अकृत्यं नैव कर्तव्यं प्राणत्यागेऽपि संस्थिते।
न च कृत्यं परित्याज्यं एष धर्म: सनातन:॥
- सुभाषित
( न करने योग्य कार्य को प्राण जाने की परिस्थिति में भी नहीं करना चाहिए और कर्त्तव्य का कभी त्याग नहीं करना चाहिए, यह सनातन धर्म है।)
पीछले सप्ताह गुजरात में व्यस्त प्रवास और कार्यक्रमों के बाद आज लंडन पहुँचे । यहाँ के साधकों के द्वारा स्वागत हुआ ।
आज और कल २०-२१ अगस्त लेस्��र में प्रवचन और २३ अगस्त से कथा प्रेस्टन में प्रारंभ होगी। यहाँ का प्रवास २ सितंबर तक रहेगा।
राम राज बैठे त्रैलोका।
हर्षित भए गए सब सोका॥
बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप बिषमता खोई॥
वरनाश्रम निज निज धरम, निरत वेद-पथ लोक।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं, नहिं भय रोग न सोक॥
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज ��हिं काहुहिं व्यापा॥
सबु नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं।
पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥
रामभगति रत नर अरु नारी।
सकल परम गति के अधिकारी॥
- श्रीमद् रामचरितमा��स