अगर एक पुरुष ने महिला डेड ब���डी के जननांग पर जोक किए होते तो @IMAIndiaOrg उसका लाइसेन्स रद्द करने में कितना टाइम लेता?
मतलब महिला कुछ भी कर सकती है और बच सकती है?
इस निर्णय का स्वागत है।
यदि सरकारी शिक्षक अपना पूरा समय और ऊर्जा सरकारी विद्या��यों के विद्यार्थियों को दें, तो शिक्षा व्यवस्था निश्चित रूप से बेहतर होगी।
मगर इसके साथ सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि शिक्षकों से शिक्षण के अतिरिक्त अनावश्यक कार्य न करवाए जाएँ, सर्वे, चुनाव, गणना, कागजी कार्यवाही और दर्जनों गैर-शैक्षणिक काम भी बंद होने चाहिए। और उनका वेतन व सुविधाएँ ऐसी हों कि बढ़ती महंग���ई के दौर में उन्हें अतिरिक्त आय के साधन तलाशने की आवश्यकता न पड़े शिक्षक सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।
जब हमने पेपर लीक, भर्ती घोटालों, शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के मुद्दे उठाए थे, तब हमें ही कठघरे में खड़ा किया गया।हम पर आरोप लगे, मज़ाक उड़ाया गया, चरित्र पर सवाल उठाए गए।
हालत यह है कि देश ��े बाहर से भी मीडिया की खबरों पर सवाल उठ रहे हैं।
हमारी लड़ाई किसी चैनल, पत्रकार या व्यक्ति से नहीं थी, हमारी पूरी लड़ाई हमेशा 'सच्चाई' के लिए थी।
देश की छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए जिम्मेदार मीडिया भी है।
राष्ट्रीय हित का विषय हैं। 🇮🇳
भारत-पाक सीमा से अपने पुनरोद्धार की करुण पुकार करता अदम्य साहस और वीरता का साक्षी रहा देश का पहला अंतराष्ट्रीय रेलवे स्टेशन।
माननीय @AshwiniVaishnaw जी (रेलमंत्री, भारत सरकार),
मैं इस पत्र के माध्यम से भारत के पहले छोर पर अवस्थित उस रेलवे स्टेशन के बारे में आपको अवगत करवाना चाहूंगा जो भारतीय रेलवे के गौरवशाली इतिहास एवं अपनी विशिष्ट सामरिक अवस्थिति के कारण एक विशेष स्थान रखता है। बाड़मेर की गडरा तहसील में स्थित गडरा रोड स्टेशन जहां भारत ही नहीं वरन् वैश्विक इतिहास का एकमात्र ऐसा मेला भरता हैं जो रेलवे के कर्मचारियों की शहादत की याद म��ं आयोजित होता है। मैं आपको बताना चाहूंगा की 1965 के भारत-पकिस्तान युद्ध के दौरान जहां एक तरफ इस दुर्गम रेगिस्तान में हमारे जांबाज़ सिपाही दुश्मनों से लड़ रहे थे वहीं इस लड़ाई में एक बड़ा योगदान रेलवे कर्मचारियों की भी रहा। 9 सितंबर, 1965 का दिन, जब सैनिकों तक युद्ध में रसद सामग्री पहुंचाना ज़रूरी ��ा, इसके लिए बाड़मेर से रेलवे कर्मचारियों के साथ सेना के जवान रेल से सामान लेकर गडरा रोड के लिए रवाना हुए। रेल जैसे ही गडरा रोड की गोलाई में पहुंची तो अचानक आसमान से बमबारी और गोलिबारी शुरू हो गयी। पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा लगातार बमबारी की जा रही थी जिससे रेल के अंतिम कोच में आग लग गयी। तभी इंजन चालक व अन्य रेलवे कार्मिकों ने बहादुरी व वीरता दिखाते हुए उस कोच को रेल से अलग कर शेष रेलगाड़ी को ���वाना किया। रेल का अंतिम डिब्बा होने के कारण उसमें अधिकांश रेल कर्मचारी थे जिनमें से 17 कर्मचारी शहीद हो गए। मान्यवर वैसे तो इस घटना को घटे 59 साल बीत गए लेकिन भारतीय रेलवे द्वारा इस शहादत स्थल पर सिर्फ एक रेलवे कर्मचारी शहीद मेला ही आयोजित करता है। यह भारतीय रेलवे के लिए एक अद्वितीय मिसाल है कि रेलवे के 17 लोगों ने देश की रक्षा के लिए पटरियों पर दुश्मन का सामना करते हुए राष्ट्र हित में अपने प्रा��ों की आहुति दी। मैं आपसे निवेदन कर��ा चाहता हूँ जैसलमेर के लोंगेवाला की तर्ज पर बाड़मेर के गडरा रोड स्थित रेलवे शहीद स्थल को भी पुनः जिवंत किया जाये, जिससे हम उन शहीदों के प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें।
माननीय, मैं साथ ही साथ आपको भारत के पहले रेलवे स्टेशन, मुनाबाव रेलवे स्टेशन की स्थिति से भी अवगत करवाना चाहता हूँ। जहां किसी समय भारत-पकिस्तान के बीच चलने वाली थार एक्सप्रेस के कारण इस रेलवे स्टेशन की पहचान पुरे देशभर मे��� होती थी। लेकिन थार एक्सप्रेस के बंद हो जाने के बाद से इस रेलवे स्टेशन के हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे है। मेरा आपसे निवेदन है कि दिल्ली से अजमेर को आने वाली वन्दे भारत एक्सप्रेस का रुट दिल्ली से मुनाबाव तक बढ़ाया जाए जिससे जोधपुर, बाड़मेर और बालोतरा जैसे सीमावर्ती इलाकों की कनेक्टिविटी बढ़ेगी जिससे देश की सरहद पर मजबूत आधारभूत ढांचा तैयार हो सके। इसके अलावा इस रेल के चलने से क्षेत्रीय ���र्यटन को बढ़ावा मिलेगा जिस से बाखासर-गागरिया से ��ुनाबाव-तनोट एक बॉर्डर टूरिज्म कोरिडोर के रूप विकसित हो सके। इस कोरिडोर के परस्पर जुड़ाव के लिए वर्तमान में चलायमान भारतमाला सड़क एक रक्त वाहिनी का काम करेगी। इस सब से ना केवल सुरक्षा की दृष्टि से बॉर्डर मजबूत होगा वरन् वहां रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकेंगे और आर्थिक क्रियाकलाप भी बढ़ेंगे जिससे अवसंरचनात्मक दृष्टि से भी भारत को लाभ होगा।
अतः मान्यवर से निवेदन रहेगा कि सीमावर्ती रेलवे स्टेशन मुनाबाव और गडरा रोड स्टेशन हेतु विशेष प्रयास करके उनका पुनरोद्धार करवाएं।
आभार,
रविंद्र सिंह भाटी
(विधायक, शिव, बाड़मेर)
@RailMinIndia @NWRailways
कैंटीन संचालक का आरोप:
4 पुलिसकर्मियों ने पिलाई पेशाब और कहा
"सालों. तुम मीणाओं से उलझोगे?"
पुलिसकर्मियों के नाम:
-भवानी शंकर मीणा
-दिलीप मीणा
-मस्तराम मीणा
-रवि मीणा
बता दें कि यहाँ के MLA, MP, SDM, सारे मीणा हैं!
और ये सब संविधान अनुसार "शोषित" हैं!
आपका नाम अशोक श्रीवास्तव है।
आप DD News के anchor हैं।
DD News कोई private WhatsApp group नहीं है।
यह public broadcaster है, जनता के पैसे से चलता है।
एक छात्र/छात्रा CBSE revaluation में गलत answer sheet मिलने का दावा करता है।
वह proof लगाकर सवाल पूछता है।
लेकिन सिस्टम से जवाब मांगने की जगह कुछ आप और आपको चाहने वाले उसे Pakistani, देशद्रोही और agenda-driven बताने लगते हैं।
बाद में जब किरकिरी होती है तो माफी मांगकर पल्ला झाड़ लेते है।
सवाल आपसे भी है कि ..
क्या अब CBSE से अपनी copy मांगना देशद्रोह है?
क्या answer sheet पर सवाल पूछना Pakistan का एजेंडा है?
क्या हर छात्र जो सिस्टम की गलती दिखाए, उसे anti-national घोषित कर दिया जाएगा?
Anchor का काम सरकार की नाकामी पर सवाल पूछना होता है,
छात्रों को troll narrative में धकेलना नहीं।
अब CBSE ने अपनी गलती मान ली है और result भी ��पडेट कर दिया है।
लेकिन आप बताइए कि आपके मंसूबे क्या थे क्यों बच्चों के भविष्य की समस्या को Pakistan और देशद्रोह के पीछे छिपा रहे थे ?
छात्र copy मांग रहा है।
System जवाब नहीं दे रहा।
और कुछ लोग patriotism का certificate बांट रहे हैं।
यह पत्रकारिता नहीं, सत्ता की PR duty लगती है।
आपका नाम वेदांत है।
आप Class 12 के छात्र हैं।
Physics में कम marks आए, तो आपने CBSE की re-evaluation process में answer sheet मांगी।
लेकिन जब copy मिली, तो shock लगा ,
आपका दावा ह�� कि वह answer sheet आपकी थी ही नहीं।
Handwriting अलग , answers अलग, paper अलग।
आपने चुप रहने के बजाय X पर account बनाया , proof के साथ लंबा thread लिखा और CBSE से जवाब मांगा।
लेकिन जवाब मिलने से पहले कुछ BJP समर्थक troll accounts और सरकारी मीडिया के पत्रकारों ने मुद्दे पर बात करने के बजाय आपको देशद्रोही और Pakistani बताना शुरू कर दिया।
सवाल बहुत साफ है ,,
अगर CBSE ने गलत answer sheet upload की है, तो जांच होनी चाहिए।
अगर छात्र झूठ बोल रहा है, तो CBSE proof दे।
लेकिन एक बच्चे क��� Pakistani बोलकर च���प कराना घटिया राजनीति है।
कम marks मिले।
Re-evaluation मांगी।
गलत answer sheet का दावा किया।
Proof डाला।
और सिस्टम से जवाब मांगने पर Pakistani बना दिया गया।
यह देश का असली मजाक है,,
छात्र marks मांगे तो troll,
paper leak पर बोले तो anti-national,
और system गलती करे तो silence.
बाड़मेर में गिरल लिग्नाइट माइंस के मजदूरों का 38 दिन से धरना प्रदर्शन जारी है। शिव विधायक श्री @RavindraBhati__ भी 15 दिन से इन मजदूरों के साथ बैठे हैं परन्तु न तो सरकार ने कोई वार्ता की और न ही प्रशासन ने ध्यान दिया। इस उदासीनता के कारण वे मजदूरों के साथ कलेक्ट्रेट कूच करने एवं अपने ऊपर पेट्रोल उड़ेलने तक को मजबूर हुए।
भाजपा के शासन में एक विधायक को अपनी मांगों पर ध्यानाकर्षण के लिए ऐसा कदम उठाना पड़ रहा है तो आम आदमी की स्थिति की कल्पना की जा सकती है। राज्य सरकार को अविलंब इनकी मांगों पर ध्यान देकर सकारात्मक हल निकालना चाहिए।
500+ days in jail.
Bail denied. Again.
Chinmoy Krishna Das Prabhu, a spiritual leader and an ISKCON monk, continues to languish behind bars in Bangladesh while the world watches.
When even his lawyers are intimidated, threatened and silenced in court corridors, what justice are we even talking about?
Is advocating for the rights of the Minority Hindu community a crime? When a saffron-clad soul is treated like a criminal for raising his voice, the world CANNOT remain silent.
I appeal to the Government of Bangladesh to give medical aid and, more importantly, access to fair justice to Chinmoy Krishna Das Prabhu immediately. May he be granted bail at the earliest.
And to all the pseudo-secularists and Selective Human rights Activists around the World who flood timelines overnight, wave watermelons and trend hashtags on cue, your silence can be still heard. Apparently, your humanity has a filter.
@bdhc_delhi@UNHumanRights@UN_HRC@UN
#FreeChinmoyKrishnaDas
भारत में अपने पूर्व राजघरानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए कुछ लोग किसी भी हद तक गिर सकते हैं। देखिए कैसे फर्ज़ीवाड़ा कर रहे हैं। साफ़ समझ आ रहा नक़ली बनाया हुआ है। सरकार को ऐसे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए, देश की एकता और अखंडता के लिए ऐसे लोग ख़तरनाक हैं, देश विरोधी ताकतों का काम आसान कर रहे हैं।
मौत हुई मंगल पांडे की....
गोली खाई चंद्रशेखर आजाद तिवारी ने....
फांसी चढ़े भगत सिंह,राजगुरु,सुखदेव...
ओर ये दोगले नेताओं ने इतिहास में बच्चों को क्या पढ़ाया है.. #UGC_काला_कानून_वापस_लो
लेफ़्टिनेंट जनरल हनुत सिंह राठौड़ 11 साल पहले 10 अप्रैल को दैहिक रूप से चले गए थे। हनुतसिंह भारतीय सेना के संभवत: इकलौते ऐसे युद्ध सेनानी हैं, जिनके कसीदे युद्ध के बाद अपने देश के साथ-साथ दुश्मन देश और उसकी सेना के लड़ाकों ने भी पढ़े। यह एक तरह का अप्रतिम उदाहरण है कि एक ऐसा सेनानी, जो राजस्थान के मारवाड़ ��ी माटी का सच्चा सपूत था और जिसने क़माल शौर्य दिखाया, पाकिस्तान ने भी युद्ध में उसके तौरतरीक़ों और वीरता को सलाम किया। सोचिए, ऐसा व्यक्ति या उस रेजिमेंट के लोग कितने असाधारण रहे होंगे, जिन्होंने यह सब किया।
1971 के बसंतर युद्ध में हनुत सिंह उस समय लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में 17 हॉर्स यानी पूना हॉर्स का नेतृत्व कर रहे थे और उसी असाधारण रण-नेतृत्व के लिए उन्हें महावीर चक्र मिला।
हमारे यहाँ राजनेता अक्सर मूर्तियों की राजनीति में इतने तल्लीन रहते हैं कि वे जीवित आदर्शों की जगह मृत प्रतीकों के बाज़ार सजाते रहते हैं। हनुत सिंह जैसे सैनिक इस बाज़ार में फिट नहीं बैठते। वे नारे नहीं थे, वे अनुशासन थे; वे प्रचार नहीं थे, वे पेशेवर कौशल की वह दुर्लभ अग्नि थे, जो रणभूमि में जलती है और इतिहास में देर तक द्य���तिमान रहती है। बसंतर में उनका आधिकारिक वीरता-वर्णना साफ़ और वाचाल होकर बताता है कि वे दुश्मन की भीषण गोलाबारी के बीच एक संकटग्रस्त मोर्चे से दूसरे मोर्चे तक जाते रहे, अपने जवानों को स्थिर, साहसी और दृढ़ बनाए रखते रहे। ऐसे लोग राष्ट्र के शोर में नहीं, उसकी रीढ़, रूह और रगों में बसते हैं।
और देखिए, विडंबना कितनी गहरी है। 1971 के युद्ध के तत्काल बाद पाकिस्तान की सेना ने उन्हें ‘फ़ख्र-ए-हिन्द’ का स��बोधन दिया, जो पूना हॉर्स की असाधारण बहादुरी के लिए प्रचलित हुआ। यह केवल एक रेज़िमेंट का करिश्मा नहीं था। यह एक तरह से हनुत सिंह के निजी अलंकरण की तरह था। उस रेजिमेंट की उस ऐतिहासिक आभा के केंद्र में हनुत सिंह का नेतृत्व था। यानी दुश्मन ने भी उस जांबाजी को देखा, पहचाना, स्वीकार किया; और हम हैं कि अपने ही शहरों में उनके नाम की रोशनी तक ठीक से नहीं जला पाए। यह देखकर दु:ख और ग्लानि का भाव जागता है कि उन्हें शायद राजपूत समाज के बाहर उस तरह जाना ही नहीं गया है।
यही प्रश्न जयपुर में मौजूद प्रदेश के प्रमुख नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने एक ऐसे सैनिक के लिए क्या किया, जिसकी तारीफ़ पाकिस्तान की सेना तक ने की और उन्हें ‘फ़ख्र-ए-हिन्द’ का संबोधन दिया? मैं कल ही देख रहा था, फुले साहब के मूल्यों से बहुत दूर रहने वाले लोग उनकी प्रतिमाओं पर पुष्पअर्पण कर रहे थे। लेकिन प्रश्न है कि प्रतिमाएं कुछ कर पातीं तो भारत दुनिया का सर्वाेत्तम शक्तिशाली राष्ट्र होता। लेकिन वह था कभी। उस समय जब वह प्रतिमाएं नहीं, उन मूल्यों को जीता था।
हनु्तसिंह साहब को याद करना कोई भारत सरकार या भारतीय सेना भर का मामला नहीं है। यह इस बात को ज़ेहन से गर्दोगुबार हटाकर जीवनबोध में बिठाने की ज़रूरत है कि जब एक शहर अपने सच्चे नायकों के लिए जगह नहीं बनाता तो वह अपने भविष्य से भी थोड़ी जगह खाली कर देता है। हम साफ़ देखते हैं कि ऐसा शायद ही कोई राजनेता हो, जो अपने बेटों को सेना में भेजता हो। वे आए दिन युद्धोन्माद तो भड़काते हैं; लेकिन उन्हें उस अग्निकुंड के लिए संतानें आम लोगों, किसानों, ग्रामीणों या देश प्रेमी सामान्य परिवारों की ही चाहिए, जो राष्ट्र के यज्ञ में समिधा बनकर बलिदान हो सकें। लेकिन राजनेता स्वयं क्यों इस गौरव से वंचित रहना चाहते हैं? क्यों उन्हें सिर्फ़ क्रिकेट, राजनीति, सत्ता, सिनेमा और विधानसभाएँ या लोकसभाएँ ही चाहिए? देश से प्रेम करने वाले हमारे राजनेताओं को देश के प्रति उस सेवा के मार्ग पर भी आगे बढ़ना चाहिए, जो सेना से होकर गुजरता है।
राजनीतिक समूह को यह बात थोड़ा कटु लग सकती है; लेकिन यह देखना चाहिए कि हमारे ही लाड़ले जब करिश्मे करते हैं तो हम उन्हें भुला क्यों देते हैं? एक विधायक या सांसद को तो सदन में श्रद्धांजलि दी जाती है; लेकिन ऐसे वीर���ं को क्याें भुला दिया जाता है और क्यों उनकी स्मृति को चिरस्थायी नहीं बनाया जाता? मीडिया में यूपीएससी क्रैक करने पर तो सुर्खियाँ बनती हैं; लेकिन किसी के सेना में चयनित होने या साहित्य में बहुत बड़ी उपलब्धि को वह सम्मान क्यों नहीं मिलता?
हनुत सिंह साहब की स्मृति में बड़ा युद्ध-स्मारक उनके जन्मस्थान जसोल में बनाने की पहल सेना और पूना हॉर्स ने की थी। देहरादून में भी उनकी स्मृति से जुड़ा स्थल सार्वजनिक चर्चा में आया। लेकिन देहरादून वाले उनके आश्रम को तो सरकार ने ही ध्वस्त कर दिया था। की होगी आपने देश की सेवा! बुलडोज़र तो हम नेता और हम अफ़सर चलवाते हैं! आपने देखा नहीं किस तरह भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के वोट तक एसआईआर में काट दिए गए! पर जयपुर जैसा राजधानी वाला नगर, जहाँ से राजस्थान अपनी सांस्कृतिक आत्म-प्रभा का दावा करता है, क्या उसके पास हनुत सिंह के लिए एक भव्य स्मारक, एक सैन्य अध्ययन केंद्र, एक सड़क, एक संग्रहालय-दीर्घा या कम से कम स्कूली बच्चों के लिए प्रेरणा-स्थल तक नहीं होना चाहिए? क्या उनकी स्मृति में एक बेहतरीन पुस्तकालय नहीं बनाया जा सकता था?
मेरे ख़याल से जयपुर में उनके नाम पर केवल एक चौराहा नहीं, एक जीवित स्मृति-परिसर होना चाहिए; जहाँ प्रतिमा पूजन नहीं, मूल्यों को जीवन में बसाने की राह दिखती हो। टैंक-युद्ध, बसंतर, पूना हॉर्स, अरुण खेतरपाल, नेतृत्व, तप, सादगी और सैनिक मर्यादा की कथाएँ भर नहीं, वे जीवन मूल्य सिखाए जाएँ कि आपका दुश्मन भी आपकी तारीफ़ करे। क्योंकि हनुत सिंह सिर्फ़ एक सैनिक नहीं थे; वे उस दुर्लभ भारतीय परंपरा के उत्तराधिकारी थे, जिसमें तलवार और तपस्या एक ही देह में निवास करते हैं। ऐसे मनुष्यों को भूलना केवल कृतघ्नता नहीं, राष्ट्रीय स्मृति के प्रति पतित मानसिकता रखना है।
आज के हमारे राजनेताओं को भी उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए कि वे नैतिक पतन वाली राजनीति करने के बजाय लोकतंत्र के ��ुनावी युद्ध में नैतिकता के मूल्यों को तिरोहित नहीं करें, उन्हें ऐसे आदर्श बनाएँ कि प्रतिपक्ष भी उसकी तारीफ़ करे। लेकिन हम जिस नैतिक रूप से रिक्तता वाली निर्लज्ज राजनीति और संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन देख रहे हैं, वह हमें उस राह पर नहीं ले जाता, जिसे लेफ़्टिनेंट जनरल हनुत सिंह जैसे योद्धा ने देदीप्यमान किया है। हम महाराणा प्रताप का नाम तो आए दिन लेते हैं, लेकिन उन्होंने युद्ध के समय में ���ी एक विशालकाय सेना के सामने अपनी बहुत छोटी सेना होते हुए भी नैतिक मूल्यों का जो बोध स्थापित किया था, उसके बिलकुल उलट हो रहा है। पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों का कहना था कि हनुतसिंह राठौड़ ने दुश्मन होकर भी पाकिस्तानी सेना से लड़ते हुए उनके टैंक उड़ाते हुए सैनिक मूल्यों का जिस श्रेष्ठतम तरीके से ध्यान रखा था, वह अद्वितीय था। क्या हमारे सत्ताधारी राजनेता, जो प्राय: बदलते रहते हैं, अपने ही देश���ासी राजनीतिक दलों के साथ चुनावों में उस नैतिकता का एक प्रतिशत भी रख पाते हैं? क्या हमें ऐसे महानायक से कुछ सीख न���ीं लेनी चाहिए कि आपके एक्ट पर प्रतिद्वंद्वी भी मुग्ध हो जाए!
#हनुतसिंह
"अध्यक्ष महोदय, अध्यक्ष महोदय,
मुस्लिम समाज की 52 जातियों को आरक्षण हमने (भाजपा सरकार) ने दिया"
-ये कह रहे हैं सदन में चिल्ला-चिल्लाकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी
@BJP4India
इनको ये ज्ञान आपने नहीं दिया था?
या फिर बंगाल और महाराष्ट्र में अलग अलग नीति है आपकी?😂
ओरण इसलिए नहीं बचाई जाएगी
क्योंकि सोलर अप्रूवल का कमीशन कम आएगा
क्योंकि ओरण की आवाज़ सबसे पहले किसी ��र ने उठाई थी
क्योंकि क्रेडिट नहीं मिलेगा
क्योंकि ये किसी एक जाति का आंदोलन तो है नहीं
क्योंकि जाति का नहीं है तो वोटों का नुकसान कम होगा
क्योंकि..क्योंकि सत्ता निर्लज्ज है
~50 रुपए दवा 500 MRP में बिक रही है,
~7 रुपए का इंजेक्शन 700 में बिक रहा है,
~कही ब्लड ट���स्ट 200 का है, तो कहीं 2000 का,
~कहीं MRI 3500 रुपए की है, तो कहीं 7000 की,
~कहीं CT स्कैन 2000 रुपए का है, तो कंही 4000 का,
~लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष का ध्यान है कि कौन सी मूवी अच्छी है कौन सी खराब।
विडंबना
-हमारे ऊपर 7 फ़र्ज़ी झूटे केस किए गए
-ग���जरात में तो हमे jail भी जाना पड़ा
-हमारे परिवार और बच्चो को पुलिस द्वारा धमकाया-डराया गया (जिसमे गुजरात के दो IPS ऑफिसर सम्मिलित थे)
-9 महीने तक हमे हर 15 दिन में लोकल पुलिस स्टेशन में सिग्नेचर करने जाना पड़ता था
-हमारा पासपोर्ट कोर्ट के पास जप्त पड़ा है
-गिर-सोमनाथ जिले से हम तड़ीपार है
-गुजरात में हमारे पर कई बार “मीडिया ट्रायल” चलाया गया, झूठी कहानी बनाई गई
-हमे उस बात/गुनाह का दोषी मीडिया द्वारा बनाया गया जो हमने किया ही नहीं था
-हमे निरंतर मेंटल टॉर्चर दिया गया(इसी सिस्टम द्वारा)
और यह सब करने की हिम्मत किसी मुसलमान या ईसाई में नहीं थी,
यह सब उन्होंने किया जिन्हें हम अपना समझते थे/है
आप जैसे लाखो “विजय” उनके लिए केवल “Use and throw material” है, उम्हे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता आपके होने या ना होने से-
लेकिन #धर्म को फर्क पड़ता है,
ना कोई लेफ्ट है, ना कोई राइट है
ना कोई पक्ष है, ना कोई विपक्ष है
ना कोई अपना है, ना कोई दुश्मन है
सिर्फ #धर्म ��ै और #अधर्म है,
इसलिए “give up” मत करिए, आपका अस्तित्व है और इसके लिए किसी “सोशल मीडिया अकाउंट” की आवश्यकता नहीं।
मैं सभी अधर्मियों से लड़ी और आप भी लड़ सकते है,
हम सदैव महादेव और माँ के चरणों में शरणागत रहते है इसलिए किसी नेता के पैर नहीं पकड़े और इसलिए हमारे महादेव ने हमे कभी “give up” नहीं करने दिया
रही बात इस घटिया सिस्टम की- तो इस सिस्टम ने मुझे हराने के लिए बहुत ताक़त लगाई थी,
मगर हमारी साइड में ��र्म है इसलिए इस संघर्ष में हम सदैव जीते,
आपको ये सब इसलिए बता रहे है क्युकी आपका नाम ही #विजय है तो आप “give up” कैसे कर सकते है ?
आपके पास हमारा नंबर है, अगर हम आपके किसी भी काम आ पाए तो अपनी इस बहन को याद कर लेना।
यतो धर्मस्ततो जयः🚩 हर हर महादेव 🚩🙏🏻
हे नड्डेश्वर! क्या आप अपनी ही सरकार द्वारा प्रस्तावित यूजीसी नियमावली और SC/ST एक्ट समेत, अमेबेडकर धाम, पंचतीर्थ आदि से अनभिज्ञ हैं या जनता को विशेष कोटि का चूतिया समझते हैं?