भादों की अँधेरी रात में, जन्मे नंदलाल।
देवकी के लाल हैं, यशोदा के गोपाल।
मथुरा में जन्म लिया, गोकुल में मुस्काए।
जय श्री कृष्ण कहकर, भक्त सभी हर्षाए ॥
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।।
#कृष्णजन्माष्टमी
मुल्ले शवों के साथ भी रेप करते थे। पाकिस्तान में आज भी वही हो रहा है। इसलिए हिन्दू स्त्रियाँ जौहर करती थीं। किसी दो कौड़ी की मुल्ला प्रेमी, करियर में फुँक चुकी लौंडी के लिए यह समझना कठिन हो सकता है क्योंकि उसके लिए उसकी ‘पुसी फॉर अ रेंट’ ही जीवन का सत्य है।
ऐसी लौंडियाँ सेक्स को स्��तंत्रता मानती हैं, जितनों के साथ सेक्स, उतनी अधिक स्वतंत्र। हर स्त्री ऐसा नहीं मानती। उनके लिए अरब के बाजारों में सेक्स स्लेव बनना उतना अडवेंचरस और फुलफुलिंग नहीं दिखा होगा, जितना आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझती, भैया कह कर सैंया बनाने वाली के लिए दिखता हो।
तुम नंगी हो कर एम्सटर्डम के बाजारों के शीशे में नाचों, तुम्हारी मुटल्ली देह भी किसी को पसंद आ जाएगी। हाँ, किसी योनि-केन्द्रित लौंडिया का ��ारीवाद यह तय नहीं करेगा कि दूसरी स्त्रियाँ रंडी बन कर ही घूमें क्योंकि तुम्हें रंडीपना बहुत पसंद है।
यह पोस्ट मैंने बहुत माइल्ड लिखा है। हिन्दू नारियों पर ऐसे आक्षेप का उत्तर मैं और भी अच्छी शब्दावली के साथ दे सकता हूँ।
खेतों को संवारा तो सँवरते गये खुद भी,
फसलों को उभारा तो उभरते गये खुद भी,
फितरत को निखारा तो निखरते गये खुद भी,
नित अपने बनाये हुए साँचे में ढलेंगे।
हम जिन्दा थे, हम जिन्दा हैं, हम जिन्दा रहेंगे।
- #फ़िराक_गोरखपुरी
Gayatrimata Jayanti
ॐ भूर्भुवः स्वः।तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
We meditate upon the divine radiance of the supreme Creator, the source of life across all realms. May that sacred light illuminate and guide our minds.
खेतों को संवारा तो सँवरते गये खुद भी,
फसलों को उभारा तो उभरते गये खुद भी,
फितरत को निखारा तो निखरते गये खुद भी,
नित अपने बनाये हुए साँचे में ढलेंगे।
हम जिन्द�� थे, हम जिन्दा हैं, हम जिन्दा रहेंगे।
- फ़िराक गोरखपुरी
फ़िराक गोरखपुरी का असली नाम रघुपति सहाय था। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में अंग्रेजी के आचार्य थे। उर्दू में उनकी बहुत प्रसिद्ध रचना है - गुल ए नगमा। सन 1969 में इस रचना के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है।
फ़िराक गोरखपुरी ने कई चर्चित गजल और नज़्म लिखी हैं। उनमें मुझे उक्त नज़्म बहुत अच्छी लगती है क्योंकि इसमें अपने देश की सुगंध है। एक गौरव बोध है। उत्कृष्ट इतिहास बोध है। वह सभ्यतागत निरंतरता का उल्लेख है जो केवल भारत की पहचान है। इस नज़्म में आई "हम जिंदा थे, हम जिंदा हैं और जिंदा रहेंगे!" कालजयी पंक्तियां हैं जो भारत की सनातनता का उद्घोष हैं।
आज फ़िराक गोरखपुरी का जन्मदिन है। 28 अगस्त!
उनके जन्मदिन पर पुण्य स्मरण! श्रद्धांजलि।
भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा।
विश्व संस्कृत दिवस की समस्त संस्कृत प्रेमियों, विद्वतजनों एवं प्रदेश वासियों को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सनातन ज्ञान-परंपरा, दर्शन, विज्ञान और संस्कृति की दिव्य अभिव्यक्ति है।
आइए, हम सभी देवभाषा के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु संकल्पित हों।
संस्कृतदिनस्य शुभाशयाः। 🌿
A language of beauty and expression, Sanskrit is also a profound repository of Vedic and philosophical wisdom.
On Sanskrit Day, let us celebrate a language that continues to connect beauty with knowledge.
#SanskritDay#Sanskrit#SanskritLanguage
रक्षाबन्धनस्य शुभाशयाः। 🪢❤️
The sacred thread may bind the wrist, but it is love, affection, and the bond of family that truly bind hearts together.
Wishing you a beautiful and blessed Raksha Bandhan.
#RakshaBandhan#Sanskrit#IndianTraditions#Family#Love#TimelessWisdom
जो वकील अपने चैंबर में जज बनाने के लिए कुख्यात है, वो भोंसड़ीवाला भी मर्यादा पर ज्ञान चोद रहा है। लाल जंघिए में आर्गुमेंट करने वाले लोग, जिनके इनकम टैक्स के पेपर दीमक चर जाते हैं, वो साले मोरेलिटी का हमें ज्ञान देंगे?
साले सही पैसे दूँ तो रिरियाता हुआ ‘जी सर’ बोल कर तू मुझे डिफेंड करने आ जाएगा।
पुनः कहूँगा, जिन हराम के पिल्लों को लगता है कि मे��ी (या किसी भी व्यक्ति की) माँ-बहन किसी अनपढ़-गँवार-जातिवादी ��ीड़े के डिजिटल भोग की विषयवस्तु है, मैं उनकी पिछवाड़े में बाँस डाल कर खड़ा कर दूँगा।
मेरे लिए मेरे परिजनों का सम्मान सर्वोपरि है, और उस पर कोई कॉम्प्रोमाइज नहीं। चाहे वो भारत का प्रधानमंत्री हो या अमेरिका का राष्ट्रपति, मुझे झाँट भर फर्क नहीं पड़ता तुम्हारी पहचान क्या है।
मैं अपने प्रत्युत्तर में तीक्ष्ण, तीव्र और डिस्प्रपॉर्शनेट ही रहूँगा।
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥
अमर महाकाव्य 'श्रीरामचरितमानस' के रचयिता, भक्तिधारा के महान कवि, 'पूज्यपाद' गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की जयंती पर कोटि-कोटि नमन एवं प्रदेश वासियों को हार्दिक बधाई।
उन्होंने अपनी दिव्य कृतियों के माध्यम से प्रभु श्री राम के आदर्शों, सनातन संस्कृति और भारतीय जीवन मूल्यों के अमृत संदेश को जन-जन तक पहुंचाया। उनका कालजयी साहित्य लोकमंगल का शाश्वत पथप्रदर्शक है।