#JNVU छात्रसंघ चुनाव- 2022 के समय का ये वीडियो आज सोशल मीडिया पर काफी वायरल है.....
एक सामाजिक कार्यक्रम को राजनीतिक कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है अरविन्द सिंह भाटी को ?
इस कार्यक्रम में किसी एक पार्टी विशेष के नेताओं को ही आमंत्रण क्यों ?
#JNVU
आपसे पुछना चाहता हू,
जिस पोस्टर मे आप फोटो लगाकर आमंत्रित किया,
जब छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे थे,उनमे से कितने आपके समर्थन आए थे,
कितने लोगो ने आपको टिकिट दिलवाने का प्रयास किया.🤔
जिस मुकाम पर खड़े हो ना,
उस बंदे की मेहनत ने सड़को पर संघर्�� करके उस काबिल बनाया था।
#Jnvu
अरविन्द सिंह जिंदाबाद
अरविन्द सिंह जिंदाबाद
जीतेगा के जीत गया अरविन्द सिंह जीत गया
इतना भी एहसान फरामोश मत बनो हुक्म
ये सब प्लानिंग गजेंद्र सिंह शेखावत की हे की वो एक उभरते हुए राजपूत समाज के युवा को देख नहीं सकते 🥺🙏
@RavindraBhati__
महेंद्र सिंह मुनाबाव जी को पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन (CWJ) में बाड़मेर जिले का जिलाध्यक्ष नियुक्त किए जाने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
@MahendraMunabao
पहला वायरल वीडियो 👏😄
सिद्ध पुरुषों ��ें जो तेज होता है उसको प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती हैं।
वो दूर से भांप लेते हैं.....
तुरंत बुलाया
यह विशेष आशीर्वाद ही
इस नौजवान को शक्ति प्रदान कर रहा है।
@RavindraBhati__
जाति-धर्म की राजनीति करने वाली इस सरकार को जनता की भला क्या चिंता होगी?
स्वार्थ और भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार अपनी उपलब्धियों के गीत गाने में व्यस्त है, लेकिन जनता सब देख रही है। सत्ता स्थायी नहीं होती, और समय आने पर जनता अपना हिसाब अवश्य चुकता करेगी।
@RavindraBhati__
श्री @Rajendra4BJP
ईडब्ल्यूएस पर आपका क्या विचार है महोदय,डबल इंजन की सरकार है ���िर कब करोगे स्वर्ण समाज का भला ..
पार्टी भक्ति से थोड़ा बाहर आकर क��छ अपनों का सोच लेना नहीं तो आने वाली पीड़ियाँ कोसेगी..
आपकी नजर में सब नौटंकीबाज है पर आप तो सही है तो फिर करवाओ सरलीकरण।
���ाठौड़ साब ने अपने ही समाज के उभरते नेता को नौटंकी बोला फिर भी पार्टी ने राज्यसभा नहीं भेजा।
राजपूत नेता गुलाम हैं यह आज फिर साबित हुआ तुम्हारे हक में गुलामी आई।
@Rajendra4BJP
गिरल में KGF स्टाइल का महिमामंडन, पिस्टल रीलबाज़ी और मज़दूर की मौत पर उठते सवाल , आखिर शांति किस कीमत पर?
_ बाड़मेर एसपी, कलक्टर को पिस्टल रीलबाजी क्यों रास आई , क्या लाइसेंस निरस्तीकरण की प्रक्रिया नहीं होगी ? AI की आड़ में बंदूकवाद कैसे चलेगा ?
#दुर्गसिंह_राजपुरोहित
��ाड़मेर के गिरल क्षेत्र में पिछले दिनों जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए, उन्होंने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। सवाल केवल एक पिस्टल, एक रील या एक शक्ति प्रदर्शन का नहीं है, बल्कि उस माहौल का है जहाँ भय को प्रभाव का पर्याय बना दिया जाता है।
हथियार का लाइसेंस कानून व्यवस्था के दायरे में आत्मरक्षा और वैध उपयोग के लिए दिया जाता है, न कि सार्वजनिक मंचों पर शक्ति प्रदर्शन, रौब झाड़ने या लोगों को मानस���क दबाव में लेने के लिए। जब कोई व्यक्ति या समूह खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन करता है, तो संदेश केवल वीडियो तक सीमित नहीं रहता, वह समाज के कमजोर वर्गों तक भय के रूप में पहुँचता है।
गिरल में मजदूरों और जनप्रतिनिधियों को कथित रूप से डराने-धमकाने के आरोपों के बीच एक मजदूर की मृत्यु ने पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना दिया है। यह कहना जांच एजेंसियों का काम है कि मौत के कारण क्या थे, लेकिन यह सवाल उठाना पूरी तरह जायज़ है कि क्या भय, दबाव और तनाव का वातावरण इस त्रासदी से जुड़ा हुआ था?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या बाड़मेर में कानून का राज चलेगा या प्रभाव, पूंजी और हथियारों का प्रदर्शन ही नई व्यवस्था बनेगा? यदि कोई व्यक्ति स्वयं को इतना शक्तिशाली समझने लगे कि प्रशासन, पुलिस और कानून उसके सामने गौण दिखाई दें, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ सं��ेत नहीं है।
आज आवश्यकता किसी पक्ष विशेष का बचाव करने की नहीं, बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की है। यदि किसी भी स्तर पर भय पैदा करने, धमकाने या कानून के दुरुपयोग की भूमिका रही है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि नहीं रही, तो वह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए।
लोकतंत्र में सम्मान संविधान से मिलता है, बंदूक से नहीं। प्रभाव सेवा से बनता है, भय से नहीं। और विकास का रास्ता मजद��रों के विश्वास से निकलता है, उनके मन में डर पैदा करके नहीं।
गिरल की घटना केवल एक क्षेत्र का मुद्दा नहीं है, यह उस सोच की परीक्षा है जिसमें तय होना है कि राजस्थान कानून से चलेगा या कथित "KGF संस्कृति" से।
सवाल अभी भी वही है आखिर शांति किस कीमत पर खरीदी जाएगी, और उसकी कीमत क्या एक मजदूर की जान हो सकती है?
@PoliceRajasthan
@RajCMO
टिकट की दौड़ में आगे निकले पूनिया
राजेंद्र राठौड़ इस बार भी रह गए
विधानसभा चुनाव के बाद जब भी चुनाव हुए (लोकसभा या राज्यसभा) इन दोनों नेताओं के नाम हमेशा एक साथ चले हैं। दो-तीन बार किस्मत दोनों को इकठ्ठे ही छकाती रही, लेकिन इस बार सतीश पूनिया बाजी ले गए। दोनों का राजस्थान की राजनीति में बड़ा नाम है। दोनों हमारे चूरू से हैं। दोनों का ही राज्यव्यापी समर्थन आधार है। दोनों के पास विशद् अनुभव है। पार्टी से इतर, अन्य लोग भी दोनों को एक साथ राज्यसभा जाते हुए देखना चाहते थे। कुल मिलाकर दोनों डि��र्विंग कैंडीडेट थे। अब आगे जब भी मौके आएंगे, बातें राजेंद्र राठौड़ के लिए ही होंगी।
किस्मत का वह दगा...
2018 में विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद सतीश पूनिया का राजनीति में कद बढ़ता गया। पार्टी में उन्हें लगातार मौके दिए। पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाया। फिर जब प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाया तो तुरंत उप नेता प्रतिपक्ष का पद दिया। चुनाव हार गए तो हरियाणा के प्रभारी का पद दिया और अब राज्यसभा भेजा जा रहा ��ै। यानी एक दिन के लिए भी सतीश पूनिया पिक्चर से बाहर नहीं हुए। जब किस्मत इस तरह साथ दे रही थी तो अगर 2023 का विधानसभा चुनाव जीत गए होते, तो पूनिया किसी "अच्छी जगह" होते। ख़ैर। पूनिया जी अच्छी जगह ही पहुंच रहे हैं और आगे उससे अच्छी जगह भी मिलने की संभावना काफी ज्यादा है।
साफ-सुथरी राजनीति का सम्मान...
साफ सुथरी राजनीति करने वालों के लिए राजनीति में जगह है, यह सतीश पूनिया के मनोनयन से फिर एक बार साबित हो रहा है। 2013 के चुनाव का एक ��्रेरक किस्सा है। सतीश पूनिया का वह तीसरा विधानसभा चुनाव था और इससे पहले के दोनों चुनाव वे हारे हुए थे। 2013 का चुनाव ऐसा चुनाव था कि भाजपा से टिकट अपने वाले 200 में से 163 लोग चुनाव जीत गए थे क्योंकि उस चुनाव में नरेंद्र मोदी की जबरदस्त लहर थी। चुनाव प्रचार थमने के बाद कुछ कार्यकर्ता उनके पास आए और कहा कि अब यह समय शराब बांटने का है। हमें इस काम पर लग जाना चाहिए। पूनिया जी ने साफ इनकार कर दिया कि भले ही चुनाव जीतें या हारें, लेकिन शराब नहीं बांटेंगे। पूनिया वह चुनाव महज तीन सौ से कुछ ज्यादा वोटों से हार गए। उस हार ने पूनिया जी को तोड़कर रख दिया था लेकिन अगले चुनाव में मिली जीत और उसके बाद करियर को जो गति मिली, उसने पुरानी सभी हारों को धो दिया था। अब नई पारी 2023 में मिली हार को भी भुला ही देगी। जीवन भी इसी का नाम है। ऐसी कोई सड़क बनी ही नहीं, जिसमें सिर्फ चढ़ाई ही चढ़ाई हो। हर कठिन चढ़ाई के बाद सुखद ढ���ान भी अवश्यंभावी है।
बलराम प्रजापत जैसे पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष और पूर्व भाजपा जिला अध्यक्ष, बाड़मेर भाजपा के समर्पित व जमीनी नेताओं में गिने जाते हैं। ऐसे कार्यकर्ताओं की पीड़ा और सुझावों को लगातार नजरअंदाज करने का परिणाम भी संगठ�� को भुगतना पड़ता है।
बीते चुनावों में बाड़मेर में भाजपा की जमानत जब्त होना सिर्फ हार नहीं, एक संदेश भी था।
@BJP4India को जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज़ सुननी होगी वरना स्थिति ख़राब होनी तय है।
#Barmer #BJP
न झुक सकेंगे किसी के आगे, न बेच देंगे कभी ज़मीर,
हवा के रुख़ से नहीं बदलते, हमारे इरादे, हमारी तदबीर।
हमें मिटाने की लाख कोशिश, मगर ये याद रखना ऐ ज़माना,
शजर वही और बुलंद होता, जिसे पड़े आँधियों से टकराना॥
@RavindraBhati__
सितम भी सहना दुआ भी करना, ओ बेकसी का गया जमाना।
अगर है जुर्रत गिराओ बिजली, बना रहे हैं हम आशियाना,
किसी भी हालत में बागवानों, तुम्हारा एहसान हम न लेंगे
जो अपनी गैरत पर आँच आयी, तो फूँक देंगे हम आशियाना॥
राजस्थान के सब राजपूत नेता मर चुके हे विशेष बीजेपी के
इतनी खिलाफत भाई रविन्द्र ��े खिलाफ चुल्लू भर पानी लेके के डूब मरो आपके आंखों में इतना खटक रहा है वो 😡
उभरते हुए सेहरे को आप देखना नहीं चाहते हो
आने वाले समय में जनता सब को सबक सिखाएगी जनता सब समझदार है #RavindraBhati