यूं ���िसी की मधुरतम विरह अग्नि में
हम जले तो मगर अध- जले रह गए
कैसे व्याख्या करूं अपने संताप की
बस बदलता रहा करव��ें भोर तक
अपने जीवन की अर्जित निराशा लिए
आ गए हैं हम अपने प्रलय छोर तक
फिर जलाया नहीं हां किसी ने हमें
हम दिए का दिया बस बने रह गए
~नितिन एहसास
दुनिया से एकाकी होकर
मैं कमरे में बंद पड़ा हूं
दीवारों को ताक रहा हूं
तकते तकते मेरी नज़रें
आईने से टकराती हैं
अपना ही अक्स देख के मुझको
यूं ही एक ख्याल सा आया
एक दिन मेरी प्यासी पलकें
जालों से जब भर जा��ंगी
हैरानी के वीरान�� में
आंखे दश्त में खो जाएंगी
है पाक ��ुनाहों से हमारी ये ख़ता भी,
गारत हों अगर हमको बदी ने हो छुआ भी ।
हम चश्मः-ए-उल्फ़त में हैं मानिन्द कंवल के
जो पानी के अन्दर भी है पानी से जुदा भी।
~आगा हश्र कश्मीरी
(नाटक-यहूदी की लड़की)
जिससे ताल्लुक का तोड़ दुनिया है
उसका कहना है कि छोड़ दुनिया है
वो मेरा नहीं है मैं जिसका हूं
जैसे गफलत का जोड़ दुनिया है
कौन इतना जियादा रोया था
किस आंख का निचोड़ दुनिया है
जो दिख रहा है ये कमाल होठों पर
उसने रखे थे कभी गाल होठों पर
होंठ रक्खे जब उस ने गालों पर
होंठ करने लगे सवाल होंठों पर
मैं तुम तक फिर देर से जो पहुंचा हूं
तो अपना गुस्सा निकाल होंठों पर
सर��दियों की रुत है कोई लम्स भी नहीं
ऐसे नहीं आया ये जवाल होंठों पर
~नितिन एहसास
बुरा हो कर भी वो अच्छा बहुत है
वो जैसा है नहीं बनता बहुत है
फ़रेब-ए-सादगी है या शरारत
मैं ये समझा कि वो मेरा बहुत है
तुझे सोचा किया शब-भर सँवारा
नहीं ऐस��� नहीं वैसा बहुत है
उसी से बात करना है कि जिस ने
हमें समझा नहीं पूछा बहुत है
– बद्र वास्ती
पांव जब धूप में उनके जले थे
लिहाज़ा हम नाज़ो से पले थे
आज तक जाने क्यूं ये सोचता हूं
कि दिन गुजरे हुए अच्छे भले थे
उस दरम्यां ख़ामोशियां ना थी
जब तक होंठ पे शिकवे गिले थे
~नितिन एहसास
जितने भी दरख़्त मिले वो खजूर के मिले
उस गांव में हमें कोई पीपल नही मिला
गाड़ी भी दिल की ये उसी जगह खड़ी रही
उ��की तरफ से जब कोई सिग्नल नहीं मिला
उम्र इतनी काट दी की अब मिलेगा अब
हमको हमारी सब्र का कोई फल नहीं मिला
~नितिन एहसास
पर्वत मिले, नदियां मिली, दलदल नहीं मिला
ऐब तो कितने मिले पर छल नहीं मिला
हम उससे दिल की बात कल कहेंगे कल
रोज़ कल के चलते व�� कल नहीं मिला
हर जगह किसी न किसी के आशियाने थे
कितना चले लेकिन हमें जंगल नही मिला