जब विश्वविद्यालयों में किताबों से ज़्यादा राजनीति और शोध से ज़्यादा प्रदर्शन चर्चा का विषय बनने लगें, तो आत्ममंथन की आवश्यकता होती है। शिक्षा संस्थानों का काम राष्ट्रनिर्माण के लिए सक्षम युवाओं को तैयार करना है, न कि उन्हें वैचारिक संघर्षों का हथियार बनाना@DGP_MP@CMMadhyaPradesh