नेताओं के सामने पैंट में गुनगुना मूतने वाले,
एक गरीब जो गन्ने का रस बेचत�� है उसको थप्पड़ से मारते हैं।
हराम का खा खा कर चर्बी चढ़ी है,
अपने मालिक पर हांथ उठाते हो बेशर्मों।
सिपाही शैलेन्द्र सिंह थाना लालगंज पर कार्यवाही होनी चाहिए।
एक मासूम बेटी
उम्र- 15 साल
कक्षा- 10
अभी पूरा जीवन बचा था, करियर सामने था। सोच के रूह कांप जाती है कि वो कितना तड़पी होगी, कितना रोई होगी, उसने कितना दर्द सहा होगा।
@rajput_of_india , कोई नेता किसी का सगा नहीं होता। ये नेता नगरी भी एक बिज़नेस है। अंधा भरोसा किसी पर सही नहीं। राम त्रेतायुग में थे, कलयुग में “प्राण जाए पर वचन न जाए” ऐसा कोई सूर्यवंशी मुश्किल से मिलेगा, लेकिन किसी नेता में तो बिल्कुल नहीं।
कृपया अपनी आवाज�� खुद बुलंद करें। जय भवानी।
क्या @narendramodi@samrat4bjp इस घृणित सोच वाले पर कार्रवाई करेंगे? बलात्कार को ‘शुद्धिकरण’ कहा जा रहा है। जब-जब इस स्तर की ‘बदला तो लेगा’ वाली सोच को मंचों से सामान्य बनाया जाएगा, सारन में कोई सवर्ण बच्ची किसी माँझी, पासवान के द्वारा नोची जाती रहेगी।
ये विराट कोहली की शादी का रिसेप्शन नहीं जहां मोदी या उसके चरण चाटुकार सवर्ण सांसद पहुंचे।
ये टीवी चैनलों का डिबेट रूम नहीं जहां सुधांशु त्रिवेदी या राजीव प्रताप रूडी पहुंचे
ये भारत पाकिस्तान के मैच वाला स्टेडियम नहीं जहां अनुराग ठाकुर पहुंचे
ये कोई राजनैतिक रैली जहां गिरिराज सिंह या सम्राट चौधरी दिखाई दें।
ये कोई अंबानी की शादी काफंक्शन नहीं जहा��� जाना नेता लोग अपनी शान समझते हैं।
ये जगह वो है जहां एक लाचार मां अपनी नोच डाली गई बेटी की लाश लेकर उन पुलिस वालों के सामने बैठी है जिन्हें लगता है कि लड़की अपने आप कुएं में कूद गई।
थू है तुम पर राजीव प्रताप रूडी, अनुराग ठाकुर, गिरिराज सिंह, निशिकांत दुबे, रविशंकर प्रसाद और सारे सवर्ण नेताओं
थू है तुम पर!
सामान्य वर्ग के योद्धाओं से आग्रह है कि इन पिल्लों को जम कर पेलो। प्रो��ेस्ट की न्यूज़ और वीडियो जहाँ से मिले, जितनी बार मिले, एक कमेंट क�� साथ पोस्ट करते रहो। जब तक बाढ़ नहीं आएगी, इनका घमंड नहीं टूटेगा।
बिहार सरकार ने ‘स्वच्छता अभियान’ के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में हर वार्ड में कूड़ा उठाने हेतु एक-एक व्यक्ति को ₹3000/माह पर नियुक्त किया।
पिछली मई जब में अपने गाँव में था तो एक दलित नवयुवक ने मुझसे कहा कि मुखिया पैसे नहीं दे रहा। आज वही नवयुवक पुनः आया और कहा कि डेढ़ वर्ष से उसके जैसे चौदह दलित नवयुवकों को पंचायत से पैसे नहीं मिल रहे।
@NitishKumar जी, ये गरीब लोग कूड़ा उठा रहे हैं, और @DM_Begusarai की नाक के नीचे पंचायतों में फंड रिलीज नहीं हो रहे। यदि रिलीज हो रहा है, तो मुखिया पैसे बाँट क्यों नहीं रहा है। मेरी पंचायत (बभनगामा) का मुखिया मोहम्मद मोख्तार है, प्रखंड बरौनी है।
आपसे आग्रह है कि दलितों का ही काम है, इन अत्यंत निर्धन परिवारों को उनके किए हुए कार्य का पैसा दिलाया जाए। @bdobarauni
‘जिन्ना परस्तों देखो ���ो
हमारी एकता ना तोड़ो
ना तोड़ो, ना तोड़ो’…
लखनऊ विश्वविद्यालय के गेट के सामने छात्र धरने पर बैठे। छात्र #UGCRegulations में जाति आधारित भेदभाव का विरोध कर रहे है।
पुलिस का भारी बंदोबस्त और जमावड़ा लगा हुआ है। पुलिस “स्वतंत्र” होने का मौक़ा तलाशती हुई!!
सबसे ज़्यादा आवाज़ें उत्तर प्रदेश से सुनाई पड़ रही हैं। ज़्यादातर बड़ी क्रांतियों का बिगुल यहीं से फूँका गया है…
का हो @nishikant_dubey जी, आज नहीं बताना कि मोदी जी ने उज्ज्वला योजना का सिलिंडर दिया और बाबा साहेब के संविधान की गारंटी हैं मोदी जी। और आर्टिकल लहसुन में क्या लिखा है?
इन सारे पतित नेताओं को याद रखिएगा जो @dpradhanbjp वाले कुत्ते की टट्टी को लीपने का प्रयास कर रहे हैं।
कुछ सच ऐसे होते हैं, जिनके ऊपर भ्रम का आवरण चढ़ा दिया जाता है। ऐसा ही एक सच ये है कि न तो रोहित वेमुला दलित था और न ही उसकी माँ राधिका दलित समाज में आती हैं।
ये मैं नहीं कह रहा हूँ। गुंटूर की जिलास्तरीय स्क्रूटनी कमिटी ने ये पाया था कि माँ-बेटे ने फर्जीवाड़ा करके SC का सर्टि��िकेट प्राप्त किया था। ये दोनों वड्डेरा जाति से आते थे, जो आंध्र प्रदेश/तेलंगाना में OBC में आती है।
एक और सच ये है कि रोहित वेमुला के आत्महत्या का कारण शैक्षणिक परिसर में हुआ जातिगत भेदभाव नहीं, बल्कि उसकी व्यक्तिगत परेशानियाँ थीं जिनके कारण वो अवसाद में था। ये भी मैं नहीं कह रहा हूँ, ये शिक्षा मंत्रालय (तब HRD) द्वारा गठित रूपनवाल आयोग ने पाया था।
तीसरा सच ये है कि रोहित वेमुला की आत्महत्या में जिन्हें आरोपित बनाया गया था, जिनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिले। ये भी मैं थोड़े न कह रहा हूँ। ये तेलंगाना पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट में लिखा हुआ है। तेलंगाना हाईकोर्ट ने भी माना कि सबूत नहीं मिले हैं, आत्महत्या के पीछे कई कारण हो सकते हैं।
मीडिया कुछ और चलाता है, जाँच में कुछ और निकलता है। नैरेटिव जाँच के आधार पर नहीं, मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर गढ़े जाते हैं। बाद में यही नैरेटिव नीति-निर्��ाण की प्रक्रिया को दिशानिर्देशित करते हैं। फिर जो भी नियम या क़ानून बनकर आता है, वो तथ्यों पर आधारित न होकर उन्हींलोगों के लेखों पर आधारित होता है जो मन ही मन कह रहे होते हैं कि सरकार तो तुम्हारी है पर सिस्टम हमारा है। UGC के ताज़ा नियमों को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
आदरणीय, परम सम्मानीय, श्री सांसद महोदय @nishikant_dubey जी आपने बहुत ही अच्छा और शानदार ट्वीट किया है।
बस जो ट्वीट है वही UGC की गाइडलाइंस यानी नियमों में जुड़वा दीजिए। अभी UGC के नियमों में SC/ST/OBC बस है। उसमें SC/ST/OBC/UR करवा दीजिए। बस बात ही ख़त्म।
जब आप ऐसे करवा देंगे उसी समय मैं आपको कोट करके ज़िंदाबाद करूँगा।
नहीं तो……… ग़रीब/शोषित/पीड़ित/वंचित अपनी आवाज उठाते रहेंगे ।