आज के दौर मे ऐ दोस्त ये मंज़र क्यों है,
जख्म हर सर मे हर हाथ मे पत्थर क्यों है
जब हक़ीक़त है के हर जर्ररे मे तू रहता है,
फिर जमीं पर कही मंदिर कहीं मस्जिद क्यों है
अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी,
अपनी नज़रो मे हर इंसान सिकंदर क्यों है
जिंदगी जीने के काबिल नहीं अब अजहर,