इरफान हबीब: मुगलई डिस्टोरियन जिसने हिंदू कत्लेआम को वर्ग संघर्ष के रूप में स्थापित किया
इरफान हबीब को पढ़ना एक जादू देखना है। हाथ में फारसी स्रोत, मुँह पर मार्क्स का सिद्धांत, और बीच में से मजहब गायब। उसे वर्ग संघर्ष का नाम दे दिया ताकि मामला प्रगतिशी�� लगे, कत्लेआम रोमांटिक लगे।
उसका सबसे बड़ा काम मुगल भारत की कृषि व्यवस्था इसी जादू की नींव है। इसमें उसने सिद्ध किया कि मुगल साम्राज्य जागीर संकट और लगान के दबाव से ��िरा। पर उसी किताब में मुगल साम्राज्य के शोषण का मजहबी हथियार जैसे जजिया, तीर्थयात्रा कर, मंदिरों की जमीन जब्त कर वक्फ बनाना, जबरन मतांतरण एक फुट नोट भी नहीं।
ऐसा क्यों, क्योंकि अगर जजिया का जिक्र कर दे तो मानना पड़ेगा कि किसान सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं, धार्मिक रूप से भी निचोड़ा गया। साकी मुस्तइद खान लिख गया है कि जजिया का मकसद हिन्दुओं को अपमानित करना था। इस एक पंक्ति से पूरा वर्ग-संघर्ष का ��ांचा गिर जाता है, इसलिए वह पंक्ति किताब में नहीं आती।
हबीब लिखता है मंदिर लूटे गए क्योंकि वे खजाना थे। पर खुद उसी के पढ़े हुए फारसी स्रोत में औरंगजेब का 1669 का फरमान है - काशी, मथुरा, सोमनाथ में काफिरों के विद्यालय और मंदिर तोड़ दो। इसमें खजाने का जिक्र नहीं, कुफ्र क�� जिक्र है। हबीब फरमान जानता है पर अनुवाद बदल देता है और इसे राजनीतिक विद्रोह दबाना बता देता है।
भारतीय इतिहास कांग्रेस में 1998 में भगवाकरण के विरुद्ध प्रस्ताव लाकर खुद को धर्मनिरपेक्षता का ठेकेदार बना लिया पर उसी प्रस्ताव में मांग नहीं की कि मुगल काल के फारसी इतिहास में जो हिन्दुओं को काफिर, मुशरिक, हरबी लिखा है उस पर भी चर्चा हो। धर्मनिरपेक्षता एकतरफा हो गई , हिन्दू राष्ट्र की आलोचना करो, द���र-उल-इस्लाम की नहीं।
यही धूर्तता है, सच को धुंधला कर देना, आधा सच बोलना। इसी आधे सच से 60 वर्ष तक भारत के बच्चे पढ़ते रहे कि मध्यकाल में सब आपस में भाई-भाई थे बस जागीरदार खराब था। उन्हें बताया ही नहीं कि उसी काल में काशी में विश्वनाथ नहीं था क्योंकि तोड़ दिया गया था, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर ईदगाह थी, नालंद�� में किताबें तीन महीने तक जली थीं और सोमनाथ के शिवलिंग को गजनी की मस्जिद की सीढ़ियों में गाड़ दिया गया ताकि रौंदा जा सके।
और जब यह आधा सच पकड़ा जाता है तो दूसरा औजार निकलता है, मिलावट। जो स्रोत में नहीं था वह जोड़ दिया। कहीं भी मंदिर को खजाना नहीं लिखा पर हबीब ने जोड़ा। कहीं गंगा-जमुनी तहजीब नहीं लिखी हबीब ने जोड़ी। अलबरूनी 1030 में किताब-उल-हिंद में हिन्दू को अलग पहचान लिख गया पर हबीब ने लिखा हिन्दू पहचान अंग्रेजों ने बनाई। 1857 के जिहाद वाले फतवे ब्रिटिश संग्रहालय में रखे हैं पर हबीब ने लिखा यह किसान विद्रोह था। धर्मसूत्र का आधा श्लोक उठा कर लिखा ब्राह्मण गोमांस खाते थे, अगली पंक्ति जिसमें गोहत्या को महापाप लिखा है छोड़ दी।
जब कैंची और मिलावट दोनों पकड़ी जाएं तो तीसरा चेहरा आता है। 28 दिसंबर 2019 कन्नूर विश्वविद्यालय, 80वीं भारतीय इतिहास कांग्रेस का मंच। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान मौलाना आजाद को उद्धृत कर रहे थे, हबीब उठा और कुर्सी छोड़ कर सीधे राज्यपाल की तरफ बढ़ आया, सहायक की कमीज फट गई, सुरक्षा गार्ड को आना पड़ा। राज्यपाल ने कहा वह सीधे मुझ पर हमला करने आया, यह काम सड़क के गुंडे का है।
किताब में जो काम कैंची करती थी मंच पर वही हाथ करने लगा। मार्क्स की आड़ में मध्यकालीन मजहबी हुकूमत का वकील जो पहले फाइल से अपराध की धारा गायब करता है और जब न्यायाधीश प���ड़ ले तो न्यायाधीश पर ही चढ़ जाता है।
यही पैटर्न है इन डिस्टोरियंस का जिसे वे पूरे भारत में लागू करने का स्वप्न देखते है।
क्या भारत को सांप्रदायिक गृहयुद्ध का सा���ना करना पड़ सकता है?
तुर्की का मानना है कि वह एक सांप्रदायिक संकट भड़का सकता है और फिर संयुक्त राष्ट्र की कूटनीति का इस्तेमाल करके भारतीय मुसलमानों को सशक्त बनाकर देश को और विभाजित कर सकता है।
माइकल रुबिन
मूल अंग्रेज़ी लेख: द संडे गार्डियन, 25 अक्टूबर 2026 — https://t.co/E2vu1mZ13m
पाकिस्तानी और तुर्की इस्लामवादी विमर्श में हमेशा से यह अंतर्धारा रही है कि किसी भी भारतीय मुसलमान को ग़ैर-मुस्लिम शासन के अ��ीन नहीं रहना चाहिए। 6 अगस्त 2019 को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा था कि पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने "भारत के मुसलमानों को एक ऐसी अलग मातृभूमि देने के लिए द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया था, जो कट्टरता और नस्लवाद से मुक्त हो।" ख़ान विभाजन पर ही नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा कि एक दिन "भारत केवल हिंदुओं का देश रह जाएगा।"
16 अप्रैल 2025 को पाकिस्तानी फ़ील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने घोषणा की, "हमारे पूर्वजों का मानना था कि हम जीवन के हर संभव पहलू में हिंदुओं से अलग हैं… हम दो राष्ट्र हैं, हम एक राष्ट्र नहीं हैं।"
जहाँ पाकिस्तान की पहले की बयानबाज़ी मुख्यतः कश्मीर पर केंद्रित थी, वहीं हाल के वर्षों में, जैसे-जैसे पाकिस्तान का सहयोगी तुर्की अधिक इस्लामवादी विदेश नीति की ओर मुड़ा है, पाकिस्तान और तुर्की ने कश्मीर से आगे तक फैली सांप्रदायिक महत्वाकांक्षा��ं के संकेत दिए हैं।
25 सितंबर 2019 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर, तुर्की द्वारा पाकिस्तान के साथ मिलकर आयोजित नफ़रत भरे भाषणों (हेट स्पीच) पर संयुक्त राष्ट्र के एक मंच पर राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने पूछा, "भारत में, हम उन मुस्लिम युवाओं का बचाव कैसे करेंगे जिन पर सिर्फ़ गोमांस खाने के लिए कोड़े बरसाए जा रहे हैं, गँड़ासों से वार किए जा रहे हैं और यहाँ तक कि मौत की सज़ा सुनाई जा रही है?"
इसके ठ��क पाँच महीने बाद अपनी ही राजनीतिक पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए एर्दोगन ने हिंदू शासन के अधीन रह रहे मुसलमानों की स्थिति पर अफ़सोस जताया। "भारत ऐसा देश बन गया है जहाँ नरसंहार आम हो गए हैं। कैसे नरसंहार? मुसलमानों के नरसंहार। किसके द्वारा? हिंदुओं के द्वारा," उन्होंने घोषणा की।
तुर्की का सरकारी प्रेस इससे भी अधिक विषैला है। एर्दोगन के पसंदीदा अख़बार और उनके शासन के अनौपचारिक मुखपत्र "येनी शफ़क़" के संपादक इब्राहीम काराग्युल ने 29 अप्रैल 2025 को लिखा, "अगर चीन और तुर्की पाकिस्तान के साथ खड़े हों… तो भारत के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।" उन्होंने आगे लिखा, "मुग़ल साम्राज्य, सेल्जुक, ओटोमन, सब इस युद्ध में शामिल होंगे!" 8 मई 2025 को "येनी शफ़क़" ने एक प्रमुख पाकिस्तानी स्तंभकार फ़ुरक़ान हमीद का अतिथि संपादकीय प्रकाशित किया, जिसके अनुसार भारत "अल्पसंख्यकों के लिए रहने लायक़ ���हीं रह गया है"; हमीद तुर्की के सरकारी टेलीविज़न की उर्दू सेवा के प्रमुख हैं। अगले दिन स्तंभकार हिलाल कापलान ने "सबाह" में लिखा कि "भारत में कुछ समय से मुसलमानों का एक अनाम नरसंहार चल रहा है…."
विडंबना यह है कि भारत और इज़राइल में मुसलमानों को उन देशों की तुलना में कहीं अधिक अधिकार प्राप्त हैं जहाँ उनके सहधर्मी मुसलमानों का शासन है। फ़्रीडम हाउस की नवीनतम वार्षिक रैंकिंग में इज़राइल, ऊँची रैंक वाले मुस्लिम-बहुल देशों सेनेगल और अल्बानिया से तीन अंक ऊपर है। फ़्रीडम हाउस के विश्लेषक ऐतिहासिक रूप से भारत के प्रति अनुचित रूप से विरोधी रहे हैं, लेकिन फ़्रीडम हाउस भी स्वीकार करता है कि भारत इंडोनेशिया और किसी भी अरब देश की तुलना में कहीं अधिक सहिष्णु और लोकतांत्रिक है, पाकिस्तान और तुर्की की तो बात ही छोड़िए, जिनका स्कोर अल्जीरिया और इराक़ के आसपास है।
मुनीर ���र एर्दोगन की शिकायतों की एक और विडंबना यह है कि पाकिस्तान और तुर्की दोनों ही सहिष्णुता के बिल्कुल विपरीत हैं। जब पाकिस्तान को स्वतंत्रता मिली थी, तब वहाँ बड़े ईसाई और हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय थे और प्रमुख ईसाई और हिंदू त्योहारों को राष्ट्रीय अवकाश तक माना जाता था। आज, राज्य द्वारा भड़काए गए क़त्लेआम और ईशनिंदा क़ानूनों के दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल के चलते बहुत से ईसाई और हिंदू वहाँ से पला��न कर चुके हैं। और जहाँ पाकिस्तान भारत में ख़ालिस्तान आंदोलन का स��र्थन करता है, वहीं वह पाकिस्तानी पंजाब में सिख समुदायों के सफ़ाए का ज़िक्र तक नहीं करता।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लगभग दुनिया के सबसे विविधतापूर्ण देशों में से एक है। यह न केवल हिंदुओं, बल्कि जैन, सिख, बहाई और पारसी (ज़रथुस्त्री) आबादी के लिहाज़ से भी दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है; मुसलमानों की आबादी के लिहाज़ से यह तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत की ईसाई आबादी पूरे ऑस्ट्र���लिया की जनसंख्या से अधिक है। यहाँ 270 से अधिक ऐसी भाषाएँ हैं जिनके कम से कम 10,000 मातृभाषी वक्ता हैं, और 700 से अधिक जातीय समूह हैं। अधिकांश नागरिक भारत के प्रति निर्विवाद निष्ठा रखते हैं और इसे एक बहु-जातीय, बहु-सांप्रदायिक देश के रूप में स्वीकार करते हैं।
बहुत लंबे समय से भारतीय अधिकारी यह मानते आए हैं कि यह रवैया अपरिवर्तनीय है, लेकिन पाकिस्तान और तुर्की दोनों ही मीडिया, सोशल मीडिया और अपने समर��थित संगठनों व धर्मार्थ संस्थाओं के माध्यम से अब खुले तौर पर कट्टर��ंथ, सांप्रदायिक शिकायत-भाव और शासन करने के हक़ की भावना को बढ़ावा दे रहे हैं।
20वीं सदी के उत्तरार्ध में देशों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा आक्रमण से आता था। चीन ने अक्साई चिन हड़प लिया, पाकिस्तान ने कश्मीर के लगभग 30% हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया। अन्यत्र, उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर आक्रमण किया, उत्तर वियतनाम ने दक्षिण वियतनाम को अपने में मिला लिया, तुर्की ने साइप्रस के एक-तिहाई हिस्से पर क़ब्ज़�� कर लिया और इराक़ ने कुवैत पर आक्रमण किया। 21वीं सदी में उग्रवाद और अनियमित युद्ध उतना ही बड़ा ख़तरा हैं। जब रूस ने क्रीमिया पर आक्रमण किया, तो उसने पहले अनियमित लड़ाकों के ज़रिए ऐसा किया। बाल्टिक देश स्वीकार करते हैं कि रूस उनके रूसी-भाषी अल्पसंख्यकों तक पहुँच बना रहा है और उन्हें उकसा रहा है, और उन्हें आशंका है कि किसी भी व्यापक आक्रमण से पहले 'फ़ॉल्स फ़्लैग' (छद्म) संकट खड़े किए जाएँगे और तोड���फोड़ का अभियान चलाया जाएगा। तुर्की का भी मानना है कि वह एक सांप्रदायिक संकट भड़का सकता है और फिर संयुक्त राष्ट्र की कूटनीति का इस्तेमाल करके भारतीय मुसलमानों को सशक्त बनाकर देश को और विभाजित कर सकता है। अब जब एर्दोगन अपने ��ूर्व विदेश मंत्री और यूरोप में सुरक्षा एवं सहयोग संगठन (OSCE) के वर्तमान महासचिव फ़ेरिदुन सिनिर्लिओग्लू को संयुक्त राष्ट्र का अगला महासचिव बनवाने के लिए ज़ोर लगा रहे हैं, यह ख़तरा वास्तविक है।
मुसलमानों को कट्टरपंथ अपनाने के लिए उकसाना उन्हें कट्टरपंथ से मुक्त करने की तुलना में कहीं आसान है। 1980 के दशक में भारत ने इसका एक पूर्वाभ्यास देखा था, जब ख़ालिस्तान आंदोलन ने पूरे भारत में आतंक बरसाय��; यदि भारत के 20 करोड़ मुसलमानों में से दसवाँ हिस्सा भी पाकिस्तानी और तुर्की ऑनलाइन कट्टरपंथ के प्रभाव में आ गया, तो भारत को ऐसे गृहयुद्ध का सामना करना पड़ेगा जो सबसे बुरी स्थिति में उसके अस्तित्व के लिए ख़तरा बन जाएगा, और अधिक संभावना यह है कि वह भारत की अर्थव्यवस्था और निवेश को एक चौथाई सदी या उससे भी अधिक समय तक पंगु बना देगा। दुर्भाग्य से, भारत सरकार और अभिजात वर्ग में बहुत से लोग पाकिस्तान ���र तुर्की की वैचारिक पहुँच और अपने सांप्रदायिक लक्ष्यों का निर्यात करने की उनकी इच्छा को नहीं समझते। भारत अपने ही जोखिम पर सो र��ा है।
माइकल रुबिन वॉशिंगटन डीसी स्थित मिडिल ईस्ट फ़ोरम में नीति विश्लेषण निदेशक और उसानस फ़ाउंडेशन में विशिष्ट फ़ेलो हैं।
They broke our homes, looted our wealth and shattered our dreams. But they couldn’t break our courage, our patriotism or our bond with our motherland.
My Maa and Masi returned to a temple in Kashmir they had visited as five-year-olds, nearly six decades ago. Years of displacement and trauma had kept them from venturing far beyond Srinagar on previous visits. This time felt different. Perhaps they could feel their father, my Nanaji, who once lived nearby.
Watching them relive their childhood through stories was priceless.
You can exile a people from their homeland, but you can never erase their memories or their sense of belonging. Kashmir will always be home ❤️🩹🙏
Sharjeel Imam: I hate RSS and Hindu Majority India
Hindu Leftist: He means he hates RSS and not Hindu Majority India
Sharjeel Imam: I hate you commies as well
Hindu Leftist: He means he hates RSS
Sharjeel Imam: I hate the Fascist Constitution, I want to break away Assam from rest of India.
Hindu Leftist: He means he hates RSS.
Sharjeel Imam: I want to create a 3rd Pakistan
Hindu Leftist: He means he hates RSS
Sharjeel Imam: I hate you too
Hindu Leftist: He means he loves us.
नेहा बोरा इसी 2 कौड़ी के जिहादी देशद्रोही शरजील इमाम के रिहाई के लिए भी प्रोटेस्ट कर रही है। जो भारत से north east अलग करना चाहता
ये पाकिस्तानी मसूद अजहर से कम नहीं है
मुल्ले शवों के साथ भी रेप करते थे। पाकिस्तान में आज भी वही हो रहा है। इसलिए हिन्दू स्त्रियाँ जौहर करती थीं। किसी दो कौड़ी की मुल्ला प्रेमी, करियर में फुँक चुकी लौंडी के लिए यह समझना कठिन हो सकता है क्योंकि उसके लिए उसकी ‘पुसी फॉर अ रे��ट’ ही जीवन का सत्य है।
ऐसी लौंडियाँ सेक्स को स्वतंत्रता मानती हैं, जितनों के साथ सेक्स, उतनी अधिक स्वतंत्र। हर स्त्री ऐसा नहीं मानती। उनके लिए अरब के बाजारों में सेक्स स्लेव बनना उतना अडवेंचरस और फुलफुलिंग नहीं दिखा होगा, जितना आइडेंटिटी क्राइसिस से जूझती, भैया कह कर सैंया बनाने वाली के लिए दिखता हो।
तुम नंगी हो कर एम्सटर्डम के बाजारों के शीशे में नाचों, तुम्हारी मुटल्ली देह भी किसी को प���ंद आ जाएगी। हाँ, किसी योनि-केन्द्रित लौंडिया का नारीवाद यह तय नहीं करेगा कि दूसरी स्त्रियाँ रंडी बन कर ही घूमें क्योंकि तुम्हें रंडीपना बहुत पसंद है।
यह पोस्ट मैंने बहुत माइल्ड लिखा है। हिन्दू नारियों पर ऐसे आक्षेप का उत्तर मैं और भी अच्छी शब्दावली के साथ दे सकता हूँ।
First they will call a God Muruga as a Tamil ancestor who's worshipped by an ethnicity, but also respected by other religionists as a Muppaattan.
Then they will reduce the Muppaatan to a secular philosopher whose way of life should be followed by all, like Valluvar or Vallalaar.
Then they will strip him of all religious symbols and add him to their pantheon of saints. They will write books and Wikipedia articles saying St Murugan met St Thomas in the hill and St Murugar generously offered the St Thomas Mount to him.
Then they will call Thai Poosam a secular Tamil festival, even lighting lamps in their places of worship in honor of St Muruga, offering Beep as padayal to him saying it is ok in their indigenous tradition and ask you to respect diversity.
This is how they dilute and steal and denigrate other gods, because their viswasam is to their ONE true God only. தன்மானமுள்ள, சுயமரியாதையுள்ள, மத்தவங்ககிட்ட validation பிச்சை எதிர்ப்பார்க���காத தமிழன் இதெல்லாம் நடக்காம பாத்துப்பான், நடக்குறப்போ தட்டிக் கேப்பான்.