राजस्थान में अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान और उनका अध्ययन स्वागत योग्य है। यदि हमारे विश्वविद्यालयों में मराठी के साथ-साथ तमिल, तेलुगु, कन्नड़ जैसी समृद्ध भाषाओं के केंद्र खुलेंगे तो इससे ��ाषाई विविधता मजबूत होगी और 'राष्ट्रीय एकता' (National Integration) की भावना को बल मिलेगा।
लेकिन यह चिंता का विषय है कि आज प्रदेश के मात्र 4 विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा का अलग विभाग है। मैं राज्य सरकार और राजभवन से आग्रह करता हूँ कि बाहरी भाषाओं से पहले प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में 'राजस्थानी' भाषा के विभाग और अध्ययन केंद्र स्थापित कर इसे मजबूत किया जाए।
हमारी कांग्रेस सरकार ने 25 अगस्त 2003 को ��िधानसभा से प्रस्ताव पारित कर मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, बृज, वागड़ी, मालवी और शेखावाटी जैसी समृद्ध बोलियों सहित 'राजस्थानी भाषा' को संवैधानिक दर्जा दिलाने की जो मुहिम शुरू की थी। केंद्र सरकार राजस्थानी भाषा को अविलंब 8वीं अनुसूची में शामिल कर संवैधानिक मान्यता दे। मायड़ भाषा का सम्मान और इसका स��रक्षण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
राजस्थानी से पहले मराठी क्यों?
बीकानेर के शिक्षाविद और साहित्यकार राजेंद्र जोशी ने राजस्थान के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी से पहले मराठी के केंद्र खोले जाने के मुद्दे पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
राजस्थान के 8 करोड लोगों और दो करोड़ से ज्यादा प्रवासियों को किस मुद्दे पर जरूर सोचना चाहिए कि अगर आप लोग आज एकजुट नहीं हुए तो आ���के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी के बजाय मराठी, कन्नड़, तेलूगू, तमिल आदि के केंद्र ही खुलेंगे। राजस्थानी के नहीं।
जद आपरै घर'रै माइनै आपरौ मान नहीं हुवै पण
दूसर��'नै पूरौ मान देवण री बातां हुवण लाग जावै
दर्द होणौ लाजमी भी है @arvindchotia सा ।
पण आपरै ई दर्द नै खुल'र बोलणै री तागत सारां
जणा'म नीं हुवै @RajveerChalkoi जैड़ा
कोई विरला मिणख ही हुवै ।
साधुवाद आपरी सोच नै @RajveerChalkoi 🙏
आज इस आवाज में दर्द है...
राजवीर सिंह चलकोई को हम सुनते रहे हैं। उनकी बोली में हमेशा एक खनक रहती है अल्हड़पन झलकता है। मैंने इस पूरे वीडियो में देखा कि वो बात कहीं भी नहीं है। क्यों?
क्योंकि हमारे आत्मसम्मान पर चोट ही हुई है
राज्यपाल महोदय ने एक आदेश जारी कर राजस्थान के सभी व���श्वविद्यालयों में मराठी के केंद्र खोलने के लिए कह दिया है। दूसरी तरफ वर्षों से राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए संघर्ष कर रहे ल���ग अभी तक राजस्थान के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी के केंद्र नहीं खुलवा पाए हैं। स्कूलों में राजस्थानी की पढ़ाई शुरू नहीं करवा पाए हैं। राजस्थान की राजभाषा नहीं बनवा पाए हैं। पीड़ा तो है। सच्ची है। झलकेगी ही। छलकेगी ही।
राजस्थान वालों के चेहरे पर ऐसा जोरदार झापड़ मारा गया है, जिसका अहसास तो हुआ है लेकिन आत्म गौरव खो चुके लोग यह तय नहीं कर पा रहे कि रिएक्ट क्या करना है और कैसे करना है। इस पीड़ा को सभी सुनें और और सोचें कि हम अभागे लोग कहां खड़े हैं?
वीडियो साभार @republic
जो लोग अपने-अपने क्षेत्र की बोलियों को मान��यता दिलाने के नाम पर राजस्थानी को मान्यता देने का विरोध कर रहे हैं, उनसे एक बात -
अपनी स्थानीय भाषा को जीवित रखने का रास्ता किसी दूसरी भाषा का विरोध नहीं, बल्कि अपनी बोली ��े साहित्य, शोध और दस्तावेज़ीकरण को मजबूत करना है।
यदि आपको लगता है कि किसी एक बोली का प्रभाव अधिक है, तो उसका समाधान विरोध नहीं बल्कि अपनी स्थानीय बोली को साहित्यिक और अकादमिक स्तर पर समृद्ध बनाना है।
लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, लोकनाट्य, इतिहास …इन सबका जितना अधिक दस्तावेज़ीकरण होगा, उतना ही आपकी बोली का योगदान मान्यता प्राप्त राजस्थानी के स्वरूप में दिखाई देगा।
और जो लोग कहते हैं कि “इ���में साहित्य या विमर्श नहीं”, तो उसका उत्तर भी यही है -
लेखन कीजिए, शोध कीजिए, अपनी भाषा को राज्य ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाइए।
भाषाएँ विरोध से नहीं, संरक्षण और सृजन से जीवित रहती हैं।
राजस्थानी को मान्यता न देना और अपनी बोली के लिए भी कोई ठोस प्रयास न करना ….यह भाषा-चिंता कम और विरोध की प्रवृत्ति अधिक लगती है।
कड़वा है, पर सत्य है!
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राजस्थानी भाषा को प्रदेश के विद्यालयों में अनिवार्य किए जाने का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ऐतिहासिक और स्वागत योग्य है।
मातृभाषा में शिक्षा मिलने से बच्चों के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी के साथ ही वे अपनी संस्कृति, परंपराओं एवं लोक मूल्यों से और अधिक दृढ़ता से जुड़ पाएंगे।
यह निर्णय राजस्थानी भाषा प्रेमियों के लिए भी अत्यंत गौरवान्वित करने वाला है। राजस्थानी भाषा को सम्मान दिलाने हेतु समर्पित भाव से प्रयासरत सामाजिक संगठनों, साहित्यकारों, युवाओं एवं सभी प्रबुध्दजनों को हार्दिक शुभकामनाएं।
राजस्थानी भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग हमने संसद में पहले भी उठाई है और अब सरकार से फिर से मांग करते हैं कि राजस्थानी भाषा को 8वीं अनुसूची में श���मिल कर प्रदेशवासियों की भावनाओं का सम्मान किया जाए।
#Rajasthan
राजस्थान ही नहीं अपितु उत्तर भारत का एक भी हिंदीपट्टी राज्य कभी अपनी हिंदी और लोकल भाषा को किसी पर नहीं थोपता है
आपको एक घटना ऐसी नहीं दिखेगी जिसमे भाषा के नाम पर किसी को परेशान किया गया हो
अगर हम राजस्थानी अपनी भाषा के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो उसका अस्तित्व बचाने के लिए कर रहे हैं ना कि किसी पर थोपने
फिर भी किसी को मिर्ची लगती हो तो लगे