत्मा की है; कर्तृत्व, भोक्तृत्व और जगत् की समस्त विविधता अविद्याजन्य उपाधियों का अध्यास है।
यह मन्त्र वैदिक “सविता” की भी महिमा का वर्णन करता है - “मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः।” यहाँ “सविता” केवल भौतिक सूर्य नहीं है। शाङ्करभाष्य के अनुसार यह उस परम चेतना का प्रतीक है जो सम्पूर्ण जगत् को प्रेरित करती है। जैसे सूर्य सम्पूर्ण विश्व को प्रकाश देता है किन्तु किसी कर्म में लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा समस्त अनुभवों का साक्षी होकर भी अकर्ता और अभोक्ता रहती है। उपनिषद् का यह मन्त्रमय संकेत साधक को बाह्य सूर्य से अन्तःस्थित चैतन्य-सूर्य की ओर ले जाता है।
भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य कहते हैं कि आत्मा स्वयंप्रकाश है - “न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं।” मन और बुद्धि उसी आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। जब साधक मन को संयमित कर बुद्धि को शुद्ध करता है, तब अन्ततः उसे ज्ञात होता है कि जिस ब्रह्म को वह बाहर खोज रहा था, वही उसके अन्तःकरण ��ें साक्षिरूप से सदा विद्यमान है। यही आत्मबोध उपनिषदों का चरम प्रतिपाद्य है।
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LIVE IN HARMONIOUS CO-EXISTENCE WITH OTHERS.
Human life finds its highest fulfillment not in isolation, but in harmonious relationships built on mutual respect, understanding, and compassion. Every individual, regardless of their background, beliefs, culture, status, or circumstances, deserves to be treated with dignity and honor. True greatness is reflected not by how we treat those who are powerful, but by how we behave toward every person we encounter.
Harmony begins with the recognition that all beings are interconnected. When we cultivate kindness, patience, tolerance, and empathy, we contribute to an atmosphere of peace and goodwill. Respecting the thoughts, feelings, and rights of others strengthens the bonds of society and creates an environment where everyone can flourish.
Differences in opinions, traditions, and lifestyles need not become causes of conflict. Instead, they can become opportunities for learning, growth, and mutual enrichment. A wise person seeks understanding rather than division, cooperation rather than confrontation, and unity rather than discord.
Let us strive to live with humility, courtesy, and consideration. Let us speak with gentleness, act with fairness, and extend goodwill to all. By honoring the inherent dignity of every individual, we not only elevate others but also enrich our own character.
A harmonious world begins with harmonious hearts. When respect guides our actions and compassion shapes our relationships, peace becomes a living reality. Let us therefore live together in a spirit of harmony, treating every person with respect, dignity, and sincere goodwill.
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्यतो धिया दिवम्।
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ।।३।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीय अध्याय)
मन और बुद्���ि का संयम : साधना का प्रथम सोपान ! अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक संकेतों से युक्त है। शाङ्करवेदान्त की दृष्टि से यह केवल वैदिक कर्म या देवोपासना का विधान नहीं, अपितु अंततः ब्रह्मविद्या की ओर उन्मुख साधना-मार्ग का दिग्दर्शन करता है।
भवदपादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के भाष्य के अनुरूप, “युक्त्वा मनसा” का तात्पर्य है-मन को संयमित, एकाग्र और अंतर्मुख करना। चञ्चल, विषयासक्त और विक्षिप्त मन न तो देवताओं का यथार्थ ध्यान कर सकता है, न ही आत्मतत्त्व का साक्षात्कार। अतः साधक का प्रथम प्रयास मन को विषयों से हटाकर तत्त्व की ओर लगाना है।
यहाँ “देवान्” शब्द केवल बाह्य देवताओं तक सीमित नहीं है; भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य इसे इन्द्रिय-शक्तियों अथवा चेतना के विभिन्न प्रकाश-आयामों के रूप में भी ग्रहण करते हैं। ज��� साधक अपने मन को संयमित कर इन्द्रियों को एकाग्र करता है, तब वह बिखरी हुई चेतना को एक केन्द्र में स्थापित करता है - यही उपासना का वास्तविक आरम्भ है।
धिया दिवम् - बुद्धि का उत्कर्ष और ब्रह्मबोध की दिशा ! “सुवर्यतो धिया दिवम्” यहाँ “धिया” (बुद्धि) का विशेष महत्व है। शंकरभाष्य में बुद्धि को वह माध्यम माना गया है, जिसके द्वारा आत्मा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट होता है। “दिवम्” का अर्थ केवल स्वर्ग नहीं, बल्कि प्रकाशस्वरूप चेतना का उच्चतम स्तर है। अतः यह वाक्य इंगित करता है कि साधक को केवल मन के संयम पर ही नहीं रुकना चाहिए, बल्कि अपनी बुद्धि को भी सूक्ष्म, निर्मल और विवेकयुक्त बनाना चाहिए। यही “विवेक” (��ित्य-अनित्य-वस्तु-विवेक) शाङ्करवेदान्त की साधना का मूलाधार है। बुद्धि जब शुद्ध होती है, तब वह ब्रह्म के प्रकाश को धारण करने योग्य बनती है।
बृहज्ज्योतिः ब्रह्म का परम प्रकाश ! बृहज्ज्योतिः करिष्यतः” यहाँ “बृहज्ज्योति” से अभिप्राय है वह अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश ब्रह्म, जो समस्त ज्योतियों का भी ज्योति है। यह वही तत्त्व है जिसे उपनिषद् अन्यत्र “ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः” कहकर निरूपित करते हैं। भगवत्पाद भगवान आद्य शंकराचार्य के अनुसार, यह “बृहज्ज्योति” कोई बाह्य प्रकाश नहीं, अपितु आत्मस्वरूप चैतन्य है-जो सदा प्रकाशित है, किन्तु अज्ञान के कारण अप्रत्यक्ष प्रतीत होता है। साधक का लक्ष्य इसी आत्मज्योति का साक्षात्कार करना है।
सविता- प्रेरक शक्ति के रूप में ईश्वर !
“सविता प्रसुवाति तान्” यहाँ “सविता” (सूर्य) को भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य केवल भौतिक सूर्य तक सीमित ���हीं करते, बल्कि उसे उस परम चेतन सत्ता का प्रतीक मानते हैं, जो समस्त साधना को प्रेरित और सम्पन्न कराती है। यह “सविता” ईश्वर का वह रूप है जो साधक के अंतःकरण को शुद्ध करता है, उसे साधना में प्रवृत्त करता है और अन्ततः ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर करता है। अद्वैत वेदान्त में, यद्यपि ब्रह्म निराकार और निर्गुण है, तथापि उपासना के स्तर पर यही ईश्वर (ईश्वर-तत्त्व) साधक का मार्गदर्शक बनता है।
शाङ्करवेदान्तीय समन्वय : उपासना से ज्ञान की ओर ! इस मंत्र का गूढ़ संदेश यह है कि
प्रारम्भ में साधक मन और इन्द्रियों को संयमित करता है तत्पश्चात बुद्धि को शुद्ध और विवेकयुक्त बनाता है; फिर ईश्वर-प्रेरणा से ब्रह्मप्रकाश की ओर अग्रसर होता है और अंततः बृहज्ज्योति आत्मस्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करता है
भगवत्पाद भाष्यकार आदि शंकराचार्य के अनुसार, उपासना (देव-चिन्तन) और ज्ञान (ब्रह्मबोध) परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि साधना के क्रमिक सोपान हैं। यह मंत्र उसी क्रम का संकेत देता है- जहाँ देवोपासना अन्ततः आत्मज्ञान में परिणत होती है।
इस प्रकार, यह मंत्र साधक को एक समग्र साधना-पथ प्रदान करता है। मन के संयम से प्रारम्भ होकर बुद्धि की शुद्धि, ईश्वर की प्रेरणा और अन्ततः ब्रह्मसाक्षात्कार तक।
शाङ्करवेदान्त की दृष्टि में यह सम्पूर्ण प्रक्रिया बाह्य से आन्तरिक, उपासना से ज��ञान, और अनेकता से अद्वैत की ओर यात्रा है। जब साधक “बृहज्ज्योति” अपने ही आत्मस्वरूप को पहचान लेता है, तब वह समस्त बन्धनों से मुक्त होकर परम शान्ति और आनन्द को प्राप्त करता है।
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"सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।
कुतस्तद्धनलुब्धानामित��्चेतश्च धावताम् ।।"
संतोष ही शान्ति की सच्ची कुँजी है।
कृतज्ञ हृदय जीवन को आनन्दमय बनाता है। जो अपने आशीर्वादों का मूल्य जानता है, वही वास्तव में समृद्ध है। संतोष में ही सुख, शान्ति और आत्मिक सम्पन्नता निहित है।
आज का मनुष्य बाह्य उपलब्धियों, भौतिक साधनों और निरन्तर बढ़ती आकांक्षाओं के बीच जीवन व्यतीत कर रहा है, किन्तु इसके बावजूद उसके अन्तःकरण में शान्ति का अभाव दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि वास्तविक सुख और शान्ति बाहरी वस्तुओं में नहीं, अपितु संतोषपूर्ण मन में निहित हैं। वस्तुतः संतोष ही शान्ति की कुँजी है और कृतज्ञता ही संतोष का आधार है।
संतोष का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य पुरुषार्थ का त्याग कर दे अथवा प्रगति की इच्छा छोड़ दे। इसका वास्तविक अर्थ है - ईश्वर द्वारा प्रदत्त जीवन, परिस्थितियों, अवसरों और उपलब्धियों के प्रति कृतज्ञ रहते हुए अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना। संतोषी व्यक्ति अभावों में भी व्याकुल नहीं होता और उपलब्धियों में अहंकारग्रस्त नहीं होता। उसका जीवन समत्व, संयम और प्रसन्नता से परिपूर्ण होता है।
कृतज्ञता मनुष्य के जीवन को दिव्यता से जोड़ती है। जब हम अपने जीवन में प्राप्त प्रत्येक अनुग्रह को ईश्वर की कृपा के रूप में स्वीकार करते हैं, तब हृदय में विनम्रता, प्रसन्नता और आत्मिक सम्पन्नता का उदय होता है। जो व्यक्ति अपने जीवन के छोटे-से-छोटे सुख और अवसर के प्रति भी धन्यवाद का भाव रखता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता; क्योंकि उसका हृदय सदैव समृद्ध रहता है।
असंतोष मन में तुलना, स्पर्धा, चिन्ता और अशान्ति को जन्म देता है, जबकि संतोष मन को स्थिरता, धैर्य ��र आन्तरिक आनन्द प्रदान करता है। जो व्यक्ति अपने जीवन की उपलब्धियों, सम्बन्धों और ईश्वरप्रदत्त कृपाओं का सम्मान करना सीख लेता है, वह बाहरी परिस्थितियों से पर�� जाकर भी सुखी रह सकता है।
आइए ! हम अपने जीवन में कृतज्ञता का दीप प्रज्वलित करें, संतोष का भाव विकसित करें और अपने प्राप्त आशीर्वादों का सम्मान करें। स्मरण रहे- धन, वैभव और सफलता जीवन को सुविधाएँ दे सकते हैं, किन्तु संतोष ही वह अमूल्य निधि है, जो मनुष्य को वास्तविक शान्ति, प्रसन्नता और आत्मिक समृद्धि प्रदान करती है।
संतोषी हृदय ही सबसे धनी हृदय है; कृतज्ञ जीवन ही सबसे सुखी जीवन है, और शान्त मन ह�� मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति है।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे ।
सुवर्गेयाय शक्त्या ।।२।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्यायः)
यह मन्त्र साधना के उस अत्यन्त सूक्ष्म और गूढ़ आयाम का उद्घाटन करता है, जहाँ साधक का मन, बुद्धि और सम्पूर्ण अन्तःकरण एक दिव्य प्रेरणा के अधीन होकर परम तत्त्व की ओर उन्मुख होता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह वाक्य, भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव में, केवल एक वैदिक प्रार्थना नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्या की साधना का सुसूत्रित दार्शनिक विधान है।
“युक्तेन मनसा वयम्” चित्त की समाहित अवस्था ! इस मन्त्र का प्रारम्भ “युक्तेन मनसा” से होता है। “युक्त” शब्द यहाँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शाङ्कर���ेदान्त में “युक्तता” का अर्थ केवल बाह्य एकाग्रता नहीं, बल्कि अन्तःकरण की पूर्ण समाहित, संयत और विषयवासनाओं से निवृत्त अवस्था है। ऐसा मन न तो विषयों में बिखरता है, न स्मृति-कल्पनाओं के जाल में उलझता है; वह आत्मतत्त्व की ओर प्रवृत्त होता है।
यह भाव श्रीमद्भगवद्गीता में प्रतिपादित “योगयुक्तो विशुद्धात्मा” तथा “समत्वं योग उच्यते” के सिद्धान्त के अनुरूप है। जब मन समत्व में प्रतिष्ठित होत�� है, तभी वह ज्ञान का अधिकारी बनता है। भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार, चित्त की शुद्धि और एकाग्रता के बिना ब्रह्मज्ञान का उदय असंभव है। अतः यह पद साधना के मूलाधार मनोनिग्रह और चित्तशुद्धि की अनिवार्यता को उद्घाटित करता है।
“देवस्य सवितुः सवे” ��िव्य प्रेरणा का तत्त्व !
मन्त्र का अगला पद “देवस्य सवितुः सवे” है। “सविता” वैदिक वाङ्मय में वह दिव्य चेतन शक्ति है, जो समस्त जगत् को प्रेरित करती है, गति देती है और प्रकाशमान करती है। शाङ्करभाष्य की दृष्टि से यह बाह्य सूर्य का द्योतक मात्र नहीं, बल्कि वह अन्तर्यामी चैतन्य है, जो बुद्धि को आलोकित करता है।
यहाँ साधक यह स्वीकार करता है कि यद्यपि वह स्वयं प्रयास करता है, किन्तु उसकी साधना की अन���तिम सिद्धि किसी अहंकारगत पुरुषार्थ का फल नहीं, बल्कि उस दिव्य प्रेरणा का परिणाम है। भाव बृहदारण्यक उपनिषद के “तमसो मा ज्योतिर्गमय” के तथा कठोपनिषद के “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः…” के सिद्धान्तों से पूर्णतः संगत है। आत्मतत्त्व का प्रकाश उसी को प्राप्त होता है, जिसे वह स्वयं प्रकाशित करता है।
अतः “सविता” यहाँ ईश्वर, ब्रह्म या शुद्ध चैतन्य का प्रतीक है- वह शक्ति जो साधक की बुद्धि को सत्य की ओर प्रेरित करती है और उसे अविद्या के अन्धकार से बाहर लाती है।
“सुवर्गेयाय शक्त्या” यह पद विशेष दार्शनिक गहराई लिए हुए है। सामान्यतः “सुवर्ग” का अर्थ स्वर्गलोक या सुखप्रद स्थिति माना जाता है, किन्तु शाङ्करवेदान्त में इसका गूढ़ार्थ इससे कहीं अधिक उच्च है। यहाँ “सुवर्ग” का तात्पर्य उस चेतन-स्थिति से है, जहाँ साधक स्थूल और सूक्ष्म बन्धनों से ऊपर उठकर आत्मस्वरूप की ओर अग्रसर होता है। यह वही स्थिति है, जिसका संकेत मुण्डकोपनिषद में “परिक्ष्य लोकान् कर्मचितान्…” के माध्यम से किया गया है - जहाँ साधक कर्मफल के सीमित क्षेत्र से निवृत्त होकर ज्ञानमार्ग की ओर उन्मुख होता है।
“शक्ति” यहाँ केवल शारीरिक या मानसिक सामर्थ्य नहीं, बल्कि साधना-स��र्थता, अन्तःकरण की परिपक्वता और ईश्वरीय अनुग्रह का संयुक्त रूप है। यह वही शक्ति है, जो साधक को अधःस्थित अनुभवों से उठाकर ऊर्ध्व, सूक्ष्म और अन्ततः ब्रह्मनिष्ठ अवस्था की ओर ले जाती है।
यदि इस मन्त्र को प्रस्थानत्रयी- उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र के आलोक में देखा जाए, तो यह एक समग्र साधन-मार्ग का सूत्र बन जाता है। उपनिषद् यहाँ तत्त्व का प्रतिपादन करते हैं मन को संयमित कर उसे सत्य की ओर उन्मु�� करना है । श्रीमद्भगवद्गीता मनोनिग्रह, समत्व और योगयुक्तता के माध्यम से इस साधना को व्यवहारिक रूप देती है। ब्रह्मसूत्र “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” के द्वारा इस आन्तरिक प्रेरणा को दार्शनिक दिशा प्रदान करते हैं। इस प्रकार यह मन्त्र साधना के तीनों आयामों ��ुरुषार्थ, ईश्वरीय अनुग्रह और ज्ञान का अद्वैत समन्वय प्रस्तुत करता है।
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव में इस मन्त्र का सार यह है कि ब्रह्मविद्या का उदय किसी आकस्मिक घटना के रूप में नहीं होता। उसके लिए आवश्यक है कि मन की युक्तता (संयम और एकाग्रता),
बुद्धि की दिव्य प्रेरणा (सविता का प्रकाश) और साधक की आन्तरिक शक्ति (शक्ति) द्वारा चेतना का ऊर्ध्वगमन। जब ये तीनों तत्त्व ए��त्र होते हैं, तभी साधक तत्त्वचिन्तन के योग्य बनता है और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में अग्रसर होता है।
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!! “सनातन शंखनाद” !!
देवाधिदेव महादेव भगवान श्रीपशुपतिनाथ के दर्शन-पूजन तथा सनातन धर्म-संस्कृति के वैश्विक जागरण के पावन संकल्प के साथ "हिन्दू धर्म आचार्य सभा" के अध्यक्ष, परम पूज्य श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद श्रीस्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” 19 से 21 जून, 2026 तक त्रिदिवसीय नेपाल यात्रा पर पधार रहे हैं।
इस दिव्य प्रवास के अंतर्गत "पूज्य आचार्यश्री जी" काठमांडू स्थित विश्वविख्यात एवं परम पावन श्रीपशुपतिनाथ मन्��िर में श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करेंगे, सन्त-महात्माओं, धर्माचार्यों, विद्वज्जनों एवं श्रद्धालुओं से आत्मीय भेंट करेंगे तथा सनातन धर्म के शाश्वत, सार्वभौमिक, लोककल्याणकारी और समन्वयमय संदेश का प्रसार करेंगे। "कुमारी देवी" पूजन सहित विविध धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भी उनकी गरिमामयी उपस्थिति रहेगी।
नेपाल के विराटनगर में "हिन्दू स्वयं सेवक संघ", नेपाल द्वारा आयोजित विशेष कार्यक्रम में "पूज्य आचार्यश्री जी" के पावन करकमलों से सनातन धर्म-संस्कृति जागरण हेतु समर्पित संगठन के कार्यालय का भव्य लोकार्पण सम्पन्न होगा। इसी पावन अवसर पर उनके दिव्य सान्निध्य में एक विराट धर्मसभा का आयोजन होगा, जिसमें सन्त-महात्मा, धर्माचार्य, विद्वज्जन, धर्मप्रेमी एवं श्रद्धालुजन बड़ी संख्या में सहभागिता करेंगे।
यह यात्रा भारत और नेपाल की प्राचीन साझा सनातन विरास���, सांस्कृतिक एकात्मता, आध्यात्मिक चेतना और आत्मीय सम्बन्धों को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला ऐतिहासिक एवं प्रेरणादायी अवसर है। "पूज्य आचार्यश्री जी" की पावन उपस्थिति से नेपाल की पुण्यभूमि पर धर्म, संस्कृति, सेवा, करुणा, समरसता, विश्वबंधुत्व और सनातन चेतना का पुनः दिव्य एवं मंगलमय शंखनाद होगा।
#पशुपतिनाथ #नेपाल
#हिन्दू_स्वयंसेवक_संघ_नेपाल
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#स्वामी_अवधेशानन्द_गिरि
।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ।।१।।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् – द्वितीयोऽध्यायः)
यह मन्त्र साधना, ध्य��नयोग और आत्मविद्या के सम्पूर्ण पथ का उद्घाटन करता है। यदि प्रथम अध्याय में उपनिषद् ने ब्रह्मतत्त्व की जिज्ञासा और उसके स्वरूप का विवेचन किया है, तो द्वितीय अध्याय में वह साधक को उस दिव्य अनुभूति तक पहुँचने की साधना-पद्धति का निर्देश देता है। यह मन्त्र वस्तुतः वेदान्त और योग के अद्भुत समन्वय का उद्घोष है।
“युञ्जानः प्रथमं मनः” यह वाक्यांश सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का आधार है। ‘युञ्जानः’ धातु ‘युज्’ से बना है, जिसका अर्थ है- जोड़ना, नियोजित करना, संयमित करना और परम लक्ष्य में स्थापित करना। यही धातु आगे चलकर ‘योग’ शब्द का आधार बनती है। अतः उपनिषद् कहता है कि साधना का प्रथम चरण बाह्य जगत् का परित्याग नहीं, अपितु मन का संयम�� है।
मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मोक्ष का साधन। अमृतबिन्दू उपनिषद् का प्रसिद्ध वचन है- “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
विषयों में आसक्त मन बन्धन का कारण बनता है और आत्मा में प्रतिष्ठित मन मुक्ति का द्वार खोल देता है। इसलिए साधक को सर्वप्रथम अपने मन को चञ्चलता, विषयासक्ति, राग-द्वेष, भय, कामना और अहंकार से मुक्त करना पड़ता है। जिस प्रकार अशान्त जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब स्पष्ट न���ीं दिखता, उसी प्रकार विक्षिप्त चित्त में आत्मतत्त्व का प्रकाश प्रतिबिम्बित नहीं हो सकता।
“तत्त्वाय” यह पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मन को एकाग्र करना ही पर्याप्त नहीं; वह किस लक्ष्य के लिए एकाग्र किया जा रहा है, यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। संसार में चोर भी एकाग्र होता है, वैज्ञानिक भी एकाग्र होता है और कलाकार भी। परन्तु उपनिषद् जिस एकाग्रता की बात करता है, उसका लक्ष्य परम तत्त्व है- वह सत्य जो त्रिकालाबाधित, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है।
वेदान्त की दृष्टि में तत्त्व का अर्थ है- वह जो वास्तव में है। उपनिषद् साधक को असत्य से सत्य की ओर, अनित्य से नित्य की ओर और मृत्यु से अ��ृत की ओर ले जाना चाहता है - "असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय।"
अतः मन का संयम तभी सार्थक है, जब वह आत्मबोध और ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए हो।
“सविता धियः” यहाँ ‘सविता’ केवल दृश्य सूर्य नहीं, अपितु समस्त चेतना का दिव्य प्रेरक है। ऋग्वेद के गायत्री मन्त्र में भी यही भाव व्यक्त हुआ है- “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।”
सविता वह परम चेतन सत्ता है, जो बुद्धि को प्रेरित करती है, विवेक को जाग्रत करती है और अन्तःकरण को सत्य की ओर उन्मुख करती है। मनुष्य का पुरुषार्थ आवश्यक है, किन्तु ईश्वरीय अनुग्रह के बिना अन्तिम जागरण सम्भव नहीं। आत्मविद्या में साधना और कृपा दोनों का समन्वय अनिवार्य है।
“अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य” यहाँ अग्नि बाह्य अग्नि नहीं, अपितु ज्ञानाग्नि है। भगवद्गीता में भगवान कहते हैं- "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्म���ात्कुरुते तथा।"
ज्ञानरूपी अग्नि अविद्या, संशय और कर्मबन्धन को दग्ध कर देती है। ‘निचाय्य’ का अर्थ है- भलीभाँति समझकर, पहचानकर, अनुभवपूर्वक ग्रहण करना। केवल शास्त्र पढ़ लेने से ज्ञान नहीं होता; ज्ञान तब होता है जब साधक उस ज्योति को अपने अन्तःकरण में अनुभव करता है।
यह अग्निज्योति विवेक की ज्योति है, जो नित्य और अनित्य में भेद करना सिखाती है। यही आत्मप्रकाश है, जिसके उदय होते ही अज्ञानरूपी रात्रि समाप्त हो जाती है। मुण्डकोपनिषद् कहता है- “भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।”
ज्ञान-ज्योति के उदय से हृदय की गाँठें खुल जाती हैं और संशय समाप्त हो जा��े हैं।
“पृथिव्या अध्याभरत्” यह पद अत्यन्त गूढ़ है। पृथ्वी स्थूलता, जड़ता और भौतिक चेतना का प्रतीक है। साधक जब केवल शरीर, इन्द्रियों और विषयों तक सीमित रहता है, तब उसकी चेतना पृथ्वी-तत्त्व में बँधी रहती है। किन्तु जब वह ध्यान, विवेक और आत्मचिन्तन के द्वारा चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है, तब वह स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण और कारण से परब्रह्म की ओर आरोहण करता है। योगशास्त्र इसे चित्तवृत्���ि-निरोध कहता है, वेदान्त इसे आत्मविचार कहता है और उपनिषद् इसे तत्त्वाभिमुखता कहता है। नाम भिन्न हो सकते हैं, पर लक्ष्य एक ही है - आत्मस्वरूप की अनुभूति।
भगवत्पादाचार्य श्रीआदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव के अनुसार ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे नया प्राप्त करना हो। वह तो नित्यसिद्ध है। अज्ञान केवल उसके प्रकाश को ढँक देता है। इसलिए साधना का प्रयोजन ब्रह्म को उत्पन्न करना नहीं, अपितु अन्तःकरण को इतना शुद्ध बनाना है कि उसमें नित्य विद्यमान आत्मप्रकाश प्रतिबिम्बित हो सके।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद्
।। "सनातन शंखनाद" ���।
सनातन संस्कृति और उसके दिव्य मूल्यों के जागरण के लिए श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद
श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” का "नेपाल प्रवास"
दिनांक : 19 - 20 - 21 जून, 2026.
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श्री रेवित कुमार राजपूत जी (नेपाल)
+977 9852030103
बीते हुए कल के लिए शोकाकुल न हों और आने वाले कल की आशंकाओं से स्वयं को व्याकुल न करें। जीवन का वास्तविक सत्य केवल वर्तमान क्षण में न��हित है। अतीत स्मृति बन चुका है और भविष्य अभी समय के गर्भ में अव्यक्त है; हमारे अधिकार में केवल वर्तमान है। यही वह अमूल्य क्षण है जिसमें हम सोच सकते हैं, कर्म कर सकते हैं, स्वयं को रूपान्तरित कर सकते हैं और अपने जीवन को सार्थक दिशा दे सकते हैं।
मनुष्य का एक बड़ा दुःख यह है कि वह बीते हुए समय की भूलों, हानियों और पश्चात्तापों में उलझा रहता है, अथवा भविष्य की अनिश्चितताओं और कल्पित आशंकाओं से घिर�� रहता है। परिणामस्वरूप वह उस वर्तमान को खो देता है, जो वास्तव में उसके जीवन की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। अतीत को स्मरण करें, पर उससे बँधें नहीं; उससे शिक्षा ग्रहण करें, पर उसके बोझ तले दबें नहीं। भविष्य के लिए योजना ��नाएँ, पर उसकी चिन्ता में अपने वर्तमान की शान्ति न खोएँ।
वर्तमान क्षण ईश्वर का दिया हुआ अनुपम उपहार है। प्रत्येक श्वास, प्रत्येक अवसर और प्रत्येक परिस्थिति हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन अभी और यहीं है। जो व्यक्ति वर्तमान के मूल्य को समझ लेता है, वह जीवन के प्रत्येक क्षण को साधना, सेवा और आत्मविकास का अवसर बना लेता है। उसके लिए सफलता कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं रहती, बल्कि प्रत्येक क्षण में उत्क��ष्ट कर्म करने की प्रेरणा बन जाती है।
जीवन का वास्तविक सौन्दर्य अपने कर्तव्य को निष्ठा, समर्पण और उत्कृष्टता के साथ निभाने में है। मनुष्य चाहे किसी भी भूमिका में हो - विद्यार्थी, शिक्षक, गृहस्थ, अधिकारी, सेवक, साधक या संन्यासी - यदि वह अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह पूर्ण ईमानदारी और श्रद्धा के साथ करता है, तो उसका प्रत्येक कर्म साधना बन जाता है। कर्तव्यनिष्ठ जीवन ही आत्मविश्वास, शान्ति और ��ंतोष का आधार है।
फल की चिन्ता मन को दुर्बल बनाती है, जबकि कर्म की निष्ठा उसे शक्तिशाली बनाती है। परिणाम अनेक परिस्थितियों और ��ारणों पर निर्भर होते हैं, किन्तु कर्म की पवित्रता, परिश्रम की गुणवत्ता और संकल्प की दृढ़ता पूर्णतः हमारे हाथ में होती है। अतः अपनी समस्त ऊर्जा वर्तमान में श्रेष्ठ कर्म करने में लगाएँ। जब हम परिणामों की चिन्ता छोड़कर कर्तव्य पर केन्द्रित होते हैं, तब जीवन में सहजता, स्थिरता और आन्तरिक प्रसन्नता का उदय होता है।
प्रत्येक प्रभात एक दिव्य का सन्देश लेकर आता है। प्रत्येक चुनौती अपने भीतर एक श���क्षा छिपाए रहती है। प्रत्येक अनुभव हमें अधिक परिपक्व, अधिक सजग और अधिक सक्षम बनाता है। इसलिए बीते हुए कल की असफलताओं से निराश न हों और आने वाले कल की अनिश्चितताओं से भयभीत न हों। विश्वास, धैर्य और पुरुषार्थ के साथ वर्तमान में स्थित रहकर अपने जीवन-पथ पर आगे बढ़ते रहें।
जब मनुष्य वर्तमान में जीना सीख लेता है, तब उसे ज्ञात होता है कि शान्ति कहीं बाहर नहीं, उसके अपने अन्तःकरण में है; सफलता किसी दूरस्थ उपलब्धि का नाम नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण किए गए श्रेष्ठ प्रयास का परिणाम है; और आनन्द किसी बाहरी वस्तु में नहीं, बल्कि कर्तव्य के समर्पित पालन में निहित है।
आइए ! हम स���कल्प लें कि अतीत के पश्चात्ताप और भविष्य की चिन्ताओं से ऊपर उठकर वर्तमान के प्रत्येक क्षण का सम्मान करेंगे। अपने कर्तव्य को पूजा मानकर उसका निष्ठापूर्वक पालन करेंगे। अपने कर्मों को उत्कृष्ट बनाएँगे, अपने विचारों को सकारात्मक रखेंगे और अपने जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाएँगे।
वर्तमान ही जीवन है, कर्तव्य ही साधना है, और समर्पित कर्म ही सफलता का मार्ग है।
अतः वर्तमान का सम्मान करें, कर्तव्य ��ा निष्ठापूर्वक पालन करें और ईश्वर पर विश्वास रखते हुए जीवन-पथ पर निरन्तर अग्रसर रहें।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् ।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत् परम् ।।१६।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोध्याय:)
उपनिषद् का यह मंत्र आत्मत��्त्व की सर्वव्यापकता तथा उसके अनुभव की साधना-पद्धति का अत्यन्त गूढ़ निरूपण करता है। भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत-वेदान्त के आलोक में यह मंत्र स्पष्ट करता है कि आत्मा सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी सामान्य दृष्टि से प्रत्यक्ष नहीं होती, क्योंकि वह अविद्या के आवरण से आवृत प्रतीत होती है।
उपनिषद् यहाँ एक अत्यन्त सुन्दर दृष्टान्त प्रस्तुत करता है, जैसे - दूध में घी निहित रहता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष नहीं दिखता; उसे प्राप्त करने के लिए मंथन और संस्कार की प्रक्रिया आवश्यक होती है। उसी प्रकार सर्वव्यापी आत्मा प्रत्येक जीव और समस्त जगत् में व्याप्त होते हुए भी साधारण दृष्टि से अनुभव में नहीं आती। जब साधक आत्मविद्या और तप के द्वारा अन्तःकरण को शुद्ध करता है, तब वही निहित ब्रह्मस्वरूप प्रकट हो उठता है।
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के भाष्य की भावना के अनुसार, यहाँ ‘आत्मविद्या’ का तात्पर्य उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित उस ज्ञान से है, जो जीव और ब्रह्म की अभिन्नता का बोध कराता है। यह ज्ञान प्रस्थानत्रयी उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र तीनों का सार है। छान्दोग्य उपनिषद् का महावा��्य “तत्त्वमसि” तथा बृहदारण्यक का “अहं ब्रह्मास्मि” इसी सत्य की उद्घोषणा करते हैं कि आत्मा ही ब्रह्म है।
श्रीमद्भगवद्गीता भी इसी तत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहती है कि “सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि” - ज्ञानी पुरुष समस्त प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में समस्त प्राणियों को देखता है। इसी प्रकार ब्रह्मसूत्र यह प्रतिपादन करते हैं कि ब्रह्म सर्वव्यापक और सर्वाधार तत्त्व ह���, जिसका ज्ञान ही मोक्ष का कारण है।
अतः इस मंत्र का सार यह है कि सर्वव्याप्त ब्रह्म प्रत्येक जीव में अन्तर्निहित है, किन्तु उसका अनुभव तभी सम्भव है, जब साधक आत्मविद्या और तप के द्वारा अपने अन्तःकरण को निर्मल करता है। जिस प्रकार दूध से मंथन द्वारा घी प्रकट होता है, उसी प्रकार ज्ञान और साधना के द्वारा आत्मा का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।
इस प्रकार यह उपनिषद् का मंत्र साधक को स्मरण कराता है ���ि ब्रह्म कहीं दूर स्थित कोई सत्ता नहीं, बल्कि प्रत्येक हृदय में निहित वह परम सत्य है, जिसका साक्षात्कार आत्मज्ञान और तप के माध्यम से ही सम्भव है; यही उपनिषदों का परम सन्देश है।
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Adverse circumstances and the many challenges of life may disturb the mind and create restlessness, yet the inexhaustible source of Truth, Bliss, and Divine Strength resides within our own being. The moment this profound realization dawns, sorrow, fear, and anxiety begin to dissolve. Peace, happiness, and true contentment are not to be sought outside; they are hidden within us. Let us awaken noble thoughts, turn inward, and discover our true, eternal Self.
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्माऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसायोऽनुपश्यति ।।१५।।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह मंत्र वेदान्त के उस परम रहस्य का उद्घाटन करता है, जिसके अनुसार आत्मा कोई बाह्य पदार्थ, नवीन उपलब्धि अथवा भविष्य में प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है, अपितु वह मनुष्य के स्वयं के अस्तित्व का नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप है। उपनिषद् यहाँ आत्मसा��्षात्कार की प्रक्रिया को अत्यन्त सरल किन्तु अत्यन्त गहन दृष्टान्तों के माध्यम से स्पष्ट करता है। यह मंत्र बताता है कि आत्मज्ञान किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि उस सत्य का अनावरण है जो सदैव विद्यमान होते हुए भी अज्ञान के कारण अप्रकट बना रहता है।
उपनिषद् कहता है कि जैसे तिल��ं के भीतर तैल स्वभावतः विद्यमान रहता है, किन्तु वह प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता। उचित विधि से मर्दन और निष्पेषण करने पर वही तैल प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार दधि के भीतर सर्पि अर्थात् घृत निहित रहता है, परन्तु मन्थन के बिना वह दृष्टिगोचर नहीं होता। जैसे पर्वतीय स्रोतों और भूमिगत धाराओं में जल विद्यमान रहता है, परन्तु उसे खोजने और उचित मार्ग देने पर ही वह प्रवाहित होता है; और जैसे अरणिकाष्ठ में ��ग्नि निहित रहती है, किन्तु मन्थन के बिना उसकी ज्वाला प्रकट नहीं होती- वैसे ही आत्मा भी प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में नित्य विद्यमान है, परन्तु अज्ञान, अविवेक और वासनाओं के आवरण के कारण उसका स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं हो पाता।
भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस मंत्र के भाष्य में स्पष्ट संकेत करते हैं कि आत्मा कभी उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि जो वस्तु उत्पन्न होती है वह विनाशशील भ�� होती है। आत्मा नित्य है, स्वयंसिद्ध है और स्वप्रकाश है। अज्ञान आत्मा का नाश नहीं करता, क्योंकि सत्य का कभी नाश नहीं हो सकता; अज्ञान केवल उसके प्रकाश को ढँक देता है। जिस प्रकार बादल सूर्य को नहीं मिटाते, केवल दृष्टि को आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार अविद्या आत्मा को नहीं मिटाती, केवल उसके अनुभव में बाधक बनती है।
मंत्र का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वाक्य है- “एवमात्माऽत्मनि गृह्यते”। यहाँ उपनिषद् यह घोषित करता है कि आत्मा का साक्षात्कार कहीं बाहर नहीं, स्वयं आत्मा में ही होता है। परमात्मा को किसी विशेष स्थान, दिशा अथवा बाह्य वस्तु में खोजने की आवश्यकता नहीं है। वह स्वयं साधक के हृदय में, उसके चैतन्य में, उसके अस��तित्व के मूल में सदा विद्यमान है। आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है; उसे नेत्र देख नहीं सकते, वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, मन पूर्णतः ग्रहण नहीं कर सकता। वह तो स्वयं उन सबका आधारभूत साक्षी है। इसलिए आत्मसाक्षात्कार का अर्थ है- दृश्य जगत्, देह, मन, बुद्धि और अहंकार से अपनी भिन्नता का विवेकपूर्वक अनुभव करना तथा उस शुद्ध साक्षी-चैतन्य में स्थित होना।
उपनिषद् आगे आत्मप्राप्ति का साधन भी बताता है- “���त्येन” और “तपसा”।
यहाँ ‘सत्य’ का अर्थ केवल वाणी की सत्यता नहीं है। शाङ्कर-वेदान्त के अनुसार सत्य वह है जो त्रिकालाबाधित हो- जो भूत, वर्तमान और भविष्य में कभी परिवर्तित न हो। ब्रह्म ही सत्य है, आत्मा ही सत्य है। अतः ‘सत्येन’ का तात्पर्य है- अपने जीवन को परम सत्य की दिशा में उन्मुख करना, अनित्य में आसक्ति का त्याग करना तथा नित्य आत्मतत्त्व में श्रद्धा और निष्ठा स्थापित करना। जब साधक संसार के क्षणभंगुर आकर्षणों से ऊपर उठकर सत्यस्वरूप आत्मा को अपने जीवन का केन्द्र बना लेता है, तभी उसके भी आत्मज्ञान की भूमि तैयार होती है।
‘तपस्’ का अर्थ भी केवल शारीरिक कष्ट या उपवास नहीं है। उपनिषद् के परिप्रेक्ष्य में तपस् का वास्तविक स्वरूप है- अन्तःकरण की शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, मन की एकाग्रता, वासनाओं का क्षय, आत्मचिन्तन, ध्यान तथा निरन्तर साधना। तपस् वह आन्तरिक अग्नि है जिसमें अहंकार, राग, द्वेष, मोह और अज्ञान क्रमशः भस्म होते जाते हैं। जब चित्त शुद्ध और निर्मल हो जाता है, तब उसमें आत्मज्ञान का प्रकाश उसी प्रकार प्रतिबिम्बित होता है जैसे स्वच्छ दर्पण में सूर्य का प्रकाश।
मंत्र का अन्तिम पद- “अनुपश्यति��� अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ रखता है। उपनिषद् केवल ‘पश्यति’ नहीं कहता, बल्कि ‘अनुपश्यति’ कहता है, अर्थात् साधक उस सत्य का बारम्बार, निरन्तर और स्थिर भाव से दर्शन करता है। यह ��ोई क्षणिक अनुभव नहीं, बल्कि ऐसी आत्मनिष्ठा है, जिसमें ज्ञानी पुरुष निरन्तर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित रहता है। उसके लिए आत्मा कोई विचार नहीं रहती, बल्कि जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाती है।
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#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#भगवत्पादाचार्य
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भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, ���पितु सनातन सांस्कृतिक चेतना, जीवंत सभ्यता और सहस्राब्दियों से प्रवाहित आध्यात्मिक परम्परा का दिव्य प्रतीक है। जब-जब इस राष्ट्र ने इतिहास के महत्वपूर्ण मोड़ों पर स्वयं को नवीन रूप में प्रतिष्ठित किया है, तब-तब उसे ऐसे नेतृत्व का सान्निध्य प्राप्त हुआ है जिसने केवल शासन नहीं किया, बल्कि राष्ट्रजीवन में नवचेतना, नवविश्वास और नवसंकल्प का संचार किया है। वर्तमान युग में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी का नेतृत्व इसी राष्ट्रीय पुनर्जागरण का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय बनकर उभरा है।
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र भारतवर्ष को पुनः तीसरी बार ऐसे प्रधानमंत्री का नेतृत्व प्राप्त हुआ है, जिनके व्यक्तित्व में सेवा, समर्पण, संकल्प और कर्मनिष्ठा का अद्भुत समन्वय दृष्टिगोचर होता है। आदरणीय मोदी जी करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं के प्रतीक तथा रा���्ट्रविश्वास के केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, विकास-दृष्टि और वैश्विक प्रतिष्ठा के समर्थ संवाहक के रूप में उभरे हैं।
भारतीय सनातन धर्म संस्कृति और में आदर्श नेतृत्व को सदैव “राजर्षि” की संज्ञा दी गई है ऐसा नेतृत्व जो प्रशासनिक दक्षता के साथ नैतिकता, आध्यात्मिकता और लोकमंगल के प्रति समर्पित हो। आदरणीय प्रधानमंत्री जी के व्यक्तित्व में शासक, प्रशासक और उपासक इन तीनों आयामों का सुंदर समन्वय दृष्टिगोचर होता है। उनकी कार्यशैली में अनुशासन, दृष्टि में दूरदर्शिता तथा संकल्पों में जनकल्याण का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसी कारण उनके नेतृत्व में शासन केवल सत्ता संचालन का माध्यम न रहकर राष्ट्र-निर्माण का व्यापक अभियान बन गया है।
इतिहास साक्षी है कि सम्राट विक्रमादित्य, महाराज हर्षवर्धन और लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जैसे लोकनायक शासकों ने भारत की सांस्कृतिक चेतना और जनकल्याणकारी शासन-परम्परा को सुदृढ़ किया था। आधुनिक भारत में आदरणीय प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी उसी ���ौरवशाली परम्परा के समकालीन संवाहक सिद्ध हुए हैं। उनके नेतृत्व में भारत ने अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को नवीन आत्मविश्वास के साथ अभिव्यक्त किया है तथा विश्वपटल पर अपनी सभ्यतागत पहचान को गौरवपूर्ण स्वर में स्थापित किया है।
पिछले वर्षों में भारत ने विकास और जनकल्याण के ऐसे समन्वित मॉडल को साकार होते देखा है, जिसमें समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएँ पहुँचाने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है। गरीबों के लिए आवास, स्वास्थ्य सुरक्षा, निःशुल्क खाद्यान्न, स्वच्छ ऊर्जा, आधारभूत संरचना का तीव्र विस्तार, आधुनिक रेलवे, वंदे भारत ��्रेनों का संचालन, नए हवाई अड्डों का निर्माण तथा राजमार्गों और एक्सप्रेसवे का अभूतपूर्व विकास-ये सभी उस दूरदर्शी दृष्टि के प्रतीक हैं, जिसका केन्द्र सामान्य नागरिक का जीवन आधार है
आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति स्थापित कर रहा है। वैश्विक मंचों पर उसकी प्रतिष्ठा, कूटनीतिक प्रभाव और आर्थिक सामर्थ्य में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भा��तीय भावना को वैश्विक विमर्श में प्रतिष्ठित करने में भी भारत की भूमिका अधिक प्रभावशाली हुई है। यह केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और आत्मगौरव के पुनरुत्थान का भी प्रतीक है।
आदरणीय प्रधानमंत्री जी की कार्यनिष्ठा, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण विशेष रूप से प्रेरणादायी है। भारतीय संस्कृति जिस “कर्मयोग” की शिक्षा देती है, उसका जीवंत प्रतिबिम्ब उनके सार्वज��िक जीवन में दृष्टिगोचर होता है। जब नेतृत्व की नीयत निर्मल हो, लक्ष्य राष्ट्रहित हो और संकल्प लोकमंगल के लिए समर्पित हों, तब परिवर्तन केवल नीतियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह राष्ट्रीय मानस को भी प्रभावित करता है।
निस्संदेह, वर्तमान काल भारत के आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव के पुनर्जागरण का काल है। यह वह युग है जिसमें भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ विश्व समुदाय के समक्ष एक नई शक्ति के रूप में उदित हो रहा है। ४,३९९ दिनों की यह यात्रा सशक्त, समृद्ध, विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण स��वर्णिम अध्याय है।
आज विकसित भारत के संकल्प की दिशा में अग्रसर राष्ट्र, आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व, निर्णायक नीतियों और “राष्ट्र प्रथम” की भावना का सशक्त प्रमाण है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आदरणीय प्रधानमंत्री जी का हृदय से अभिनंदन तथा उनके स्वस्थ, दीर्घायु और यशस्वी जीवन हेतु मंगलकामनाएँ।
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासादेवं पश्येन्निगूढवत् ।।१४।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
यह मंत्र उपनिषद्-साहित्य के उन विलक्षण मंत्रों में से है, जिनमें सम्पूर्ण साधना-पथ को एक अत्यन्त सरल, किन्तु अत्यन्त गहन रूपक के माध्यम से व्यक्त किया गया है। यह केवल ध्यान की कोई सामान्य विधि नहीं बताता, अपितु आत्मसाक्षात्कार की सम्पूर्ण प्रक्रिया का दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा अनुभूतिपरक रहस्य उद्घाटित करता है। भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य के भाष्य के आलोक में यह मंत्र साधक को बाह्य जगत् से हटाकर उसके अपने अन्तःकरण की ओर ले जाता है, जहाँ ब्रह्म का शाश्वत प्रकाश सदा से विद्यमान है, किन्तु अविद्या के आवरण के कारण अप्रकट प्रती�� होता है।
उपनिषद् यहाँ वैदिक यज्ञपरम्परा में प्रयुक्त अरणि-मंथन की प्रक्रिया का अत्यन्त सुन्दर रूपक प्रस्तुत करता है। प्राचीन काल में अग्नि उत्पन्न करने के लिए दो अरणियों का उपयोग किया जाता था। अधःस्थित अरणि आधार बनती थी और ऊर्ध्वस्थित अरणि को निरन्तर घर्षण द्वारा घुमाया जाता था। दीर्घ अभ्यास एवं सतत प्रयास से उसी घर्षण से अग्नि प्रकट होती थी। उपनिषद् कहता है कि आत्मज्ञान की प्राप्ति भी इसी प्रकार होती है। साधक अपने शरीर और अन्तःकरण को अधःअरणि के रूप में धारण करे तथा प्रणव अर्थात् “ॐ” को उत्तरारणि के रूप में स्थापित करे। तत्पश्चात् ध्यान, मनन, चिन्तन और आत्मविवेक रूपी मंथन के द्वारा उस परम सत्य को प्रकट करे, जो उसके भीतर ही गुप्त रूप से विद्यमान है।
भगवत्पादाचार्य इस मंत्र की व���याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि आत्मा कोई उत्पन्न होने वाली वस्तु नहीं है। जिस प्रकार अग्नि वास्तव में अरणियों में पहले से ही सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहती है और मंथन के द्वारा केवल प्रकट होती है, उसी प्रकार आत्मा भी नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप से सदैव विद्यमान है। साधना का प्रयोजन आत्मा को उत्पन्न करना नहीं, बल्कि अज्ञानरूपी आवरण को हटाना है। ज्ञान किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति नहीं, प्रत्युत अपने वास्तविक स्वरूप की पुनः पहचान है।
इस मंत्र का विशेष महत्व इस तथ्य में निहित है कि यहाँ साधना का केन्द्र बाह्य कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि अन्तर्मुखता है। उपनिषद् यह संकेत करता है कि परम सत्य को बाह्य विषयों, इन्द्रियानुभवों अथवा लौकिक उपलब्धियों में खोजने का प्रयास अन्ततः व्यर्थ सिद्ध होता है। सत्य का निवास स्वयं साधक के अन्तःकरण में है। इसी कारण कहा गया - “स्वदेहमरणिं कृत्वा”। साधना का क्षेत्र कोई बाहरी स्थान नहीं, अपितु स्वयं का अन्तःकरण है; और साधना का उपकरण भी वही अन्तःकरण है।
यहाँ “प्रणव” अर्थात् “ॐ” को उत्तरारणि कहा गया है। समस्त उपनिषदों में प्रणव को ब्रह्म का प्रत्यक्ष वाचक माना गया है। माण्डूक्य उपनिषद् उद्घोष करता है - “ओंकार एवेदं सर्वम्” यह सम्पूर्ण विश्व ओंकारस्वरूप है। भगवत्पादाचार्य के अनुसार प्रणव का ध्यान वस्तुतः ब्रह्म के ध्यान से भिन्न नहीं है। प्रणव में सम्पूर्ण वेदों का सार निहित है। उसमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय - चारों अवस्थाओं का समन्वय है। अतः जब साधक श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता के साथ प्रणव का चिन्तन करता है, तब उसका चित्त क्रमशः बाह्य विषयों से निवृत्त होकर ब्रह्माकार वृत्ति को प्राप्त करता है।
मंत्र में प्रयुक्त “ध्याननिर्मथन��भ्यास” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। केवल एक बार का ध्यान या क्षणिक साधना आत्मसाक्षात्कार का कारण नहीं बनती। जिस प्रकार अग्नि उत्पन्न करने के लिए निरन्तर और धैर्यपूर्ण मंथन आवश्यक होता है, उसी प्रकार आत्मज्ञान के लिए भी अविरत अभ्यास आवश्यक है। योगशास्त्र में जिसे “अभ्यास” कहा गया है और वेदान्त में जिसे “निदिध्यास���” कहा गया है, वही यहाँ “ध्याननिर्मथन” के रूप में व्यक्त हुआ है। बार-बार आत्मतत्त्व का चिन्तन, बार-बार ब्रह्मभाव में स्थित होने का प्रयास, बार-बार मन को विषयों से हटाकर आत्मा में स्थिर करना - यही वह मंथन है जिससे ज्ञानाग्नि प्रज्वलित होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश भी इसी सत्य की पुष्टि करता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”
अर्थात्, इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कोई वस्तु नहीं है। परन्तु यह ज्ञान केवल बौद्धिक सूचना नहीं है; यह ध्यान, साधना, अन्तर्मुखता और आत्मानुभूति से प्रकाशित होने वाला सत्य है। इसी कारण गीता के छठे अध्याय में योगी को अपने मन को बार-बार आत्मा में स्थिर करने का निर्देश दिया गया है।
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मानव-जीवन के दुःखों का मूल कारण धन, सफलता, शक्ति या साधनों का अभाव नहीं, अपितु सच्चे ज्ञान का अभाव है। अज्ञान मन को ढँक देता है, दृष्टि को विकृत कर देता है और मनुष्य को भय, भ्रम, चिंता एवं असंतोष के बंधन में बाँध देता है।
आध्यात्मिक ज्ञान वह दिव्य प्रकाश है, जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर आत्म-जागरण का मार्ग प्रशस्त करता है। यह सिखाता है कि वास्तविक सुख बाह्य परिस्थितियों में नहीं, अपितु हमारे अंतःकरण में निहित है।
सच्चे ज्ञान के उदय से शंकाएँ स्पष्टता में, चिंताएँ विश्वास में, अशांति शांति में और भय साहस में परिवर्तित हो जाता है। शास्त्रों, संतों और सद्गुरुओं की वाणी वाणी मनुष्य को आत्मबोध, आंतरिक परिवर्तन और जीवन के उच्च उद्देश्य की ओर अग्रसर करती है।
अतः ज्ञान केवल बुद्धि ���ो सूचित करने के लिए नहीं, आत्मा को प्रकाशित करने के लिए अर्जित करें। जब आध्यात्मिक ज्ञान का सूर्य उदित होता है, तब दुःख मिटता है, भ्रम दूर होता है और जीवन शांति, संतोष, शक्ति एवं दिव्य आनंद की यात्रा बन जाता है।
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः।
स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ।।१३।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
यह मंत्र वेदान्त के अत्यन्त गूढ़ किन्तु अत्यन्त सुगम सत्य का उद्घाटन करता है। उपनिषद् यहाँ एक ऐसे दृष्टान्त का आश्रय लेता है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति सहज रूप से समझ सकता है। जिस प्रकार काष��ठ में अग्नि विद्यमान रहती है, किन्तु सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा भी प्रत्येक जीव के भीतर नित्य उपस्थित होकर भी अज्ञान के कारण अप्रकट प्रतीत होती है। यह मंत्र साधक को यह समझाने का प्रयास करता है कि आत्मसाक्षात्कार किसी नये तत्त्व की प्राप्ति नहीं, अपितु अपने ही नित्यस्वरूप की पहचान है।
भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के भाष्य के आलोक में इस मंत्र का रहस्य और अधिक स्पष्ट हो जाता है। वे बताते हैं कि आत्मा न त�� उत्पन्न होती है, न नष्ट होती है, न परिवर्तित होती है। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप है। उसका अस्तित्व किसी प्रमाण का मोहताज नहीं है, क्योंकि वह स्वयं समस्त प्रमाणों का आधार है। फिर भी मनुष्य उसे नहीं जान पाता, क्योंकि उसका चित्त नाम-रूपात्मक जगत् में इतना उलझा रहता है कि आत्मा का स्वप्रकाश स्वरूप आवरणों के पीछे छिप जाता है।
मंत्र में अग्नि का उदाहरण अत्यन्त सारगर्भित है। लकड़ी में अग्नि विद्यमान है, परन्तु जब तक उचित विधि से मन्थन नहीं किया जाता, तब तक वह प्रकट नहीं होती। इसका अर्थ यह नहीं कि मन्थन से अग्नि उत्पन्न होती है; वास्तव में मन्थन केवल उस अप्रकट अग्नि को व्यक्त करता है जो पहले से ही वहाँ विद्यमान थी। इसी प्रकार आत्मज्ञान भी आत्मा को उत्पन्न नहीं करता; वह केवल अज्ञानरूपी आवरण को हटाता है। आत्मा पहले भी थी, ज्ञान के बाद भी वही रहती है। परिवर्तन केवल साधक की दृष्ट��� में होता है, आत्मा में नहीं।
उपनिषद् आगे कहता है - “तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे”। अर्थात्, जिस प्रकार अग्नि और काष्ठ का सम्बन्ध है, उसी प्रकार देह में स्थित आत्मतत्त्व का साक्षात्कार प्रणव अर्थात् “ॐ” के माध्यम से किया जा सकता है। यहाँ प्रणव मात्र उच्चारण करने योग्य ध्वनि नहीं है। वह सम्पूर्ण वेदों का सार, ब्रह्म का वाचक तथा आत्मबोध का दिव्य प्रतीक है। ��मस्त उपनिषदों में प्रणव को परम साधन के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
माण्डूक्योपनिषद् तो सम्पूर्ण रूप से प्रणव के रहस्य का ही प्रतिपादन करती है। वहाँ “ॐ” को सम्पूर्ण विश्व और उसके अधिष्ठान ब्रह्म का प्रतीक बताया गया है। अकार, उकार और मकार जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं के द्योतक हैं, जबकि इन तीनों से परे स्थित अमात्र तुरीय ही आत्मा का परम स्वरूप है। अतः प्रणव का ध्यान साधक को बाह्�� जगत् की विविधताओं से उठाकर उस अद्वैत सत्य की ओर ले जाता है जहाँ समस्त भेद समाप्त हो जाते हैं।
भगवद्गीता भी इसी सत्य की पुष्टि करती है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चित्त को स्थिर कर आत्मा में स्थित किया जा सकता है। जब मन विषयों की ओर भागना छोड़ देता है और अन्तर्मुख होकर अपने स्रोत की ओर लौटता है, तब आत्मस्वरूप का प्रकाश स्वतः प्रकट होने लगता है। यह कोई रहस्यमय उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने वास्तविक अस्तित्व की पहचान है।
ब्रह्मसूत्र भी यही प्रतिपादित करते हैं कि मोक्ष का साधन ज्ञान है। बन्धन का कारण अज्ञान है और अज्ञान की निवृत्ति का साधन आत्मविद्या। जब अज्ञान का नाश होता है, तब आत्मा का प्रकाश उसी प्रकार प्रकट हो जाता है जैसे बादलों के हट जाने पर सूर्य का प्रकाश स्वतः दिखाई देने लगता है। सूर्य नया उत्पन्न नहीं होता; केवल आवरण हटता है। यही स्थिति आत्मज्ञान की है।
इस मंत्र का एक और सूक्ष्म संकेत यह है कि साधना का उद्देश्य किसी दूरस्थ सत्य की खोज नहीं, बल्कि अपने ही अन्तःकरण में स्थित दिव्यता का उद्घाटन है। मनुष्य प्रायः ईश्वर को बाहर खोजता है, जबकि उपनिषद् उसे भीतर देखने की प्रेरणा देता है। जिस सत्य की तलाश समस्त दिशाओं में की जाती है, वह स्वयं साधक के हृदयगुहा में विराजमान है। आवश्यकता केवल उचित साधना, एकाग्रता, व��वेक और आत्मचिन्तन की है।
अतः यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि आत्मा कोई प्राप्त की जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि हमारी स्वयं की नित्य सत्ता है। जैसे लकड़ी में अग्नि छिपी रहती है और मन्थन से प्रकट होती है, वैसे ही आत्मा प्रत्येक जीव में सदा विद्यमान है और प्रणव-उपासना, आत्मविचार तथा ज्ञान के द्वारा उसका प्रकाश अनुभव में आता है। जब यह अनुभव घटित होता है, तब साधक जान लेता है कि जिस सत्य को वह बाहर ख��ज रहा था, वह तो सदैव उसके भीतर ही प्रकाशित था।
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The root cause of human sorrow is not the absence of wealth, success, power, or possessions; it is the absence of true knowledge. Ignorance clouds the mind, distorts perception, and binds individuals to fear, confusion, anxiety, and dissatisfaction. When one fails to understand the deeper purpose of life, the true nature of the self, and the eternal laws that govern existence, even the greatest external achievements cannot bring lasting peace or fulfilment.
Spiritual knowledge is the light that dispels the darkness of ignorance. It awakens inner awareness and reveals the truth that happiness is not dependent upon external circumstances but arises from within. Through spiritual wisdom, doubts are replaced by clarity, worries by faith, restlessness by serenity, and fear by courage. It teaches us to remain balanced amidst success and failure, gain and loss, pleasure and pain.
The wisdom imparted by the great scriptures, saints, and enlightened masters guides humanity towards self-discovery and inner transformation. As knowledge deepens, the mind becomes purified, the heart becomes peaceful, and life gains a higher purpose. One begins to experience a joy that is not fleeting or dependent on worldly conditions, but enduring, profound, and divine.
Seek knowledge not merely to inform the intellect, but to illuminate the soul. For when spiritual wisdom dawns, sorrow fades away, confusion dissolves, and life blossoms into a journey of peace, contentment, strength, and everlasting joy.
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं
नातः परं वेद���तव्यं हि किञ्चित् ।
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा
सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ।।१२।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोऽध्यायः)
यह मंत्र उपनिषद् के प्रथम अध्याय का सिद्धान्त-वाक्य है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य की दृष्टि में “एतत् ज्ञेयम्” का आशय है - वह तत्त्व जो नित्य, आत्मा में ही प्रतिष्ठित (आत्मसंस्थ) और स्वप्रकाश है। इसलिए उपनिषद् दृढ़ता से कहता है - “नातः ���रं वेदितव्यं किञ्चित्”: इससे आगे जानने योग्य कुछ नहीं; क्योंकि जो जानने वाले (प्रमाता) का भी अधिष्ठान है, उससे परे कोई ��िषय शेष नहीं रहता। यह वाक्य ज्ञान की पराकाष्ठा नहीं, अविद्या का अन्त घोषित करता है।
फिर मंत्र व्यवहार-क्षेत्र का त्रिविध भेद दिखाता है - भोक्ता (जीव), भोग्य (जगत्/प्रकृति) और प्रेरिता (ईश्वर)। भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यह त्रिविधता व्यवहार-सत्य में उपयोगी है: देह-मन से तादात्म्य के कारण जीव “भोक्ता” बनता है; प्रकृति-प्रपंच “भोग्य” बनता है; और वही एक परम तत्त्व माया-उपाधि से सम्��द्ध होकर “प्रेरिता/नियन्ता” के रूप में प्रतीत होता है। पर उपनिषद् का अन्तिम निष्कर्ष यह है - “त्रिविधं ब्रह्म एतत्”: ये तीनों अन्ततः ब्रह्म से भिन्न नहीं - भेद उपाधि-कल्पित है, अधिष्ठान एकमेव अद्वितीय ब्रह्म है।
यही प्रस्थानत्रयी का मर्म है : उपनिषद् आत्मा को नित्य-साक्षी बताकर विषय-जगत् को अनित्य ठहराते हैं; गीता कर्तृत्व-भोक्तृत्व को गुणों पर रखकर आत्मा को असंग घोषित करती है; और ब्रह्मस���त्र समस्त भेदों का अपवाद कर ब्रह्म की एकरसता सिद्ध करते हैं। इस मंत्र की शिक्षा साधक को सीधी राह पर ले जाती है - भोक्ता-भाव की भ्रान्ति का त्याग, प्रेरिता में चित्त-समर्पण, और अन्ततः ब्रह्मात्मैक्य-बोध: यही वह ज्ञान है जिसके बाद “कुछ और” जानना शेष नहीं रहता।
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