@monikasinghpoet ये कहानी सैकड़ों लम्हात की है
साँवले को सोच, दिन की रात की है
बाँसुरी के सुर सुनाई दे तो लागे
बात राधा-कृष्ण के साआत की है
दरमियाँ अब भी है कुछ मोहन पियारे
आरज़ू बाक़ी मिलन के रात की है
देवकी, कुंती, सुभद्रा, द्रौपदी ने
तू जहाँ है मुश्किलों पर मात की है
था कहाँ मंदिर,शिवालय,चर्च, मस्ज़िद
तू ही जाने बात किन हालात की है
पाप करके शर्म से ना सर झुके जब
तो सुर्दशन चक्र से शुरुआत की है
सच का छोड़ा साथ जब जब भी किसी ने
अपनों से लड़ने की तूने बात की है
~ मोनिका सिंह
#Janmashtami2025
जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई.. सो बात गई..!
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लर���याँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई.. सो बात गई..!
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई.. सो बात गई..!
मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट ��ूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई.. सो बात गई..!
~ हरिवंशराय बच्चन
“कृष्ण की पुकार है,
ये भागवत का सार है,
कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है !
कौरवों की भीड़ हो,
या पांडवों का नीड़ हो,
जो लड़ सका है वो ही तो महान है!!
जीत की हवस नहीं,
किसी पे कोई वश नहीं!!
क्या ज़िन्दगी है ठोकरों पे मार दो!!
मौत अंत है नहीं तो,
मौत से भी क्यूँ डरें,
ये जाके आसमान में दहाड़ दो!!
~ पीयूष मिश्रा
बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे
मत ब्याहना उस देश में
जहाँ आदमी से ज़्यादा
ईश्वर बसते हों
जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन
वहाँ तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
ऊँचे-ऊँचे मकान
और दुकानें हों बड़ी-बड़ी
उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे ।
मत चुनना ऐसा वर
जो पोचाई और हंडिया में
डूबा रहता हो अक्सर
काहिल निकम्मा हो
माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने ��ें
ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर
कोई थारी लोटा तो नहीं
कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
अच्छा-ख़राब होने पर
जो बात-बात में
बात करे लाठी-डंडे की
निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर
ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया
और ��ो और
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो "ह" से हाथ
उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ
ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
जहाँ सुबह जाकर
शाम को लौट सको पैदल
मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप.....
महुआ का लट और
खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
तुम्हारी ख़ातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी,
समय-समय पर गोगो के लिए भी
मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे
उस देश ब्याहना
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
बकरी और शेर
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!
उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड़ और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाह��� खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुःख बाँटने तक
चुनना वर ऐसा
जो बजाता हों बाँसुरी सुरीली
और ढोल-मांदर बजाने में हो पारंगत
बसंत के दिनों में ला सके जो रोज़
मेरे जूड़े की ख़ातिर पलाश के फूल
जिससे खाया नहीं जाए
मेरे भूखे रहने पर
उसी से ब्याहना मुझे।
~ निर्मला पुतुल
बचपन में पढ़ी गई एक कहानी जिसमें यह सीख मिली कि कैसे धैर्य का साथ नहीं छोड़ने से सबकुछ सम्भव है...
“बां�� का पेड़ और किसान”
एक किसान रोज़ सुबह अपनी ज़मीन पर जाकर बांस का बीज पानी देता था।
1 हफ्ता… 1 महीना… फिर 1 साल बीत गया।
लेकिन ज़मीन से कुछ नहीं निकला।
लोग हँसने लगे —
"पगला गया है! कहाँ उगेगा बांस?"
"1 साल से कुछ नहीं उगा, छोड़ दे!"
लेकिन किसान रोज़ जाता, बीज को पानी देता, धूप से बचाता।
4 साल बीत गए, फिर भी जमीन में कुछ नहीं उगा।
5वें साल, एक दिन अचानक —
बांस का छोटा सा पौधा निकला।
अगले 6 हफ्तों में व�� बांस का पेड़ 90 फीट ऊँचा हो गया।
बांस 5 साल तक अपनी जड़ों को मजबूत कर रहा था।
अगर किसान धैर्य न रखता, तो ये ऊँचाई कभी नहीं मिलती।
ज़िंदगी भी वैसी ही है।
धैर्य रखो। मेहनत करते रहो।
फल ज़रूर मिलेगा — और जब मिलेगा, तो बड़ा मिलेगा।