अव्ययवतोऽपि धनिनः
स्वजनसहस्रं भवेत् पदस्थस्य।
भ्रष्टधनस्य हि सततं
बन्धुरपि मुखं न दर्शयति॥
धनी व्यक्ति भले ही उदार न हो पर जब तक उसके पास पद व संपत्ति होती है, तब तक उसके हजारों अनुयायी होते हैं; पर जैसे ही उसका धन चला जाता है, तब कोई सगा-संबंधी भी उसका मुंह तक देखने नहीं आता।
अशेषलङ्काप��िसैन्यहन्ता
श्रीरामसेवाचरणैककर्ता।
अनेकदुःखाहतलोकगोप्ता
त्वसौ हनूमांस्तव सौख्यकर्ता॥
जो लंकेश रावण की समस्त सेना का संहार करते हैं, जो श्रीराम की चरणसेवा में ही एकनिष्ठ हैं और जो अनेक दुःखों से पीड़ित सांसारिक लोगों के रक्षक हैं, ऐसे श्रीहनुमान् आपको सुख प्रदान करें।
कार्य में निरन्तर लगे रहने से व्यक्ति को अन्तत: सफलता मिलती ही है। #राजतरंगिणी (8.2551) में #कल्हण लिखते हैं -
अविश्रान्तो वातो दहन इव सोऽयं जनयति
प्रसक्तं सातत्याद्दलयति कुलाद्रीनपि जलम्।
प्रसूते कृत्येषु व्यवसितिरनिर्व्यूढसुदृढा
फलावाप्तिं लोके प्रतिकलमसंभाव्यविभवाम्॥
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दिनांक: 19 मार्च 2026 चैत्र नवरात्रि के पावन प्रथम दिवस, विक्रम संवत 2083 के शुभ अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा संचालित गंगा आरती का भव्य शुभारंभ आज संपन्न हुआ। इस दिव्य क्षण की प्रतीक्षा सम्पूर्ण विश्वेश्वर भक्तों को लंबे समय से थी। गंगा आरती में श्री रविंद्र जायसवाल, श्री नीलकंठ तिवारी, श्री धर्मेंद्र सिंह, श्री अवधेश सिंह, मंडलायुक्त महोदय श्री एस राज लिंगम, जिलाधिकारी महोदय श्री सत्येंद्र कुमार वह अन्य विशिष्ट गणमान्य जनों की उपस्थिति रही I आरती के दौरान श्रद्धालुओं ने करत��ल ध्वनि तथा “जय माँ गंगा” के जयघोष से सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया। गंगा तट पर उपस्थित जनसमूह ने अत्यंत श्रद्धा एवं आस्था के साथ आरती में सहभागिता कर आध्यात्मिक आनंद का अनुभव किया। प्रथम दिवस पर ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे तथा माँ गंगा की आरती में अपना विशेष योगदान प्रदान किया। इस आयोजन ने भक्ति, श्रद्धा और सांस्कृतिक परंपरा का अनुपम संगम प्रस्तुत किया। श्री का���ी विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा यह आयोजन जनमानस की आस्था को सुदृढ़ करने तथा सनातन परंपराओं के संरक्षण एवं नवीन पुनीत कार्यों के नवाचार की दिशा में एक और महत्वपूर्ण प्रयास है।
#banaras #kashivishwanath #GangaGhat
नमस्तस्यै सरस्वत्यै यस्याः कारुण्यवीक्षणात्।
शुकोऽपि स्कन्धमाश्रित्य ब्रूते नैःश्रेयसीं गिर��्॥
उन देवी सरस्वती को नमन है, जिनकी करुणामयी दृष्टि से कोई शुक (तोता अथवा शुकदेव) भी स्कन्ध (वृक्ष का तना अथवा भागवत-पुराण के स्कन्ध) का आश्रय लेकर परम-कल्याणमयी वाणी बोलता है।
अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः।
प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम्॥
संसार में स्त्रियाँ ��ूर्ख पुरुष को ही नहीं, बल्कि काम और क्रोध के वशीभूत विद्वान् पुरुष को भी गलत मार्ग पर ले जाने में समर्थ होती हैं। #मनुस्मृति (2.214) @Sanatan_Science @sankrant
@drsureshpant
सास-ससुर को गाली देने वाली या नित्य कलह करने वाली नारी पुनर्जन्म में जोंक और पति को झिड़कने वाली नारी पुनर्जन्म में जूँ बनती है।
A woman who abuses her parents-in-law or quarrels constantly is reborn as a leech, and a woman who scolds her husband is reborn as a louse.