डार्विन ने बोला था कि जीवन मिट्टी और ऑर्गेनिक केमिस्ट्री के एक ध��्के से चालू हो गया या सीधा बोले विज्ञान मोटे तौर पर यह कहता है प्रारंभिक पृथ्वी पर सरल इनऑर्गनिक रसायन मौजूद थे उनसे जटिल ऑर्गेनिक अणु बने।
कुछ अणुओं ने स्वयं की सेल्फ रिप्लिकेशन की क्षम��ा विकसित की और धीरे-धीरे प्रोटोसेल और फिर प्रथम कोशिकाएँ बनीं जिसको जीवन की उत्पत्ति बोला गया।
तो एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है वे गुण कहाँ से आए जिनके कारण यह परिवर्तन संभव हुआ?
यदि किसी समय केवल इनऑर्गनिक पदार्थ ही विद्यमान थे और उन्हीं से ऑर्गनिक अणुओं का निर्माण हुआ, तो क्या यह नहीं मानना पड़ेगा कि उन अकार्बनिक तत्वों में पहले से ही ऐसी संभावनाएँ निहित थीं जो आगे चलकर जीवन के रूप ���ें प्रकट हो सकें?
बीज में वृक्ष बाहर से नहीं डाला जाता; वह पहले से ही उसकी संभावना के रूप में उपस्थित होता है। उचित परिस्थितियाँ मिलने पर वही संभावना अभिव्यक्त हो जाती है। इसी प्रकार यदि निर्जीव पदार्थों से जीवन प्रकट हुआ, तो यह कहा जा सकता है कि जीवन किसी पूर्णतः बाहरी या आकस्मिक घटना के रूप में नहीं आया, बल्कि पदार्थ के भीतर निहित किसी अंतर्निहित संभावना का प्रकटीकरण था।
इसी संदर्भ में प्राचीन दार्शनिक उक्ति
"Ex Nihilo Nihil Fit"
You can’t make something out of nothing.
शून्य से कुछ नहीं उत्पन्न होता।
विशेष महत्व रखती है। यदि जीवन प्रकट हुआ है, तो उसकी संभावना किसी न किसी रूप में पहले से विद्यमान रही होगी। जो प्रकट हुआ, वह पूर्णतः नया नहीं था; वह किसी गहरे स्तर पर पहले से निहित था और समय के साथ संगठित होकर अभिव्यक्त हुआ।
इस दृष्टि से जीवन को पदार्थ के ऊपर आरोपित किसी चमत्कार के रूप में नहीं, बल्कि पदार्थ की अंतर्निहित संभाव्यता (लेटेंट पोटेंशियलिटी) के उद्भव के रूप में देखा जा सकता है। प्रश्न तब यह नहीं रह जाता कि जीवन शून्य से कैसे आया?, बल्कि यह बन जाता है कि पदार्थ के भीतर निहित जीवन-संभावना किन परिस्थितियों में स्वयं को प्रकट करती है?
आधुनिक विज्ञान बता सकता है ��ि रसायन जटिल कैसे होते गए, लेकिन यह अभी भी स्प��्ट नहीं कर पाया कि व्यक्तिपरक अनुभव (कांशियसनेस) कैसे उत्पन्न हुआ।
यदि चेतना मनुष्य में प्रकट हुई है, तो चेतना किसी रूप में ब्रह्मांड की संरचना में पहले से निहित रही होगी।
डार्विन और आधुनिक विज्ञान का सिद्धांत जीवों के विकास की उत्कृष्ट व्याख्या करता है, लेकिन यह जीवन की प्रथम उत्पत्ति, चेतना की प्रकृति और पदार्थ में निहित संभावनाओं के अंतिम दार्शनिक प्रश्नों का उत्तर नहीं देता।
ब्रह��मांड का एक बड़ा हिस्सा उस चीज़ से बना है जिसे आज हम वैक्यूम (निर्वात) कहते हैं। हालाँकि, जिसे हम वैक्यूम कहते हैं, वह भी पूरी तरह खाली नहीं होता। उसमें अभी भी कुछ कण (पार्टिकल) मौजूद रहते हैं। लेकिन मान लीजिए कि किसी स्थान से सारा पदार्थ हटा भी दिया जाए, तब भी वह खाली स्थान वास्तव में "कुछ नहीं" नहीं बन जाता।
वैक्यूम वास्तव में पूर्ण शून्य नहीं है। वह किसी न किसी रूप में अस्तित्व, ऊर्जा या संरचना को धारण किए हुए है; इसलिए उसे "कुछ नहीं" कहना उचित नहीं होगा।
शायद उसमें अनंत चेतना का विस्तार हो? जिस विषय को पूरी तरह नहीं समझता, उसे अपने परिचित ढाँचे में समझने की कोशिश कर रहा हूँ।
तो सवाल वही है:
"यदि जीवन निर्जीव पदार्थ से निकला, तो क्या जीवन की संभावना पदार्थ में पहले से निहित थी?"
जीवन यात्रा... 🚶🏻♂️
प्रभु की ऐसी व्याख्या 🙏🙏🙏
शायद ही मैने इस से पहले इतनी स्पष्टता से किसी से सुना हो
इस वीडियो को समझने के लिए भी आपको काफी समझ चाहिए
इस छोटी आयु में इतनी प्रौढ़ सोच
नमन है देवी को 🙏🙏
@dwigartaa न ते र भलेआं गै इक्कै जनेह् न, हत्थे लिखदे,भलेठा पौंदा ऐ,
र पराने डोगरा अक्खरें दा ठीक हा, परना र,नमें ग कन्नै मिलदा ऐ पर पराने ग ,कोला बक्खरा ये स्पष्ट ऐ
#OperationTankri / #Takri
See how the British Standardisation completely altered the original #Tankri Script which was quite uniform across Himachal.
Any suggestions for the next post of #OperationTankri?