इस बीच 16 सितंबर को अनुसूचित जनजातीय दलित मुद्दे पर लिखी पुस्तकों की सीरीज़ में तीसरी पुस्तक यानि - ‘#संविधान_के_सामाजिक_अन्याय, खंड-2’ भी आ गई।
जो अन्याय के शिकार सबसे अधिक हाशिये के लोगों (अजजा के दलितों) को समर्पित है।
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#ScheduledTribeDalit#HimachalPradesh
स��सीसी और यूसीसी की अवधारणा में क्या फर्क है, वह तो उसके ड्राफ्ट आने के बाद ही पता चल पायेगा;
तब तक उन लोगों को अपनी-2 राय बना लेनी चाहिए;
जो रिवाज-ए-आम के अन्दर ‘अस्मिता’ या ‘शोषण’ या ‘सकारात्मक विभेद’ की बात करते हैं.
मणिपुर, क्या देश को, इसी तरह टुकड़ों में जलने के लिए छोड़ दिया जायेगा?
समुदायों, समाजों, समूहों, जातियों, प्रजातियों के बीच नफ़रत की दीवारें और अधिक सशक्त क्यों की जा रही हैं?
यह सही है कि देश में ‘व्यक्तिक विधान’ या ‘रिवाज-ए-आम’ की आड़ में कई तरह के शोषण होते हैं;
लेकिन ‘समान नागरिक संहिता’ का मतलब, न सिर्फ ‘व्यक्तिक अस्तित्व, अस्मिता, निजता’ अपितु ‘सामाजिक अस्तित्व, अस्मिता, निजता एवं पहचान’ की समाप्ति है.
तालियां बजाइये, देश में आधिकारिक अरबपतियों की संख्या 266 हो गई है;
ऊपर के 30% सेठों के कब्ज़े में देश की सम्पति का 90% और नीचे के 70% के हिस्से सिर्फ 10% है;
राष्ट्रवाद का ग्राफ निरन्तर बढ़ रहा है.
सिकन्दर महान ने सही कहा था ‘यह देश विचित्र’ है;
क्यों कि यहां का समाज विविधताओं भरा है;
आज का निज़ाम ‘गलत इरादे’ से इसे बदलने की कोशिश में है;
जो देश की एकता और अखंडता के लिए चुनौतियां पैदा कर सकता है.
मिट्टी की महानता द्वारा मानव के महत्त्व को बौना बना देने के सफल प्रयास ने समाज-आर्थिक समानता की लड़ाई को पीछे धकेल दिया है;
आज की सबसे बड़ी त्रासदी है, यह।
मध्य प्रदेश में भाजपा के एक नेता ने एक आदिवासी के ऊपर पेशाब करने की घिनौनी हरकत की;
जिस देश के प्रधानमंत्री बात-2 पर सीना ठोंकते हों, वहां यही तो होगा.
मैं या कि मानव
डरा हुआ जरूर हूं
इस लिए
डर से जीतने के लिए
डर से मुक़ाबला करता हूं
मैं बेबस नहीं हूं।
अंधेरे से निकलने का
रास्ता तलाश रहा हूं
और जो
रास्ता तलाशता है
वह बेबस नहीं होता
मैं बेबस नहीं हूं।
दुखों और दुखों के-
कारणों को महसूस कर,
उनके उपचार खोज;
वह तो-
गौतम से बुद्ध बन गए।
मेरे लिए छोड़ गये,
बोधिचित, बोधिसत्व औ���
बौद्ध, तथागत-
निर्वाण, मोक्ष का
महा जंजाल.....।
ज़िन्दगी कोई ‘पोस्टर’ तो नहीं
जो कहीं भी,
किसी भी ईंट-पत्थर की दीवार,
किसी सूखे पेड़ पर
चिपका दी जाये,
यह तो सतत प्रक्रिया है
आती-जाती सांसों,
चढ़ते-उतरते भावों,
संवेदनाओं, अनुभवों
प्रेम और घृणा की।
आम आदमी पार्टी के ��र्वशक्ति सम्पन्न नेता केजरीवाल जी ने सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर्ड जज, जस्टिस लोकुर द्वारा अध्यादेश पर लिखित पूरे लेख को ट्विटर पर शेयर किया है;
क्या बात है, तब तो कुछ न बोले थे, जब 4 जज खुली प्रेस कांफ्रेंस करने को मजबूर हुए थे...?
राहुल को मणिपुर में सड़क ��ास्ते जाने से रोक दिया गया;
लड़ाई मैतेयी आरक्षण की बताई गई;
लेकिन अब तक 250 से अधिक चर्च व डेढ़ दर्जन से ज्यादा मंदिर जला दिए गए;
राज्य में 60 में 40 विधायक और आज तक 12 मुख्यमंत्रियों में 10 मैतेयी रहे हैं;
फिर भी दिल्ली निर्णय लेने से देर कर रही है?
कोटा (राज) में ���गड़-2 कर आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर ��नाने वाली फैक्ट्री ने बीते साल 14 युवाओं की जान ले लीं;
अब तो ये रगड़ने वाली फेक्टरियाँ पहाड़ों में जम चुकी हैं?
समय रहते समाज और सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए.@CMOFFICEHP