ये है हुसैन मंसूरी जो कई दिनों से असम में बाढ़ पीड़ितों को मदद कर रहे है।
कभी अनाज तो कभी जरूरत की चीजों से। खुद अपने हाथों से ��िन रात लगे है।
ऐसे जांबाजो को सलाम🫡
आज इलाहाबाद हाई कोर्ट में जौहर यूनिवर्सिटी के फाउंडर मोहम्मद आज़म ख़ान और उनके बेटे पूर्व विधायक अब्दुल्लाह आज़म की जमानत की मांग की जाने वाली याचिका पर सुनवाई होनी थी लेकिन जस्टिस विक्रम डी चौहान ने सुनवाई के वक़्त ख़ुद को सुनवाई से अलग कर मामले को मुख्य न्यायधीश को ट्रांस���र कर दिया।
जज साहब ने 15 जुलाई को सुनवाई की थी और अगली तारीख़ 6 अगस्त दे दी, आज़म ख़ान के वकीलों और परिजनों ने 20 दिन इंतिज़ार किया और आज अदालत पहुंचे तो जज साहब ने बिल्कुल मौके पर ख़ुद को सुनवाई से अलग कर लिया, जज साहब चाहते तो मामले को पिछली तारीख़ यानी 15 जुलाई को ही इस मामले से अलग कर सकते थे ताकि अब तक मामला की सुनवाई हो जाती, लेकिन साहब ने ऐसा नहीं किया क्योंकि मामले को खींचना भी था।
ख़ैर जज साहब की मामले से दूरी बनाने की मजबूरी जो भी रही हो लेकिन साफ़ जाहिर है कि अदालतों में सरकारों का खौफ़ है, इसलिए जज अब मामलों से दूरी बनाना ही बेहतर विकल्प समझते हैं, और यह दूरी उन्हीं केसों में बनाई जाती हैं जिनमें पहली ही सुनवाई में जमानत देने का आधार बनता हैं लेकिन दबाव के कारण जज फ़ैसले देने का भी फैसला नहीं ले पा रहे हैं, और फैसला लिया जाता है तो मामलों से दूरी बनाने का।
यह पहला मामला नहीं जब किसी जज ने आज़म ख़ान और उनके बेटे के मामले की सुनवाई से दूरी बनाई हो, इससे पहले 21 नवंबर 2025 को यतीमखाना केस में भी जो कि आज़म ख़ान से ही जुड़ा हुआ था, उसकी सुनवाई से भी जज समीर जैन ने ख़ुद को अलग कर मामले को मुख्य न्यायधीश के पास भेज दिया था।
साबित हैं जज साहब आज़म ख़ान के मामले को भांप चुके हैं जिसमें आज़म ख़ान और उनके बेटे को बरी या जल्द जमानत देने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, लेकिन जज साहब ने जमानत न देकर ख़ुद को मामले की सुनवाई से अलग कर मुख्य न्यायधीश के पास भेजना मुनासिब समझा। अगर जज साहब को इस मामले से ख़ुद को अलग ही करना था तो अलग होने वाला फैसला कई महीनों में क्यों लिया गया? क्यों न ख़ुद को मामले की शुरुआत या जब मुख्य न्यायधीश ने अदालत में भेजा था उसी दौरान क्यों नहीं लौटाया गया? अब नागरिक अदालतों का नहीं बल्कि अदालत ही नागरिकों का स���य बर्बाद करती हैं, अदालत का नागरिक समय बर्बाद करता है तो अदालत द्वारा नागरिकों पर जुर्माना और FIR तक दर्ज कर देती हैं लेकिन नागरिकों अगर अदालत ही नागरिकों का समय बर्बाद करें तो किस पर जुर्माना और किस पर FIR होनी चाहिए यह ��ी अदालतों को बताना चाहिए।
धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं है...
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा !
गुड़गांव दंगे में कल्लू मियां जी के दुकान को जला कर राख कर दिया गया.. बुजुर्ग फिर से एक नई शुरुवात कर रहे हैं...आपकी दुआएं असर करेंगी !!
رب کعبہ کی قسم
@zoo_bear
تو گرفتار ہوا ہے رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم کی ناموس و عزت کی حفاظت کرتے ہوئے
لہٰذا تیرے قید و بند کا ہر لمحہ اور ہر سیکنڈ
قابلِ رشک ہے، قابلِ فخر ہے
اور سب سے بڑھ کر رفعت و بلندی کا ذریعہ ہے
#IStandWithZubair
ये भीड़ नमूस ए रिसालत की हिफाज़त केलिए इकट्ठा हुई है,
दुनिया चाहे किसी भी चीज़ मे�� हमारा इम्तिहान ले ले,मगर बात जब मुहम्मद s.a.w की मुहब्बत की आती है,ये वो इम्तिहान हैं जिसमे हम हरगिज़ नाकाम नहीं हो सकते,इस इम्तिहान में ना हमारे नेक लोग नाकाम होंगे ना ही गुनहगार
#ProphetMuhammad
شان رسالتؐ میں گستاخی ہرگز برداشت نہیں، گستاخان رسولؐ کو حکومت فوراً گرفتار کریں!
کرناٹک کے مؤقر علماء اور تمام تنظیموں کے ذمہ داران کا گستاخان رسولؐ کے خلاف نمائندہ و احتجاجی پروگرام!
(مکمل رپورٹ 👇🏻)
https://t.co/tSqLYFeCCl
#ProphetMuhammad#ArrestNupurSharma#Gustakherasool
اب ایسا لگتا ہے ملک میں میں عدالتوں کی کوئی ضرورت نہیں؟
مذہبی عبادت گاہوں سے متعلق قانون سے چھیڑ چھاڑ انتہائی خطرناک،
انتظامیہ کامظاہرین کے درمیان مذہب کی بنیاد پر تفریق افسوسناک :
حضرت مولانا ارشد مدنی صاحب دامت برکاتہم
قومی صدر جمعیۃ علماء ہند
و صدرمدرس دارالعلوم دیوبند