लिव इन रिलेशन को वैधानिक रूप देने की तैयारी…
भेराराम सियोल और एक दो और विधायकों ने…
लड़के लड़कियों के घर से भागकर शादी करने का मुद्दा सदन में उठाया था…
माँ बाप अपनी औलाद को पाल पोसकर बड़ा करते हैं
18 साल के होते ही…
औलाद को अपने माँ बाप की संपत्ति पर पूरा अधिकार मिलता हैं…
लेकिन माँ बाप को अपनी औलाद पर कोई अधिकार नहीं मिलता…
वो किसी के साथ भी भागकर शादी कर लेते है…
और कोर्ट में माँ बाप को पहचानने तक से इनकार कर देते है…
उल्टा उनसे जान का ख़तरा बताकर उन्हें क़ानूनी पचड़ों में उलझा देते है…
इसे लेकर क़ानून में प्रावधान होना चाहिए…
लेकिन सरकार ने तो ऐसे बच्चों को और ज़्यादा सुविधा मुहैया करवा दी है…
जाओ भागो… क़ानून तुम्हारे साथ है….!!!
Supreme Court on SC/ST Act: જાતિસૂચક અપમાન અને એટ્રોસિટી એક્ટને (SC/ST Act) લઈને સુપ્રીમ કોર્ટે એક અત્યંત મહત્ત્વપૂર્ણ ચુકાદો આપ્યો છે. જસ્ટિસ વિક્રમ નાથ અને જસ્ટિસ સંદીપ મહેતાની બેન્ચે સ્પષ્ટતા કરી છે કે, કોઈ જાતિ કે જ્ઞાતિસૂચક શબ્દો બોલવાની ઘટના, જાહેર સ્થળ (જેમ કે સ્કૂલ કે ઓફિસ) પર બની હોવાથી તેને 'Public View' માની લેવાતી નથી. જો કોઈ બંધ રૂમમાં અપશબ્દો બોલાયા હોય, પરંતુ ત્યાં કોઈ નાગરિક હાજર ના હોય અને તેણે કંઈ સાંભળ્યું ના હોય, તો SC/ST એક્ટની કલમો લાગુ પડતી નથી.
શું હતો સમગ્ર મામલો?
આ વિવાદ ઉત્તર પ્રદેશની એક સ્કૂલનો છે. બે વિદ્યાર્થીઓ વચ્ચેના ઝઘડા બાદ તેમના પિતા સ્કૂલ મેનેજર પાસે રજૂઆત કરવા પહોંચ્યા હતા. આક્ષેપ હતો કે, ત્યાં તેમની સાથે મારપીટ કરાઈ અને સ્કૂલ મેનેજર દ્વારા તેમને જાતિસૂચક અપશબ્દો બોલાયા. આ આક્ષેપોના આધારે મેનેજર સામે SC/ST એક્ટ અને અન્ય ફોજદારી કલમો હેઠળ FIR નોંધાઈ હતી અને સ્પેશિયલ જજે ચાર્જશીટની નોંધ પણ લીધી હતી. અલ્લાહાબાદ હાઈકોર્ટના નિર્ણય સામે આ મામલો સુપ્રીમ કોર્ટમાં પહોંચ્યો હતો.
સુપ્રીમ કોર્ટે 'Public View' ની વ્યાખ્યા સ્પષ્ટ કરી
આ કેસની સુનાવણીમાં કોર્ટનું મુખ્ય ધ્યાન SC/ST એક્ટની કલમ 3(1)(r) (જાણીજોઈને અપમાનિત કે ડરાવવાનો ઈરાદો) અને 3(1)(s) (જાતિના નામે ગાળો આપવી) પર હતું. કોર્ટે સ્પષ્ટ કર્યું કે આ બંને કલમો માટે 'any place within public view' (એવી જગ્યા જે જાહેર હોય) શરત ફરજિયાત છે. કોર્ટે સ્પષ્ટતા કરી કે, 'Public View' નો અર્થ માત્ર 'Public Place' (જાહેર સ્થળ) પૂરતો સીમિત નથી. જો કોઈ ખાનગી સ્થળે ઘટના બને પરંતુ ત્યાં સામાન્ય લોકો હાજર હોય અને તે સાંભળી કે જોઈ શકતા હોય, તો તે પણ 'Public View' ગણાય. પરંતુ જો ઘટના સંપૂર્ણપણે બંધ રૂમમાં બની હોય, જ્યાં અન્ય કોઈ સામાન્ય વ્યક્તિ હાજર ન હોય, તો માત્ર તે સ્થળ સ્કૂલ કે ઓફિસ હોવાથી તેને જાહેર નજર સમક્ષ થયેલી ઘટના ગણી શકાય નહીં.
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वंदे मातरम् के सिर्फ पहले 2 अंतरे ही क्यों गाए जाते रहे हैं?
इसका फैसला आज की Congress ने नहीं, 1937 में Congress Working Committee ने लिया था।
कारण: पहले दो अंतरे मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन करते हैं, लेकिन बाद के अंतरों में मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया गया है। इसे लेकर मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से ने धार्मिक आपत्ति जताई थी।
इस मुद्दे पर रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी के बीच भी चर्चा हुई थी। अंततः राष्ट्रीय आयोजनों में पहले दो अंतरे गाने पर सहमति बनी।
अब 2026 में विवाद फिर लौटा है—केंद्र सरकार पूरे 6 अंतरे गाने के पक्ष में है, जबकि Congress 1937 के फैसले पर कायम है।
यानी बहस सिर्फ “वंदे मातरम् गाना है या नहीं” की नहीं है; असली बहस है—पहले 2 अंतरे या पूरे 6?
आप चाहे किसी भी पीढ़ी के हों,
Boomers, Gen X, Millenial, Gen-Z या Gen-Alpha
कभी भी कश्मीर , लद्दाक, अरुणाचल जैसी दुर्गम जगह पर घूमने अगर जा रहे हैं, तो मन में कृतज्ञता का भाव लेकर जाइएगा ।
क्यूँकि जो आपके लिए महज सैर-सपाटा है, उसे महफ़ूज़ रखने के लिए भारतीय सेना अपना ख़ून बहाती है ।
(ऐसी ही एक की एक वीडियो ,
18000 फीट पर,
पहाड़ों के ऊपर,
बंकरों में,
जहाँ सड़कें नहीं पहुँचती,
वहाँ भारतीय सेना के जवान अपने बंदूक की ट्रिगर पर उँगलियाँ रख तैनात रहते हैं, ताकि आपको आज़ादी मिलते रहे बुद्धिजीवी बन कर बात करने की)
रिलायंस टाउनशिप, जामनगर, गुजरात….!!!
देश भर में गुजरात शायद इकलौता ऐसा राज्य हैं…
जहाँ उद्योगपतियों को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता…
उल्टा प्रेरणा की नज़र से देखा जाता हैं…
यहाँ उद्योगपतियों को कोसने की बजाय उनकी तरह बनने की कोशिश की जाती हैं…
ये सोच काफ़ी है Difference create करने के लिए…
मैं ऐसा पहली बार देख रहा हूँ कि मारवाड़ राजपूत सभा के अध्यक्ष का चुनाव इतनी चर्चाओं के बीच आ गया है।
बुद्धिजीवियों और पत्रकारों के साथ एक दिक्कत यह है कि वे ऐसे चुनावों को जातियों, खाप आदि का चुनाव कहकर चर्चाओं से इतिश्री कर लेते हैं लेकिन ऐसे चुनावों, खेमेबंदियों पर जरूर चर्चा होनी चाहिए। क्योंकि जाति इस व्यवस्था का सच है, आप, हम नकार नहीं सकते। जाति को आधार मानकर पार्टियां टिकिट, नियुक्ति और RPSC,UPSC तक के फैसले ले रहीं हैं और हम हैं कि ऐसी घटनाओं को जाति का कहकर उस पर चर्चा तक से बच रहे हैं।
राजस्थान में भी जाति की राजनीति के 50 नुकसान जरूर होंगे लेकिन ये ना भूला जाए कि भूस्वामी आंदोलन से लेकर आर्य समाज जैसे विचार सिर्फ जातियों की लामबंदी के कारण यहां सफलता का आसमान छू गए थे। कर्नल बैंसला जैसा नायक जाति की जाजम से निकलकर सामने आया था।
बहरहाल, मारवाड़ राजपूत सभा का चुनाव दिलचस्प होने की दहलीज पर है। कारण है कि इस बार युवाओं ने यहां रुचि ले ली है। ऐसे चुनाव युवाओं की रुचि लेने का कारण क्यों हुए ? इसलिए कि सवाल बहुत जमा हो चुके हैं और उनके जवाब उन लोगों के पास नहीं है जो जिम्मेदार है।
मेरा तो स्पष्ट मानना है कि किसी पद पर रहकर या तो आप लोकप्रिय हो सकते हैं या अलोकप्रिय, या तो निर्विवाद हो सकते है या विवादित लेकिन किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं हो सकते। और अगर हैं तो आप उस पद पर क्यों हैं ? अभी के अध्यक्ष हनुमान सिंह खांगटा के साथ यही वस्तुस्थिति है। वे बार - बार क्यों निर्वाचित होते हैं, एकदम समझ से बाहर की बात है। उनका क्या मैकेनिज्म है, कोई अता - पता नहीं है। अंतिम परिणीति ये है कि समोसे में आलू की तरह हनुमान सिंह खांगटा मारवाड़ राजपूत सभा में जमे हुए है।
विचारवान युवाओं को ऐसी मोनोपली से दिक्कत होती है, होनी चाहिए। क्योंकि ऐसी संस्थाएं बहुत बड़े रिसोर्स खर्च करने के बाद खड़ी की जाती हैं। वहां नए प्रयोग होने चाहिए, नए लोगों को जगह मिलनी चाहिए, नए काम होने चाहिए। डाउन टू अर्थ और सॉफ्ट इमेज स्ट्रेटजी आपको रामजी की गाय साबित कर सकती है लेकिन रिसोर्स विजन और इनोवेशन के लिए खड़े किए जाते हैं।
मैं उन युवाओं को साधुवाद जरूर दूंगा जिन्होंने ये हिम्मत की है कि इस बार हम स्थापित लोग और स्थापित धारणा को चुनौती देंगे।
इसलिए वर्षों से चली आ रही मोनोपली तो तोड़ने के लिए इस बार तो कम से कम युवाओं को रविन्द्र सिंह राणावत के पक्ष में लामबंद हो जाना चाहिए।
पिछले 10 मिनट में दस बार सुन चुका हूँ…
नागालैंड के Wangnao Yato ने राष्ट्रीय गान के साथ अपनी आवाज़ का जो समां बाँधा वो अद्भुत है!
एक बार आप भी सुनिए फिर और लूप में डाल कर सुनते रहेंगे
Love you Wangnao Yato, Love you Nagaland 🇮🇳
Speaking at the Trailer launch of the movie, Sagwan, starring Police Inspector Himanshu Singh Rajawat. He also has written the story, dialogues and done the direction. Best wishes for this movie shot entirely in Rajasthan and mostly using the local talent.
Watching the movie Sagwan along with Himanshu Singh PI and team at Mansarovar, Jaipur. It’s a well made thriller using mostly the local artists and bringing out the flavour of Mewar. It’s serial killer mystery set in the background of Superstitions and gullibility of the folk.
Three legends of Rajasthan Police. Tarachand ji even lost his life fighting Dacoits in 1958 as SP Jodhpur. Retired DIG Sameer Singh ji is his grandson.
Delighted to interact with the medalists of the International Science Olympiad (ISO) at the Red Fort. These young and brilliant champions were invited to attend the 80th Independence Day celebrations.
Congratulated them for scripting history at the Science Olympiad.
Wishing them success in their future endeavours. I am confident that they will continue to make India proud.
जो मंज़िलों के निशानात दे रही हैं तुम्हें, उस इतिहास की तरफ चलो
कोटा के नौजवानों ने इस बार कमाल कर दिया। जड़ों की मिट्टी को उठाकर माहौल में संगीत उतार दिया है।
कोटा में एक जगह है उम्मेद क्लब और वहां वीरान पड़े एक चबूतरे पर ये बैंड की धुन बज रही है। शहर के लोगों को लगता था कि ये चबूतरा किसी राजा महाराजा का कोई यूं ही चोंचला होगा जो अब कचरे का अड्डा बन चुका है। लेकिन कल शाम इस चबूतरे पर बैगपाइपर बैंड की धुन गूंजी है और पूरे शहर को खुद के इतिहास का दीदार हुआ है।
उम्मेद क्लब की कमान इन दिनों नौजवानों के हाथ में है। इन नौजवानों ने इस चबूतरे जैसे दिखने वाले ढांचे का इतिहास ढूंढ निकाला और जब इतिहास मालूम हुआ तो कल यही चबूतरा कोटा की एक महान विरासत में शामिल हो गया है।
कहानी यूं है कि ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट क्रॉस्थवेट के नाम पर महाराव उम्मेद सिंह ने क्रॉस्थवेट इंस्टीट्यूट बनवाया जो आजादी के बाद उम्मेद क्लब हो गया। इसी परिसर में एक बैंड स्टैंड भी बनायावा गया। रोज शाम को इस बैंड स्टैंड पर मशक धुन बजती थी। कोई खास मौका होता तो बड़ा जलसा लगता था। कोटा रियासत के खास मेहमानों की अगुवानी में भी यहां खास प्रस्तुतियां दी जाती थी। जिस दिन मुल्क आजाद हुआ उस दिन भी इस बैंड स्टैंड से देशभक्ति की धुने गूंजी थीं।
लेकिन 1950 के बाद कोटा की पीढ़ियाँ ये इतिहास भूल गईं और एक ऐतिहासिक बैंड स्टैंड कचरे के अड्डे में तब्दील हो गया।
फिर युवाओं ने उम्मेद क्लब की कमान संभाली और लोकेंद्रसिंह राजावत जनरल सेकेट्री बने। नौजवानों की टीम के भीतर इतिहास के गौरव की कसक ने इस बैंड स्टैंड का इतिहास ढूंढ निकाला फिर बैंड स्टैंड का जीर्णोद्धार करवा दिया।
अब कल कोटा में 75 साल बाद इस ऐतिहासिक बैंड स्टैंड पर रौनक लौटी है। देशभक्ति गानों की प्रस्तुतियां दी गईं हैं और पूरे कोटा शहर ने अपने इतिहास का दीदार किया है।
ये सच है कि इंग्लिश बैंड हमारे देश में ब्रिटिश फौज के साथ आया था लेकिन बाद में बैंड से निकलने वाली धुनें ब्रिटिश हुकूमत के लिए नासूर बन गई थीं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के लिए संगीत निर्देशक रामसिंह ठाकुर ने "कदम कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा, ये जिंदगी है कौम की तू कौम पर लुटाए जा" की बैंड धुन तैयार की थी और ये गीत आजादी के मतवालों का गीत बन गया।