@tata_cars एक महीना की नई कार की CNG लिकेज़ हो गई है मेरी जान बच गई है कृपया अपनी कार को ले जाएं मुझे टाटा की कार नहीं चाहिए I मैं पैसा और जान दोनों नहीं दे सकता यदि आपकी नई कार में गैस लीक हो रही है तो पुरानी होने के बाद तो ��िलेंडर भी फट सकता है
@vicky25081994 नमस्ते @vicky25081994, आपको हुई असुव���धा के लिए क्षमा चाहते हैं। कृपया DM के माध्यम से अपनी चिंता पर विस्तृत करें और हमारे साथ कांटेक्ट नंबर, कार मॉडल तथा डीलर डिटेल्स शेयर करें ताकि हमारी टीम आपकी चिंता को सुलझाने में आपकी मदद कर सके। https://t.co/u0e592rBQO
सर्प दंश के काफ़ी मामले अगस्त में आते हैं।
सरकार को इन सब चीज़ों पर अभी से ही ध्यान देना चाहिए।
1) सभी स्वास्थ्य केंद्रो (PHC में भी) में Anti Snake Venom की पर्याप्त अनिवार्य उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।
2) सभी प्राइवेट अस्पतालों को भी निर्देश निर्गत करे कि वो अपने इमरजेंसी में अनिवार्य ��ौर से ASV रखें।
3) राज्य के सभी PHC स्टाफ को सर्प दंश के इलाज कि उपयुक्त ट्रेनिंग दें।
4) लोगों में सर्प दंश से जुड़ी भ्रांतियों को लेकर जागरूकता अभियान चलाए।
@PMOIndia @MoHFW_INDIA
@JharkhandCMO @IrfanAnsariMLA
ये बिहार के कॉमेडियन हर्ष राजपूत है इन्होंने भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर पर एक वीडियो बनाया है।
इनका कहना है कि इस वीडियो से जितनी भी कमाई होगी। श्रद्धांजलि के रूप में गरीब बच्चों के स्कूल में डोनेट कर दूंगा। इस वीडियो को आप यूट्यूब पर देख सकते हैं
@myogiadityanath@CMOfficeUP@NandiGuptaBJP@upeidaofficial यह शिकायत UPEIDA के विफल प्रबंधकीय शैली के प्रति नाराजगी व्यक्त करने तथा आपातकालीन सेवाओं के सुचारू संचालन कराने के उद्देश्य से की जा रही है, कृप्या संवेदनशीलता से संज्ञान लें।
सोचिए उस माँ पर क्या गुजरी होगी, जब उसे पता चला कि उसके 19 साल के क्रांतिकारी बेटे का कटा हुआ सिर कोर्ट लाया गया है? कुछ कहानियाँ दिल नहीं तोड़तीं, बल्कि सीने में एक ऐस�� टीस पैदा करती हैं जो सदियों तक खत्म नहीं होती। जब हम क्रांतिकारी 'प्रफुल्ल चाकी' का नाम लेते हैं, तो हमें एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक 19 साल का वो बच्चा दिखना चाहिए, जिसकी आँखों में माँ के आंचल की ममता से ज्यादा मातृभूमि की बेड़ियों का दर्द था।
कल्पना कीजिए उस पल की, जब प्रफुल्ल घर से निकले होंगे। क्या उन्होंने अपनी माँ के पैर छुए होंगे? क्या उनकी माँ को पता था कि उ��का हँसता-मुस्कराता 'प्रफुल्ल' अब कभी लौटकर नहीं आएगा?
उस उम्र में, जहाँ लड़के अपनी मूँछों पर ताव देना सीखते हैं, प्रफुल्ल ने हाथ में बम थाम लिया था। मुजफ्फरपुर की उस अंधेरी रात में जब उन्होंने और खुदीराम ने धमाका किया, तो वह केवल एक विस्फोट नहीं था, वह सदियों की गुलामी के खिलाफ एक तड़प थी।
तारीख थी 2 मई, 1908 मोकामा घाट स्टेशन पर
एक 19 साल का क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी दो दिन से भूखा-प्यासा, पैरों में ��ाले, लेकिन आंखों में वो आग जो समंदर सुखा दे, मुजफ्फरपुर में बम फोड़ने के बाद वो भाग रहा था। उसे लगा था कि मुल्क के लिए कुछ कर दिया, लेकिन उसे नहीं पता था कि एक गद्दार हिंदुस्तानी पुलिसवाला उसकी ताक में बैठा है।
स्टेशन पर घेराबंदी हो गई। पुलिस की राइफलें तनी थीं। प्रफुल्ल के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था। अंग्रेज चाहते थे उसे ज़िंदा पकड़ना, ताकि उससे राज उगलवा सकें। पर प्रफुल्ल ने सोचा— "इन गोरों के हाथ लगने से अच्छा है, अपनी मिट्टी में मिल जाना।"
उस क्रांतिकारी ने खटाक से अपनी ही रिवॉल्वर निकाली और एक ही झटके में खुद को खत्म कर लिया। अंग्रेज देखते रह गए, लड़का उनके हाथ आने से पहले ही शहीद हो गया।
अब सुनिए वो बात जिसे सुनकर कलेजा मुंह को आ जाए। अंग्रेज इतने बौखला गए थे कि उन्होंने मरे हुए प्रफुल्ल के शव ��े साथ वो किया जो कोई जानवर भी न करे।
पहचान करने के बहाने उन्होंने प्रफुल्ल का सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया। उस कटे हुए सिर को एक स्पिरिट के डिब्बे में बंद किया गया और कलकत्ता भेजा गया। क्यों? ताकि कोर्ट में सबूत पेश किया जा सके और खुदीराम बोस को डराया जा सके।
सोच के देखिए, जिस मां ने अपने लाल को लोरी सुनाकर सुलाया होगा, उसके सामने उसके बेटे का कटा हुआ सिर एक डिब्बे में बंद होकर आ��ा। ये कोई कहानी नहीं है, ये वो कीमत है जो इस देश के बच्चों ने अपनी गर्दन कटाकर चुकाई है।
प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस, ये वो लड़के थे जिनकी उम्र में आज के बच्चे वीडियो गेम खेलते हैं। इन लोगों ने घर-बार, मां की ममता, सब छोड़ दिया बस एक जिद के लिए— वो जिद थी ''।
आज हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन क्या हम उस 19 साल के शहीद का नाम भी ठीक से जानते हैं? प्रफुल्ल ने अपनी जान दे दी, अपना सिर कटा लिया, पर अंग्रे��ों के सामने झुका नहीं।
सच तो ये है साहब, कि हमारी आज़ादी के पन्ने इन्हीं गुमनाम शहीदों के खून से लिखे गए हैं। इसे सिर्फ पढ़िए मत, महसूस कीजिए कि उस वक्त का मंजर क्या रहा होगा।
प्रफुल्ल, आपकी शहादत का कर्ज यह देश कभी नहीं उतार पाएगा।😢😢
आदरणीय मुख्यमंत्री जी @myogiadityanath विद्युत विभाग के CE,SE, EE द्वारा शासन के आदेश , UPPCL के निदेशकों के आदेशों की अवहेलना लिखित ���ें कर रहे हैं जोकि कर्मचारी नियमावली 1956 के अंतर्गत कदाचार और अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। ऐसे अधिकारियों पर तत्काल कार्यवाही होनी चाहिए
श्रीमान जी @ChairmanUppcl jan 24 के आदेश में 100 केवीए से 250 केवीए तक का मुख्य उत्तरदायित्व जेई का था ।आज के आदेश में 10 केवीए से 1000 केवीए तक का मुख्य उत्तरदायित्व जेई का है। अगले साल 27 में 10 केवीए से 10000 केवीए तक जेई ही जिम्मेदार होगा बाकी सब क्या बारात में आये हैं।
ऋषिकेश में गङ्गा किनारे चार दिन की सड़ी हुई एक ला#श मिली थी। भीड़ इकट्ठी हो गयी, पुलिस बुला ली गयी। सबने ला#श से बार बार पूछा- "ला#श! कौन हो तुम?"
ला#श का मुँह सड़ गया था। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। भारत में पुलिस के आगे जिन्द�� लोग नहीं बोल पाते, वह तो फिर भी ला#श थी। हाँ, उसके कपड़ों ने बताया- वह एक बूढ़ी बंगालन स्त्री थी।
किसी ने कहा कि मुक्ति मिल गयी। किसी ने परिजनों के लिए धिक्कार की गालियां गढ़ीं। पुलिस ने चौकीदारों से ला#श को तिरपाल में लपेटवाया और ले गयी। चौकीदारों ने मन ही मन गालियां दी- "ऐसी नौकरी तो सा#ली दुश्मन को भी न मिले..."
पुलिस मुख्यालय में अधिकारी महीनों तक ला#श से उसका परिचय पूछते रहे। बीच बीच में कुछ पत्रकारों ने भी पूछा, शहर की समाजसेवी संस्थाओं के लोगों ने पूछा, उस इलाके के नेताओं ने पूछा, पर कोई उत्तर नहीं मिला।
इन सबने मिल कर महीनों तक कड़ियां जोड़ीं। जाँच हुई, गायब हुए लोगों का पता किया गया,अंदाजे लगाए गए। अब ला#श बोलने लायक हुई। ला#श जानती थी कि यह जादुई यथार्थवाद का युग है, सो उसने बोलने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इंस्पेक्टर ने अबकी पूछा तो ला#श सुगबुगाई। पुलिस को बल मि��ा, इंस्पेक्टर ने पूछा- "बुढ़िया बता! किसकी ला#श है तू?
ला#श बोली- "बीना दास (वीणा) को जानते हो दारोगा साहब?"
"कौन बीना दास? मैं नहीं जानता किसी बीना वीणा को..."
"पद्मश्री बीना दास! सुभाष चन्द्र बोस के गुरु बेनीमाधव दास और समाजसेवी कमला देवी की पुत्री बीना दास। वही बीना, जिसे अंग्रेज गवर्नर को गोली मारने के कारण कालापानी की सजा हुई थी। ��िसने सेलुलर जेल में दस वर्ष काटे थे।
"हैं,,,?? यह कौन सी कथा है रे बुढ़िया? मैंने तो कभी नाम तक नहीं सुना..." इंस्पेक्टर झुंझला गया था।
ला#श ठहाके लगा कर हँसने लगी। कुछ देर बाद बोली- "कोई बात नहीं साहब! आजाद भारत क्यों याद रखे स्वतन्त्रता संग्राम को? सुख के दिनों में दुख की कथाएँ कौन गाये..."
"अच्छा तो तू ही बता दे उनके बारे में..." सब एक साथ चीखे।
ला#श हँसी। बोली, " सुनो! बीना के पिता बंगाल के क्रांतिकारियों में प्रतिष्ठित और पूज्य थे। उसकी माँ लड़कियों के लिए विद्यालय चलाती थी। बचपन से ही उसने सुभाष बाबू को अपने घर आते देखा था और उनसे बहुत प्रभावित रहती थी।"
सबकी निगाह ला#श पर जम गई थी। वह बोलती गयी, "कलकत्ता विश्वविद्यालय से उसने बीए की परीक्षा पास की थी। दीक्षांत समारोह के दिन ही उसने अपने जीवन को सार्थक करने का मन बनाया था। इस काम में ��सके पिता और मां दोनों उसके साथ थे। माँ ने जाने कहाँ से ला कर उसे भरी हुई पिस्तौल दी थी।
विश्वविद्यालय में डिग्री बांटने के लिए गवर्नर स्टैनली जैक्शन आया था। वह जैसे ही मंच पर खड़ा हुआ, वीणा उठ कर आगे बढ़ी, और फायर झोंक दिया। गोली गवर्नर की कनपट्टी को छूती हुई निकक गयी। वह दूसरा फायर करती तबतक इंस्पेक्टर सोहरावर्दी ने एक हाथ से उसका गला पकड़ लिया, और दूसरे हाथ से उसके पिस्तौल वाले हाथों को ऊपर ��ठा दिया। वह फिर भी फायर करती रही। उसके पांचों फायर बेकार गए..."
सबके चेहरे पर आश्चर्य पसरा हुआ था। वे सन्न पड़े चुपचाप सुन रहे थे। लाश ने कहा, " उसके बाद केस चला, दस साल की सजा हुई। सन 1939 तक सजा काटी। छूटने के बाद फिर आंदोलनों में सक्रिय हो गयी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी जेल गयी..."
"फिर?"
"फिर 1947 में देश आजाद हुआ तो बीना ने विवाह कर लिया। आयु 36 की हो गयी थी, पर सोचा कि ��ब सुखी जीवन जीने के दिन हैं... पर शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था। पति का देहांत हुआ और फिर आगे पीछे कोई न दिखा! बीना ऋषिकेश आ गयी। एक स्कूल में पढ़ाती, उसी से खर्च चल जाता।"
"फिर?"
"फिर क्या? एक दिन आया जब उम्र देह पर भारी पड़ने लगी। पढ़ाने की शक्ति नहीं रही। कुछ दिन इधर उधर से मांग कर पेट भर लिया... और एक दिन सड़क पर चलते चलते ठोकर लगी,ऐसी गिरी कि उठ न सकी... वहीं से निकल ली।"
"ओह... हे भगवान! तुम.. आप वही हैं?"
" ह��ँ जी! पर दुखी मत होवो आपलोग! जब मैं दुखी नहीं तो तुमलोग क्यों हो रहे हो? मुझे मेरा देश बहुत प्रिय है। मैं यहाँ मर कर भी बहुत प्रसन्न हूँ।"
"लेकिन सरकार को तो आपकी व्यवस्था करनी चाहिये थी। इतनी बुरी मृ#त्यु... उफ्फ!"
"सरकार तो सरकार ही होती है जी, वह अंग्रेजों की हो या भारतीयों की हो... कुछ नहीं बदलता! जिसे देश की जनता भूल जाय उसे ��रकारें क्या याद रखेंगी।"
भीड़ छंटने लगी। सब अपने अपने काम में लगे। लाश भी जला दी गयी। पर इंस्पेक्टर के साथ कुछ गड़बड़ हो गया। वह जब भी अपने कार्यालय में टंगा भारत का नक्शा देखता तो उसे उसमें लाश की तस्वीर दिखती, और तब उसकी आँखों में केवल लज्जा होती थी।
साभार
इस पीड़ित परिवार की आवाज उस प्रशासन तक पहुंचनी चाहिए। जिसके कानों पर जूं नहीं रेंगती। इस काम को आप जैसे बुद्धि जीवी लोग ही कर सकते है।
इसमें किसी भी प्रकार से पक्ष-विपक्ष न होने दे। हम लोग अगर सड़क पर नहीं उरत सकते तो कम से कम इतना तो कर ही सकते है कि ये बात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक पहुंच जाए। कल को ये न हो कि हम लोगों ने किसी भी प्रकार से कोई आवाज नहीं उठाई थी।
हम न्याय नहीं दे सकते तो कम से कम किसी पीड़ित को न्याय के दरवाजे तक तो पहुंचा ही सकते है। मुझे आप लोगों से उम्मीद है कि आप लोग इस कार्य में मेरा साथ देंगे। 🙏🙏🙏🙏
UP का हाथरस 2.0 : गंगा किनारे सुनाई दी रिया (बदला हुआ नाम) के साथ हुए दुष्कर्म की चीखें !
Samne Ghat, वाराणसी
वाराणसी… जहाँ हर सुबह गंगा के किनारे आरती की आवाज़ गूंजती है, जहाँ लोग मोक्ष की कामना लेकर आते हैं। लेकिन इसी पवित्र शहर के सामने घाट की झुग्गियों में एक ऐसा दर्द दफन है, जिसकी चीख आज भी हवा में तैरती है।
रिया … सिर्फ 17 साल की,उम्र थी सपने देखने की।
उम्र थी स्कूल, हँसी और छोटे-छोटे ख्वाबों की।
लेकिन एक दिन, उसी बस्ती के लो��ों ने देखा — एक पेड़ पर उसकी लाश लटकी हुई है। परिवार जब पहुँचा, तो माँ की चीख ने पूरे घाट की खामोशी तोड़ दी। पिता के हाथ काँप रहे थे। भाई बार-बार कह रहा था — “ये मेरी बहन ऐसा नहीं कर सकती…”
परिवार का दावा है कि जब उन्होंने रिया को नीचे उतारा, तो कई बातें उन्हें खटक गईं। उनका कहना है कि न तो आँखें पलटी थीं, न जीभ बाहर थी। पैरों में गहरे चोट के निशान थे। शरीर पर ऐसे संकेत थे जो उनके मन में सवाल खड़े कर र���े थे।
परिवार के मुताबिक उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट कभी नहीं दिखाई गई। वे कहते हैं कि जब उन्होंने थाने के चक्कर लगाए, सच्चाई जानने की कोशिश की, तो उन्हें चुप रहने की सलाह दी गई। पिता और भाई का आरोप है कि उनके साथ मारपीट तक की गई, ताकि मामला आगे न बढ़े।
सबसे ज्यादा दिल तोड़ देने वाली बात तब हुई, जब रिया का अंतिम संस्कार जल्दबाज़ी में Harishchandra Ghat पर कर दिया गया। परिवार का कहना है कि वहाँ पहले से एक चिता जल रही थी और उसी में उनकी बेटी के शरीर को डाल दिया गया। माँ रोती रही, भाई हाथ जोड़ता रहा — लेकिन सब कुछ कुछ ही पलों में खत्म हो गया। जैसे किसी ने एक ज़िंदगी को जल्दी-जल्दी मिटा दिया हो।
दो साल बीत चुके हैं।फाइल बंद हो चुकी है।लेकिन उस झुग्गी में आज भी हर शाम सन्नाटा उतर आता है।
रिया का परिवार सामने घाट की झुग्गियों में रहता है। कच्ची छत, टपकती दीवारें, और हर दिन का संघर्ष। गरीबी इतनी कि न वकील करने के पैसे, न बड़े दरवाजों तक पहुँचने की ताकत। बस्ती की और लड़कियाँ आज भी डरी हुई हैं। वे कहती हैं — “अगर हमारे साथ भी कुछ हो गया, तो क्या हमारी आवाज़ भी ऐसे ही दबा दी जाएगी?”
माँ आज भी गंगा किनारे बैठकर एक ही सवाल पूछती है — “मेरी बेटी ने क्या गुनाह किया था?”
पिता की आँखों में अब आँसू कम और खालीपन ज़्यादा है।
भाई हर आने-जाने वाले से बस इ��ना कहता है — “हमें सच चाहिए… बस सच।”
सामने घाट पर सूरज रोज़ उगता है।
आरती रोज़ होती है।लेकिन उस परिवार की ज़िंदगी में जो अंधेरा आया, वो अब तक नहीं छँटा।
यह कहानी सिर्फ एक लड़की की मौत की नहीं है…
यह कहानी है उस खामोशी की, जो अक्सर गरीबों के हिस्से में आती है।
और सवाल अब भी वहीं खड़ा है —क्या रिया को कभी न्याय मिलेगा, या उसकी कहानी भी गंगा की लहरों में बहा दी जाएगी…? सच्चाई से इस खबर को दुनिया तक लाने के लिए आपका शुक्रिया ���र धन्यवाद @kashish_Baghel1 जी
एक कैंची तलवार वाले अधिकारी के लौंडे ने तुम्हारे कांस्टेबल को चौकी के अंदर गिरा गिरा के मारा ,
फिर उसके पिताजी उसको वहां से अपनी गाड़ी में बिठा के ले गए तब तुम्हारा ये सपेरा कौन से बिल में छिप गया था?
सामने जवान बेटे की निर्जीव देह पड़ी थी… और एक अंग्रेज अफसर ने ठंडी आवाज़ में कहा— “बस एक बार कह दे कि ये तेरा बेटा है… फिर इसे अग्नि देने की इजाजत मिल जाएगी।” उस एक वाक्य ने जैसे एक बाप के सीने को चीर दिया, लेकिन जो जवाब आने वाला था… उसने इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।
यह कहानी है उस पिता की… जिसने अपने दिल को पत्थर बना लिया, लेकिन देश का सिर झुकने नहीं दिया। यह कहानी है मास्टर अमीरचंद की, जिनका नाम आज भी बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन जिनका त्याग किसी भी बड़े बलिदान से कम नहीं था।
8 मई 1915… दिल्ली की जेल… और एक ऐसा दृश्य, जिसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है। एक तरफ अंग्रेजों का अत्याचार था… दूसरी तरफ एक पिता का अटूट साहस।
मास्टर अमीरचंद पेशे से एक साधारण अध्यापक थे, लेकिन उनके भीतर आज़ादी की ऐसी ज्वाला जल रही थी जो हर डर को खत्म कर दे। लाला हरदयाल और रासबिहारी बोस जैसे क्रांतिकारी भी उन्हें सम्मान से देखते थे। जब लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनी, तो उस योजना के पीछे उनकी भूमिका ���ी अहम थी।
अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। लेकिन उनकी निर्दयता यहीं नहीं रुकी… उन्होंने उनके जवान बेटे को भी पकड़ लिया। उस मासूम को इतनी क्रूर यातनाएँ दी गईं कि उसने जेल की अंधेरी कोठरी में ही दम तोड़ दिया। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है?
अंग्रेजों को लगा कि अब वो टूट जाएंगे। उन्होंने सोचा कि जब एक बाप अपने बेटे की लाश देखेगा… तो वह सब कुछ बता देगा। वे ��न्हें उस कोठरी में ले गए जहाँ उनका बेटा निर्जीव पड़ा था… ठंडा… खामोश… और हमेशा के लिए दूर।
उस पल जैसे समय ठहर गया। एक पिता की नजर अपने बेटे के चेहरे पर टिक गई। वही चेहरा… जिसे उसने कभी अपने हाथों से सहलाया था, जिसे उसने अपने कंधों पर बैठाकर दुनिया दिखाई थी। आँखें नम हो उठीं… दिल भीतर ही भीतर चीख पड़ा… लेकिन होंठ अब भी खामोश थे।
अंग्रेज अफसर ने फिर कहा— “बस मान लो कि ये तुम्हारा बेटा है… इसे सम���मान से अंतिम संस्कार दे दो।” वह चाहते थे कि एक पिता की ममता उसकी मजबूती को तोड़ दे।
लेकिन उस दिन… एक पिता नहीं, एक क्रांतिकारी खड़ा था। उन्होंने अपनी आँखों के आँसू अंदर ही रोक लिए… और पत्थर जैसे स्वर में कहा— “यह मेरा बेटा नहीं है… मैं इसे नहीं पहचानता।”
उस एक वाक्य में एक पिता का पूरा दिल टूट गया… लेकिन देश का सिर ऊँचा हो गया। उन्हें पता था कि अगर आज वह भावनाओं में बह गए, तो उनके साथियों की जान खतरे में पड़ जाएगी और आज़ादी की लड़ाई कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए उन्होंने अपने ही बेटे को दुनिया के सामने “लावारिस” बना दिया।
सोचिए… ��ैसा दिल होगा उस इंसान का? जिसने अपने खून को भी देश के लिए त्याग दिया… जिसने अपने ही जिगर के टुकड़े को पहचानने से इनकार कर दिया… ताकि देश की लड़ाई जिंदा रहे।
8 मई 1915… फांसी का दिन भी आ गया। जब उन्हें फांसी के फंदे की ओर ले जाया जा रहा था, तो उनके चेहरे पर डर नहीं… बल्कि एक अजीब सी शांति थी। जैसे उन्होंने सब कुछ पहले ही त्याग दिया हो।
उन्होंने फंदे को देखा… उसे चूमा… और अंतिम बार कहा— “मैंने अपना सब कुछ भारत माता को दे दिया… अब यह जीवन भी उसी का है।”
और फिर… एक और बलिदान इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। लेकिन समय के साथ हम उस नाम को भूलते चले गए… उस दर्द को भूलते चले गए… उस त्याग को भी, जिसने हमें आज़ादी की सांस दी।
आज सवाल सिर्फ इतना है— जिस बाप ने अपने बेटे के शव को छूने का अधिकार तक छोड़ दिया, ताकि हम आज खुले आसमान में सांस ले सकें… क्या हम उसका नाम भी याद रखते हैं?
अगर यह कहानी पढ़कर आपके दिल में भी हलचल हुई हो… तो इसे यूं ही मत जाने दीजिए। इस महान पिता को एक सलाम जरूर लिखिए, “वंदे मातरम्” जरूर कहिए, और इस कहानी को आगे बढ़ाइए… क्योंकि शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि शब्दों से नहीं, याद रखने से मिलती है।
साभार
23 साल अकेली मां ने इतलौते बेटे को पाला, ReelBaz रईसज़ादा Scorpion से कुचल आज़ाद घूम रहा!
https://t.co/zqBKickNqc
पूरी वीडियो देखें अभिनव पाण्डेय के साथ।
बेटा तू भारत छोड़ कर कहीं और चला जा....
"मुझे एक बजकर 19 मिनट पर पुलिस का कॉल आया। पुलिस ने बताया गया कि मुझे यहां पर एक बाइक मिली है- R-15। बाइक का एक्सीडेंट हुआ है, लड़के की ऑन द स्पॉट मौत हो गई है। मैं दौड़ते-भागते वहां पहुंची। सड़क पर मेरा बच्चा पड़ा था। उसकी हालत बेहद खराब थी। बच्���े की स्पोर्ट्स बाइक के तीन टुकड़े हो गए थे। जैकेट के भी चिथड़े हो रखे थे। मैं 10 मिनट तक चिल्लाती रही। वह���ं एंबुलेंस खड़ी थी, लेकिन बच्चा वहीं रोड पर पड़ा था। मैं 1.30-35 तक पहुंची थी। मुझसे पहले मेरे ऑफिस की लड़की वहां पहुंच चुकी थी। मेरे एक पड़ोसी भी थे। मेरे जाने के 10 मिनट बाद मेरे बच्चे को उठाया। उसे एंबुलेंस में डालकर दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल ले जाया गया। मैं भी पीछे-पीछे पहुंची। हॉस्पिटल में मैं 4 घंटे तक चिल्लाती रही। मैं अपने बच्चे की बॉडी मांग रही थी। मैं अपने बच्चे के लिए लास्ट चांस लेना चाहती थी। मैं अपने खर्चे पर बच्चे को प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाना चाहती थी। लेकिन मेरे लाख कहने पर भी किसी ने मेरे बच्चे को नहीं दिया। बाद में उसे मोर्चरी ले गए। फिर पोस्टमार्टम के बाद मुझे मेरे बच्चे की बॉडी मिली। सिंगल मदर होने के कारण मैंने 23 साल तक बच्चे को अकेले पाला था। मैं हमेशा से चाहती थी वो इस कंट्री में नहीं रहे। मैं यहां के हालात, टॉर्चर देखकर शुरू से उसे कहती थी बेटा कहीं और चले जाना।"
य��� बातें इन्ना माकन ने कही। इन्ना के 23 वर्षीय बेटे साहिल धनेश्रा की बीत��� दिनों दिल्ली में हुए एक हादसे में मौत हो गई। इन्ना ने बताया कि जिस एसयूवी से बेटे की बाइक में टक्कर लगी, उस पर पहले से 13 चालान थे। ये सभी चालान ओवर स्पीड के हैं। उन्होंने यह भी बताया कि आरोपी को अंतरिम जमानत मिल गई है। मैं पुलिस से मिली तो मुझे कहा गया कि हमारी ओर से निष्पक्ष जांच होगी।
हादसे में साहिल की मौत की यह घटना और उसके बाद उनकी मां की चीखें सिस्टम पर बड़ा सवाल कर रही है। आखिर हमारी व्यव��्था कब सुधरेगी। दुर्घटनाओं में हो रही इस तरह की मौते कब थमेगी। कब एक मां को यह नहीं कहना पडे़गा कि बेटा तू भारत छोड़ कर कहीं और चला जा।
Mother Pleads for Justice After Son Killed by Unlicensed Teen Driver
स्थान वाराणसी का कैंट स्टेशन के सामने रोड, समय लगभग 2:30 दोपहर। ग��्ने के जूस का ठेला। एक महिला यात्री ने जूस के ठेले वाले से पूछा, भईया जूस कैसे गिलास है। वह बिना दाम बताए गिलास में जूस उड़ेलने लगा। महिला ने पूछा क्या बीस रुपये ग्लास है, वह सहमति में सिर हिलाया। मगर जब महिला को पैसे देने की बारी आई तो बीस को तीस बताने लगा, सुनने में कन्फ्यूजन की बात कहकर तीस रुपये पर अड़ गया। महिला थोड़ा बहस करके पेमेंट दे भुनभुनाते हुए निकल गई।
अब मेरी बारी आई। मैंने परखने क�� उद्देश्य से पूछा जूस कैसे ग्लास है। वह बोला बीस रुपये ग्लास। मैंने सवाल किया बीस रुपये वह बोला हां बीस रुपये। मैंने फिर से दोहराया बीस रुपये, उसने फिर हां किया।
मगर पैसे देने के वक्त वह तीस रुपये की बात करने लगा। मेरी तगड़ी बहस हो गई क्योंकि बात मात्र दस रुपये की नहीं, यह बाहर से आए यात्रियों को लूटने की होती है। मैं खरी खोटी सुनाने लगा तो वह ऐंठने लगा। चूंकि वहीं मेरा छोटा भाई पत्रकार रहता है, उसके आने के बाद वह माफी पर उतर आया।
दरअसल यही हाल कमोबेश हर रेलवे स्टेशन और बस अड्डे का होता है, जहां वेंडर दुकानदार बाहर से आए यात्रियों को महज इसलिए लूटते हैं क्योंकि वह स्थानीय और नियमित ग्राहक नहीं होते, दूसरा उन्हें बहस करने या शिकायत करने का समय नहीं होता। लिहाजा ऐसे दुकानदारों का लूट तंत्र चलता रहता है।
कभी वाद विवाद हुआ भी तो स्थानीय पुलिस वाले उनसे महीना लेने की वजह से उन्हीं का ही पक्ष लेते हैं।
ऐसे ही बनारस के रोडवेज ब�� स्टेशन पर समोसे की दुकान एक महिला लगाती थी, ठीक चौ��ी से सटे। पंद्रह साल पहले दो समोसे का चालीस रुपये वसूल लेती। ग्राहक पूछे तो रेट पांच रुपये पीस बताती, फिर उसी समोसे पर मामूली छोले चटनी डालकर चालीस रुपये मांगती।
जब ग्राहक पूछे तो कहे समोसे का इतना, बाकी छोले चटनी का। वाद विवाद में पुलिस उसी का पक्ष लें क्योंकि वह चौकी पर पैसे देती ।
ऐसे ही एक बार बीस साल पहले दिल्ली स्टेशन के सामने उतरा तो दुकानदार पराठे का रेट पंद्रह रुपये बताया, मगर खाने ���े बाद जब पैसे देने की बारी आई तो डेढ़ सौ रुपये बोला। पूछने पर जो प्लेट में चुटकी भर छोला, चटनी, दही दिया था सबका रेट अलग अलग बताया। बहस पर वह सब झगड़ने पर उतारू हो गए।
ऐसी जगहों के चौकी प्रभारी अन्य पुलिसवाले बहुते "चादर मोड़" टाइप के होते हैं, "झांम" भर की वसूली के पैसे के लिए उन लुटेरे दुकानदारों का पक्ष लेते हैं, और परेशान यात्रियों की बद्दुआ लेते हैं।
मेरा तो पंद्रह साल पहले एक चौकी इंचार्�� से इसी मामले को लेकर तगड़ी बहस हुई थी। उस वक्त पचास रुपये के लिए पंद्रह सौ की टिकट वाली यात्र�� टालकर ट्रेन छोड़ दी, दो हजार का होटल लिया, सुबह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से मिलकर लिखित शिकायत दी, ताकि उस दुकानदार औऱ पुलिस वाले को पता चले कि यात्रा करने वाले पचास रुपये के लिए पांच हजार का नुकसान कराकर तुम्हारा भी नुकसान कराने की कुव्वत रखते हैं।
बहरहाल यही कहूंगा कि यात्रा के वक्त स्टेशन के आसपास खाने पीने का सामान खरीदने से बचें, वरना स्कैम का शिकार हो सकते हैं। ऐसा कुछ हो तो वरिष्ठ अधिकार���यों को सूचित करें, क्योंकि नीचे वाले अधिकारी मामूली वसूली के चक्कर में अपना "विलेज" उन लुटेरे दुकानदारों के आगे समर्पित कर दिए होते हैं।
कंटेंट:विनय मौर्या
बनारस
झारखंड की बेटी नंदिनी का यह वीडिय��� तेजी से वायरल हो रहा है
◆ उसने भावुक कर देने वाली पंक्तियाँ पढ़ीं: "मैं भारत की हूँ और ये भारत मेरा है, ना सरकार मेरी है और ना रब मेरा है ..."
◆ वीडियो ने लोगों का दिल जीत लिया और सोशल मीडिया पर जमकर शेयर किया जा रहा है
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