Whenever I found myself struggling with an intellectual, emotional, or moral dilemma, he would ask me to quietly walk into his personal library, take the suggested book and note the date on which I would return it, writes Dr Madhu B. Baghel
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सरकार ने श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में सैकड़ों दलितों को पांच-छह दशक पहले जमीनें आवंटित की थीं लेकिन दलितों की जमीनें किस प्रकार दलितों के ही नाम पर खरीद कर छीनी जा चुकी हैं, बता रहे हैं अमरपाल सिंह वर्मा
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��द्यपि पंजाब के अछूत समुदाय में पहले से ही गुरु रविदास (रैदास) के प्रति गहन श्रद्धा भाव था मगर आद धर्म आंदोलन ने अत्यंत प्रभावी तरीके से उनकी तस्वीरों का उपयोग कर राज्य की निम्न जातियों की संस्कृति को एक नया, मज़बूत स्थान दिलवाया। बता रहे हैं रौनकी राम
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लंबे समय से इस धारणा को हमारी आम समझ का हिस्सा बनाने की सचेत कोशिश की गई कि जहां मुसलमानों की आबादी ज़्यादा होती है वो पाकिस्तान होता है। इसलिए मुसलमानों को मुहल्लों या गांवों से निकालना एक ‘राष्ट्रवादी कर्तव्य’ है। बता रहे हैं शाहनवाज आलम
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लगभग हर दशक में कुछ मेधावी दलित-बहुजन शख्सियतें उभर के आती हैं जो व्यवस्था की बारीकी से समालोचना करते हैं और सत्ताधारी आसानी से उसे नज़रंदाज़ कर देते हैं। बिना संगठन के समालोचना एक ऐसी चिट्ठी है जिसे लाल डिब्बे में डाला ही नहीं गया। बता रहे हैं अदीब हैदर https://t.co/ATWpyuQONi
For a welfare-based system to withstand the volatile pressures of a digital attention economy, it must evolve from a mechanism for ensuring material survival into an active vehicle for structural equality and democratic dignity, writes Thiruppathi P.
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लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. रीता चौधरी ने अपने वक्तव्य में अर्जक संघ की संस्कृति और महिलाओं के अधिकारों की व्याख्या की, जिसमें महिलाओं को समता, और स्वतंत्रता के अधिकार पर बल दिया गया है। पढ़ें, यह खबर
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The Ad Dharm movement used images of Guru Ravidass to great effect to concretize the newly conceived lower-caste cultural space in the region, writes Ronki Ram
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जनवार गांव में 50 से ज्यादा आदिवासी लड़के-लड़कियां हैं, जो स्केटबोर्डिंग के खेल में माहिर हैं। लेकिन, आज इन खिलाड़ियों के ��ास पंजीयन शुल्क, यात्रा खर्च, किट, पार्क का अभाव इत्यादि समस्याएं हैं
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REPOST #DeathAnniversary
अपने सरोकारी लेखन और पक्षधरता के कारण दलित-बहुजन सोच और समाज के अभिन्न हिस्सा रहे विचारक, नाटककार, आलोचक मुद्राराक्षस को स्मरण कर रहे हैं कंवल भारती
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यहां वह प्रकृति से संवाद कर रही हैं और कह रही हैं कि उन्हें बस प्रकृति के साथ जाना है, उसकी दिशा में जाना है। न बाएं देखना है और न दाएं। वही रास्ता अपनाना है जो प्रकृति का है और एक दिन विलीन हो जाना है। पढ़ें, यह समीक्षा
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Every decade produces brilliant Dalitbahujan voices who critique power with precision and then watch power ignore them, not because the critique was wrong, but because critique without organization is a letter that was never sent, writes Adeeb Haider
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‘Matka King’ is a confident, character-first swing by a director in the process of expanding his range. It celebrates the intoxicating dream of upward mobility while unflinchingly tracing its human cost, writes Neeraj Bunkar
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जिस भाजपा को खुद यकीन नहीं कि वह चार विधायकों को जुटा सकेगी, उसन�� नाथवानी नामक रेस के घोड़े पर दांव लगा दिया है, क्योंकि उसे यकीन है कि नाथवानी कुछ विधायकों की ‘अंतरआत्मा की आवाज’ को जगा कर समर्थन जुटा लेंगे। पढ़ें, विनोद कुमार का यह विश्लेषण
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सम्राट चौधरी के रहते अब भाजपा को दूसरे कोईरी नेता की जरूरत नहीं रही। हालांकि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को सम्राट चौधरी के मंत्रिपरिषद में जगह मिल गई, लेकिन बिहार विधान परिषद चुनाव में भाजपा ने उन्हे उम्मीदवार नहीं बनाया। बता रहे हैं किरणेश
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REPOST #DeathAnniversary
केवल 25 वर्ष के बिरसा मुंडा की हत्या अंग्रेजों ने धीमा जहर देकर कर दी थी। इसके पहले ही वे आदिवासियों में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर आंदोलन का आगाज कर चुके थे। यही वजह रही कि उन्हें धरती आबा कहा जाने लगा था
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Meera shedding social inhibitions was not about quitting royal life and embracing a spartan existence; it was about a widow being drawn to a man, loving him, and wanting to marry him, writes Kanwal Bharti
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फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह जगदेव प्रसाद के जीवन को किसी चमत्कारी नायक की कथा में बदलने के बजाय उनके सामाजिक और वैचारिक निर्माण की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करती है। बता रहे हैं अरुण नारायण
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इस संग्रह की तीसरी और अंतिम श्रेणी की कहानियां सामाजिक संघर्षों पर आकर ठहरती हैं। जो लेखक के लेखन का उत्स है। सुरेंद्र स्निग्ध की रचनाओं में सामंतवादी प्रवृतियों से संघर्ष करते कई किरदार नजर आते हैं। बता रहे हैं श्रीधर करुणानिधि
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