भामाशाह, चारण जैसा, चारण केशव, डोडिया भीमसिंह, राणा पुंजा, हकीम खाँ सूरी, शालिवाहन तँवर, भवानीसिंह तँवर, प्रतापसिंह त��वर, झाला मान देलवाड़ा, कल्याण पड़ीहार और कोशीथल महारानी जैसे अद्वितीय योद्धाओ ने राणा प्रताप के नेतृत्व में शौर्य की एक अमर गाथा लिखी���
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हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप को बंदी बनाने या मारने, मेवाड़ पर पूर्ण अधिकार करने में अकबर पूरी तरह विफल रहा था जो उनके हल्दीघाटी युद्ध में हार को दर्शाता है।
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मुगल सैनिक बदायूँनी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जून की भीषण गर्मी में मुगल सेना पहाड़ों में घिरकर भूखी-प्यासी मर रही थी और महाराणा प्रताप के भील तीरंदाजों के रात्रि-आक्रमणों के भय से सो नहीं पाती थी।
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लोहासिंह एवं भादराजून अभिलेख (१५७६-१५७७ ई.) के अनुसार युद्ध के अगले महीनों, वर्षों के भीतर महाराणा प्रताप द्वारा आसपास के गांवों में ताम्रपत्र और भूमि सुधार संबंधी प्रशासनिक आदेश जारी किए,जो उनके हल्दीघाटी विजय को दर्शाता है।
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सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. चंद्रशेखर शर्मा द्वारा बलीचा का ताम्रपत्र के गहन शोध के अनुसार, हल्दीघाटी युद्ध के ठीक बाद महाराणा प्रताप ने विजय के उपलक्ष्य में युद्ध क्षेत्र के बगल में स्थित 'बलीचा' गाँव के किसानों व नागरिकों को भूमि अनुदान जारी किए थे।
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रणछोड़ भट्ट प्रणीत 'अमरकाव्यम्' महाकाव्य में उल्लेख है कि रणभूमि में आए मुगल सेनापति मानसिंह का युद्ध में महाराणा प्रताप ने अभिमान पूरी तरह चूर्ण कर दिया और अपनी अलौकिक वीरता का विस्तार किया।
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वि.सं. 1708 / 13 मई 1652 ई. को उदयपुर के जगदीश मंदिर में जगन्नाथ राय प्रशस्ति राजकीय श���लालेख घोषणा करता है कि महाबली महाराणा प्रताप ने अकबर की विशाल और आधुनिक हथियारों वाली सेना के अहंकार को हल्दीघाटी में चकनाचूर कर दिया।
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वर्तमान शोध दर्शाते हैं कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल एक सैन्य टकराव नहीं था, बल्कि यह एक सुनियोजित सामरिक युद्ध नीति (Strategic Warfare) का हिस्सा था, जिसमें महाराणा प्रताप एक स्पष्ट विजेता के रूप में उभरे।
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डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा कहते हैं कि हल्दीघाटी युद्ध का मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा लिखा विवरण एकपक्षीय व पक्षपातपूर्ण होने के बावजूद, उनके कथनों का तटस्थ विश्लेषण किया जाए, तो यह सिद्ध होता है कि युद्ध के बाद मुगल सेना की बहुत बुरी दुर्दशा हुई।
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हल्दीघाटी युद्ध के दो दिन बाद 21 जून को मुगल सेना गोगुन्दा पहुँची, तब उनको भय बना रहा कहीं राणा उन पर अचानक टूट न पड़ें। इसी डर के कारण उन्होंने पूरे गोगुन्दा गाँव के चारों तरफ अत्यंत गहरी खाई खुदवाई, ऊँची दीवारें बनवाईं जिन्हें घोड़े भी न लांघ सकें,
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मुगल सेनापति राजा मानसिंह को गोगुन्दा में चार महीने बीत गए, परन्तु महाराणा प्रताप की युद्ध नीति के सामने वह असमर्थ रहा। मुगलों की विफलता से क्रोधित होकर अकबर ने उसे औ�� आसफ खान को तुरंत वापस लौट आने का शाही फरमान भेजा।
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कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि 18 जून 1576 ई. सन् का हल्दीघाटी युद्ध का दिन आर्य कुल की वीरता का एक परम प्रसिद्ध दिवस है। जितने समय तक संसार में मनुष्य वीरता और महानता की पूजा करेंगे, और जब तक इस जगत में राजपूत जाति का अस्तित्व रहेगा,
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कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि 18 जून 1576 के दिन पुण्य भूमि हल्दीघाटी व समस्त संकीर्ण गिरिमार्ग मेवाड़ के स्वाभिमानी पुत्रों के पवित्र शोणित (रक्त) से पूरी तरह भीग गये। हल्दीघाटी का महान युद्ध संपूर्ण राजस्थान का 'थर्मापल्ली' था।"
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महाराणा प्रताप की युद्ध नीति 'गुरिल्ला युद्ध' (छापामार युद्ध) थी। मैदान से रणनीतिक रूप से पीछे हटना युद्ध कला का हिस्सा था, न कि कायरता या पराजय। इसके बाद अकबर स्वयं तीन बार विशाल सेना लेकर मेवाड़ आया,लेकिन महाराणा को झुका नहीं सका।
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महाकवि रणछोड़ भट्ट राजसमंद झील के तट पर उत्कीर्ण राजप्रशस्ति महाकाव्यम् संसार का सबसे बड़ा शिलालेखीय इतिहास है। इसमें उल्लेख है कि हल्दीघाटी के दर्रे में राजपूतों के भयंकर प्रहार के कारण मुगल सेना के पैर उखड़ गए और वे पीछे हटने पर विवश हुए।
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महाराणा प्रताप के युद्ध से विदा होने के समय भी शाही सेना की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह पीछा करने का भी साहस कर सके। उनके मन में महाराणा प्रताप का ऐसा आतंक व्याप्त था कि वे स्वप्न देखते थे कि राणा अरावली के पहाड़ों के पीछे छिपकर उन्हें मार डालने की घात लगाए बैठा
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इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा की कृति 'उदयपुर राज्य का इतिहास' के साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात सामरिक और रणनीतिक स्थिति पर प्रताप का नियंत्रण था और मुगल सेना संकट व भय की स्थिति में थी।
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ऐतिहासिक ख्यातों व सन्दर्भों के अनुसार हल्दीघाटी युद्ध के बाद एक वर्ष तक महाराणा प्रताप ने युद्ध क्षेत्र के आस-पास के गाँवों की भूमियों के पट्टे ताम्रपत्र जारी किये। इन पर 'एकलिंगनाथ के दीवान' ��हाराणा प्रताप के प्राधिकृत हस्ताक्षर अंकित थे।
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अकबर के प्रधान वजीर अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा कि युद्ध के बाद मुख्य सेनापति राजा मानसिंह और आसफ खान दिल्ली दरबार पहुंचे, तो सम्राट अकबर अत्यंत क्रोधित था। अकबर ने उनकी 'डेवढ़ी बंद' करी, उनके दरबार में आने पर प्रतिबंध लगाया।