व्यवस्था की खामियों को ठीक करने के बजाय, उन पर सवाल उठाने वाली आवाज़ों को ही सील करने का प्रयास हो रहा है।
क्या व्यवस्था सुधारने के बजाय सवाल पूछने वालों के livelihood पर प्रहार करना ही नया समाधान है?
व्यवस्था की खामियाँ सील नहीं हो रहीं, आवाज़ें सील हो रही हैं।
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