महाभारत चक्रव्यूह...
विश्व का सबसे बड़ा युद्ध था महाभारत का कुरुक्षेत्र युद्ध। इतिहास में इतना भयंकर युद्ध केवल एक बार ही घटित हुआ था। ��नुमान है कि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में परमाणू हथियारों का उपयॊग भी किया गया था। ‘चक्र’ यानी ‘पहिया’ और ‘व्यूह’ यानी ‘गठन’। पहिए के जैसे घूमता हुआ व्यूह है चक्रव्यूह। कुरुक्षेत्र युद्ध का सबसे खतरनाK रण तंत्र था चक्रव्यूह। यधपि आज का आधुनिक जगत भी चक्रव्यूह जैसे रण तंत्र से अनभिज्ञ हैं। चक्रव्यू या पद्मव्यूह को बेधना असंभव था। द्वापरयुग में केवल सात लोग ही इसे बेधना जानते थे। भगवा��� कृष्ण के अलावा अर्जुन, भीष्म, द्रॊणाचार्य, कर्ण, अश्वत्थाम और प्रद्युम्न ही व्यूह को बेध सकते थे जानते हैं। अभिमन्यु केवल चक्रव्यूह के अंदर प्रवेश करना जानता था।
चक्रव्यूह में कुल सात परत होती थी। सबसे अंदरूनी परत में सबसे शौर्यवान सैनिक तैनात होते थे। यह परत इस प्रकार बनाये जाते थे कि बाहरी परत के सैनिकों से अंदर क�� परत के सैनिक शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा बलशाली होते थे। सबसे बाहरी परत में पैदल सैन्य के सैनिक तैनात हुआ करते थे। अंदरूनी परत में अस्र शत्र से सुसज्जित हाथियों की सेना हुआ करती थी। चक्रव्यूह की रचना एक भूल भुलैय्या के जैसे हॊती थी जिसमें एक बार शत्रू फंस गया तो घन चक्कर बनकर रह जाता था।
क्रव्यूह में हर परत की सेना घड़ी के कांटे के जैसे ही हर पल घूमता रहता था। इससे व्यूह के अंदर प्रवेश करने वाला व्यक्ति अंदर ही खॊ जाता और बाहर जाने का रास्ता भूल जाता था। माहाभारत में व्यूह की रचना गुरु द्रॊणाचार्य ही करते थे। चक्रव्यूह को युग का सबसे सर्वेष्ठ सैन्य दलदल माना जाता था। इस व्यूह का गठन युधिष्टिर को बंधी बनाने के लिए ही किया गया था। माना जाता है कि 48*128 किलॊमीटर के क्षेत्र फल में कुरुक्षेत्र नामक जगह पर युद्ध हुआ था जिसमें भाग लेने वाले सैनिकों की संख्या 1.8 मिलियन था!
चक्रव्यूह को घुमता हुआ मौत का पहिया भी कहा जाता था। क्यों कि एक बार जो इस व्यूक के अंदर गया वह कभी बाहर नहीं �� सकता था। यह पृथ्वी की ही तरह अपने अकस में घूमता था साथ ही साथ हर परत भी परिक्रमा करती हुई घूमती थी। इसी कारण से बाहर जाने का द्वार हर वक्त अलग दिशा में बदल जाता था जो शत्रु को भ्रमित करता था। अध्भुत और अकल्पनीय युद्ध तंत्र था चक्रव्यूह। आज का आधुनिक जगत भी इतने उलझे हुए और असामान्य रण तंत्र को युद्ध में नहीं अपना सकता है। ज़रा सॊचिये कि सहस्र सहस्र वर्ष पूर्व चक्रव्यूह जैसे घातक युद्ध तकनीक क��� अपनाने वाले कितने बुद्धिवान रहें होंगे।
चक्रव्यूह ठीक उस आंधी की तरह था जो अपने मार्ग में आनेवाले हरस चीच को तिनके की तरह उड़ाकर नष्ट कर देता था। इस व्यूह को बेधने की जानकारी केवल सात लोगों के ही पास थी। अभिमन्यू व्यूह के भीतर प्रवेश करना जानता था लेकिन बाहर निकलना नहीं जानता था। इसी कारण वश कौरवों ने छल से अभिमन्यू की हत्या कर दी थी। माना जाता है कि चक्रव्यूह का गठन शत्रु सैन्य को मनोवैज्ञानिक और मानसिक रूप से इतना जर्जर बनाता था कि एक ही पल में हज़ारों शत्रु सैनिक प्राण त्याग देते थे। कृष्ण, अर्जुन, भीष्म, द्रॊणाचार्य, कर्ण, अश्वत्थाम और प्रद्युम्न के अलावा चक्रव्यूह ��े बाहर निकलने की रणनीति किसी के भी पास नहीं थी।
अपको जानकर आश्चर्य होगा कि संगीत या शंख के नाद के अनुसार ही चक्रव्यूह के सैनिक अपने स्थिती को बदल सकते थे। कॊई भी सेनापती या सैनिक अपनी मन मर्ज़ी से अपनी स्थिती को बदल नहीं सकता था। अद्भूत अकल्पनीय। सदियों पूर्व ही इतने वैज्ञानिक रीति से अनुशासित रण नीती का गठन करना सामान्य विषय नहीं है। माहाभारत के युद्ध में कुल तीन बार चक्रव्यूह का गठन किया था, जिनमें से एक में अभिमन्यू की म्रु त्यू हुई थी। केवल अर्जुन ने कृष्ण की कृपा से चक्रव्यूह को बेध कर जयद्रत का व ध किया था। हमें गर्व होना चाहिए कि हम उस देश के वासी है जिस देश में सदियों पूर्व के विज्ञान और तकनीक का अद्भुत निदर्शन देखने को मिलता है। निस्संदेह चक्रव्यूह न भूतो न भविष्यती युद्ध तकनीक था। न भूत काल में किसी ने देखा और ना भविष्य में कॊई इसे देख पायेगा।
मध्य प्रदेश के 1 स्थान और ��र्नाटक के शिवमंदिर में आज भी चक्रव्यूह बना हुआ है...🚩✨💖
मिलिए रिया डाबी से
पिता - आईईएस
बहन- आईएएस
श्रेणी - आरक्षित
स्कोर- 83.67
परिणाम- योग्य
जनरल कट ऑफ 92.51 रहा था
उससे बेहतर स्कोर करने वाले हजारों सामान्य वर्ग को रिजेक्ट कर दिया गया क्योंकि जाहिर तौर पर उनके पूर्वजों ने 2000 साल पहले किसी को पानी पीने की अनुमति नहीं दी थी।
Note:- आरक्षण इनको अभी भी जरूरत है क्या मगर अब इनके बच्चे भी आरक्षण लेंगे और 90 से 99% वालो की ऐसी तैसी कर के 70% लाकर नौकरी प्राप्त करेंगे ।
फिर बोलेंगे हमने मेहनत की थी 😢
देशभक्ति सीखनी है तो #क्षत्रियो से सीखो
अपनी सैकड़ो रियासते त्याग कर भी
आज तिरंगे_झंडे तो दिल से सलाम करते है।।
देश क�� लिए सर्वाधिक प्राण न्योछावर करने वाली कोम "राजपुत" (क्षत्रिय) दोनों वर्ल्ड वार में 40000 से ज्यादा #राजपूत बलिदान हुए ....।।
उस दौर में अगर हुकुम सा न होते
हम आज उर्दू में लिख रहे होते।
उनके साथ ��नके घोड़े और हाथी अपनी मिट्टी अपने धर्म के कितने अटूट थे!
गुलामी हिंद की बादशाहत ठुकराने वाले हर जाति धर्म को मिटने से बचाने वाले,
उनकी जन्म जयंती पर सादर नमन।
#Maharanapratap
#हिंदुआ_सूरज_महाराणा_प्रताप
#Rajput
" Samrat vikramaditya pramar "
जिस #सम्राट के नाम पर भारत का कैलंडर पंचांग बना था।
जिस सम्राट के बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ,जिसने #अखंड भारत (आजका नेपाल, बांग्लादेश, भारत,पाकिस्तान,अफगानिस्तान, तिब्बत और यूरोप तक) जितने बड़े भूभाग पर छत्री राज किया हो।
यह है अपना #राजपूताना ,
नाज़ इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी ,
तीर , कटारो पे
यह #प्रताप का वतन पहला है आजादी के नारों से
कूद पड़ी यहाँ हजारों पद्मिनियाँ अंगारों पे
बोल रही है कण-कण से क़ुरबानी राजस्थान की
इस मिट्टी से तिलक करो मिट्टी है बलिदान की।।
#राजपूत समाज के भी कुछ लोग आर्थिक तौर से कमजोर हैं !!
ना जॉब है,
ना दुकान है,
ना ज्यादा जमीन है,
उन्हें भी सरकारी मदद की आवश्यकता होती है।
तो फिर नौकरी,
शिक्षा व कानून में जाति के नाम पर भेदभाव क्यों?
#JusticeForEWS
#Pakistani_Rajput
" Rana Hameer Singh sodha "
पाकिस्तान से #हिंदुओ पर अत्याचार की खबरें आती रहती हैं, लेकिन ये #राजपूत परिवार जिनका डंका पाकिस्तान में बरसों से बजता आ रहा है।
पाकिस्तान के #अमरकोट में सोढ़ा राजपूत 800 सालों से राज करते आ रहे हैं।
जिसकी शान राणा हमी सिंह है।।
जो गेंद को सिर्फ मारे नही फाड़ दे वो #राजपूत
जो अंतिम ओवर में मैच पलट दे वो #राजपूत
जो 6 गेंदों पर 36 के बदले 37 रन मार दे वो #राजपूत
और ज��� पर्पल कैप होल्डर को पेल दे वो #राजपूत
जडेजा का जन्म 6 दिसंबर 1988 को सौराष्ट्र में हुआ था....
आज भले ही रवींद्र जडेजा एक आलीशान जिंदगी जी रहे हों पर एक समय ऐसा था जब उनका परिवार बहुत गरीब था।
जडेजा के पिता अनिरूद्ध सिहं एक सिक्योरिटी गॉर्ड थे और उनकी मां लता नर्स का काम करती थीं। जडेजा की दो बहने हैं नैना और पद्मिनी जडेजा। ऐसे में आखिर कैसे जडेजा ने इंटरनेशल स्टार बनने तक का सफर तय किया।
जडेजा ��ि पिता चाहते थे कि वह आर्मी स्कूल में पढ़ें और बड़े होकर एक आर्मी ऑफिसर बनें लेकिन जडेजा को क्रिकेट से दूर रख पाना काफी मुश्किल था।
पिता से डरने वाले जडेजा ने अपनी मां से इस बारें में बात की और उन्होंने जडेजा क्रिकेट खेलने की इजाजत दे दी।
जडेजा की मां का सपना था कि वह अपने बेटे क�� क्रिकेट खेलते देखें लेकिन उससे पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया।
साल 2005 में जब जडेजा की मां का देहांत हुआ तो 17 साल के जडेजा के लिए यह सदमा बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था।
जडेजा इतने ज्यादा आहत थे कि उन्होंने क्रिकेट को हमेशा के लिए अलविदा कहने का मन बना लिया था। लेकिन उस दौरान उनकी बहनों ने उनकों संभाला और जडेजा ने मां के सपनो को पूरा किया।
कैसे मिली जडेजा को ‘सर’ की उपाधी
सर की उपाधी जडेजा को बेहद खास वजह से दी गई थी, सभी जानते हैं कि जडेजा न केवल एक शानदार गेंदबाज हैं बल्कि एक गजब के फिल्डर भी हैं।
सर की उपाधी जडेजा को भारतीय टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने दी थी, इसकी वजह है उनकी कमाल की गेंदबाजी,बल्लेबाजी और फील्डिंग जिसका कायल हर कोई है। हालांकि यह उपाधि उन्हें मजाक में दी गई।
जहां कई भारतीय क्रिकेटर्स ने लव मैरिज की है वहीं जडेजा ने अपने परिवार की पसंद की लड़की से शादी क���। 17 अप्रैल 2016 में जडेजा ने रीवाबा सोलंकी के साथ शादी की थी। जडेजा की शादी पूरे राजपूत रीति रिवाज से हुई थी, जडेजा एक बेटी के पिता भी हैं।
@rajput_of_india 🏹
एक समाज के सभी ठेकेदार आज पहलवानों के साथ हैं, राजपूत समाज के लोग धर्म रक्षा हेतु संयम बरत रहे। हिन्दू धर्म की रक्षा सिर्फ राजपूतों का ठेका है क्या ? बाहर निकलो मकानों से, जंग लड़ो धर्म द्रोहियों से...
#BrijBhushanSharanSingh#IStandWithBrijBhushanSingh
#BrijBhushan जी के हटने से होने वाले #जाट_gang को फायदे कुछ निम्नलिखत है।
1. बिना Test के यह लोग Direct इंटरनेशनल खेल सकते है।
2. अध्यक्ष इनकी जाति का हो तो वर्चव भी जाटो का होगा।
3. सिर्फ और सिर्फ हरियाणा के पहलवानों को अवसर दिया जाएगा आगे जाने का बाकी प्रदेशों के साथ भेदभाव होगा जो हुड्डा सरकार में होता था।
4. खेल में भी इनका जातिवाद चलेगा , जीजा साली फूफा का मामा का सिर्फ और सिर्फ #जाट खिलाड़ी दिखेंगे.
Note:- भारत के सभी खिलाड़ियों से बोलना चाहूंगा अगर #जाट अध्यक्ष बन जाता है आप लोग कभी भविष्य में कुछ नही कर पाओगे क्योंकि यह लोग #जातिवाद और #क्षेत्रवाद करते है सिर्फ।
राजनीति में उभरने वाले एवं व्यापक प्रभाव रखने वाले क्षत्रियों के राजनीतिक उत्पीड़न का अंत नहीं होने वाला है ।यह उत्पीड़न तब तक चलता रहेगा। जब तक क्षत्रिय समाज इस राजनीतिक उत्पीड़न का प्रतिकार करने के लिए खड़ा नहीं होगा। आखिर बिना साक्ष्यों के केवल क्षत्रिय राजनेता ही दंडित क्यों होंगे?
▶️आनंद मोहन,राजा भैया,कुलदीप सेंगर ,ब्रृज भूषण शरण सिंह:- यह चारों ही क्षत्रिय राजनेता, राजनीति के शिकार इसलिए बनाए गए ।क्योंकि इनमें स्वतंत्र राजनीति की संभावनाएं नजर आने लगीं। आनंद मोहन ,राजा भैया और कुलदीप सेंगर तीनों को ही परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के बिना ही जेल जाना पड़ा था। भले ही इन चारों के खिलाफ कोई भी परिस्थिति जन्य साक्ष्य नहीं था ।फिर भी पर्दे के पीछे से राजनीतिक खेल खेला गया। जिस कूटनीतिक एवं राजनीतिक खेल को समझने में क्षत्रिय समाज अभी भी अक्षम है।
▶️केवल राजा भैया इस राजनीतिक षड्यंत्र से बाहर निकल पाए। अन्यथा राजा भैया को भी पूरी तरह राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार बनाया गया था और उसमें पर्दे के पीछे से राजा भैया पर कार्रवाई कराने में उस समय भाजपा का पर्दे के पीछे से पूरा समर्थन था।
▶️आनंद मोहन और कुलदीप सेंगर को दोषी ठहराया जाने पर न्यायालय में कोई भी पुख्ता सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया। फिर भी उन्हें कठोर सजा से दंडित किया गया ।
▶️यह कोई साधारण खेल नहीं था ।इसके पीछे पूरी तरह राजनीति खेल था
���️आनंद मोहन को दंडित कराने में उस समय राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और भाजपा तीनों का ही रोल था। क्योंकि तीनों ही नहीं चाहते थे कि बिहार में स्वतंत्र राजनीति का कोई चतुर्थ एंगल अपना प्रभाव जमाए
▶️डीएम हत्याकांड में आनंद मोहन उस घटनास्थल से काफी दूर थे और उन्हें इस घटना की जानकारी भी नहीं थी। लेकिन सत्ता की ताकत ने और पर्दे के पीछे के राजनीतिक खेल ने आनंद मोहन को जबरदस्ती दंडित कराया।
��️राजनीति में सभी राजनीतिक दल पर्दे के पीछे से मित्र होते हैं ।जैसा कि बिहार में प्रदर्शित भी हुआ था। और अपने राजनीतिक विरोधियों को हटाने के लिए कभी कभी परदे के पीछे एकजुट हो जाते हैं।
▶️कुलदीप सेंगर के मामले में भी कुलदीप सेंगर को इसलिए दंडित होना पड़ा। क्योंकि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को बदनाम करना था और दबाव में लेना था। कुलदीप सेंगर को जबरदस्ती दंडित कराने में भाजपा के कुछ केंद्रीय नेताओं का भी हाथ था। न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय में कुलदीप सेंगर के खिलाफ भी कोई परिस्थितिजन्य साक्ष्य नहीं था। लेकिन फिर भी कुलदीप सेंगर को कठोर दंड से दंडित हो���ा पड़ा
▶️इस लोकतांत्रिक देश भारत में केवल क्षत्रियों को मीडिया ट्रायल के द्वारा दंडित होना पड़ता है ।भले ही दंडित होने के लिए कोई भी साक्ष्य मौजूद ना हो।
क्षत्रियों को दंडित कराने के लिए संविधान को भी ताक पर रख दिया जाता है
▶️संविधान का स्पष्ट उद्देश्य था कि साक्ष्यों के अभाव में भले ही 100 अपराधी छूट जाएं। लेकिन किसी एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए।
▶️लेकिन क्षत्रियों के मामले में संव��धान के उद्देश्य को पलट दिया जाता है और यहां साक्ष्यों के अभाव में भी केवल निर्दोष क्षत्रियों को भी दंडित कर दिया जाता है। निर्दोष क्षत्रियों को दंडित कराने में राजनीतिक दलों का विशेष योगदान रहता है। जो क्षत्रियों का सहयोग लेने के बाद भी उनकी पीठ में छुरा भोकते रहते हैं
▶️मैं बहुत स्पष्ट कहना चाह���ा हूं कि बृजभूषण शरण सिंह के राजनीतिक एवं आर्थिक उभार एवं स्वतंत्र व्यक्तित्व को देखते हुए ही उन्हें राजनीतिक शिकार बनाया जा रहा है।इस देश में क्षत्रियों को संवैधानिक व्यवस्था के लाभ से निरंतर वंचित करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। और निर्दोष होने के बाद भी दंडित होने का दंश झेलना पड़ रहा है।
▶️निर्दोष क्षत्रियों को दंडित होने के उदाहरणों से ऐसा प्रतीत होता है कि वह भारतीय राजनीतिक दल, न्यायपालिका और मीडिया क्षत्रियों को निर्दोष होते हुए भी दंडित देखने में आनंद का अनुभव करते हैं
▶️क्षत्रियों पर इस राजनीतिक एवं संवैधानिक अन्याय का एक विशेष कारण है कि भारत की सबसे बड़ी आबादी होने के बाद भी क्षत्रियों ने स्वतंत्र राजनीति पर कभी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया
नोट:अगर क्षत्रियों ने विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह ही स्वतंत्र राजनीति पर ध्यान दिया होता ।तो क्षत्रिय समाज देश में और क�� राज्य में एक बड़ी राजनीतिक ताकत होता और फिर क्षत्रियों को कोई भी राजनीतिक एवं संवैधानिक रूप से निर्दोष होने पर दंडित नहीं कर पाता
विशेष:अगर इस राजनीतिक षड्यंत्र को नेस्तनाबूद करना है। तो पूरे देश के क्षत्रियों को एकजुट होकर, क्षत्रियों के प्रति हो रहे इस असंवैधानिक एवं राजनीतिक अन्याय का प्रतिकार करना होगा आ��िर कब तक क्षत्रियों को निर्दोष होते हुए भी दंडित होना पड़ेगा।
बिना सबूतों और जाँच के बृजभूषण शरण सिंह को दोषी मान लिया जाए ऐसी ही मांग लेकर धरने पर बैठे कुश्ती के कुछ खि��ाड़ी दरअसल कुश्ती की मैट की बजाय राजनीति के अखाड़े में दांव लगा रहे हैं जिन्हें मोहरा बनाकर पुड़ा कंट्रोल दीपेंद्र हुड्डा द्वारा किया जा रहा है ।
#मै_बृजभूषण_सिंह_के_साथ_हूँ
@b_bhushansharan
थोड़ा और जोर लगा मुन्ना 😂
आनंद मोहन सिंह बाहर आ चुका है
कल को रोना शुरू मत कर दियो
की मैंने कुछ नहीं बोला ठाकुर साहब को
जितना झेल सके उतना ही चिल्लाइयो
@saurabhtop@TheLallantop
हरियाणा के कुश्ती खिलाडियों ने दिल्ली के जंतर मंतर पर कुश्ती संघ के अध्यक्ष के विरुद्ध फिर से धरना प्रदर्शन शुरू किया है , इसमें राजनिति समझिए -
बृजभूषण सिंह जिन्होंने दीपेंद्र हुड्डा (कांग्रेसी हरियाणा का नेता) को हरा भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष का चुनाव जीता था।
ये बॉडी खेल मंत्रालय के अधीन नही आती बल्कि ओलंपिक कुश्ती ��ंघ की स्वायत्त संस्था है जिसमें केंद्र दखल नही दे सकता। इसे भी आप इस तरह समझिए कि जब पि��ले साल इसी तरह की फीफा की भारतीय बॉडी में राजनीति हुई थी तो भारत जो अंडर 17 महिला फीफा वर्ल्ड कप होस्ट कर रहा था, ऐन मौके पर उसको फीफा ने भंग कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी था तो आनन फानन में इसे ठीक किया गया और भारत मे फीफा वर्ल्ड कप हुआ। बृजभूषण सिंह भी इसी तरह 2011 में अध्यक्ष का चुनाव जीते
थे जिसका कार्यकाल 12 साल का होता है और इस साल उनका कार्यकाल पूरा होगा और फिर चुनाव होगा। इसी की वजह से ये ���ारा यौन शोषण का ड्रामा शुरू हुआ। बृजभूषण कहते रहे कि सबूत दिखा दो मैं फांसी लगा दूंगा लेकिन किसी ने सबूत छोड़िये एक FIR तक नही की। उल्टा जन्तर मंतर में जाकर राजनीति शुरू हो गयी। इसके बाद जब ये राजनीति कांग्रेस ने ज्यादा शुरू कर खाप पंचायत तक को मैदान में उतारने की कोशिश की तो यही खिलाड़ी बैकफुट पर जाने शुरू हो गए। ये बार बार कहने लगे कि इसपर कांग्रेस राजनीति न करे। वामपन्थी तो वहां मंच तक इनके पास पहुंच गए तो उन्हें मंच से ही
खिलाड़ियों ने भगा दिया।
खिलाड़ियों का भी ये है कि हरियाणा के पहलवान कुश्ती को अपनी बपौती समझते हैं। उन्हें नही पसंद कि यूपी से कोई कुश्ती का अध्यक्ष हो जो निर्णय ले। बृजभूषण ने भी साफ कहा कि ये लोग इस घमण्ड में रहते हैं कि ये नेशनल नही खेलते सीधा इंटरनेशनल खेलने को कहते हैं। जब बृजभूषण ने ये नियम बनाया कि खिलाड़ी नेशनल प्लेयर से खेलेगा और जो जीतेगा उसे ही अंतर्रा��्ट्रीय खेलों में भेजा जाएगा तो ये इनके घमण्ड को पसन्द नही आया। इन खिलाड़ियों को भी पता है कि इनकी उम्र अब इनकी फिटनेस का साथ नही दे रही और नया यंग खिलाड़ी इन्हें हरा देगा और वो अंतराष्ट्रीय टूर्नामेंट के लिए सलेक्ट हो जाएगा। इसलिए भी ये ड्रामा किया जा रहा था।
इसके अलावा एक एंगल इसमें स्पांसरों का भी है जिसमें भी एक हरियाणा का व्यापारी जो स्वदेशी के दम पर बड़ा बना है, वो पीछे है। खिलाड़ी और वो चाहता है कि दोनों का डायरेक्ट एक दूसरे से सम्पर्क हो लेकिन बृजभूषण का कहना था कि ज��� भी स्पॉन्सरशिप होगी वो कुश्ती संघ से होगी और वो निर्णय लेगा कि किस खिलाड़ी को कौन स्पॉन्सर करेगा। यह भी इस ड्रामे का एक एंगल है।
अब जब ये खिलाड़ी बैकफुट पर आने शुरू हुए क्योंकि न कोई FIR थी, न सबूत दिखा सके, खाप की धमकी दी तो खाप तो यूपी में भी है और बृजभूषण कोई नौसिखिया तो है नही तो इन्हें लगा कि लेने के देने पड़ जायेंगें। इसलिए इन्होंने एक जांच कमेटी के नाम पर अपना धरना वापिस ले लिया। अब जो भी जांच होगी और जो भी नतीजा बाहर आएगा उसके बाद भी इसका अंतिम निर्णय ओलंपिक संघ को ही करना होगा।
बाकी विपक्ष तो अपनी आदतानुसार अपने घर मे हुए बच्चे का जिम्मेदार भी मोदी को बता देता है और लिंगानुपात पर मोदी के नारे व प्रयास "बेटी बचाओ" पर भौंकने लग जाता है तो उनका कोई इलाज भी नही है।
आगे देखते हैं कि फैक्ट फाइंडिंग कमेटी में कौन सच्चा और कौन झूठा सामने आके निकलता है।
वैसे भी आजकल ट्रेंड बन चुका है कि आप कोई सही बात ��ी करें और सामने महिला हो तो आप ही गलत ठहरा महिला विरोधी, मिसोजिनिस्ट और न जाने क्या क्या बना दिये जाते हैं। हालांकि ये सब करकर नुकसान महिलाओं का ही है क्योंकि ऐसी हरकत फिर विश्वास खोने का काम ही कर रही है
@b_bhushansharan
पचपदरा में महंगाई राहत कैंप में पहुंचे बुजुर्ग पारसमल की मौत सरकार के माथे पर कलंक है। मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये प��र्व में ही कहा था कि भीषण गर्मी में कैम्प में आने से बुजुर्गों को परेशानी होगी लेकिन राजनीतिक हित साधने के लिए सरकार उनकी जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रही है।(1/2)