वक़्फ़ एक्ट में दिलचस्पी दिखाने के लिए शुक्रिया.
पहले ही पोस्ट के बाद काफ़ी सारे लोगों ने फेसबुक, ट्वीटर व वाट्सअप के ज़रिए सवाल पूछे हैं. मैंने उन तमाम सवालों को नोट कर लिया है. इंशा अल्लाह, उनके जवाब देने की मेरी पूरी कोशिश होगी. आज रात 10 बजे दूसरा पोस्ट पढ़ने को तैयार रहिए.
Brilliant way of paying off to the institution where u studied. Makers of Jamia would've been overwhelmed by ur efforts Mr Afroz. Thanks for bringing this scholarly work which will benefit generations to come.
@afrozsahil#100YearsofJamiaMilliaIslamia#JamiaAurGandhi
‘23 मई की सुबह मेरे अब्बू घर से निकले थे और फिर कभी वापस नहीं लौटे. हमें उनकी लाश तक नसीब नहीं हुई. सिर्फ़ यह ख़बर मिली कि पास में ही फाटक के पास उनकी हत्या कर दी गई थी.’
#JusticeForMaliana
https://t.co/FzeeKDsfNM
“What the Provincial Armed Constabulary (PAC) did in #Meerut and #Maliana would put any #Government to shame…”
Read this piece by Asghar Ali Engineer on June 3, 1989 published in Times of India
#JusticeForMaliana
देश में नरसंहार को बहुत हुए हैं, जिनमें सरकारों का हाथ रहा, लेकिन 23 मई 1987 को हुआ मलियाना ऐसा कलंक है जो शायद कभी छुटाया नहीं जा सकेगा. इस कलंक का दर्द तब और बढ़ जाता है, जब नरसंहार के 34 साल भी पीड़ितों को न्याय तो दूर,दोषियों को बचाने की कोशिश की जाती है.
#JusticeForMaliana
पिछले 34 सालों से मेरठ की एक सत्र अदालत में मलियाना मामले में मुक़दमा चल रहा है. याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस मामले में प्रमुख दस्तावेज़ एफ़आईआर ही ग़ायब हो गई है. कार्यवाही शुरू होने के बाद से 800 से अधिक तारीख़ें दी गईं. पिछली सुनवाई चार साल पहले हुई थी…
#JusticeForMaliana
‘बीते 34 साल में कई दोषी और कई गवाह मर चुके हैं. बाक़ी लोग भी मेरी तरह ही इन्तज़ार में हैं कि मौत पहले आती है या गवाही की बारी... न्याय का तो अब कोई इन्तज़ार भी नहीं करता.’ — याक़ूब अली (मेरठ सत्र न्यायालय में चल रहे मुक़दमे के मुख्य शिकाय���कर्ता)
#JusticeForMaliana
‘23 मई 1987 के दिन जो नरसंहार मलियाना में हुआ था उसमें मुख्य भूम��का पीएसी की थी. शुरुआत पीएसी की गोलियों से ही हुई थी और दंगाइयों ने पीएसी की शरण में ही इस नरसंहार को अंजाम दिया था.’ — याक़ूब अली (मेरठ सत्र न्यायालय में चल रहे मुक़दमे के मुख्य शिकायतकर्ता)
#JusticeForMaliana
‘मेरे पिता की भी उस दंगे में मौत हुई थी. उस दिन वे पड़ोस के एक घर की छत पर थे. उनके गले में गोली लगी थी. यह गोली पीएसी वालों ने ही चलाई थी. स्थानीय लोगों के पास ऐसे हथियार नहीं थे जिनसे इतनी दूर गोली मारी जा सके.’ — मेहराज अली
#JusticeForMaliana
‘23 मई की सुबह मेरे अब्बू घर से निकले थे और फिर कभी वापस नहीं लौटे. हमें उनकी लाश तक नसीब नहीं हुई. सिर्फ़ यह ख़बर मिली कि पास म���ं ही फाटक के पास उनकी हत्या कर दी गई थी.’ — रईस अहमद
#JusticeForMaliana